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अमर शहीद अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ: व्यक्तित्व और कृतित्व (काकोरी के अमर शहीद का जीवन व रचनाएँ)

Amar Shaheed Ashfaqulla Khan: Personality & Works

अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ 'वारसी' (सम्पादक: बनारसीदास चतुर्वेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished297 पृष्ठ

अशफाक ने कहा है कि -'मेरा दिल गरीब किसानों और दुखियों
मजदूरों के लिए हमेशा दुखी रहा है। मैं तो अपने अय्यामें फरारी में भी
अक्सर इनकी हालत देखकर रोया किया हूँ क्योंकि मुझे इनके साथ दिन
गुजारने का मौका मिला है। निश्चित ही अशफाक उल्ला खाँ उस दौर के
क्रांतिकारियों में एक मजबूत चरित्र के रूप में नजर आते हैं। जहाँ एक
तरफ संवेदनशील और प्रगतिशील कवि, शायर के रूप में हमे नजर आते
है वही वे एक कुशल पार्टी के कार्यकर्ता के रूप में दृढ़ता से खड़े दिखते
हैं और अन्त तक उनके विचारों में कोई परिवर्तन नहीं आया। प्रमुख
क्रांतिकारी नेता अमर शहीद सरदार भगत सिंह ने लिखा है कि -‘‘आप
(अशफाक) श्री राम प्रसाद के दायें हाथ थे, मुसलमान होने के बावजूद
आपको कट्टर आर्य समाजी धर्म से हर दर्जे तक का प्रेम था। दोनों प्रेमी
एक बड़े काम के लिए अपने प्राण उत्सर्ग कर अमर हो गये।‘’
शहीदे आज़म अशफाक उल्ला खाँ ने देश की आजादी के लिए
अपने प्राणों की आहुति दी। उनका यह उत्सर्ग आने वाली पीढ़ियाँ सदैव
स्मरण करेंगी तथा उनके कृतित्व एवं व्यक्तित्व से हमेशा प्रेरणा पाती
रहेंगी।
अशफाक के शब्द आज भी स्मृति में है और गूँजते हैं -
‘‘कुछ आरजू नहीं है, है आरजू तो यह है,
रख दे कोई जरा - सी खाके वतन कफन में।‘’
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206

अध्याय-एक

अध्याय-एक
प्रस्तावना
मनुष्य का प्राकृतिक स्वभाव है कि वह दासत्व स्वीकार नहीं करना
चाहता। इसी अस्वीकार के कारण स्वतंत्र होने हेतु अनेक आन्दोलन हुए।
मनुष्य स्वतंत्र होने के लिए अनेक उपाय अपनाता है। वह संघर्ष करता
है। वह लड़ता है, जीवन कुर्बान करता है लेकिन गुलामी के धागे में
बँधना स्वीकार नहीं करता है। इतिहास गवाह है कि व्यक्ति को कभी
गुलामी कबूल नहीं हुई और यह बंधन यदि विदेशी हो तो मुक्त होने की
छटपटाहट बढ़ जाती है। भाषा, संस्कृति का मेल हो तो कुछ देर के लिए
दासत्व बर्दाश्त किया जा सकता है। यही कारण था कि देशी दास भाव ने
कभी बड़ा आन्दोलन खड़ा नहीं किया लेकिन जब वही भाव विदेशी हो
गया तो बेचैनी बढ़ गयी। प्राचीन काल पर दृष्टि डालें तो गुलामी की
मानसिकता और स्पष्ट हो जायेगी। मिश्र में दासों को (युद्धबंदी) मुर्दा
कहते थे और मार डालते थे। ये युद्धबंदी अपने श्रम के कारण लाभकारी
सिद्ध हुए, तब इन्हें मारना बन्द हो गया और 'जिन्दा मुर्दा' की संज्ञा में
होते हुए दास बनाये गये। रोम में दासों को इटली भेजा जाता था।
यूनान में एटिटका के किसान कर्ज के कारण दास बने।¹
भारत की यह विशेषता रही है कि दास प्रथा के बावजूद भारत की
मानवतावादी एवं उदारवादी दृष्टि रही है। इतिहास में उत्पीड़न से मुक्ति के
लिए वीरतापूर्वक संघर्षों का वर्णन मिलता है। जबकि विदेशी ताकतें भारत
के उदारवादी गुणों का लाभ उठाती रही हैं। तमाम कारणों के बावजूद
भारत में क्रांति का अभियान अपने सुपरिणाम तक चला। जिसका नेतृत्व
महान चिन्तकों, अदम्य साहस से भरे देशभक्तों ने किया। परिणाम यह
हुआ कि क्रान्ति सफल हो गयी,
1- प्राचीन विश्व इतिहास का परिचय, प्रगति प्रकाशन, पृष्ठ-45, 143
1

विजयी क्रांति ने नया प्रभात देखा था और हम 1947 में स्वतंत्र राष्ट्र के
इतिहास का शुभारम्भ देख सके।
भारत के इस महान आन्दोलन का शुभारम्भ स्वतंत्रता संग्राम (1857)
के क्रांतिकारी पृष्ठभूमि से हुआ। इस संघर्ष का प्रारम्भ सिपाही मंगल
पाण्डे के विद्रोह से हुआ जिसे कुछ इतिहासकारों ने 'सिपाही विद्रोह' की
संज्ञा दी। लेकिन अनेक ऐतिहासिक खोजों/अनुसंधानों से यह भी सिद्ध
हो जाता है कि यह देश की गुलामी के विरुद्ध एक सुनियोजित जनक्रांति
थी। इसे ब्रिटिश सत्ता द्वारा कुचलने का पूरा प्रयास किया गया। अंग्रेजी
सत्ता ने किसी को तोप से, किसी को तलवार से और अनेक
क्रांतिकारियों को फाँसी के तख्ते पर लटका कर इस इनकलाब को दबाने
की पूरी कोशिश की। फाँसी का फन्दा हो या बर्बर शासकों द्वारा कठोर
कारावास का असहनीय कष्ट, राष्ट्रप्रेमी वीरों की राष्ट्र उपासना और
गगनचुम्बी साहस को कोई भी सत्ता वैचारिक धरातल पर दबा न सकी
थी। स्वतंत्र भारत के निर्माण में अनेक वीरों ने अपने प्राणों की आहुतियां
मुस्कुराते हुए दी। यह दिगर बात है कि कुछ ऐसे भी नाम है जिनका
उल्लेख इतिहास की पुस्तकों में नही हुआ।¹ लेकिन ऐसे भी महत्वपूर्ण
नाम हैं जिनका उल्लेख इतिहास की पुस्तकों की गरिमा बढ़ाता है। आज
की पीढ़ी उन नामों से ऊर्जा पाती है और गौरवान्वित होती है। यही
कारण है कि भारतीय राष्ट्र के जीवन में समाजवाद से लड़ने वाली जुझारू
शक्तियाँ आज भी हमारे पुरुषत्व, हमारे जीवन और हमारे राष्ट्र-प्रेम को
रह-रह कर चुनौती दे रही हैं।


