अमर शहीद अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ: व्यक्तित्व और कृतित्व (काकोरी के अमर शहीद का जीवन व रचनाएँ)
Amar Shaheed Ashfaqulla Khan: Personality & Works
अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ 'वारसी' (सम्पादक: बनारसीदास चतुर्वेदी) द्वारा
आप मुझे अनाथालय में मिल सकेंगे।,' '¹
क्रांतिकारी उस समय छद्म नाम रखकर काम करते थे। राम प्रसाद
बिस्मिल के कई नाम थे, इसी में से एक नाम 'रुद्र राय' भी था। अन्य
क्रांतिकारियों के छद्म नाम की चर्चा योगेश चन्द्र चटर्जी ने की है, जो
निम्न है -
वास्तविक नाम छद्म नाम
- राम प्रसाद बिस्मिल- आनंद प्रकाश, रुद्रराय, मास्टर महाशय, महंत
- राजेन्द्र नाथ लाहिड़ी- निताई, निताई चन्द्र, निताई मामा, जुगुल
किशोर, दीक्षित, मथुरा प्रसाद, जवाहर लाल
बाजपेई, के०पी० श्रीवास्तव। - राम कृष्ण खत्री - नरेन्द्र, गंगाराम, गोविन्द प्रकाश
- योगेश चन्द्र चटर्जी- राय, प्रफुल्ल चन्द्र राय, राय महाशय
- मुकुन्दी लाल - महाराज
- बनवारी लाल - तारा सिंह, रामान्दा सिंह
- अशफाक उल्ला - कुंवर जी, मन्ताना, वारी, कृष्ण
- बनारसी - बाबा
- मन्मथनाथ गुप्त - नवाब, नवाब साहब
- चन्द्रशेखर आजाद - क्यूइक सिल्वर
- एस०एन० बख्शी - बद्री, कन्हई लाल, बागची
- सेठ दामोदर स्वरूप- लाला जी
- जी०सी० कर - चौधरी
- पूर्वो, सुधीर विद्यार्थी (उद्धत), पृष्ठ -37
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वास्तविक नाम छद्म नाम
14. इन्द्रभूषण - गोवर्ड-¹
एक सरकारी रिपोर्ट के अनुसार मीटिंग का उद्देश्य पिछले कार्यों की
समीक्षा करना तथा भविष्य के कार्यक्रम की रूपरेखा तैयार करना था।
रिपोर्ट के अनुसार मेरठ की बैठक में राम प्रसाद बिस्मिल, राजेन्द्र नाथ
लाहिड़ी, सुरेश चन्द्र भट्टाचार्य सहित अनेक सदस्य अनाथालय में विष्णु
शरण दुबलिस के रहने के स्थान पर इकट्ठा हुए थे। इस कार्यवाही को
पुलिस सब-इंस्पेक्टर बह्मा सिंह और पेरू सिंह ने देखा था।²
<u>गिरफ्तारियां -</u>
बिस्मिल और अशफाक अपने-अपने घर शाहजहांपुर पहुंच गये थे।
अन्य क्रांतिकारी भी अपने-अपने जिला केन्द्रों की ओर चले गये थे।
पुलिस उनकी गतिविधियों पर नजर रख रही थी। डकैती में लूटे गये
नोटों के नम्बरों के आधार पर पुलिस को इस बात का पूरा संदेह हो गया
था कि शाहजहांपुर का कोई न कोई व्यक्ति काकोरी की डकैती में अवश्य
सम्बद्ध है। राम प्रसाद बिस्मिल को बन्दी बनाये जाने की आशंका को
देखकर उनके कुछ मित्रों ने उन्हें पूरी तरह सावधान रहने का परामर्श
दिया था, किन्तु बिस्मिल को इस बात का पूरा विश्वास था कि पुलिस को
उनके विरुद्ध कोई प्रमाण नहीं मिलेगा। सरकार ने डकैती में शामिल
किसी भी अभियुक्त को पकड़वाने में मदद करने वाले को 5000 रू०
