अमर शहीद अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ: व्यक्तित्व और कृतित्व (काकोरी के अमर शहीद का जीवन व रचनाएँ)
Amar Shaheed Ashfaqulla Khan: Personality & Works
अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ 'वारसी' (सम्पादक: बनारसीदास चतुर्वेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंक्रान्तिकारियों को तो जोश चाहिए था, ऊर्जा चाहे जहाँ से मिले।
एक-एक वाक्य असरदार साबित हो रहे थे। पूर्णरूप से युवा सहमत थे कि
उन्हें किसी भी प्रकार की भिक्षा नहीं चाहिए। तिलक ने 15 जून 1897 को
'केसरी' में लिखा कि - 'यदि हमारे घर में चोर घुस आये और हममें
उनको घर से बाहर निकालने की सामर्थ्य न हो तो हमें बिना झिझक
उन्हें घर के अन्दर बन्द करके जला देना चाहिए'। लाला लाजपत राय ने
कहा कि - 'अंग्रेज भिखारी से सबसे अधिक घृणा करते हैं तथा मैं
सोचता हूँ कि भिखारी घृणा के पात्र हैं भी। अतः हमारा कर्तव्य है कि
हम सिद्ध कर दे कि हम भिखारी नहीं है।'¹
1909 का एक्ट लागू होने के बाद अंग्रेजी शासन का विरोध करने
वाली एक मात्र पार्टी क्रांतिकारी पार्टी थी। यह क्रांतिकारी पार्टी जनता में
चर्चा का विषय बनी हुई थी। आम जनता क्रांतिकारियों का समाचार
सुनने की हमेशा इच्छुक रहती थी। क्रांतिकारियों को दी जाने वाली
सजाओं में जो कड़ी और कठोर अमानवीय हुआ करती थी, से जनता में
अंग्रेजी सरकार के विरुद्ध रोष बढ़ जाता था। बहुत लोग बमबारी जैसी
घटनाओं के होने को सही ठहराते थे। ऐसा विश्वास होने लगा था कि
ऐसी ही घटनाओं से देश आजाद हो जायेगा। किसी भी अंग्रेज अफसर
की हत्या से सारे देश में चर्चा होती थी और जनता में हलचल मच जाती
थी। अधिकांश लोग समाचार पत्रों में डकैतियां, अफसरों पर हमले की
घटनाओं का समाचार बड़े चाव से सुनते-पढ़ते थे। संयुक्त प्रान्त में 1908
में बनारस में शचीन्द्रनाथ सन्याल द्वारा एक क्लब की स्थापना से
क्रान्तिकारी गतिविधियों की
- भारत में राष्ट्रीयता का विकास, डॉ० एस०एल० नागोरी, पृष्ठ-177
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