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अमर शहीद अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ: व्यक्तित्व और कृतित्व (काकोरी के अमर शहीद का जीवन व रचनाएँ)

Amar Shaheed Ashfaqulla Khan: Personality & Works

अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ 'वारसी' (सम्पादक: बनारसीदास चतुर्वेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished297 पृष्ठ

क्रान्तिकारियों को तो जोश चाहिए था, ऊर्जा चाहे जहाँ से मिले।
एक-एक वाक्य असरदार साबित हो रहे थे। पूर्णरूप से युवा सहमत थे कि
उन्हें किसी भी प्रकार की भिक्षा नहीं चाहिए। तिलक ने 15 जून 1897 को
'केसरी' में लिखा कि - 'यदि हमारे घर में चोर घुस आये और हममें
उनको घर से बाहर निकालने की सामर्थ्य न हो तो हमें बिना झिझक
उन्हें घर के अन्दर बन्द करके जला देना चाहिए'। लाला लाजपत राय ने
कहा कि - 'अंग्रेज भिखारी से सबसे अधिक घृणा करते हैं तथा मैं
सोचता हूँ कि भिखारी घृणा के पात्र हैं भी। अतः हमारा कर्तव्य है कि
हम सिद्ध कर दे कि हम भिखारी नहीं है।'¹
1909 का एक्ट लागू होने के बाद अंग्रेजी शासन का विरोध करने
वाली एक मात्र पार्टी क्रांतिकारी पार्टी थी। यह क्रांतिकारी पार्टी जनता में
चर्चा का विषय बनी हुई थी। आम जनता क्रांतिकारियों का समाचार
सुनने की हमेशा इच्छुक रहती थी। क्रांतिकारियों को दी जाने वाली
सजाओं में जो कड़ी और कठोर अमानवीय हुआ करती थी, से जनता में
अंग्रेजी सरकार के विरुद्ध रोष बढ़ जाता था। बहुत लोग बमबारी जैसी
घटनाओं के होने को सही ठहराते थे। ऐसा विश्वास होने लगा था कि
ऐसी ही घटनाओं से देश आजाद हो जायेगा। किसी भी अंग्रेज अफसर
की हत्या से सारे देश में चर्चा होती थी और जनता में हलचल मच जाती
थी। अधिकांश लोग समाचार पत्रों में डकैतियां, अफसरों पर हमले की
घटनाओं का समाचार बड़े चाव से सुनते-पढ़ते थे। संयुक्त प्रान्त में 1908
में बनारस में शचीन्द्रनाथ सन्याल द्वारा एक क्लब की स्थापना से
क्रान्तिकारी गतिविधियों की

  1. भारत में राष्ट्रीयता का विकास, डॉ० एस०एल० नागोरी, पृष्ठ-177
    9

शुरुआत हुई।¹ इस क्लब का नाम अनुशीलन समिति रखा गया। यह
समिति 1914 तक निष्क्रिय रही। उसी वर्ष रास बिहारी बोस ने संयुक्त
प्रान्त की गतिविधियों का संचालन अपने हाथ में ले लिया। इसके बाद
तो संयुक्त प्रान्त का क्रांतिकारी स्वर ओज से भर गया। क्रांतिकारी स्वर
के उग्र होने के कई कारण हो सकते हैं लेकिन एक महत्वपूर्ण कारण
'आर्थिक कारण' भी था। लार्ड बेकन ने कहा है कि - 'आर्थिक दरिद्रता
और आर्थिक असंतोष क्रांति को जन्म देता है।'
यह निश्चित है कि असंतोष चाहे जिस प्रकार का क्यों न हो वह
क्रांति को जन्म देता ही है। शाहजहाँपुर भी इससे अछूता नही रहा।
रजनी राय दत्त का मत है कि 1857 के विद्रोह से यह बात साफ हो गयी
कि सतह के नीचे जनता में असंतोष और बेचैनी की भयानक आग
सुलग रही है। इस असंतोष की आग के कारण अंग्रेज शासकों में ऐसी
घबराहट पैदा हुई जो इसके बाद की उनकी सारी कठिनाइयों में दिखायी
देती है।² यह बेचैनी और यह सुलगती आग शाहजहाँपुर में भी थी।
शाहजहाँपुर पर एक नजर दें तो अशफाक के व्यक्तित्व और उनकी
क्रांतिकारी भूमिका का संस्कार स्पष्ट हो जायेगा। रामायण और महाभारत
काल से होता हुआ शाहजहाँपुर वाजिद अली शाह के शासनकाल तक
अपनी पहचान और महत्वपूर्ण छवि पर कायम रहा। अंग्रेज अपने स्वभाव
और अपनी नीतियों के कारण अवध पर कुशासन का आरोप लगाकर
अपने अधिकार में कर लेने का कुचक्र रचने लगे थे। नवाब वाजिद अली
शाह ने आरोपों का खण्डन किया। वे किसी भी मूल्य पर अवध को
ब्रिटिश सत्ता के हाथों नही सौंपना चाहते थे। नवाब ने महारानी
विक्टोरिया को एक स्मृति पत्र दिया कि यदि कम्पनी के शासन के अधीन
कानपुर, फर्रुखाबाद और शाहजहाँपुर के नवाब के अधीन जिलों की

  1. भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास, रामगोपाल, पृष्ठ-207
  2. भारत वर्तमान और भावी, रजनीपाल दत्त, पृष्ठ-119
    10