इनाम देने की घोषणा की।
- पूर्वो, योगेश चन्द्र चटर्जी, पृष्ठ -379-80
- पूर्वो, योगेश चन्द्र चटर्जी, पृष्ठ -351-352
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इस घोषणा के इस्तहार प्रत्येक रेलवे स्टेशन और पुलिस थाने पर चस्पा
कर दिये गये थें।¹ पुलिस ने एकाएक संदिग्ध व्यक्तियों के घरों पर छापे
मारे, जिससे पुलिस को महत्वपूर्ण दस्तावेज हाथ लगे, जिसके द्वारा उन
व्यक्तियों का क्रांतिकारी गतिविधियों से सम्पर्क होने का पता लगता था।
जब गोविन्द चरण को लखनऊ में गिरफ्तार कर लिया गया, तो उनके
कमरे से पार्टी के संविधान का पीला कागज प्राप्त हुआ।² 26 सितम्बर,
1925 की प्रातः चार बजे समूचे प्रान्त की पुलिस ने एक साथ छापा मारा,
जिसमें अनेक व्यक्तियों को एक साथ गिरफ्तार किया गया किन्तु अशफाक
उल्ला खां, चन्द्रशेखर आजाद, राजेन्द्र नाथ लाहिड़ी और शचीन्द्र नाथ
बख्शी उसी दिन गिरफ्तार नहीं किये जा सके।³ राम प्रसाद बिस्मिल उसी
दिन अवश्य गिरफ्तार हो गये। राम प्रसाद बिस्मिल ने इसका जिक्र किया
है - ‘‘रात्रि के समय ग्यारह बजे के लगभग एक मित्र के यहां से अपने
घर पर गया। रास्ते में खुफिया पुलिस के सिपाहियों से भेंट हुई। कुछ
विशेष रूप से उस समय भी वे मेरी देखभाल कर रहे थे। मैंने कोई
चिन्ता न की और घर पर जाकर सो गया। प्रातः काल चार बजने पर
जगा, शौचादि से निवृत होने पर बाहर द्वार पर बन्दूक के कुन्दों के शब्द
सुनाई दिये। मैं समझ गया कि पुलिस आ गयी है। मैं तुरन्त ही द्वार
खोलकर बाहर आया। एक पुलिस अफसर ने बढ़कर हाथ पकड़ लिया। मैं
गिरफ्तार हो गया। मैं केवल एक अंगोछा पहने हुए था।’'⁴ पुलिस ने घर
की तलाशी ली परन्तु कोई आपत्तिजनक वस्तु नहीं मिली लेकिन
बिस्मिल की तलाशी लेने पर जेब से कुछ पत्र मिल गये, जो उन्होंने
लिखे थे।
- दे लिव्ड डेन्जरसली, मन्मथनाथ गुप्त, पृष्ठ -144
- कार्यवाही काकोरी षड़यंत्र केस अपील - पृष्ठ -37
- अशफाक उल्ला खाँ, भवान सिंह राणा, पृष्ठ -77
- पूर्वो, राम प्रसाद बिस्मिल, पृष्ठ -92-93
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वह उन्हें डालने के लिए डाकखाने भी गये थे, परन्तु डाक निकल जाने
के कारण वह लेटर बाक्स में न डाल सके। इसलिए वापस ले आये थे।
उनकी यही असावधानी उनके लिए दुर्भाग्यपूर्ण सिद्ध हुई। इसमें एक पत्र
दल की गतिविधियों के विषय में था, जिसे पुलिस ने अपने अधिकार में
ले लिया।
अशफाक उल्ला खाँ शाहजहाँपुर से फरार हो गये थे। उनके मन में
रूस जाने का विचार आया था। इसके लिए वे पहले काबुल जाना चाहते
थे। छापामारी के दौरान फसाहत हुसैन सब-इंस्पेक्टर ने बताया कि वे
अशफाक उल्ला खां के घर पांच बजे 26 सितम्बर, 1925 को गये। वे साथ
में एक सर्च वारन्ट लेकर गये थे। अशफाक उल्ला खां अनुपस्थित थे और