1- काकोरी स्मृतिदिवस शहीद प्रस्तावना लेखक - (हेमवतीनंदन
बहुगुणा) - डा० भगवानदास माहौर
2

1857 का विद्रोह भारतीय इतिहास की एक बहुत महत्वपूर्ण घटना थी
और इसमें संदेह नही है कि भारत के स्वतंत्रता आन्दोलन की गिनती
आधुनिक समाज के सबसे बड़े आन्दोलनों में की जाती है।¹ इस
आन्दोलन को कोई भी नाम मिले लेकिन यह सत्य प्रतीत होता है कि
यह एक व्यापक जन आन्दोलन था, इसे भारत का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम
कहा जा सकता है। क्रांति के इस संग्राम को पाकिस्तानी इतिहासकारों ने
आजादी की जंग कहा है।² 1857 तक अंग्रेज भारत में शक्तिशाली तो हो
ही चुके थे। देशी राजे और जनता दोनों ही आतंकित थे। लेकिन यह
सत्य है कि शासन सदैव आतंक से नही चलाया जा सकता था। हाँ यह
हो सकता है कि कोई बुद्धिमान विदेशी शासक अपनी नीति कुशलता से
किसी देश में अपना शासनकाल बढ़ा सकता है लेकिन आतंक के बल पर
उसे स्थायित्व प्रदान नहीं कर सकता। 1857 का विद्रोह भले सफल नहीं
हुआ लेकिन उसके अनेक अनुभव प्राप्त हुए। अनुभव का धरातल चाहे
अंग्रेज हो चाहे भारतीय। अंग्रेजों ने अनुभव किया कि हिंसात्मक कार्यों में
वे भारतीयों से बढ़कर हैं। भारतीयों ने अनुभव किया कि उनमें आपस में
फूट थी, कुछ अंग्रेजों के पक्ष में, कुछ विद्रोह में सहायता दे रहे थे। साथ
ही उन्होंने यह भी अनुभव किया कि जो संगठन उन्होंने बनाया था वह
देश के दूर-दूर के भागों को अपने में समेटने में समर्थ नही था।³ तमाम
आरोहों अवरोहों के बावजूद क्रान्ति जब एक बार मन में बैठ जाती है तो
परिणाम तक जाये बिना थम नहीं सकती। क्रांति की यात्रा धीमी पड़
सकती है, घटनाएं थम सकती हैं लेकिन भीतर की आग सुलगती रहती
है। राख के ढेर में कहीं न कहीं एक चिंगारी जीवित रह जाती है।


1- भारत का स्वतंत्रता संघर्ष, विपिन चन्द्र - पृष्ठ XIII
2. द इंडियन पोलिटिकल सिस्टम, नार्मन डी० यामर, पृष्ठ-83
3. भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास, पृष्ठ-27
3

विदित है कि भारतवर्ष एक दिन में अंग्रेजों के अधीन नहीं हुआ था।
लगभग सौ साल का षड्यन्त्र, विश्वासघाती चाल, कूटनीति भरी दृष्टि के
बाद अंग्रेजों का परचम लहराया है। 1857 के पहले भी विद्रोह हुआ था।
निजाम की फौज की तृतीय घुड़सवार सेना ने 1855 के 21 सितम्बर को
विद्रोह का झण्डा बुलन्द किया। फौज के अध्यक्ष ब्रिगेडियर मैकेन्जी के
शरीर पर दस घाव आये और वे किसी तरह जान लेकर भागे। विद्रोहियों
का घर लूट लिया गया। इस विद्रोह के नेता भी मुसलमान थे।¹ स्पष्ट है
कि 1857 के पूर्व कई विद्रोह हुए जो इतिहास में रेखांकित हैं। 1857 के
बाद महत्वपूर्ण विद्रोहों में किसान विद्रोह का जिक्र आता है। किसान
आन्दोलन की पृष्ठभूमि पहले से ही तैयार थी। हाउस ऑफ लार्ड्स की
पाँचवी रिपोर्ट (1821) कहती है कि बंगाल में इस्तमरारी बन्दोबस्त की
वजह से जितनी गरीबी फैली है, और भूमि अधिकारों में जितना बड़ा
परिवर्तन हुआ है, उतना उसी समय में महज कानून के जोर से और
किसी देश में या किसी युग में शायद नहीं हुआ होगा।² देश की अधिक
आबादी किसानों की है सो यह आग कई रूपों में फैली। कई क्रांतियों ने
अपने को पुनः टटोला। वैसे भी किसान आन्दोलन देश के कई भागों में
फैला था। मसलन-संथाल विद्रोह (1855-56), नील की खेती करने वाले
किसानों की हड़ताल (1860), मराठा किसान विद्रोह (1875-76) मोपला
बगावत (1836-96) बंगाली किसानों की बगावत (1872) आदि ने भी
क्रांतिकारी आन्दोलन की मानसिकता पर असर डाला।

  1. भारतीय क्रान्तिकारी आन्दोलन का इतिहास, मन्मथनाथ गुप्त, पृष्ठ-3
    (नोट-इस विद्रोह का विवरण श्री निवारण चक्रवर्ती के बंगला लेख से
    संकलित किया गया है)
  2. आजादी के दस्तावेज, ख्वाजा हसन निजामी, पृष्ठ-14
    4