तुलना की जाये तो स्पष्ट हो जायेगा कि नवाब के अधीन इलाके की
जनता ज्यादा सरसब्ज और खुशहाल है।¹ यह तो स्पष्ट तब भी था कि
अंग्रेजी शासन भारतीयों को सुखकर नहीं था। 1857 के प्रमाणिक लेखक
सर जगन लिखते हैं कि 'शाहजहाँपुर में ब्रिटिश अधिकारियों को शहर के
लोगों द्वारा विद्रोह करने का भय था।² सत्ता हमेशा क्रांति से भय खाती
है। अंग्रेज भी विद्रोह से डरे हुए थे और यह भय वास्तविकता में तब
बदल गया जब 31 मई 1857 को लगभग 20-22 विद्रोही तलवार लिए चर्च
में घुस गये। इन विद्रोहियों का जवाहर राय नामक व्यक्ति नेतृत्व कर रहा
था। विद्रोहियों में अन्य प्रमुख विद्रोही थे - गंगा दुबे, महादेव, राम
नारायण दुबे, बिन्द्रा सिंह, रामधीन सिंह, नारायण पाण्डे, ननकूं व शिव
चरण। यह बात और थी कि इन विद्रोहियों को गिरफ्तार किया गया, इन
पर मुकदमा चला, जेल भी गये और फिर मुक्त कर दिये गये।
शाहजहाँपुर की क्रांति में गोरखपुर के मौलवी सरफराज अली का भी
महत्वपूर्ण योगदान था।³ सरफराज अली में विशेष गुण थे। उनका नेतृत्व
कभी असफल नहीं रहता। शाहजहाँपुर अब क्रांतिकारियों का अड्डा बन
गया। अब क्या था युवा का खून उमाँच बाँधने लगा और फिर क्रांति का
दौर रुका नहीं। डॉ० ए०डफ ने लिखा है - 'यदि इस विद्रोह को
बहुसंख्यक जनता का समर्थन प्राप्त न होता और सहानुभूति न मिली
होती और केवल सैनिकों द्वारा किया गया बलवा मात्र ही होता तो प्रथम
दो चार बड़ी विजयों के उपरान्त यह बगावत शान्त हो जाती।


1.वाजिद अली शाह और अवध राज्य का पतन, परिपूर्णानंद वर्मा, पृष्ठ-35
2.हिस्ट्री ऑफ दि इण्डियन म्यूटनी खण्ड-3, सरजान विलियम्स, पृष्ठ-578
3.स्वतंत्रता आंदोलन में शाहजहाँपुर का योगदान, डॉ० एन०सी०मेहोत्रा, पृष्ठ-41

11

.....प्रतीत होता है कि यह सैनिकों का साधारण विद्रोह नहीं, यह विप्लव
है, क्रांति का विस्फोट है।' ¹ राष्ट्रीय चेतना जगाने का काम आर्य समाज
ने भी जमकर शाहजहाँपुर की धरती से किया। स्वतंत्रता की पहली पंक्ति
के शब्द स्वामी दयानंद सरस्वती के मुख से ही निकले थे। क्रांति की
धधकती ज्वाला से भरपूर क्रांति का हवन कुण्ड वैचारिक समिधा से
प्रज्ज्वलित हो रहा था। एक तरफ युवा वर्ग का गर्म खून और दूसरी ओर
वैचारिक आक्रोश के तेजस्वी स्वर.... फलस्वरूप राम प्रसाद बिस्मिल और
अशफाक उल्ला जैसे युवा इस वैचारिक भूमि से अछूते नहीं रहे। राम
प्रसाद बिस्मिल पूर्ण रूप से आर्य समाजी हो गये और उन्हीं के मित्र
अशफाक बिना किसी हिन्दू-मुस्लिम भेद के घनिष्ठ मित्र ही नहीं देश प्रेमी
भी हुए, जिन्होंने राम प्रसाद की ही तरह भारत भूमि को अपने प्राण
न्यौछावर कर दिये। भारतीय क्रांतिकारियों के इतिहास में अशफाक की दी
हुई प्राणों की आहुति सदैव रेखांकित होती रहेगी।
1916 की राजनैतिक घटनाएं महत्वपूर्ण रहीं और शाहजहाँपुर के
मामलों में तो खास थीं। इसी काल में हसरत मोहाली, शौकत अली,
मोहम्मद अली, शमसुद्दीन को नजरबन्द रखा गया।² क्रांतिकारी
परमानन्द को लाहौर षड्यन्त्र केस (1916) के तहत फाँसी की सजा
सुनाकर क्रांतिकारियों को विचलित कर दिया। राम प्रसाद बिस्मिल ने
आर्य समाज मंदिर में स्वामी सोमदेव के समक्ष बदला लेने की प्रतिज्ञा
की।³ सन् 1916 में ही हसरत मोहानी के साथ शाहजहाँपुर में शमसुद्दीन
को भी बन्दी बनाया। अशफाक को क्रांति का वातावरण मिला। वे दिन
प्रतिदिन क्रांति हेतु निखरते चले गये।

  1. दि इण्डियन रिबेलियन, डा०ए०डफ, पृष्ठ 241
  2. पूर्वा-जगदीशचन्द्र दीक्षित, पृष्ठ-83
  3. जांबाज पत्रिका, डा० एन०सी० मेहरोत्रा, पृष्ठ-47
    12