उनके भाई ने इंस्पेक्टर से कहा कि उन्होंने रिश्तेदार अब्दुल कादिर खान
डिप्टी कलेक्टर के यहां रात बिताई। सब-इंस्पेक्टर वहां भी गया, जिससे
अशफाक उल्ला को गिरफ्तार किया जा सके, परन्तु वे वहां भी आरोपी
को पाने में असफल रहे। अशफाक उल्ला के घर 12 बोर की बन्दूक, ढेर
सारी खाली-खाली गोलियां, एक सही गोली और चार झोले छोटी
गोलियां प्राप्त हुईं। बन्दूक अब्दुल कादिर खान की थी और एक लाइसेंस
मिला, जिसमें अशफाक उल्ला के भाई का नाम था। बन्दूक और गोली
का मिलना यह प्रदर्शित करता है कि अशफाक उल्ला की पहुंच गोली एवं
बन्दूक तक है।¹
उसी दिन (26 सितम्बर, 1925) प्रेम किशन खन्ना, इन्द्र भूषण मित्र,
हरगोविन्द और बनारसी लाल को पकड़ लिया गया। ठाकुर रोशन सिंह
भी पुलिस की पकड़ में आ गये। कानपुर में कांग्रेस कार्यालय सहित
क्रांतिकारी वीरभद्र तिवारी और 'प्रताप' समाचार पत्र के सहायक सम्पादक
सुरेश चन्द्र भट्टाचार्य के यहां छापे मारे गये।
- सी०आई०डी० वाल्यूम-2, काकोरी षड्यन्त्र केस, उ०प्र० राजकीय अभिलेखागार,
पृष्ठ-41
116
राजेन्द्र लाहिड़ी के घर भी छापा मारा गया किन्तु वे दल की ओर से बम
बनाना सिखाने के लिए कलकत्ता जा चुके थे।¹
राजकुमार सिन्हा को गिरफ्तार कर लिया गया। बनारस हिन्दू
विश्वविद्यालय के जिस कमरे में रहते थे, उसकी तलाशी ली गयी, जहां से
दो राइफलें पकड़ी गयीं। रामकृष्ण खत्री पूना में पकड़े गये। भूपेन्द्र नाथ
सन्याल इलाहाबाद में पुलिस द्वारा पकड़े गये। इलाहाबाद में हीबट रोड
पर जब एक बंगाली छात्र बम लेकर जा रहा था, तो अचानक बम फट
गया और छात्र घायल हो गया। उसने पकड़े जाने पर भूपेन्द्र नाथ
सन्याल का नाम बताया। इस प्रकार भूपेन्द्र नाथ को भी काकोरी केस में
शामिल कर लिया गया। इसी प्रकार शचीन्द्र नाथ सन्याल को लखनऊ
में, विष्णु शरण दुबलिस को मेरठ में, शिव चरन लाल को मथुरा में,
बनवारी लाल को रायबरेली में तथा मुकुन्दी लाल को बनारस में पकड़ा
गया।²
कुन्दल लाल और चन्द्रशेखर आजाद को फरार घोषित किया गया।
आजाद की गिरफ्तारी पर दो हजार रू० का ईनाम था परन्तु आजाद को
गिरफ्तार करना कोई सरल कार्य न था। आजाद कहा करते थे कि उन्हें
कोई गिरफ्तार नहीं कर सकता ओर वे आजाद के रूप में जीवित रहेंगे।³
जब कभी आजाद का कोई साथी पकड़ा जाता था तो वे अपने रहने का
स्थान बदल देते थे और किसी से पत्र व्यवहार नहीं करते थे।⁴ पुलिस
बेचैन हो गयी अशफाक को गिरफ्तार करने के लिए और अशफाक उल्ला
फरार हो गये। पुलिस ने अशफाक को गिरफ्तार करने की चाल भी
चली।
- स्वतंत्रता आन्दोलन में जनपद शाहजहाँपुर का योगदान, एन०सी०मेहोत्रा, पृष्ठ-123
- स्वतंत्रता आन्दोलन में जनपद शाहजहाँपुर का योगदान, एन०सी०मेहोत्रा, पृष्ठ-123
- मैमायर्स, शिव वर्मा, पृष्ठ -54