क्रान्तिकारियों को जाने-अनजाने इनसे ऊर्जा मिलती रही। बीसवीं
सदी तक आते-आते किसानों का प्रतिरोध साम्राज्यवाद-विरोधी
प्रतिरोध में समाहित हो गया। किसान साम्राज्यवाद-विरोधी आन्दोलन में
शरीक हो गये। अंग्रेजों के खिलाफ राष्ट्रव्यापी आन्दोलन में किसानों ने
अहम भूमिका निभाई।¹
गीता में कहे गये वचन कि 'अन्याय के साथ समझौता नहीं,
अपितु उसका निवारण करो' के अनुसार भारतीय जनता अपने हक हेतु
संघर्ष कर निवारण करने का संकल्प ले चुकी थी। 1885 से 1905 के बीच
ऐसी घटनाएँ घटीं जिससे युवाओं का अंग्रेजों की न्याय प्रियता से विश्वास
उठने लगा था। 1885 में काँग्रेस का जन्म हुआ। उस समय हमें कोई
क्रांतिकारी शक्ति देखने को नहीं मिलती, जो कांग्रेस के पीछे रही हो या
साथ निभाती रही हो। क्रांतिकारी विचार का कोई व्यक्ति कांग्रेस में नहीं
था। मन्मथनाथ गुप्त ने लिखा है कि 'कांग्रेस का जनता से उस समय
कोई सम्बन्ध नही था, इसलिए उसकी कोई पूछ भी नहीं थी। कांग्रेस के
आरम्भ के बीस वर्ष तक उस पर उदारवाद का प्रभाव रहा।² कांग्रेस
समय-समय पर इग्लैंड में अपने शिष्ट मंडल भेजती रही। जिसका फल
यह हुआ कि ब्रिटेन में भारतीय मांगों के प्रति सहानुभूति रखने वाला एक
वर्ग बन गया। सुरेन्द्रनाथ बनर्जी के अनुसार 'अंग्रेजों की न्याय, दया
तथा बुद्धि की भावना में हमारा दृढ़ विश्वास है। संसार की महानतम
प्रतिनिधि सभा, संसदों की जननी, ब्रिटिश कॉमन्स सभा के प्रति हमारे
हृदय में श्रद्धा है। अंग्रेजों ने सर्वत्र प्रतिनिध्यात्मक आदर्श पर ही शासन
की रचना की है।' कांग्रेस के बारहवें अधिवेशन में रहीमतुल्ला सयानी ने
कहा-‘अंग्रेजो से बढ़कर सच्चरित्र तथा सच्ची जाति इस सूर्य के प्रकाश के
नीचे नहीं बसती।'³

  1. भारत का स्वतंत्रता संघर्ष, विपिन चन्द्र, पृष्ठ-28
  2. भारत में राष्ट्रीयता का विकास, डॉ० एस०एल० नागोरी, पृष्ठ-85
  3. एनीबेसेन्ट : हाउ इण्डिया रॉट फोर फ्रीडम, पृष्ठ-232 से उद्धृत
    5

दादा भाई नौरोजी ने कहा कि - 'यद्यपि जॉन बुल तनिक बुद्धि के
हैं, परन्तु यदि उसे एक बार कोई बात सुझा दी जाये कि वह अच्छी और
उचित है तो आप उसे कार्यरूप में परिणित किये जाने के प्रति विश्वस्त हो
सकते हैं। ‘‘दादा भाई नौरोजी का अंग्रेजों की न्यायप्रियता में विश्वास
था। वे यह भी कहते थे कि हम पुरुषों की तरह बोलें और घोषणा कर दें
कि हम पूर्णतः राजभक्त हैं। अंग्रेजों की न्यायप्रियता पर किसी बड़े नेता
को शायद ही संदेह हो। गोपाल कृष्ण गोखले ने कहा था - 'अंग्रेज जाति
की न्यायप्रियता तथा उदारता में हमारी अबाध निष्ठा है।' चाहे फिरोजशाह
मेहता हों या सर टी० माधवराव, प्रायः सभी ने अंग्रेजों की न्यायप्रियता
के गुण गाये। डॉ० सीता रमैया का यह कथन उल्लेखनीय है कि -
'उदारवादी नेता इस बात पर विश्वास करते थे कि अंग्रेज स्वभाव से ही
न्यायप्रिय होते हैं। अतः यदि उन्हें भारतीय दृष्टिकोण का सही ज्ञान करा
दिया गया तो वे भारतीय दृष्टिकोण को स्वीकार कर लेंगे।¹ लेकिन प्रश्न
था कि भारतीय मानसिकता का ठीक प्रकार से परिचय कौन देगा। खास
बात यह भी थी कि क्रान्तिकारी अंग्रेजों का गुण नहीं गाते थे। चाहे
न्यायप्रियता हो या शासन-सत्ता, कोई भी विषय/प्रकरण हो, अंग्रेज सुपाच्य
नहीं थे। क्रांतिकारियों को दासत्व का बोध होता था।
1857 के बाद यह लगता था कि आजादी की जंग समाप्त हो गयी
है लेकिन ऐसा नहीं था। क्रांति के बीज हृदय में अंकुरित होते रहे, फूटते
रहे, बढ़ते -पकते रहे। यही कारण है कि मनुष्य की जीने की इच्छा
जिजीविषा संघर्षों हेतु प्रेरित करती है और इतिहास का निर्माण करती है।
महात्मा गाँधी के भारतीय राजनीति में आने के पहले स्वतंत्रता के नाम
पर जो कुछ भी घटा वह क्रांतिकारियों की भूमिका ही थी।

