अमर शहीद अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ: व्यक्तित्व और कृतित्व (काकोरी के अमर शहीद का जीवन व रचनाएँ)
Amar Shaheed Ashfaqulla Khan: Personality & Works
अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ 'वारसी' (सम्पादक: बनारसीदास चतुर्वेदी) द्वारा
पृष्ठ 55, कुल 297 में से
संदर्भ में पढ़ेंअतः घर के नौकर से कहकर वह पुस्तक चिमटे से उठाकर एक
ओर रखी गयी। यह घटना अंग्रेजों और अंग्रेजी संस्कृति के प्रति आक्रोश
ही नहीं घृणा भी दर्शाती है। अशफाक को ऐसी घटनाओं से पीड़ा होती,
वे एक बदली हुई मानसिकता के धनी थे। वे ऐसे संकीर्ण विचारों से ऊपर
उठ चुके थे। परन्तु क्या करते किस-किस को समझाते। वे अन्त तक ऐसी
भावनाओं के कारण शिक्षा से वंचित होने की पीड़ा का बखान करते रहे।
यह अशफाक के स्वस्थ व्यक्तित्व और सुलझी हुई मानसिकता का द्योतक
है।
परम्परानुसार एक मौलवी साहब ने अशफाक और उनके भाइयों की
शिक्षा का भार लिया। छोटी उम्र में ही अशफाक को उनके भाइयों के
साथ पढ़ने भेज दिया गया जबकि बिस्मिलाह की रस्म के बिना अक्षर
ज्ञान नहीं कराया जाता था। लेकिन यहां तो चिकने पात हैं सो रस्म
होने तक अशफाक ने लिखना पढ़ना सीख लिया। मौलवी साहब ने
औपचारिक रस्म पूरी की और फिर अक्षर ज्ञान कराने लगे। बहुत कम
समय में ही अशफाक ने उर्दू और फारसी सीख ली। मौलवी साहब ने
'अखलाक मोहसनी' और 'अनवार सहेली' पढ़ा दी थी। चूँकि अशफाक
के घर उर्दू की कई पुस्तकें थीं सो वे उन तमाम पुस्तकों का अध्ययन
करने लगे थे। अशफाक की पसन्द शाहनामा थी तिलस्महोशरूबा भी वे
चाव से पढ़ते थे।
अशफाक उल्ला खाँ को बचपन में मेले के अवसर पर तलवार
खरीदने का बड़ा शौक था। बाद में यही शौक पिस्तौल में बदल गया।¹
यह शौक ऐसे ही नहीं उपजा था। अशफाक को युद्ध विषयक पुस्तकें पढ़ने
में आनंद आता था। भले ही वे मौलवी साहब के पास ही क्यों न रहे हों।
अवसर मिलते ही वे अपनी रुचि के अनुसार पुस्तकों को पढ़ लेते थे।
- जांबाज (पत्रिका) सुरेश कुमार खन्ना, पृष्ठ-1
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