राष्ट्र हेतु समर्पित होने का भाव उमाँचे बाँधने लगा था।
अशफाक उल्ला की पारिवारिक पृष्ठभूमि पर एक नजर दें तो स्थिति
और स्पष्ट हो जायेगी। अशफाक उल्ला खाँ अंग्रेजी सरकार की
गतिविधियों की बखूबी जानकारी रखते थे। 1857 से ही अशफाक उल्ला
का मातृपक्ष सरकारी पदों पर कार्य करता चला आ रहा है। किसी भी
व्यक्ति के लिए उसकी पारिवारिक पृष्ठभूमि का खास महत्व होता है।
अध्ययन से पता चला कि अशफाक उल्ला खाँ के पूर्वजों ने सरकार के
लिए जासूसी भी की थी। अशफाक उल्ला खाँ को जब यह ज्ञात हुआ कि
मातृपक्ष (ननिहाल) के लोग अंग्रेजों के प्रति भक्ति भावना रखते है तो वे
स्वयं को (लज्जित) हीन समझने लगे, उन्हें अपने आप से शर्म आने
लगी। लेकिन उन्हें किसी भी भाँति अपने विश्वास को बनाये रखना था।
पितृपक्ष पर जब उनका ध्यान गया तो उन्होंने पाया कि पिता की ओर से
स्वाधीनता के उपासक की सुगंध आ रही है। वैसे अशफाक के पिता सब
इन्स्पेक्टर थे। अशफाक को युद्ध विषयक पुस्तकें पढ़ने का शौक बचपन से
ही था। वे क्रांतिकारियों के विषय में अनेक बातें ध्यान से सुनते थे।
अशफाक खुदीराम बोस और कन्हाई दत्त के सम्पर्क में आये। अशफाक
के दिल में दबा हुआ क्रांतिकारी बीज अंकुरित होने लगा। अशफाक देश
के लिए घातक संकीर्ण मनोवृत्ति का परित्याग कर बिना किसी भेद भाव
के राष्ट्र की एकता और अखण्डता को बचाये रखना चाहते थे, इस हेतु
किसी भी प्रकार के कार्य करने से वे हिचकते नही थे। यह तो स्पष्ट ही
था और सत्य भी कि क्रांतिकारी आन्दोलन राष्ट्रीय मुक्ति संघर्ष की एक
बलवती व प्रभावोत्पादक धारा थी। शचीन्द्र नाथ सान्याल का कथन था
कि 'क्रांतिकारियों ने राष्ट्रीय मुक्ति संघर्ष को आगे बढ़ाने के लिए उत्प्रेरक
तथा पूरक भूमिका निभाई।'
अशफाक उल्ला खाँ को जहाँ सबसे ज्यादा प्रेरणा मिली वह था
मैनपुरी काण्ड। शाहजहाँपुर का महत्वपूर्ण योगदान था मैनपुरीकाण्ड में।
13

इस काण्ड के तहत लालारामाधीन, राम प्रसाद बिस्मिल, देवनारायण,
गंगा सिंह चन्देल, राजाराम बाजपेयी, कालीचरन शर्मा ने उल्लेखनीय
भूमिका निभाई। सर्वविदित है कि यही मैनपुरी काण्ड है जिससे प्रेरित
होकर अशफाक उल्ला ने भारत को गुलामी की जंजीरों से मुक्त कराने का
संकल्प लिया। इसके बाद अशफाक उल्ला पं० राम प्रसाद बिस्मिल के
सम्पर्क में आये, लेकिन प्रथम मिलन में अशफाक को निराशा हाथ लगी।
लेकिन होना तो कुछ और ही था। तमाम आरोहों-अवरोहों के बाद कट्टर
मुस्लिम परिवार के अशफाक और आर्य समाजी पं० राम प्रसाद बिस्मिल
के बीच धार्मिकता जैसी बात आड़े नहीं आई और वे एक दूसरे के गहरे
मित्र बन गये। अब क्या था अशफाक की प्रसन्नता का पारावार न था।
वे एक ऐसे क्रांतिकारी के मित्र बन गये जिनके नाम के स्मरण मात्र से
ओज भर जाता था। दो देश-भक्त एक जान, एक मन, एक काम, एक
विचार हो गये और यह गति अशफाक को ऊँचाई पर ले जाकर ही दम
ली। भेद भाव के सारे प्रश्न समाप्त हो गये थे। राम प्रसाद बिस्मिल ने
जिन युवकों को शाहजहाँपुर में क्रांतिकारी दल की ओर प्रवृत्त किया उन
युवकों में अशफाक उल्ला खाँ प्रमुख थे। जांबाज अशफाक उल्ला जब
क्रांतिकारी दल में सम्मिलित हो गये तो उन्होंने इस धारणा को मिथ्या
सिद्ध कर दिया कि मुसलमान भारत की स्वाधीनता के लिए बलिदान
करने में पीछे रहने वाले हैं। राम प्रसाद बिस्मिल का साथ मिल जाने के
कारण अशफाक का जीवन ही भिन्न हो गया। अब वे सामान्य नागरिक
नहीं रह गये थे। अब वे देश के लिए जरूरी थे। वे इतिहास के लिए
आवश्यक थे। वे क्रांतिकारी यात्रा में प्रमुख मार्ग थे।
देश के लिए मर मिटने वाले उन विशेष लोगों में वे थे जिनका सारा
धर्म, कर्म, विश्वास, दिनचर्या, विचार सिर्फ राष्ट्र की स्वतंत्रता में लगा
था।
14

अशफाक उल्ला खाँ भारत में हिन्दू मुस्लिम एकता का सपना लेकर
क्रांतिकारी बने थे। वे एक प्रगतिशील समाज की संरचना चाहते थे। यही
नही वे समाजवादी विचारधारा के पोषक थे। स्वयं अशफाक ने कहा है -
'मैं हिन्दुस्तान की ऐसी आजादी का ख्वाहिशमंद हूँ जिसमें गरीब खुश
और आराम से रहते और सब बराबर होते।' ऐसी विचारधारा के धनी
अशफाक निश्चित ही स्तुत्य हैं। अशफाक के काल में क्रांतिकारियों का
एक और प्रमुखकाम था कि वे अपने सभी मित्रों को, चाहे वे क्रांतिकारी
हों या न हों, मातृभूमि के लिए आत्म बलिदान हेतु प्रेरित करते रहते थे।
क्रांतिकारियों का कार्य महत्वपूर्ण तो था ही लेकिन इससे अधिक महत्व था
स्वतंत्रता के संघर्ष में स्वस्थ और सार्थक वातावरण तैयार करना और
वातावरण के काम में शायर दिल अशफाक उल्ला खाँ सबसे आगे थे। यह
उनके पत्रों विचारों और काव्य रचनाओं से स्पष्ट हो जाता है। अशफाक
बचपन में अपने मौलवी साहब की शिक्षाओं से खूब प्रभावित हुए।
मौलवी साहब सच्चे उस्ताद थे जो अशफाक को तराशकर देश हित हेतु
तैयार करने में खूब मददगार साबित हुए। सत्य है कि अशफाक को
तराशने का यही समय था जब बाल मन के हृदय में ऐसा बीज बोया जा
सके जो आगे चलकर वृक्ष बनकर पूरे समाज की अपनी छाया और अपने
फल से सेवा कर सके। युवा वर्ग में उत्साह और प्रेरणा भर सके। मौलवी
साहब की शिक्षाओं ने जाने-अनजाने अंग्रेजों के प्रति नफरत पैदाकर दी
थी। यदि उनके बाल मन और युवा ऊर्जा की तुलना करें तो स्पष्ट हो
जायेगा कि वे एक जांबाज सिपाही, एक विश्वसनीय और निष्ठावान
कार्यकर्ता थे। वे मातृभूमि हेतु सब कुछ न्यौछावर कर देने वाले मानव
थे। उनकी बहुमुखी प्रतिभा से प्रायः सभी प्रभावित रहते थे।
15