  1. भारत में राष्ट्रीयता का विकास, डा० एस एल नागोरी, पृष्ठ 86
    6

तब ऐसा नहीं था कि यह हिंसा है और यह अहिंसा। विद्वानों का मानना
भी है कि हिंसा-अहिंसा का प्रश्न खड़ा करके किसी देश की आजादी हेतु
लड़ाई नहीं लड़ी जा सकती है।
जैसा कि पहले भी कहा जा चुका है कि अंग्रेजों की न्यायप्रियता
क्रांतिकारियों को पच नहीं रही थी। उदारवादी नेता भी क्रांतिकारियों के
लिए मानसिक रूप से सहयोग देने की कौन कहें उन्हें वे देखना तक न
चाहते थे। युवा वर्ग 'राजनीतिक भिक्षावृत्ति' का विरोध करने लगा था।
अपनी वस्तु लेने में भिक्षा जैसी बात युवा वर्ग की समझ में नहीं आती
थी। उन्हें यह ज्ञात था कि देश हित में किसी भी परिणाम तक जाने के
लिए कठिन संघर्ष आवश्यक है। जब संघर्ष होगा तो क्रांति होगी और इस
हेतु हिंसा-अहिंसा का रोड़ा ठीक नहीं था। युवाओं की धारणा थी कि
अंग्रेज स्वेच्छा से स्वशासन नहीं देंगे। स्वेच्छा के बिना किसी वस्तु को
प्राप्त करने हेतु लड़ाई तो आवश्यक थी। वैसे भी क्रांतिकारी युवा
हिंसात्मक साधनों में विश्वास रखते थे और उनका विश्वास अटल था। वे
विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार करते थे। वे आत्म निर्भर होना चाहते थे।
युवाओं को स्वतंत्र कार्यों में विश्वास था। बालगंगाधर तिलक ने कहा भी
है कि 'हमारा उद्देश्य आत्म निर्भरता है, भिक्षावृत्ति नहीं।'
क्रांतिकारी आन्दोलन में संयुक्त प्रांत (उत्तर प्रदेश) का प्रमुख स्थान
रहा है। 1857 के युद्धों में यही प्रान्त मुख्य केन्द्र था। रौलट की रिपोर्ट में
लिखा है कि 'संयुक्त प्रान्त आगरा व अवध और बंगाल के बीच बिहार
व उड़ीसा प्रान्त है। यह प्रान्त भौगोलिक दृष्टि से भारतवर्ष का हृदय है।
इस प्रान्त में बनारस और इलाहाबाद है जो हिन्दुओं की दृष्टि में पवित्र है,
आगरा है जो किसी जमाने में मुगल साम्राज्य का केन्द्र था और लखनऊ
है जो मुस्लिम राज्य की राजधानी थी।
7

1857 के युद्धों में यही प्रान्त मुख्यतः केन्द्र था।¹ उ०प्र० में क्रांतिकारी
आन्दोलन बंगाल से फैला और इस प्रान्त का क्रांतिकारी आन्दोलन
तत्कालीन सत्ता से खासा प्रभावित भी रहा। इसी समय भारत में दूसरी
तरफ क्रांतिकारी आन्दोलन का भी जन्म हुआ। उग्रवादी प्रतिरोध में
विश्वास रखते थे। ब्रिटिश वस्तुओं का बहिष्कार आदि उनके मुख्य साधन
थे, जबकि क्रांतिकारी हिंसात्मक साधनों में विश्वास रखते थे एवं बम व
बन्दूक आदि उनके मुख्य साधन थे। इन दोनों विचारधाराओं के विषय में
निहालसिंह ने लिखा है कि 'इन दोनों में धार्मिक भावना समायी हुई
थी, किन्तु दोनों का मार्ग अलग था। उनमें आत्म बलिदान की भावना
एवं स्वतंत्रता की भावना थी। प्रबल देश प्रेम था एवं विदेशी राज्य के प्रति
घृणा थी।² क्रांतिकारियों में उत्साह भरने का काम समाचार पत्रों ने खूब
किया। नवम्बर 1907 में स्वराज्य नाम से इलाहाबाद से पत्र निकला। यहीं
से सर्वप्रथम इस शांतिपूर्ण प्रान्त में क्रान्तिकारी प्रचार हुआ। इस अखबार
का स्वर प्रारम्भ से ही सरकार के विरुद्ध था। यही नही यह अखबार दिन
प्रतिदिन गरम होता गया। इस पत्र के एक के बाद एक इसके आठ
सम्पादक हुए जिसमें कई को आपत्ति जनक लेखों के कारण लम्बी सजाएं
हुई। इस पत्र ने बड़े जोर-शोर से राजद्रोह फैलाया। यह पत्र क्रान्तिकारियों
के लिए ऊर्जा भर रहा था। इलाहाबाद से ही 1909 में 'कर्मयोगी'
निकला। स्पष्ट है कि लेखनी ने ओज भरना शुरू कर दिया था।
क्रान्तिकारी गतिविधियों पर दृष्टि दें तो बनारस षणयन्त्र से क्रान्तिकारी
गतिविधियाँ अपने चरम पर थीं। बड़े नेतृत्व कर्ताओं के बयान आग में
घी का काम कर रहे थे।


  1. भारतीय क्रांतिकारी आन्दोलन का इतिहास, मन्मथनाथगुप्त, पृष्ठ-84
  2. भारत में राष्ट्रीयता का विकास एस०एल० नागोरी, पृष्ठ-120

8

क्रान्तिकारियों को तो जोश चाहिए था, ऊर्जा चाहे जहाँ से मिले।
एक-एक वाक्य असरदार साबित हो रहे थे। पूर्णरूप से युवा सहमत थे कि
उन्हें किसी भी प्रकार की भिक्षा नहीं चाहिए। तिलक ने 15 जून 1897 को
'केसरी' में लिखा कि - 'यदि हमारे घर में चोर घुस आये और हममें
उनको घर से बाहर निकालने की सामर्थ्य न हो तो हमें बिना झिझक
उन्हें घर के अन्दर बन्द करके जला देना चाहिए'। लाला लाजपत राय ने
कहा कि - 'अंग्रेज भिखारी से सबसे अधिक घृणा करते हैं तथा मैं
सोचता हूँ कि भिखारी घृणा के पात्र हैं भी। अतः हमारा कर्तव्य है कि
हम सिद्ध कर दे कि हम भिखारी नहीं है।'¹
1909 का एक्ट लागू होने के बाद अंग्रेजी शासन का विरोध करने
वाली एक मात्र पार्टी क्रांतिकारी पार्टी थी। यह क्रांतिकारी पार्टी जनता में
चर्चा का विषय बनी हुई थी। आम जनता क्रांतिकारियों का समाचार
सुनने की हमेशा इच्छुक रहती थी। क्रांतिकारियों को दी जाने वाली
सजाओं में जो कड़ी और कठोर अमानवीय हुआ करती थी, से जनता में
अंग्रेजी सरकार के विरुद्ध रोष बढ़ जाता था। बहुत लोग बमबारी जैसी
घटनाओं के होने को सही ठहराते थे। ऐसा विश्वास होने लगा था कि
ऐसी ही घटनाओं से देश आजाद हो जायेगा। किसी भी अंग्रेज अफसर
की हत्या से सारे देश में चर्चा होती थी और जनता में हलचल मच जाती
थी। अधिकांश लोग समाचार पत्रों में डकैतियां, अफसरों पर हमले की
घटनाओं का समाचार बड़े चाव से सुनते-पढ़ते थे। संयुक्त प्रान्त में 1908
में बनारस में शचीन्द्रनाथ सन्याल द्वारा एक क्लब की स्थापना से
क्रान्तिकारी गतिविधियों की

