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अमर शहीद अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ: व्यक्तित्व और कृतित्व (काकोरी के अमर शहीद का जीवन व रचनाएँ)

अमर शहीद अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ: व्यक्तित्व और कृतित्व (काकोरी के अमर शहीद का जीवन व रचनाएँ)

Amar Shaheed Ashfaqulla Khan: Personality & Works

अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ 'वारसी' (सम्पादक: बनारसीदास चतुर्वेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished297 पृष्ठ

पृष्ठ 50, कुल 297 में से

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जब वह कहते थे कि तुम खानयीने वतन की औलाद हो, मैं उन
अहबाब का नाम नहीं लिखना चाहता हूँ। चूँकि उनको शर्म आयेगी कि
वह इस वक्त अपने गले में गुलामी का पट्टा डाले हुए हैं या सरकारी
कचहरियों में कुंजड़ो, कुंजड़ियों की तरह बाररूम में दुकाने लगाये हुए बैठे
हैं। उस वक्त उनको फख्र था कि उनके आबाब-अजदाद उस गिरोह के
एक बड़े रुक्न थे, जिसने आजादी का अलम बुलन्द किया था। खैर मैंने
अपनी कुर्बानी से इस धब्बे को जो 1857 ई० में मेरे ननिहाल के बुजुर्गों ने
अस्मते वतन पर लगाये थे, अपने खून से और नौजवान मासूम खून से
धो डाले, क्या इस खानदान का इसको कफारा समझा जा सकता है।
ख्वाह यह हो या न हो मेरी आने वाली नस्ल पर यह एतराज न होगा
कि वह उस खानदान से ताल्लुक रखते हैं, जो खाएन था, बल्कि मेरी
कुर्बानी से लोग रहम करेंगे और उनको अशफाक के खानदान का एक
मेम्बर ख्याल करके बुजुर्गों की गलतियाँ फिर अजसरे नौ याद न करेंगे।
मुझे ननिहाल के खानदान के बारे में बस इतना ही लिखना है। अब
मुझको यह अन्देशा है कि यह खानदान अब तरक्की करने के काबिल न
हो सके, क्योंकि अब नौजवान तरक्की करने के बजाय अपने बुजुर्गों पर
ही नाज करने को अपना शआर बनाये हुए हैं।
अगर यही सिम्मेकातिल है कि बुजुर्गों की तारीफ में लगे रहें या उन
पर फख्र करते रहे, इन्सान को खुद इम्ताजी हैसियत हासिल करना
चाहिए। बुजुर्गों पर फख्रों मुवाहात की जरूरत नहीं। यूं मैं दादा की तरह
कौम परस्त और ननिहाल की तरफ से अंग्रेज परस्त पैदा हुआ था। मगर
माँ का खून कमजोर था, यूँ वतनी आजादी का जज्बा ताकतवर रहा और
वतन प्यारे वतन के लिए आज मौत के तख्ते पर खड़ा हूँ'।¹ अशफाक के
ये शब्द उनकी मानसिकता को बखूबी दर्शाते हैं।

  1. अशफाक उल्ला खाँ, भवान सिंह राणा, पृष्ठ-12
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