आगे चलकर अशफाक उल्ला खाँ सशस्त्र क्रांति के ध्वजवाहक बने।¹
उनकी बहादुरी, निडरता और अदम्य साहस से भला कौन क्रांतिकारी
अछूता था। देशभक्ति की प्रबल भावना तो थी ही, साथ ही उनमें
हिन्दू-मुस्लिम को साथ-साथ लेकर चलने का अभूतपूर्व कौशल था। यही
क्षमता, यही संवेदनशीलता अशफाक को समाज में लोकप्रिय बना सकी।
कवि हृदय भावुक और संवेदनशील तो होता ही है। वे अपनी बात
कविताओं, गज़लों एवं नज़्मों में कहते थे। उनकी लिखी गयी कविताएं
आज भी रेखांकित होती हैं।
अशफाक की कविताओं के बिना स्वतंत्रता संघर्ष हेतु लिखी गयी
रचनाओं का अध्याय पूरा नही होता। अशफाक के पत्र और उनके वक्तव्य
इतने प्रभावित करते हैं कि एक शान्त मन भी उद्वेलित हुए बिना नही रह
सकता। अशफाक के बचपन का अध्ययन करने से स्पष्ट है कि पूत के
पाव पालने में ही नजर आने लगे हैं। वे जब भी मेले जाते थे तो
तलवार खरीदते थे। जिससे पता चलता है कि अशफाक के भीतर क्या रहा
है। निश्चित ही यह गुण क्रांतिकारी होने का अंकुरण है।
मैनपुरीकाण्ड का प्रभाव तो अशफाक पर पड़ ही चुका था और वे
बाकायदा राम प्रसाद बिस्मिल की सेना में शामिल भी हो गये थे।
अशफाक अब क्रांतिकारी पहचान की संज्ञा से अलंकृत थे। छोटी-छोटी
घटनाओं डकैतियों के बाद जब राम प्रसाद बिस्मिल की घोषणा के
अनुसार वे काकोरी काण्ड में महत्वपूर्ण भागीदारी निभाने हेतु प्रथम पंक्ति
में खड़े हुए तो अशफाक की निष्ठा, उनका शौर्य, बल, साहस का आभास
किये बिना रहा नही जा सकता है। वैसे तो अशफाक इस डकैती की
योजना के पक्षधर नही थे। लेकिन स्वयं को मनाकर जब वे प्रस्तुत हुए
तो उनके फौलादी तेवर और ताकतों की सभी साथियों ने सराहना की।

  1. जांबाज (पत्रिका) सम्पादक, सुरेश चन्द्र मिश्र पृष्ठ-1
    16

जिस तिजोरी के धन को लूटने की योजना थी, वह तिजोरी किसी अन्य
साथी से नही अशफाक के हाथों से ही टूटी। अशफाक के मत को
मन्मथनाथ गुप्त ने भी उचित ठहराया है। श्री गुप्त ने लिखा भी है कि -
'अशफाक उल्ला खाँ का विरोध किसी डर या भय से प्रेरित होकर न था।
प्रत्युत वह बुद्धिमत्ता की आवाज थी। बाद के इतिहास ने सिद्ध कर दिया
कि अशफाक सही थे और बाकी क्रांतिकारी गलती पर थे।¹ काकोरी ट्रेन
डकैती में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले फरार अशफाक को 8 दिसम्बर
1926 को दिल्ली में गिरफ्तार कर लिया गया। इसके पूर्व वे कई स्थानों
पर घूमते रहे और फिर क्या होना था शायद अज्ञात मन को सब ज्ञात हो
गया था।
काकोरी काण्ड आधुनिक इतिहास के क्रांतिकारी अध्याय में
अतिमहत्वपूर्ण पृष्ठ बन गया है जिसका शीर्षक बनकर चमक रहे है
अशफाक उल्ला खाँ। इस उल्लेखनीय काण्ड में पं० राम प्रसाद बिस्मिल,
अशफाक उल्ला खाँ, चन्द्रशेखर आजाद, राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी, मुकुन्दीलाल,
मन्मथनाथ गुप्त, बनवारी लाल, शचीन्द्र नाथ वक्शी, मुरारीलाल, कुन्दन
लाल के नाम महत्वपूर्ण हैं। कलम के धनी अशफाक उल्ला खाँ में भीम
जैसी ताकत भी होगी, यह जानकर तो आश्चर्य ही लगता है। कहाँ
कोमल कवि हृदय, कहां बज्र जैसी भुजाएं। अशफाक के विषय में अक्सर
कहा जाता है कि - 'अशफाक बड़े सुडौल और सुन्दर युवक थे। ऐसे सुन्दर
व्यक्ति कम ही देखने को मिलते हैं। वे तैरने, घोड़े की सवारी,
क्रिकेट-हाकी खेलने बंदूक चलाने का शौक रखते थे।² इससे यह भी स्पष्ट
होता है कि वे शाहजहाँपुर के रईसों में गिने जाते थे।