  1. भारत में राष्ट्रीयता का विकास, डॉ० एस०एल० नागोरी, पृष्ठ-177
    9

शुरुआत हुई।¹ इस क्लब का नाम अनुशीलन समिति रखा गया। यह
समिति 1914 तक निष्क्रिय रही। उसी वर्ष रास बिहारी बोस ने संयुक्त
प्रान्त की गतिविधियों का संचालन अपने हाथ में ले लिया। इसके बाद
तो संयुक्त प्रान्त का क्रांतिकारी स्वर ओज से भर गया। क्रांतिकारी स्वर
के उग्र होने के कई कारण हो सकते हैं लेकिन एक महत्वपूर्ण कारण
'आर्थिक कारण' भी था। लार्ड बेकन ने कहा है कि - 'आर्थिक दरिद्रता
और आर्थिक असंतोष क्रांति को जन्म देता है।'
यह निश्चित है कि असंतोष चाहे जिस प्रकार का क्यों न हो वह
क्रांति को जन्म देता ही है। शाहजहाँपुर भी इससे अछूता नही रहा।
रजनी राय दत्त का मत है कि 1857 के विद्रोह से यह बात साफ हो गयी
कि सतह के नीचे जनता में असंतोष और बेचैनी की भयानक आग
सुलग रही है। इस असंतोष की आग के कारण अंग्रेज शासकों में ऐसी
घबराहट पैदा हुई जो इसके बाद की उनकी सारी कठिनाइयों में दिखायी
देती है।² यह बेचैनी और यह सुलगती आग शाहजहाँपुर में भी थी।
शाहजहाँपुर पर एक नजर दें तो अशफाक के व्यक्तित्व और उनकी
क्रांतिकारी भूमिका का संस्कार स्पष्ट हो जायेगा। रामायण और महाभारत
काल से होता हुआ शाहजहाँपुर वाजिद अली शाह के शासनकाल तक
अपनी पहचान और महत्वपूर्ण छवि पर कायम रहा। अंग्रेज अपने स्वभाव
और अपनी नीतियों के कारण अवध पर कुशासन का आरोप लगाकर
अपने अधिकार में कर लेने का कुचक्र रचने लगे थे। नवाब वाजिद अली
शाह ने आरोपों का खण्डन किया। वे किसी भी मूल्य पर अवध को
ब्रिटिश सत्ता के हाथों नही सौंपना चाहते थे। नवाब ने महारानी
विक्टोरिया को एक स्मृति पत्र दिया कि यदि कम्पनी के शासन के अधीन
कानपुर, फर्रुखाबाद और शाहजहाँपुर के नवाब के अधीन जिलों की

  1. भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास, रामगोपाल, पृष्ठ-207
  2. भारत वर्तमान और भावी, रजनीपाल दत्त, पृष्ठ-119
    10

तुलना की जाये तो स्पष्ट हो जायेगा कि नवाब के अधीन इलाके की
जनता ज्यादा सरसब्ज और खुशहाल है।¹ यह तो स्पष्ट तब भी था कि
अंग्रेजी शासन भारतीयों को सुखकर नहीं था। 1857 के प्रमाणिक लेखक
सर जगन लिखते हैं कि 'शाहजहाँपुर में ब्रिटिश अधिकारियों को शहर के
लोगों द्वारा विद्रोह करने का भय था।² सत्ता हमेशा क्रांति से भय खाती
है। अंग्रेज भी विद्रोह से डरे हुए थे और यह भय वास्तविकता में तब
बदल गया जब 31 मई 1857 को लगभग 20-22 विद्रोही तलवार लिए चर्च
में घुस गये। इन विद्रोहियों का जवाहर राय नामक व्यक्ति नेतृत्व कर रहा
था। विद्रोहियों में अन्य प्रमुख विद्रोही थे - गंगा दुबे, महादेव, राम
नारायण दुबे, बिन्द्रा सिंह, रामधीन सिंह, नारायण पाण्डे, ननकूं व शिव
चरण। यह बात और थी कि इन विद्रोहियों को गिरफ्तार किया गया, इन
पर मुकदमा चला, जेल भी गये और फिर मुक्त कर दिये गये।
शाहजहाँपुर की क्रांति में गोरखपुर के मौलवी सरफराज अली का भी
महत्वपूर्ण योगदान था।³ सरफराज अली में विशेष गुण थे। उनका नेतृत्व
कभी असफल नहीं रहता। शाहजहाँपुर अब क्रांतिकारियों का अड्डा बन
गया। अब क्या था युवा का खून उमाँच बाँधने लगा और फिर क्रांति का
दौर रुका नहीं। डॉ० ए०डफ ने लिखा है - 'यदि इस विद्रोह को
बहुसंख्यक जनता का समर्थन प्राप्त न होता और सहानुभूति न मिली
होती और केवल सैनिकों द्वारा किया गया बलवा मात्र ही होता तो प्रथम
दो चार बड़ी विजयों के उपरान्त यह बगावत शान्त हो जाती।


1.वाजिद अली शाह और अवध राज्य का पतन, परिपूर्णानंद वर्मा, पृष्ठ-35
2.हिस्ट्री ऑफ दि इण्डियन म्यूटनी खण्ड-3, सरजान विलियम्स, पृष्ठ-578
3.स्वतंत्रता आंदोलन में शाहजहाँपुर का योगदान, डॉ० एन०सी०मेहोत्रा, पृष्ठ-41