- अमर शहीद चन्द्रशेखर आजाद, वैशम्पायन, पृष्ठ -6 एवं 225
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फैजाबाद जेल डायरी, अदालती बयान एवं देशवासियों के नाम अन्तिम सन्देश
इन्द्रभूषण मित्र जो अशफाक का मित्र ही था, पुलिस का मुखबिर
बन गया था। लेकिन इन्द्रभूषण द्वारा पुलिस की चाल को अशफाक के
भाई रियासत उल्ला खाँ ने नाकाम कर दिया। इस घटना से और
असफलता के कारण हार्टन रियासत उल्ला पर नाराज भी हो गये और
मुकदमा चलाने की धमकी भी दी, परन्तु खान बहादुर तसद्दुक हुसैन
डिप्टी सुपरिण्टेण्डेंट पुलिस ने अपना दोस्त बताकर माफी दिला दी लेकिन
पुलिस रियासत पर दबाव डालती रही कि अशफाक को सरकारी गवाह
बना दिया जाय। पुलिस तुली हुई थी कि अशफाक अपना मार्ग छोड़कर
सरकारी गवाह बन जाये। पुलिस ने इस हेतु अशफाक के घर के लोगों
को तंग भी किया। गुप्तचर विभाग के लोग कई प्रकार से भेष बदलकर,
जिनमें प्रायः महिलाएं होती थी, घर जाते थे, लेकिन अशफाक तो फरार
थे। बाद में पुलिस को विश्वास हो गया कि अशफाक उल्ला. वास्तव में
फरार है। पुलिस किसी भी कीमत पर अशफाक को गिरफ्तार करना
चाहती थी। उन्हें घर में न पाकर पुलिस ने उनके भाई की बन्दूक जब्त
कर ली थी।¹
अशफाक का फरार होना-
अशफाक उल्ला खाँ को अब घर में रखना उचित नहीं था। वे घर
से बाहर आधा मील दूर एक गन्ने के खेत में छिपे रहते थे। घरवालों से
सम्पर्क बना हुआ था, उनका खाना वहीं पहुंचा दिया जाता था। यही
नहीं अशफाक को पुलिस की गतिविधियों की जानकारी भी मिलती थी।
अशफाक चार दिनों तक गन्ने के खेत में छिपे रहे।
पुलिस के गुप्तचर विभाग का जब आना-जाना कम हुआ तो
घरवालों ने उन्हें कुछ रूपये देकर नेपाल भेज दिया। वहां तक पहुंचाने चार
सशस्त्र व्यक्ति भी साथ गये।
- अशफाक उल्ला खाँ, भवान सिंह राणा, पृष्ठ -84
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वहां भी अशफाक ने अनुमान लगाया कि पुलिस को संदेह हो गया है।
इसके पहले कि पुलिस उन तक पहुंचती, वे वहां से भाग गये। वे नेपाल
से चलकर दिल्ली आये। वहां लकड़ी का ठेकेदार परिचित था, उसने
अशफाक को पहचान लिया। फिर अशफाक घर समाचार भेजने को कहकर
लखनऊ चले आये। कुछ दिनों तक लखनऊ रहने के बाद वे कानपुर
चले आये। गणेश शंकर विद्यार्थी अशफाक के प्रशंसक थे। अशफाक गणेश
शंकर विद्यार्थी के पास जा पहुंचे। उस समय वे 'प्रताप' नामक समाचार
पत्र का सम्पादन कर रहे थे। विद्यार्थी जी ने दो दिन तक कार्यालय में
छिपाकर रखा और फिर कुछ रूपये देकर बनारस चले जाने का परामर्श
दिया।¹
अशफाक उल्ला बनारस जा पहुंचे। बनारस में उन्हें कोई क्रांतिकारी
नहीं मिला। पुलिस के भय से सभी भूमिगत हो गये थे या तो बन्दी बना
लिए गये थे। अशफाक वहां से डाल्टनगंज (बिहार) एक अधिशासी
