अमर शहीद अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ: व्यक्तित्व और कृतित्व (काकोरी के अमर शहीद का जीवन व रचनाएँ)
Amar Shaheed Ashfaqulla Khan: Personality & Works
अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ 'वारसी' (सम्पादक: बनारसीदास चतुर्वेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविदित है कि भारतवर्ष एक दिन में अंग्रेजों के अधीन नहीं हुआ था।
लगभग सौ साल का षड्यन्त्र, विश्वासघाती चाल, कूटनीति भरी दृष्टि के
बाद अंग्रेजों का परचम लहराया है। 1857 के पहले भी विद्रोह हुआ था।
निजाम की फौज की तृतीय घुड़सवार सेना ने 1855 के 21 सितम्बर को
विद्रोह का झण्डा बुलन्द किया। फौज के अध्यक्ष ब्रिगेडियर मैकेन्जी के
शरीर पर दस घाव आये और वे किसी तरह जान लेकर भागे। विद्रोहियों
का घर लूट लिया गया। इस विद्रोह के नेता भी मुसलमान थे।¹ स्पष्ट है
कि 1857 के पूर्व कई विद्रोह हुए जो इतिहास में रेखांकित हैं। 1857 के
बाद महत्वपूर्ण विद्रोहों में किसान विद्रोह का जिक्र आता है। किसान
आन्दोलन की पृष्ठभूमि पहले से ही तैयार थी। हाउस ऑफ लार्ड्स की
पाँचवी रिपोर्ट (1821) कहती है कि बंगाल में इस्तमरारी बन्दोबस्त की
वजह से जितनी गरीबी फैली है, और भूमि अधिकारों में जितना बड़ा
परिवर्तन हुआ है, उतना उसी समय में महज कानून के जोर से और
किसी देश में या किसी युग में शायद नहीं हुआ होगा।² देश की अधिक
आबादी किसानों की है सो यह आग कई रूपों में फैली। कई क्रांतियों ने
अपने को पुनः टटोला। वैसे भी किसान आन्दोलन देश के कई भागों में
फैला था। मसलन-संथाल विद्रोह (1855-56), नील की खेती करने वाले
किसानों की हड़ताल (1860), मराठा किसान विद्रोह (1875-76) मोपला
बगावत (1836-96) बंगाली किसानों की बगावत (1872) आदि ने भी
क्रांतिकारी आन्दोलन की मानसिकता पर असर डाला।
- भारतीय क्रान्तिकारी आन्दोलन का इतिहास, मन्मथनाथ गुप्त, पृष्ठ-3
(नोट-इस विद्रोह का विवरण श्री निवारण चक्रवर्ती के बंगला लेख से
संकलित किया गया है) - आजादी के दस्तावेज, ख्वाजा हसन निजामी, पृष्ठ-14
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