अमर शहीद अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ: व्यक्तित्व और कृतित्व (काकोरी के अमर शहीद का जीवन व रचनाएँ)
Amar Shaheed Ashfaqulla Khan: Personality & Works
अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ 'वारसी' (सम्पादक: बनारसीदास चतुर्वेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमहात्मा गांधी का प्रथम आन्दोलन लगभग समाप्त हो गया था।
इस असफलता से लगभग राजनैतिक शून्यता आ गयी थी। इसी कारण
इस काल में क्रांतिकारियों का संघर्ष सूचना लेने योग्य बनता है। काकोरी
के क्रांतिकारियों ने अपना लक्ष्य समाजवाद को नहीं बनाया था लेकिन
आगे चल कर दल के संविधान और दस्तावेजों से स्पष्ट हो जाता है कि
उन्होंने समाजवाद की ओर चलने की तैयारी कर ली थी। अशफाक ने
कहा भी है कि - ‘मैं हिन्दुस्तान की ऐसी आजादी का ख्वाहिशमंद हूँ
जिसमें गरीब खुश और आराम से रहते और सब बराबर होते’। खुदा मेरे
बाद वह दिन जल्द लाये जबकि छत्तर मंजिल लखनऊ में अब्दुल्ला मिस्त्री
लोको वर्कशाप और धनिया चमार, किसान भी, मिस्टर खलील उज्जमाँ
और जगत नारायण शुक्ला व राजा साहब महमूदाबाद के सामने कुर्सी पर बैठे
हुए नजर पड़े।¹
निश्चित ही समाजवाद का यह विचार अशफाक से निकला। वह
भगतसिंह की भूल-भुलैया से आगे निकल कर वैज्ञानिक हो गया। प्रस्तुत
शोध ग्रंथ में हम अशफाक के व्यक्तित्व एवं कृतित्व का अध्ययन काकोरी
काण्ड का संदर्भ लेते हुए आगे के अध्यायों में करेंगे।
‘‘कुछ आरजू नहीं है, है आरजू तो यह है
रख दे कोई ज़रा सी ख़ाके वतन कफन में।’’
(अशफाक उल्ला खाँ)
- अशफाक उल्ला खाँ और उनका युग, सुधीर विद्यार्थी पृष्ठ-11
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