अभियंता के पास पहुंचे। अशफाक ने यहां स्वयं को मथुरा का कायस्थ
बताया और हिन्दू बनकर उसके यहां नौकरी करने लगे। अधिशासी
अभियंता साहित्य प्रेमी था। उसे जब पता चला कि अशफाक शायर हैं,
तो खूब प्रभावित हुआ और अशफाक का वेतन बढ़ा दिया। यहां रहकर
अशफाक ने बंगला भाषा और साहित्य का अध्ययन किया। शचीन्द्र नाथ
बख्शी भी हजारी बाग और भागलपुर में छिपकर रह रहे थे, लेकिन
अशफाक के डाल्टनगंज में होने की सूचना से बेखबर थे। शचीन्द्र नाथ
ने लिखा है -
"डाल्टनगंज में रहने के दौरान ही अशफाक उल्ला खां ने बंगला
भाषा सीख ली थी और बंगला थोड़ी-बहुत बोलने भी लगे थे और
समझने भी लगे थे। उन्हें बंगला गानों का भी अभ्यास हो गया था।
- अशफाक उल्ला खाँ, भवान सिंह राणा, पृष्ठ-86
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बंगला साहित्य के सम्पर्क में आने के कारण उन्हें हिन्दू संस्कृति का
अच्छा परिचय मिला। वे पठान होते हुए भी हिन्दू संस्कृति की तह तक
पहुंच गये थे। डाल्टनगंज में आठ महीने अध्ययन, शिकार और शायरी में
अशफाक ने बिताए। उन दिनों मैं पलामू से सौ मील के अन्दर भागलपुर
और हजारीबाग में रहा, पर मेरा अशफाक से कोई सम्पर्क स्थापित न हो
सका, क्योंकि हम दोनों एक-दूसरे की स्थिति से एकदम अनभिज्ञ थे। न
तो मुझे मालूम हुआ था कि अशफाक मेरे इतने करीब हैं और ना ही
अशफाक यह जानते थे कि मैं यहीं भागलपुर में हूँ, ये बातें हमें बाद में
मालुम हुई, जब हम दोनों गिरफ्तार होकर लखनऊ सेन्ट्रल जेल में जाकर
मिले।¹
आठ-दस माह तक डाल्टनगंज में रहने के बाद अशफाक ने वह
स्थान छोड़ दिया। वे एक बार शाहजहांपुर भी सिख के भेष में आये थे।
वे अपने मित्र मुहम्मद फकीर उल्ला से मिलना चाहते थे लेकिन असमय
ही फकीर उल्ला की मौत हो चुकी थी। अशफाक को बहुत दुःख हुआ।
अशफाक वापस डाल्टनगंज आ गये। उन्होंने प्रतापगढ़ में अपनी बहन को
पत्र भी लिखा और भेजा था लेकिन पत्र शायद गुप्तचर विभाग के हाथ
लग गया और घर तक नहीं पहुंच पाया।
अशफाक के चले जाने के बाद पुलिस ने उनके परिवारवालों को
खूब परेशान किया। खानदान के एक महाशय अशफाक को गिरफ्तार
कराना चाहते थे। वे पुलिस विभाग में थे और पुलिस तो चाहती ही थी,
घर की कुर्की तक हुई। अशफाक डाल्टनगंज से पुनः गणेश शंकर विद्यार्थी
के यहां कानपुर आये। दो दिन बाद विद्यार्थी ने उन्हें दो सौ रुपये देकर उनके
भाई शहंशाह खाँ के पास भोपाल भेज दिया।
- अशफाक उल्ला खाँ, भवान सिंह राणा, पृष्ठ -87
120
अशफाक दो महीने अपने भाई शहनशाह खां के पास रहे, लेकिन
उनका मन नहीं लगा। शहनशाह खाँ ने समझाया कि ऐसी परिस्थितियों
में इधर-उधर भटकना उचित नहीं है, परन्तु अशफाक नहीं माने। वे एक
स्थान पर रुकना नहीं चाहते थे, वे मुल्क की खिदमत करना चाहते थे।