  1. जांबाज (पत्रिका) डा० डी०एन मेहरोत्रा, पृष्ठ-48
  2. भारतीय क्रांतिकारी आन्दोलन का इतिहास-मन्मथनाथगुप्त, पृष्ठ-200
    17

राम प्रसाद बिस्मिल से दोस्ती हुई और वे स्वयं को समर्पित कर बैठे।
इसके बावजूद रामप्रसाद बिस्मिल से अशफाक की इच्छा व्यक्त (क्रांतिकारी
कार्य) होती रही और मामला हमेशा टलता रहा।.... अन्त में जब
अशफाक की इच्छा की प्रबलता देखी तो पं० राम प्रसाद जी ने उन्हें अपने
दल में सम्मिलित कर ही लिया।
ज्ञातव्य है कि अशफाक उल्ला खाँ कवि हृदय थे, उनके भीतर
मनुष्यता, देश प्रेम, भाई चारा, गंगा-जमुनी संस्कृति की भावना कूट-कूट
कर भरी थी। वे संवेदनाओं की पराकाष्ठा से परिचित थे। संवेदित हृदय
अपनी रचनाओं में अपना चित्र उकेर ही देता है। अशफाक की रचनाओं
से पता चलता है कि वे काव्य तत्व के अच्छे जानकार थे। वे कविता की
आत्मा को समझते थे। उन्हें पता था कि शायरी में अपनी बात कैसे कही
जाती है। उन्हें यह भी पता था कि वे अपनी शायरी में किस वैचारिक
भूमिपर खड़े हैं। कहना न होगा वे एक ऐसी जिन्दगी चाहते थे जहाँ आम
आदमी खुली हवा में सांस ले सके। कैद मुक्त जीवन की अभिलाषा
रखने वाले अशफाक ने बेहतरीन रचनाएं की हैं जो हमारे इतिहास की
काव्यात्मक धरोहर हैं।
काकोरी काण्ड में गिरफ्तार अशफाक को अपने प्राणों की आहुति
फाँसी के रूप में देनी पड़ी। लेकिन इसका फल यह हुआ कि क्रांतिकारियों
द्वारा किया गया यह काण्ड पूरे भारत में सूचित ही नही चर्चित भी हुआ।
क्रांतिकारियों द्वारा सम्पादित काण्डों में यह बड़ा काण्ड था। जिसका प्रभाव
जनता पर ही नही अंग्रेजों पर भी पड़ा। अशफाक का व्यक्तित्व ही नहीं
कृतित्व भी सारे भारत में फैला। यह भी कहा गया कि अशफाक उल्ला
खाँ ऐसे पहले मुसलमान क्रांतिकारी थे जिन्हें षड़यंत्र के मामले में फाँसी
दी गयी। उनका प्रयत्न था कि उनकी तरह अन्य मुस्लिम युवा भी
क्रांतिकारी बने और मातृ भूमि की रक्षा करें। अशफाक तो हिन्दू मुस्लिम
एकता के कट्टर समर्थक तो थे ही अपनी ही तरह औरों में भी यही
भावना देखना चाहते थे।
18

अशफाक उल्ला खाँ के युग का इतिहास देखे तो काफी हद तक
अनेक बातें स्पष्ट हो जायेंगी। यह भी स्पष्ट हो जायेगा कि क्रांतिकारी
वातावरण तैयार करने में भले ही राम प्रसाद बिस्मिल ने महत्वपूर्ण
भूमिका निभाई हो लेकिन कंधे से कंधा मिला कर चलने वाला यह
मुस्लिम युवक अपने प्राणों की बलि देने पर अंशमात्र भी नही हिचका।
अशफाक जब क्रांतिकारी दल में सम्मिलित हुए तो वे छात्र थे। वे छात्र
धर्म जानते हैं। युवा थे, युवा का अर्थ था ओजस्वी स्वर, गर्म खून, पैना
विचार और कुछ विशेष करने की ललक, निष्ठा और अशफाक इन सब में
खरे साबित होते हैं। यही उनके व्यक्तित्व की पहचान भी थी। युवा मन
को योग्य साथ मिल गया तो निखरते देर नही लगती। अशफाक बिना
समय गवाये दिन पर दिन ओजस्वी होते गये। क्रांतिकारी अशफाक
काकोरी युग की बलिदानी उपज थे। जो 1927 में हिन्दू मुस्लिम एकता
तथा स्वतंत्र भारत का सपना लेकर फाँसी के तख्ते पर झूल गये। आर्य
समाजी विचारों के राम प्रसाद बिस्मिल और अशफाक उल्ला खाँ की
मित्रता और मातृभूमि की आजादी के लिए शहीद हो जाना साम्प्रदायिक
सद्भाव के लिए बहुत महत्वपूर्ण बात थी जो हमारे इतिहास की बहुत बड़ी
विरासत है।¹ काकोरी युग के क्रांतिकारियों में अशफाक उल्ला खाँ सबसे
अधिक प्रगतिशील विचारों के थे। उनका सबसे मजबूत चरित्र था। एक
तरफ वे प्रगतिशील शायर थे तो दूसरी तरफ एक कुशल पार्टी के कार्यकर्ता,
जहाँ वे मजबूती और दृढ़ता के साथ खड़े दिखते हैं। काकोरी की घटना
और अशफाक या अन्य क्रांतिकारियों का इतिहास में महत्व इसलिए भी
बढ़ जाता है कि वह समय 1921 के असहयोग आन्दोलन के बाद का
समय था।