11

.....प्रतीत होता है कि यह सैनिकों का साधारण विद्रोह नहीं, यह विप्लव
है, क्रांति का विस्फोट है।' ¹ राष्ट्रीय चेतना जगाने का काम आर्य समाज
ने भी जमकर शाहजहाँपुर की धरती से किया। स्वतंत्रता की पहली पंक्ति
के शब्द स्वामी दयानंद सरस्वती के मुख से ही निकले थे। क्रांति की
धधकती ज्वाला से भरपूर क्रांति का हवन कुण्ड वैचारिक समिधा से
प्रज्ज्वलित हो रहा था। एक तरफ युवा वर्ग का गर्म खून और दूसरी ओर
वैचारिक आक्रोश के तेजस्वी स्वर.... फलस्वरूप राम प्रसाद बिस्मिल और
अशफाक उल्ला जैसे युवा इस वैचारिक भूमि से अछूते नहीं रहे। राम
प्रसाद बिस्मिल पूर्ण रूप से आर्य समाजी हो गये और उन्हीं के मित्र
अशफाक बिना किसी हिन्दू-मुस्लिम भेद के घनिष्ठ मित्र ही नहीं देश प्रेमी
भी हुए, जिन्होंने राम प्रसाद की ही तरह भारत भूमि को अपने प्राण
न्यौछावर कर दिये। भारतीय क्रांतिकारियों के इतिहास में अशफाक की दी
हुई प्राणों की आहुति सदैव रेखांकित होती रहेगी।
1916 की राजनैतिक घटनाएं महत्वपूर्ण रहीं और शाहजहाँपुर के
मामलों में तो खास थीं। इसी काल में हसरत मोहाली, शौकत अली,
मोहम्मद अली, शमसुद्दीन को नजरबन्द रखा गया।² क्रांतिकारी
परमानन्द को लाहौर षड्यन्त्र केस (1916) के तहत फाँसी की सजा
सुनाकर क्रांतिकारियों को विचलित कर दिया। राम प्रसाद बिस्मिल ने
आर्य समाज मंदिर में स्वामी सोमदेव के समक्ष बदला लेने की प्रतिज्ञा
की।³ सन् 1916 में ही हसरत मोहानी के साथ शाहजहाँपुर में शमसुद्दीन
को भी बन्दी बनाया। अशफाक को क्रांति का वातावरण मिला। वे दिन
प्रतिदिन क्रांति हेतु निखरते चले गये।

  1. दि इण्डियन रिबेलियन, डा०ए०डफ, पृष्ठ 241
  2. पूर्वा-जगदीशचन्द्र दीक्षित, पृष्ठ-83
  3. जांबाज पत्रिका, डा० एन०सी० मेहरोत्रा, पृष्ठ-47
    12