भोपाल के बाद अशफाक दिल्ली जा पहुंचे। वहां वे बचपन के साथी और
साथ-साथ पढ़े दोस्त सैयद हबीब अहमद के मकान पर रहने लगे। सैयद
हबीब भी शाहजहांपुर का ही रहने वाला था। सैयद हबीब का एक और
घर भी था, जहाँ वह रहता था।¹
अशफाक की फरारी का जीवन समाप्त हो गया। आखिर वे पकड़े
गये। अशफाक उल्ला को दिल्ली सी०आई०डी० के खान बहादुर हाकिम
इकरामुल हक डिप्टी सुपरिन्टेन्डेण्ट ने 9: 30 बजे 8 सितम्बर, 1926 को
अरेस्ट किया² और इधर रियासत उल्ला खाँ को दिल्ली के नूर मुहम्मद
बैरिस्टर का एक तार मिला। यह तार उनके बड़े भाई शफी उल्ला के नाम
था। उसमें लिखा था - 'आपके भाई अशफाक उल्ला बन्दी बना लिए गये
हैं, शीघ्र आओ।' अशफाक को गिरफ्तार कराने में उनके ही मित्र सैयद
हबीब अहमद का हाथ था।³ डिप्टी इंस्पेक्टर ने उसी दिन सूचना प्राप्त की
कि अशफाक एक घर में रह रहा है। एक इंस्पेक्टर, चार कांस्टेबल वहां के
लिए रवाना कर दिये गये। घर में प्रवेश करने से पहले दो गवाह पाये
गये। उन्होंने पाया कि अशफाक उल्ला एक चारपाई पर बैठे हुए थे। डिप्टी
सुपरिन्टेन्डेन्ट ने कमरे से प्राप्त सामानों की सूची तैयार की। एक बाक्स
भी था, जो कागजों से भरा था। बक्से को सील कर दिया गया। अगले
दिन प्रथम श्रेणी मजिस्ट्रेट सैयद गुलाम मुस्तफा शाह के समक्ष पेश किया
गया।
- अशफाक उल्ला खाँ, भवान सिंह राणा, पृष्ठ -95
2 सी०आई०डी० वायल्यूम-2, काकोरी षणयन्त्र केस,उ०प्र०रा० अभि०, पृष्ठ-41 - अशफाक उल्ला खाँ, भवान सिंह राणा, पृष्ठ - 95
121
प्राप्त सामानों में एक चिट्ठी भी थी और एक फोटो, जो अशफाक
उल्ला खां का था, प्राप्त हुआ था।¹
गिरफ्तारी का तार मिलते अशफाक के भाई रियासत उल्ला खाँ
दिल्ली के लिए रवाना हो गये। वे सैयद हबीब से मिले और फिर बैरिस्टर
नूर मुहम्मद के पास गये। जेलर के पास सूचना भिजवाई गई कि
अशफाक के भाई आये हैं और मिलना चाहते हैं। निर्धारित समय पर
रियासत उल्ला खां अशफाक से मिले। अशफाक बड़े प्रसन्न लग रहे थे।
विदा होते समय अशफाक ने अपने भाई से कहा कि - 'वालिदा साहिब
को सलाम अर्ज कीजिएगा और यह अर्ज कीजिएगा कि आप कतई परेशान
न हों, जो हुक्म खुदा देगा, वह होकर रहेगा।' रियासत उल्ला वापस
शाहजहाँपुर आ गये। सुबह सैयद फरजन्द अली, जो गुप्तचार विभाग का
व्यक्ति था, उनके पास आया और कहा कि - आपको मिस्टर ऐनुद्दीन
स्पेशल मजिस्ट्रेट और खान बहादुर तसद्दुक हुसैन डिप्टी सुपरिन्टेन्डेन्ट ने
लखनऊ बुलाया है। रियासत उल्ला खां लखनऊ गये। अशफाक को जुर्म
कबूल करने का जोर देने की बात करने लगे। रियासत उल्ला उन दोनों
अधिकारियों के साथ दिल्ली आये।² लेकिन अशफाक ने एक बात नहीं
मानी। वे किसी और का नाम लेकर फंसाना नहीं चाहते थे। वे कहते रहे
कि यदि मुझे फांसी देने में सी०आई०डी० को खुशी है, तो अच्छा ही है,
