अमर शहीद अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ: व्यक्तित्व और कृतित्व (काकोरी के अमर शहीद का जीवन व रचनाएँ)
Amar Shaheed Ashfaqulla Khan: Personality & Works
अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ 'वारसी' (सम्पादक: बनारसीदास चतुर्वेदी) द्वारा
पृष्ठ 46, कुल 297 में से
संदर्भ में पढ़ेंकदनखेल खानदान सभ्य और सुसंस्कृत माना जाता था। यह खानदान
अपनी बात का धनी था, अपनी बात पर मर मिटने को तैयार रहता था।
अंग्रेज सरकार भी इस खानदान को सभ्य और सीधा समझती थी।¹
पूर्वजों का शाहजहाँपुर में बसना और फिर आस-पास के गाँवों को खरीद
लेना, उनके आराम से जीवन यापन का द्योतक है। बाद में चलकर
पठानों का आस-पास के सभी गांवों पर अधिकार हो गया। अशफाक के
पूर्वजों का मुख्य पेशा जमींदारी था। वे शिक्षा को पाप की तरह देखते
थे। यही कारण था कि अशफाक के पूर्वज अपने बच्चों की शिक्षा पर
ध्यान नहीं देते थे। इसी वजह से अन्य क्षेत्रों में सामाजिक उन्नति में वे
पीछे भी रह गये। अशफाक उल्ला खाँ इसे दुर्गुण मानते थे। वे अपना
दुख इस प्रकार व्यक्त करते है - '....मगर उन्होंने तरक्की की कोशिश
नहीं की और न नामों-नमूद की ख्वाहिश की। बेफिक्र आराम तलब बने
रहे और गरज कि आज हाल यह है कि एक भी शख्स ग्रेजुएट पैदा न
कर सके। ना तो माली अपनी हालत सुधारी और ना तरक्की हासिल
की। इलम से इनको नफरत, हाथ पैर हिलाने से इनको दुश्मनी और
अंग्रेजी पढ़ने को एक बड़ा कुफ्र समझा किये। खुदा-खुदा करके खानदान
में चन्द अफराद पैदा हुए। खुदा उनकी रूहों को जन्नत में जगह दे।
उन्होंने अपने बच्चों को स्कूल में दाखिल कराया। मगर वो जरासीम जो
फिजा-ए खानदान में मौजूद थे, वह लोग जो एक अंग्रेजी तालिबइल्म को
एक दिन स्कूल जाने से बाज रखने से जन्नत की कुन्जी को हासिल
करने का हकदार समझते थे, उनके पीछे इस बुरी तरह से पड़े रहते थे
और स्कूल जाने से बाज रखते थे' ।² अशफाक की यह पीड़ा कोई छोटी
पीड़ा नही थी। वे शिक्षा के महत्व को समझते थे।
- अशफाक उल्ला खाँ, भवान सिंह राणा, पृष्ठ-10
- अशफाक उल्ला खाँ, भवान सिंह राणा, पृष्ठ-11
23