अमर शहीद अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ: व्यक्तित्व और कृतित्व (काकोरी के अमर शहीद का जीवन व रचनाएँ)
Amar Shaheed Ashfaqulla Khan: Personality & Works
अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ 'वारसी' (सम्पादक: बनारसीदास चतुर्वेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय-एक
प्रस्तावना
मनुष्य का प्राकृतिक स्वभाव है कि वह दासत्व स्वीकार नहीं करना
चाहता। इसी अस्वीकार के कारण स्वतंत्र होने हेतु अनेक आन्दोलन हुए।
मनुष्य स्वतंत्र होने के लिए अनेक उपाय अपनाता है। वह संघर्ष करता
है। वह लड़ता है, जीवन कुर्बान करता है लेकिन गुलामी के धागे में
बँधना स्वीकार नहीं करता है। इतिहास गवाह है कि व्यक्ति को कभी
गुलामी कबूल नहीं हुई और यह बंधन यदि विदेशी हो तो मुक्त होने की
छटपटाहट बढ़ जाती है। भाषा, संस्कृति का मेल हो तो कुछ देर के लिए
दासत्व बर्दाश्त किया जा सकता है। यही कारण था कि देशी दास भाव ने
कभी बड़ा आन्दोलन खड़ा नहीं किया लेकिन जब वही भाव विदेशी हो
गया तो बेचैनी बढ़ गयी। प्राचीन काल पर दृष्टि डालें तो गुलामी की
मानसिकता और स्पष्ट हो जायेगी। मिश्र में दासों को (युद्धबंदी) मुर्दा
कहते थे और मार डालते थे। ये युद्धबंदी अपने श्रम के कारण लाभकारी
सिद्ध हुए, तब इन्हें मारना बन्द हो गया और 'जिन्दा मुर्दा' की संज्ञा में
होते हुए दास बनाये गये। रोम में दासों को इटली भेजा जाता था।
यूनान में एटिटका के किसान कर्ज के कारण दास बने।¹
भारत की यह विशेषता रही है कि दास प्रथा के बावजूद भारत की
मानवतावादी एवं उदारवादी दृष्टि रही है। इतिहास में उत्पीड़न से मुक्ति के
लिए वीरतापूर्वक संघर्षों का वर्णन मिलता है। जबकि विदेशी ताकतें भारत
के उदारवादी गुणों का लाभ उठाती रही हैं। तमाम कारणों के बावजूद
भारत में क्रांति का अभियान अपने सुपरिणाम तक चला। जिसका नेतृत्व
महान चिन्तकों, अदम्य साहस से भरे देशभक्तों ने किया। परिणाम यह
हुआ कि क्रान्ति सफल हो गयी,
1- प्राचीन विश्व इतिहास का परिचय, प्रगति प्रकाशन, पृष्ठ-45, 143
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