राष्ट्र हेतु समर्पित होने का भाव उमाँचे बाँधने लगा था।
अशफाक उल्ला की पारिवारिक पृष्ठभूमि पर एक नजर दें तो स्थिति
और स्पष्ट हो जायेगी। अशफाक उल्ला खाँ अंग्रेजी सरकार की
गतिविधियों की बखूबी जानकारी रखते थे। 1857 से ही अशफाक उल्ला
का मातृपक्ष सरकारी पदों पर कार्य करता चला आ रहा है। किसी भी
व्यक्ति के लिए उसकी पारिवारिक पृष्ठभूमि का खास महत्व होता है।
अध्ययन से पता चला कि अशफाक उल्ला खाँ के पूर्वजों ने सरकार के
लिए जासूसी भी की थी। अशफाक उल्ला खाँ को जब यह ज्ञात हुआ कि
मातृपक्ष (ननिहाल) के लोग अंग्रेजों के प्रति भक्ति भावना रखते है तो वे
स्वयं को (लज्जित) हीन समझने लगे, उन्हें अपने आप से शर्म आने
लगी। लेकिन उन्हें किसी भी भाँति अपने विश्वास को बनाये रखना था।
पितृपक्ष पर जब उनका ध्यान गया तो उन्होंने पाया कि पिता की ओर से
स्वाधीनता के उपासक की सुगंध आ रही है। वैसे अशफाक के पिता सब
इन्स्पेक्टर थे। अशफाक को युद्ध विषयक पुस्तकें पढ़ने का शौक बचपन से
ही था। वे क्रांतिकारियों के विषय में अनेक बातें ध्यान से सुनते थे।
अशफाक खुदीराम बोस और कन्हाई दत्त के सम्पर्क में आये। अशफाक
के दिल में दबा हुआ क्रांतिकारी बीज अंकुरित होने लगा। अशफाक देश
के लिए घातक संकीर्ण मनोवृत्ति का परित्याग कर बिना किसी भेद भाव
के राष्ट्र की एकता और अखण्डता को बचाये रखना चाहते थे, इस हेतु
किसी भी प्रकार के कार्य करने से वे हिचकते नही थे। यह तो स्पष्ट ही
था और सत्य भी कि क्रांतिकारी आन्दोलन राष्ट्रीय मुक्ति संघर्ष की एक
बलवती व प्रभावोत्पादक धारा थी। शचीन्द्र नाथ सान्याल का कथन था
कि 'क्रांतिकारियों ने राष्ट्रीय मुक्ति संघर्ष को आगे बढ़ाने के लिए उत्प्रेरक
तथा पूरक भूमिका निभाई।'
अशफाक उल्ला खाँ को जहाँ सबसे ज्यादा प्रेरणा मिली वह था
मैनपुरी काण्ड। शाहजहाँपुर का महत्वपूर्ण योगदान था मैनपुरीकाण्ड में।
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इस काण्ड के तहत लालारामाधीन, राम प्रसाद बिस्मिल, देवनारायण,
गंगा सिंह चन्देल, राजाराम बाजपेयी, कालीचरन शर्मा ने उल्लेखनीय
भूमिका निभाई। सर्वविदित है कि यही मैनपुरी काण्ड है जिससे प्रेरित
होकर अशफाक उल्ला ने भारत को गुलामी की जंजीरों से मुक्त कराने का
संकल्प लिया। इसके बाद अशफाक उल्ला पं० राम प्रसाद बिस्मिल के
सम्पर्क में आये, लेकिन प्रथम मिलन में अशफाक को निराशा हाथ लगी।
लेकिन होना तो कुछ और ही था। तमाम आरोहों-अवरोहों के बाद कट्टर
मुस्लिम परिवार के अशफाक और आर्य समाजी पं० राम प्रसाद बिस्मिल
के बीच धार्मिकता जैसी बात आड़े नहीं आई और वे एक दूसरे के गहरे
मित्र बन गये। अब क्या था अशफाक की प्रसन्नता का पारावार न था।
वे एक ऐसे क्रांतिकारी के मित्र बन गये जिनके नाम के स्मरण मात्र से
ओज भर जाता था। दो देश-भक्त एक जान, एक मन, एक काम, एक
विचार हो गये और यह गति अशफाक को ऊँचाई पर ले जाकर ही दम
ली। भेद भाव के सारे प्रश्न समाप्त हो गये थे। राम प्रसाद बिस्मिल ने
जिन युवकों को शाहजहाँपुर में क्रांतिकारी दल की ओर प्रवृत्त किया उन
युवकों में अशफाक उल्ला खाँ प्रमुख थे। जांबाज अशफाक उल्ला जब
क्रांतिकारी दल में सम्मिलित हो गये तो उन्होंने इस धारणा को मिथ्या
सिद्ध कर दिया कि मुसलमान भारत की स्वाधीनता के लिए बलिदान
करने में पीछे रहने वाले हैं। राम प्रसाद बिस्मिल का साथ मिल जाने के
कारण अशफाक का जीवन ही भिन्न हो गया। अब वे सामान्य नागरिक
नहीं रह गये थे। अब वे देश के लिए जरूरी थे। वे इतिहास के लिए
आवश्यक थे। वे क्रांतिकारी यात्रा में प्रमुख मार्ग थे।
देश के लिए मर मिटने वाले उन विशेष लोगों में वे थे जिनका सारा
धर्म, कर्म, विश्वास, दिनचर्या, विचार सिर्फ राष्ट्र की स्वतंत्रता में लगा
था।
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अशफाक उल्ला खाँ भारत में हिन्दू मुस्लिम एकता का सपना लेकर
क्रांतिकारी बने थे। वे एक प्रगतिशील समाज की संरचना चाहते थे। यही
नही वे समाजवादी विचारधारा के पोषक थे। स्वयं अशफाक ने कहा है -
'मैं हिन्दुस्तान की ऐसी आजादी का ख्वाहिशमंद हूँ जिसमें गरीब खुश
और आराम से रहते और सब बराबर होते।' ऐसी विचारधारा के धनी
अशफाक निश्चित ही स्तुत्य हैं। अशफाक के काल में क्रांतिकारियों का
एक और प्रमुखकाम था कि वे अपने सभी मित्रों को, चाहे वे क्रांतिकारी
हों या न हों, मातृभूमि के लिए आत्म बलिदान हेतु प्रेरित करते रहते थे।
क्रांतिकारियों का कार्य महत्वपूर्ण तो था ही लेकिन इससे अधिक महत्व था
स्वतंत्रता के संघर्ष में स्वस्थ और सार्थक वातावरण तैयार करना और
वातावरण के काम में शायर दिल अशफाक उल्ला खाँ सबसे आगे थे। यह
उनके पत्रों विचारों और काव्य रचनाओं से स्पष्ट हो जाता है। अशफाक
बचपन में अपने मौलवी साहब की शिक्षाओं से खूब प्रभावित हुए।
मौलवी साहब सच्चे उस्ताद थे जो अशफाक को तराशकर देश हित हेतु
तैयार करने में खूब मददगार साबित हुए। सत्य है कि अशफाक को
तराशने का यही समय था जब बाल मन के हृदय में ऐसा बीज बोया जा
सके जो आगे चलकर वृक्ष बनकर पूरे समाज की अपनी छाया और अपने
फल से सेवा कर सके। युवा वर्ग में उत्साह और प्रेरणा भर सके। मौलवी
साहब की शिक्षाओं ने जाने-अनजाने अंग्रेजों के प्रति नफरत पैदाकर दी
थी। यदि उनके बाल मन और युवा ऊर्जा की तुलना करें तो स्पष्ट हो
जायेगा कि वे एक जांबाज सिपाही, एक विश्वसनीय और निष्ठावान
कार्यकर्ता थे। वे मातृभूमि हेतु सब कुछ न्यौछावर कर देने वाले मानव
थे। उनकी बहुमुखी प्रतिभा से प्रायः सभी प्रभावित रहते थे।
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आगे चलकर अशफाक उल्ला खाँ सशस्त्र क्रांति के ध्वजवाहक बने।¹
उनकी बहादुरी, निडरता और अदम्य साहस से भला कौन क्रांतिकारी
अछूता था। देशभक्ति की प्रबल भावना तो थी ही, साथ ही उनमें
हिन्दू-मुस्लिम को साथ-साथ लेकर चलने का अभूतपूर्व कौशल था। यही
क्षमता, यही संवेदनशीलता अशफाक को समाज में लोकप्रिय बना सकी।
कवि हृदय भावुक और संवेदनशील तो होता ही है। वे अपनी बात
कविताओं, गज़लों एवं नज़्मों में कहते थे। उनकी लिखी गयी कविताएं
आज भी रेखांकित होती हैं।
अशफाक की कविताओं के बिना स्वतंत्रता संघर्ष हेतु लिखी गयी
रचनाओं का अध्याय पूरा नही होता। अशफाक के पत्र और उनके वक्तव्य
इतने प्रभावित करते हैं कि एक शान्त मन भी उद्वेलित हुए बिना नही रह
सकता। अशफाक के बचपन का अध्ययन करने से स्पष्ट है कि पूत के
पाव पालने में ही नजर आने लगे हैं। वे जब भी मेले जाते थे तो
तलवार खरीदते थे। जिससे पता चलता है कि अशफाक के भीतर क्या रहा
है। निश्चित ही यह गुण क्रांतिकारी होने का अंकुरण है।
मैनपुरीकाण्ड का प्रभाव तो अशफाक पर पड़ ही चुका था और वे
बाकायदा राम प्रसाद बिस्मिल की सेना में शामिल भी हो गये थे।
अशफाक अब क्रांतिकारी पहचान की संज्ञा से अलंकृत थे। छोटी-छोटी
घटनाओं डकैतियों के बाद जब राम प्रसाद बिस्मिल की घोषणा के
अनुसार वे काकोरी काण्ड में महत्वपूर्ण भागीदारी निभाने हेतु प्रथम पंक्ति
में खड़े हुए तो अशफाक की निष्ठा, उनका शौर्य, बल, साहस का आभास
किये बिना रहा नही जा सकता है। वैसे तो अशफाक इस डकैती की
योजना के पक्षधर नही थे। लेकिन स्वयं को मनाकर जब वे प्रस्तुत हुए
तो उनके फौलादी तेवर और ताकतों की सभी साथियों ने सराहना की।

