अमर शहीद अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ: व्यक्तित्व और कृतित्व (काकोरी के अमर शहीद का जीवन व रचनाएँ)
Amar Shaheed Ashfaqulla Khan: Personality & Works
अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ 'वारसी' (सम्पादक: बनारसीदास चतुर्वेदी) द्वारा
पृष्ठ 57, कुल 297 में से
संदर्भ में पढ़ेंस्कूल के दिनों की एक घटना से उनकी मानसिकता स्पष्ट हो जाती
है। जब अशफाक ने अचानक सुना कि दिल्ली में वायसराय पर किसी ने
बम फेंक दिया और इसी सिलसिले में जब स्कूल बन्द हुआ तो अशफाक
की प्रसन्नता देखते बनती थी। वे घटना की गहराई जानने का प्रयत्न
करते और स्वप्न लोक में खो जाते थे।¹ यही नहीं अंग्रेजी साम्राज्यवाद के
विरुद्ध तलवार से लैस एक क्रांतिकारी के रूप में अपनी कल्पना करने
लगते। तलवार का सपना अशफाक के लिए नया नहीं था। जैसा कि
पहले भी कहा जा चुका है कि वे मेले में तलवार खरीदने का शौक रखते
थे। ऐसी ही एक घटना पिता के साथ घटी जब उनके पिता जिन्दा थे।
अशफाक ने अपने पिता से कहा -'मियाँ आप मुझे एक तलवार मोल ला
दें।' पिता ने जवाब दिया - 'बेटा, तुमसे कोई छीन लेगा।' अशफाक
बोले - 'आप चाँदी की तलवार न लाएँ, बल्कि लोहे की ला दें। वह कोई
नहीं छीनेगा।'... यह सुनकर पिता हंस पड़ें।² शायद यही मानसिकता
काफी थी कि वे आगे चलकर अंग्रेजी सत्ता को जबरदस्त चुनौती दे सके।
अशफाक को तालीम देने वाले मौलवी भी निराले थे। वे अपने विषय में
काफी योग्य व्यक्ति थे। लेकिन वे पढ़ाते वक्त अंग्रेजी को कोसने उसके
अवगुणों के बखान में ज्यादा वक्त लगाते थे। मौलवी साहब का विचार
था कि अंग्रेजी पढ़ने का अर्थ है नरक का मार्ग बनाना। उन्हें अंग्रेजी
व्यवहार, कपड़े, भाषा सबसे घृणा थी। इस हेतु वे सदैव तत्पर रहते थे।
मौलवी साहब सुनी सुनाई या स्वयं से गढ़कर ऐसी कहानी सुनाते थे कि
उनके शिष्यों में अंग्रेजी के प्रति नफरत पैदा हो जाय।
- शहीद अशफाक उल्ला खाँ, सुधीर विद्यार्थी पृष्ठ 7
- शहीद अशफाक उल्ला - सुधीर विद्यार्थी पृष्ठ 7
34