अमर शहीद अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ: व्यक्तित्व और कृतित्व (काकोरी के अमर शहीद का जीवन व रचनाएँ)
Amar Shaheed Ashfaqulla Khan: Personality & Works
अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ 'वारसी' (सम्पादक: बनारसीदास चतुर्वेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअंग्रेजी या अंग्रेजों के प्रति घृणा का प्रथम बीज मौलवी साहब ने
ही बोया जो आगे चलकर अंकुरित हो गया। अशफाक देह से मजबूत
इंसान थे चौदह वर्ष की अवस्था में ही वे एक तगड़े नवयुवक की तरह
लग रहे थे। गणित के कमजोर अशफाक को कोई अध्यापक यदि डाँट
देता था वे ऐंठ जाते थे। शायद उन्हें अपने बुजुर्गों की परम्पराओं पर गर्व
हो न हो। हालांकि बाद में चलकर अशफाक ने ऐसी गलती के लिए दुख
व्यक्त किया है। अध्यापकों के प्रति उपेक्षा पूर्ण व्यवहार से प्रायः हर
अध्यापक उनसे खुश नहीं रहते थे। अशफाक ने लिखा है- 'चूँकि मैं
बचपन से ही गबजनार और लड़ाकू था, यूँ लड़के तो फिर लड़के थे,
मास्टरों से जरा भी न दबता था, वह भी अगर कुछ कह सकते थे इतना
उनसे हो सकता था कि इम्तिहान में ख्याल रखें और अक्सर हमारे
मास्टर पृथ्वी सिंह साहब आंजहानी कहा करते थे कि खाँ साहब! अप्रैल
के महीने का भी ख्याल है? और बेचारे अपना वायदा पूरा करते।’¹
पढ़ाई के प्रति लापरवाह अशफाक एक दबंग विद्यार्थी तो थे ही,
प्रारम्भ के दिनों में टोने-टोटके और गंडे-ताबीज में विश्वास रखते थे।
लापरवाह होने के बावजूद वे तीव्र बुद्धि वाले कुशाग्र विद्यार्थी थे।
रेखागणित में काफी कमजोर थे लेकिन छठवी कक्षा का पूरा कोर्स मात्र
छः घंटो में पूरा कर लिया और परीक्षा के दिनों में छः में से पाँच
सवाल सही कर आये।
विद्यार्थी अशफाक उल्ला खाँ अंग्रेजी स्कूल (मिशन स्कूल) शाहजहाँपुर के
छात्र हो गये। यही वह काल था जब मैनपुरी काण्ड हुआ और राम प्रसाद
बिस्मिल जो उनके शहर के थे और कुछ अन्य क्रांतिकारियों पर केस
चला। उनके विद्यालय से भी एक क्रांतिकारी की गिरफ्तारी हुई।
- अशफाक उल्ला खां, भवान सिंह राणा, पृष्ठ-21
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