  1. अशफाक उल्ला खाँ और उनका युग-सुधीर विघाथी, पृष्ठ-10
    19

महात्मा गांधी का प्रथम आन्दोलन लगभग समाप्त हो गया था।
इस असफलता से लगभग राजनैतिक शून्यता आ गयी थी। इसी कारण
इस काल में क्रांतिकारियों का संघर्ष सूचना लेने योग्य बनता है। काकोरी
के क्रांतिकारियों ने अपना लक्ष्य समाजवाद को नहीं बनाया था लेकिन
आगे चल कर दल के संविधान और दस्तावेजों से स्पष्ट हो जाता है कि
उन्होंने समाजवाद की ओर चलने की तैयारी कर ली थी। अशफाक ने
कहा भी है कि - ‘मैं हिन्दुस्तान की ऐसी आजादी का ख्वाहिशमंद हूँ
जिसमें गरीब खुश और आराम से रहते और सब बराबर होते’। खुदा मेरे
बाद वह दिन जल्द लाये जबकि छत्तर मंजिल लखनऊ में अब्दुल्ला मिस्त्री
लोको वर्कशाप और धनिया चमार, किसान भी, मिस्टर खलील उज्जमाँ
और जगत नारायण शुक्ला व राजा साहब महमूदाबाद के सामने कुर्सी पर बैठे
हुए नजर पड़े।¹
निश्चित ही समाजवाद का यह विचार अशफाक से निकला। वह
भगतसिंह की भूल-भुलैया से आगे निकल कर वैज्ञानिक हो गया। प्रस्तुत
शोध ग्रंथ में हम अशफाक के व्यक्तित्व एवं कृतित्व का अध्ययन काकोरी
काण्ड का संदर्भ लेते हुए आगे के अध्यायों में करेंगे।
‘‘कुछ आरजू नहीं है, है आरजू तो यह है
रख दे कोई ज़रा सी ख़ाके वतन कफन में।’’
(अशफाक उल्ला खाँ)

  1. अशफाक उल्ला खाँ और उनका युग, सुधीर विद्यार्थी पृष्ठ-11
    20

अध्याय-दो

अध्याय-दो
अशफाक उल्ला खाँ का जीवन परिचय
कोई भी राष्ट्र अपने वीर सपूतों पर गर्व करता ही है। देशभक्त
सदैव पूजनीय और वंदनीय रहे हैं। किसी भी देश की संस्कृति, सभ्यता
और उसकी परम्पराएँ यदि अपने सम्मानित रूप में जीवित हैं तो देश के
वीर सपूतों के कारण ही। इन सब मामलों में भारत वर्ष भावनात्मक रूप
से सदैव आगे रहा है। सही अर्थों में भारतीय वही हैं जो किसी जाति की
तरफ आकर्षित न हो, किसी धर्म में बेवजह न बँधा हो, जो किसी पंथ
का दास न हो, जो किसी प्रान्त की सीमा तक ही न सोचता हो। सच्चा
भारतीय इन सब चीजों से ऊपर उठकर सिर्फ राष्ट्र देवोभव की भावना से
ओतप्रोत होकर मनुष्य के लिए, मनुष्यता की रक्षा के लिए सदैव तत्पर
रहता है। भारतीय को किसी भाषा भेद या सम्प्रदाय भेद से क्या अर्थ, वह
तो भारत भूमि को समर्पित है। ऐसी ही सार्थक भावनाओं संवेदनाओं से
लबरेज भारतवीर अपनी भारत भूमि की रक्षा के लिए प्राणों की आहुति
देने में अंश मात्र भी संकोच नहीं करते है। यही कारण है कि ऐसे वीर
सपूतों के प्रति आने वाली पीढ़ियाँ ऊर्जा और प्रेरणा पाती हैं और उन्हें
देवतुल्य मानकर अभिनंदन करती रही हैं। यह सत्य है कि किसी भी देश
के इतिहास की गौरवशाली सर्जना एक दिन में नहीं होती। इसके लिए
एक काल खण्ड जुड़ा होता है। यह भी निश्चित ही है कि राष्ट्र हेतु किसी
एक व्यक्ति द्वारा किया गया कार्य ही पर्याप्त नहीं होता लेकिन कुछ
विशेष उपकरणों से निर्मित विशिष्टतम महापुरुषों का व्यक्तित्व और कृतित्व
इतिहास बदल देता है। यह भी सत्य है कि किसी व्यक्ति विशेष के
व्यक्तित्व और कृतित्व का अध्ययन करने हेतु उसकी पारिवारिक पृष्ठभूमि,
उसका जीवन, बाल्यकाल और उसकी शिक्षाएं, उनके पूर्वजों पर एक दृष्टि
तो देनी ही होगी।
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अशफाक उल्ला खाँ के पाँव पालने में ही नजर आ गये थे। ठीक
ही कहा गया है 'आमुखापाति कल्याणं कार्यसिद्धिं हि शंसति' तथा
“Coming events cast their shadows before” 'होनहार बिरवान के, होत चीकने
पात।' कारण क्या है? स्पष्ट है कि पूर्वजों द्वारा दिया गया वातावरण
निष्ठा से भरा था। परिवार ही ऐसा था कि जो भी कार्य व्यक्ति करता था
वह उसे लगन और निष्ठा, ईमानदारी के साथ करता था। अशफाक के
पूर्वज पठान थे और मूलतः पश्चिमोत्तर सीमा प्रान्त के निवासी थे।
मुगल सम्राट शाहजहाँ के शासन काल में अशफाक के पूर्वज शाहजहाँपुर
में आकर बस गये। शाहजहाँपुर जो पूर्वज आये थे उनका नाम खान
नजर मुहम्मद खाँ था। मुहम्मद खाँ अकेले नहीं आये थे, उनके साथ
अनेक भाई बन्धु भी थे। उनका सम्बन्ध सीमा प्रान्त के प्रसिद्ध कबीले
'नवाह' से था। उस समय कई पठान कबीले सीमा प्रान्त से आकर
शाहजहाँपुर में बस गये थे। जिस स्थान से मुहम्मद खाँ आये थे उस
स्थान का नाम 'गुलबैले' था।¹ यह संयोग ही था कि ननिहाल पक्ष भी
अशफाक के पूर्वजों के कबीलों से ही सम्बद्ध था। अर्थ यह हुआ कि मातृ
पक्ष और पितृ पक्ष की परम्पराएं काफी मिलती जुलती थीं। सो अशफाक
का संस्कार क्रमबद्ध तरीके से समयानुसार होता गया। संस्कारों में भेद
नहीं था।
<u>पितृ पक्ष के पूर्वज और अशफाक उल्ला खाँ-</u>
ज्ञातव्य है कि जो पूर्वज शाहजहाँपुर में आये उनका नाम खान
नजर मुहम्मद खाँ था। भरे-पूरे परिवार के मुहम्मद खाँ अपने धर्म और
ईमानदारी के प्रति समर्पित व्यक्ति थे। वे एक कौम परस्त इन्सान थे।
बाद में चलकर अशफाक का वंश कदनखेल के नाम से प्रसिद्ध हुआ।


