अमर शहीद अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ: व्यक्तित्व और कृतित्व (काकोरी के अमर शहीद का जीवन व रचनाएँ)
Amar Shaheed Ashfaqulla Khan: Personality & Works
अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ 'वारसी' (सम्पादक: बनारसीदास चतुर्वेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंइस हेतु वे दण्ड के भागी भी बनते थे, मौलवी साहब के देख लेने पर वे
कान पकड़कर उठक-बैठक लगाया करते थे। अशफाक बचपन में शैतान
बच्चों की श्रेणी में रखे जाते थे। घर पर भी उनकी शैतानियों से अन्य
बच्चे परेशान रहा करते थे। शरारतों से तंग आकर घर वालों ने निर्णय
लिया कि अब अशफाक को खाली रहने का अवसर ही न दिया जाय।
दोपहर तक उन्हें घर में पढ़ने के काम में लगाया जाता था। इसके बाद वे
मौलवी साहब के पास पढ़ने चले जाते थे।
अशफाक ने लिखा है - 'मुझे जंग के हालात पढ़ने में बहुत
दिलचस्पी थी और मैं इस तरह की किताबे पढ़कर मस्त रहता था और
असली बात भी पैदा करने की कोशिश करता था, जिसका नतीजा यह
निकलता था कि मौलवी साहब मुझे कान पकड़कर उठाया-बैठाया करते
थे। थी तो वह सजा, मगर मेरे लिए कसरत का काम करती थी। और मैं
भाइयों में सबसे छोटा होने पर भी धूल चटा देता था। मुहल्ले में हमेशा
जंग छिड़ी रहती थी, क्योंकि मैं एक जंगजू लड़का था। मार पीट का
बाजार गर्म रहता था। उस समय यह सजा तजवीज की गयी थी कि
फुरसत ही न दी जाए कि यह शरारत करें। चुनांचे मौलवी साहब के पास
दोपहर को जाना और फिर शाम को मगरिब के वक्त तक पास रहना
पड़ता। जब मगरिब की नमाज पढ़कर मौलवी साहब घर वापस जाएं, उस
वक्त मुझे छुट्टी मिलती थी, बस वैसा ही मजा अब आ रहा है.... कि
फाँसी की कोठरी है और हम हैं। बाहर कुछ भी तमाशा हो, कुछ भी हो,
न बाहर निकल सकते हैं, न देख सकते हैं। यही हाल जब था कि बाहर
के लड़कों के खेलने की बस आवाज सुना करते थे और दिल
मसोस-मसोस कर रह जाते थे। सबक में मौलवी साहब खुश रहते थे,
मगर शरारत के वक्त और ज्यादा खुश कि सैकड़ों बैठक करा लेते थे या
यों इसलिए कि मौलवी साहब का तरीका-ए-तामील निराला था।' जंग की
कहानी पढ़ने का शौक कोई मामूली बात नहीं थी। संघर्ष उनके स्वभाव
में था, रक्त में था।
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