अमर शहीद अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ: व्यक्तित्व और कृतित्व (काकोरी के अमर शहीद का जीवन व रचनाएँ)
Amar Shaheed Ashfaqulla Khan: Personality & Works
अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ 'वारसी' (सम्पादक: बनारसीदास चतुर्वेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतब ऐसा नहीं था कि यह हिंसा है और यह अहिंसा। विद्वानों का मानना
भी है कि हिंसा-अहिंसा का प्रश्न खड़ा करके किसी देश की आजादी हेतु
लड़ाई नहीं लड़ी जा सकती है।
जैसा कि पहले भी कहा जा चुका है कि अंग्रेजों की न्यायप्रियता
क्रांतिकारियों को पच नहीं रही थी। उदारवादी नेता भी क्रांतिकारियों के
लिए मानसिक रूप से सहयोग देने की कौन कहें उन्हें वे देखना तक न
चाहते थे। युवा वर्ग 'राजनीतिक भिक्षावृत्ति' का विरोध करने लगा था।
अपनी वस्तु लेने में भिक्षा जैसी बात युवा वर्ग की समझ में नहीं आती
थी। उन्हें यह ज्ञात था कि देश हित में किसी भी परिणाम तक जाने के
लिए कठिन संघर्ष आवश्यक है। जब संघर्ष होगा तो क्रांति होगी और इस
हेतु हिंसा-अहिंसा का रोड़ा ठीक नहीं था। युवाओं की धारणा थी कि
अंग्रेज स्वेच्छा से स्वशासन नहीं देंगे। स्वेच्छा के बिना किसी वस्तु को
प्राप्त करने हेतु लड़ाई तो आवश्यक थी। वैसे भी क्रांतिकारी युवा
हिंसात्मक साधनों में विश्वास रखते थे और उनका विश्वास अटल था। वे
विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार करते थे। वे आत्म निर्भर होना चाहते थे।
युवाओं को स्वतंत्र कार्यों में विश्वास था। बालगंगाधर तिलक ने कहा भी
है कि 'हमारा उद्देश्य आत्म निर्भरता है, भिक्षावृत्ति नहीं।'
क्रांतिकारी आन्दोलन में संयुक्त प्रांत (उत्तर प्रदेश) का प्रमुख स्थान
रहा है। 1857 के युद्धों में यही प्रान्त मुख्य केन्द्र था। रौलट की रिपोर्ट में
लिखा है कि 'संयुक्त प्रान्त आगरा व अवध और बंगाल के बीच बिहार
व उड़ीसा प्रान्त है। यह प्रान्त भौगोलिक दृष्टि से भारतवर्ष का हृदय है।
इस प्रान्त में बनारस और इलाहाबाद है जो हिन्दुओं की दृष्टि में पवित्र है,
आगरा है जो किसी जमाने में मुगल साम्राज्य का केन्द्र था और लखनऊ
है जो मुस्लिम राज्य की राजधानी थी।
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