  1. अशफाक उल्ला खाँ, भवान सिंह राणा, पृष्ठ-9
    22

कदनखेल खानदान सभ्य और सुसंस्कृत माना जाता था। यह खानदान
अपनी बात का धनी था, अपनी बात पर मर मिटने को तैयार रहता था।
अंग्रेज सरकार भी इस खानदान को सभ्य और सीधा समझती थी।¹
पूर्वजों का शाहजहाँपुर में बसना और फिर आस-पास के गाँवों को खरीद
लेना, उनके आराम से जीवन यापन का द्योतक है। बाद में चलकर
पठानों का आस-पास के सभी गांवों पर अधिकार हो गया। अशफाक के
पूर्वजों का मुख्य पेशा जमींदारी था। वे शिक्षा को पाप की तरह देखते
थे। यही कारण था कि अशफाक के पूर्वज अपने बच्चों की शिक्षा पर
ध्यान नहीं देते थे। इसी वजह से अन्य क्षेत्रों में सामाजिक उन्नति में वे
पीछे भी रह गये। अशफाक उल्ला खाँ इसे दुर्गुण मानते थे। वे अपना
दुख इस प्रकार व्यक्त करते है - '....मगर उन्होंने तरक्की की कोशिश
नहीं की और न नामों-नमूद की ख्वाहिश की। बेफिक्र आराम तलब बने
रहे और गरज कि आज हाल यह है कि एक भी शख्स ग्रेजुएट पैदा न
कर सके। ना तो माली अपनी हालत सुधारी और ना तरक्की हासिल
की। इलम से इनको नफरत, हाथ पैर हिलाने से इनको दुश्मनी और
अंग्रेजी पढ़ने को एक बड़ा कुफ्र समझा किये। खुदा-खुदा करके खानदान
में चन्द अफराद पैदा हुए। खुदा उनकी रूहों को जन्नत में जगह दे।
उन्होंने अपने बच्चों को स्कूल में दाखिल कराया। मगर वो जरासीम जो
फिजा-ए खानदान में मौजूद थे, वह लोग जो एक अंग्रेजी तालिबइल्म को
एक दिन स्कूल जाने से बाज रखने से जन्नत की कुन्जी को हासिल
करने का हकदार समझते थे, उनके पीछे इस बुरी तरह से पड़े रहते थे
और स्कूल जाने से बाज रखते थे' ।² अशफाक की यह पीड़ा कोई छोटी
पीड़ा नही थी। वे शिक्षा के महत्व को समझते थे।

  1. अशफाक उल्ला खाँ, भवान सिंह राणा, पृष्ठ-10
  2. अशफाक उल्ला खाँ, भवान सिंह राणा, पृष्ठ-11
    23

उनके कथन में व्यंग्य की झलक स्पष्ट दिखाई देती है। वे सदैव दुख
व्यक्त करते रहे कि पठान खानदान शिक्षा के क्षेत्र में विरक्ति का भाव
क्यों बनाये रखा। शिक्षा प्राप्त करने की बात कौन कहे, वे अपने बच्चों
को उत्साहित करने के बजाय हतोत्साहित किया करते थे। सारी सुविधाएं
होते हुए भी शिक्षा का अभाव अशफाक को खलता रहा।
अशफाक उल्ला खाँ के पिता मुहम्मद शफीक उल्ला खाँ थे। शफीक
उल्ला का मकान शाहजहाँपुर के जलाल नगर मुहल्ले में था। वे पुलिस
विभाग में एक जिम्मेदार पद (सब इंस्पेक्टर) पर कार्यरत थे। यह कोई
मामूली बात नहीं थी। जबकि जनता लाल पगड़ी देखकर भागती थी, उस
काल में अशफाक के पिता पुलिस के अच्छे पद सब-इन्स्पेक्टर पद पर हों,
परिवार का वैसे ही मान सम्मान जनता में बढ़ गया था। लेकिन
अशफाक उल्ला खाँ के जन्म के पूर्व ही वे अपने पद से मुक्त हो गये
थे। यही नहीं अभी अशफाक बचपन के प्यार से सराबोर ही थे कि
शफीक उल्ला खाँ का देहावसान हो गया। एक ऐसे पिता का चला जाना
जो अंग्रेजी सरकार को अपनी गहरी दृष्टि से देखे थे, एक-एक बारीकियां,
अंग्रेजी संवेदना और व्यवहार जानते थे, अशफाक के हित में कतई अच्छा
नहीं हुआ। बावजूद इसके अशफाक अपने बाल्यकाल में अपने पिता से
पुलिस की नौकरी और अंग्रेजी हुकूमत के विषय में पूछते रहते थे, सो
उन्हें खासा अनुभव प्राप्त हो गया था। अशफाक की अवधारणा अच्छी
नहीं बन पड़ी थी। बाद में चलकर अशफाक ने इस संबंध में लिखा है -
'मेरे वालिद साहब शफीक उल्ला खाँ सब-इन्स्पेक्टर पुलिस थे, मगर खुदा
के फजलोकरम से मेरे पैदा होने से पेश्तर ही वह मुस्तेदी पदमुक्त हो चुके
थे और जोकि वह मेरी कम उम्र में ही दुनिया से गुजर गये। खुदा उनको
जिबाहेरहमत दे और उनके कारनामों को, जो अय्यामे मुलाजमत में किये
थे,
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फरामोश करे। जिसकी वह हमेशा माफी माँगते रहे। वह मुझे पुलिस
के कारनामे बतौर किस्सों के सुनाया करते थे, जो मुझे अभी तक याद हैं
और फिर उनका सामना भी किया और वह सबब भी जो कभी
थ्योरिटिकल था, अब प्रेक्टिकल सूरत में मिल गया' ।¹ अशफाक उल्ला को
पिता का साथ यदि और मिल गया होता तो निश्चित ही शिक्षा के
साथ-साथ उनके व्यक्तित्व में भी चार चाँद लग जाते। माता निर्माता
होती है तो पिता मस्तिष्क, यह अशफाक उल्ला को जाने अनजाने ज्ञात
था।