  1. जांबाज (पत्रिका) सम्पादक, सुरेश चन्द्र मिश्र पृष्ठ-1
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जिस तिजोरी के धन को लूटने की योजना थी, वह तिजोरी किसी अन्य
साथी से नही अशफाक के हाथों से ही टूटी। अशफाक के मत को
मन्मथनाथ गुप्त ने भी उचित ठहराया है। श्री गुप्त ने लिखा भी है कि -
'अशफाक उल्ला खाँ का विरोध किसी डर या भय से प्रेरित होकर न था।
प्रत्युत वह बुद्धिमत्ता की आवाज थी। बाद के इतिहास ने सिद्ध कर दिया
कि अशफाक सही थे और बाकी क्रांतिकारी गलती पर थे।¹ काकोरी ट्रेन
डकैती में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले फरार अशफाक को 8 दिसम्बर
1926 को दिल्ली में गिरफ्तार कर लिया गया। इसके पूर्व वे कई स्थानों
पर घूमते रहे और फिर क्या होना था शायद अज्ञात मन को सब ज्ञात हो
गया था।
काकोरी काण्ड आधुनिक इतिहास के क्रांतिकारी अध्याय में
अतिमहत्वपूर्ण पृष्ठ बन गया है जिसका शीर्षक बनकर चमक रहे है
अशफाक उल्ला खाँ। इस उल्लेखनीय काण्ड में पं० राम प्रसाद बिस्मिल,
अशफाक उल्ला खाँ, चन्द्रशेखर आजाद, राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी, मुकुन्दीलाल,
मन्मथनाथ गुप्त, बनवारी लाल, शचीन्द्र नाथ वक्शी, मुरारीलाल, कुन्दन
लाल के नाम महत्वपूर्ण हैं। कलम के धनी अशफाक उल्ला खाँ में भीम
जैसी ताकत भी होगी, यह जानकर तो आश्चर्य ही लगता है। कहाँ
कोमल कवि हृदय, कहां बज्र जैसी भुजाएं। अशफाक के विषय में अक्सर
कहा जाता है कि - 'अशफाक बड़े सुडौल और सुन्दर युवक थे। ऐसे सुन्दर
व्यक्ति कम ही देखने को मिलते हैं। वे तैरने, घोड़े की सवारी,
क्रिकेट-हाकी खेलने बंदूक चलाने का शौक रखते थे।² इससे यह भी स्पष्ट
होता है कि वे शाहजहाँपुर के रईसों में गिने जाते थे।

  1. जांबाज (पत्रिका) डा० डी०एन मेहरोत्रा, पृष्ठ-48
  2. भारतीय क्रांतिकारी आन्दोलन का इतिहास-मन्मथनाथगुप्त, पृष्ठ-200
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राम प्रसाद बिस्मिल से दोस्ती हुई और वे स्वयं को समर्पित कर बैठे।
इसके बावजूद रामप्रसाद बिस्मिल से अशफाक की इच्छा व्यक्त (क्रांतिकारी
कार्य) होती रही और मामला हमेशा टलता रहा।.... अन्त में जब
अशफाक की इच्छा की प्रबलता देखी तो पं० राम प्रसाद जी ने उन्हें अपने
दल में सम्मिलित कर ही लिया।
ज्ञातव्य है कि अशफाक उल्ला खाँ कवि हृदय थे, उनके भीतर
मनुष्यता, देश प्रेम, भाई चारा, गंगा-जमुनी संस्कृति की भावना कूट-कूट
कर भरी थी। वे संवेदनाओं की पराकाष्ठा से परिचित थे। संवेदित हृदय
अपनी रचनाओं में अपना चित्र उकेर ही देता है। अशफाक की रचनाओं
से पता चलता है कि वे काव्य तत्व के अच्छे जानकार थे। वे कविता की
आत्मा को समझते थे। उन्हें पता था कि शायरी में अपनी बात कैसे कही
जाती है। उन्हें यह भी पता था कि वे अपनी शायरी में किस वैचारिक
भूमिपर खड़े हैं। कहना न होगा वे एक ऐसी जिन्दगी चाहते थे जहाँ आम
आदमी खुली हवा में सांस ले सके। कैद मुक्त जीवन की अभिलाषा
रखने वाले अशफाक ने बेहतरीन रचनाएं की हैं जो हमारे इतिहास की
काव्यात्मक धरोहर हैं।
काकोरी काण्ड में गिरफ्तार अशफाक को अपने प्राणों की आहुति
फाँसी के रूप में देनी पड़ी। लेकिन इसका फल यह हुआ कि क्रांतिकारियों
द्वारा किया गया यह काण्ड पूरे भारत में सूचित ही नही चर्चित भी हुआ।
क्रांतिकारियों द्वारा सम्पादित काण्डों में यह बड़ा काण्ड था। जिसका प्रभाव
जनता पर ही नही अंग्रेजों पर भी पड़ा। अशफाक का व्यक्तित्व ही नहीं
कृतित्व भी सारे भारत में फैला। यह भी कहा गया कि अशफाक उल्ला
खाँ ऐसे पहले मुसलमान क्रांतिकारी थे जिन्हें षड़यंत्र के मामले में फाँसी
दी गयी। उनका प्रयत्न था कि उनकी तरह अन्य मुस्लिम युवा भी
क्रांतिकारी बने और मातृ भूमि की रक्षा करें। अशफाक तो हिन्दू मुस्लिम
एकता के कट्टर समर्थक तो थे ही अपनी ही तरह औरों में भी यही
भावना देखना चाहते थे।
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