  1. अशफाक उल्ला खाँ, भवान सिंह राणा, (पृष्ठ - 13)
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मातृपक्ष का अध्ययन
अशफाक की माता का पक्ष समृद्ध था। उनकी माँ खलील जाति की थी
और उनका वंश ‘हाफिज खेल’ नाम से जाना जाता था। अशफाक के
पूर्वजों से हाफिज खेल घराने से वैवाहिक सम्बन्ध होते थे। अशफाक का
पितृ पक्ष भले ही आर्थिक स्थिति में कमजोर था लेकिन वह देश प्रेम की
सुगंध में जीता था वहीं मातृपक्ष के पूर्वजों में ऐसी बात नहीं थी। हाँ
उनकी माली हालत बहुत अच्छी थी। इस खानदान के लोग 1857 से ही
सरकारी पदों पर कार्य करते आ रहे थे। 1857 के विद्रोह के समय
अशफाक की माँ के दादा तथा उनके भाई जज और डिप्टी कलेक्टर थे।¹
यही नहीं उस समय इन लोगों ने विद्रोहियों का साथ न देकर सरकार के
लिए जासूसी भी की थी। यह ज्ञात होने के बाद अशफाक के दिल-दिमाग
पर गहरा असर पड़ा था। कहीं न कही यह दाग धोने की ग्रंथि भी बन
रही थी। अशफाक उल्ला खाँ लिखते है '.......मुझे यह लिखते हुए शर्म
नही आती, हाँ केस के कब्ल अगर मुझे जरूरत महसूस होती तो हर्गिज
नही लिखता, क्योंकि जहां तक मेरा ताल्लुक है, मैं इसे बायसेसदनंग
समझता हूँ कि मुल्क के लोगों को अहसासे आजादी पैदा हो और वह
अपना खून मिस्ल पानी के बहाएं, अपने बच्चों की कुर्बानी कुर्बानगाहे
वतन पर चढ़ाएं, अपनी दौलत, आबरन मकान, गरज कि हर
शय-हँसी-खुशी के साथ आजादी और मजहब के लिए निसार दें, फिर
उनके साथ फरेब करना, उनके खिलाफ साजिश करना, उनकी स्कीमों को
तहस-नहस करने की कोशिश करना और वतनी दुश्मनों को इमदाद
करना, अगर शर्म और हजार शर्म की बात नहीं तो क्या है? मुझे
जमानाए तालिबेइल्मी अपने चन्द दोस्तों से हमेशा जिल्लत उठानी पड़ी,

  1. अशफाक उल्ला ख़ाँ, भवान सिंह राणा, पृष्ठ-11
    26

जब वह कहते थे कि तुम खानयीने वतन की औलाद हो, मैं उन
अहबाब का नाम नहीं लिखना चाहता हूँ। चूँकि उनको शर्म आयेगी कि
वह इस वक्त अपने गले में गुलामी का पट्टा डाले हुए हैं या सरकारी
कचहरियों में कुंजड़ो, कुंजड़ियों की तरह बाररूम में दुकाने लगाये हुए बैठे
हैं। उस वक्त उनको फख्र था कि उनके आबाब-अजदाद उस गिरोह के
एक बड़े रुक्न थे, जिसने आजादी का अलम बुलन्द किया था। खैर मैंने
अपनी कुर्बानी से इस धब्बे को जो 1857 ई० में मेरे ननिहाल के बुजुर्गों ने
अस्मते वतन पर लगाये थे, अपने खून से और नौजवान मासूम खून से
धो डाले, क्या इस खानदान का इसको कफारा समझा जा सकता है।
ख्वाह यह हो या न हो मेरी आने वाली नस्ल पर यह एतराज न होगा
कि वह उस खानदान से ताल्लुक रखते हैं, जो खाएन था, बल्कि मेरी
कुर्बानी से लोग रहम करेंगे और उनको अशफाक के खानदान का एक
मेम्बर ख्याल करके बुजुर्गों की गलतियाँ फिर अजसरे नौ याद न करेंगे।
मुझे ननिहाल के खानदान के बारे में बस इतना ही लिखना है। अब
मुझको यह अन्देशा है कि यह खानदान अब तरक्की करने के काबिल न
हो सके, क्योंकि अब नौजवान तरक्की करने के बजाय अपने बुजुर्गों पर
ही नाज करने को अपना शआर बनाये हुए हैं।
अगर यही सिम्मेकातिल है कि बुजुर्गों की तारीफ में लगे रहें या उन
पर फख्र करते रहे, इन्सान को खुद इम्ताजी हैसियत हासिल करना
चाहिए। बुजुर्गों पर फख्रों मुवाहात की जरूरत नहीं। यूं मैं दादा की तरह
कौम परस्त और ननिहाल की तरफ से अंग्रेज परस्त पैदा हुआ था। मगर
माँ का खून कमजोर था, यूँ वतनी आजादी का जज्बा ताकतवर रहा और
वतन प्यारे वतन के लिए आज मौत के तख्ते पर खड़ा हूँ'।¹ अशफाक के
ये शब्द उनकी मानसिकता को बखूबी दर्शाते हैं।

  1. अशफाक उल्ला खाँ, भवान सिंह राणा, पृष्ठ-12
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