मैंने तो आजादिये हिन्द का बीड़ा उठाया था।³ पुलिस अशफाक को लेकर
लखनऊ आयी। पुलिस किसी भी प्रकार अशफाक को अपने पक्ष में कर
लेना चाहती थी।
- सी०आई०डी०, बायल्यू-2, काकोरी षड़यंत्र केस-उ०प्र०रा०अभि०, पृष्ठ-41
- अशफाक उल्ला खाँ, भवान सिंह राणा, पृष्ठ -97-98
- अशफाक उल्ला खाँ, भवान सिंह राणा, पृष्ठ -99
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ऐनुद्दीन ने अशफाक से कहा - 'तुम अकेले मुसलमान हो, जो इन
हिन्दुओं के साथ फांसी पर लटकाये जाओगे। तुम उनका साथ छोड़ दो। मैं
तुम्हे बचा लूंगा।'¹ अशफाक अपनी जिम्मेदारी समझते थे। उन्हें अपने
मुसलमान होने और देश की सेवा करने का गर्व था। वे अपनी कौम पर
किसी भी प्रकार का धब्बा नहीं लगाना चाहते थे। अतः अशफाक को
लखनऊ में कैद कर रखा गया।
मिस्टर हार्टन दिल्ली से लखनऊ आये। अशफाक को डर था कि
सी०आई०डी० उनके फोटोग्राफ के द्वारा गवाहों को मेरी स्थिति के विषय में
बताकर न्यायालय के समक्ष अशफाक उल्ला बताया जा सकता है। पुलिस
ने मिस्टर हार्टन को अवगत कराया कि अशफाक के कक्ष से मिले सामान
और गवाहों से स्पष्ट हो चुका है कि यह व्यक्ति अशफाक उल्ला खान ही
है² और वह फोटोग्राफ 30 अक्टूबर 1926 तक दिल्ली में सील करके रखा
है। ......जब अशफाक को पहली बार मजिस्ट्रेट के सामने लाया गया, तो
कुछ समय बाद उन्होंने यह स्वीकार कर लिया कि वे अशफाक उल्ला
खान ही हैं।³
जांच के दौरान प्राप्त सामानों में एक पैम्पलेट प्राप्त हुआ, जो
'मैनीफेस्टो आफ कम्युनिष्ट पार्टी ऑफ इण्डिया' था, जिसे बंगाल
सरकार द्वारा तथा सेन्ट्रल प्राविंस द्वारा प्रतिबन्धित किया गया था। 6
पृष्ठों के मुद्रित पैम्पलेट, जिस पर 'हिन्दू-मुस्लिम समस्या' के विषय में
चर्चा की गयी थी, उस पर 15 मार्च, 1926 की तिथि अंकित थी। उसके
प्रथम पृष्ठ पर लिखा था कि वह जल्दी ही अशफाक को दिया गया है।
- पूर्वो-बनारसी दास चतुर्वेदी, पृष्ठ-167
- सी०आई०डी०, बायल्यूम-2, काकोरी षड़यंत्र केस-उ०प्र०रा०अभि०, पृष्ठ-41
- सी०आई०डी०, बायल्यूम-2, काकोरी षड़यंत्र केस-उ०प्र०रा०अभि०, पृष्ठ-41
123
उस मेनीफेस्टो में राष्ट्रीय आन्दोलन तथा आर्थिक कार्यक्रम के
सम्बन्ध में लिखा था और यह भी कि यह प्रचार सरकार धार्मिक आधार
पर करा रही है। यह असुरक्षित और गैर व्यवहारिक है। इसके पूर्व भी
लेखक सरकारों द्वारा धार्मिक पूर्वाग्रह के आधार पर असहयोग आन्दोलन
एवं खिलाफत आन्दोलन में किए गये क्रूर व्यवहारों पर टिप्पणी करता था,
जिसका सार यह है - 'हमारे हिन्दू भाइयों ने खिलाफत आन्दोलन में
शामिल होकर खिलाफत में शामिल मुसलमानों के धैर्य एवं दृढ़ निश्चय
को देखा और महसूस किया। उन्हें विश्वास हुआ कि एक निश्चित सीमा
तक हिन्दुओं के कट्टरपंथ की तरह ही वे भी अपनी भावनाओं को जागृत
करने में समर्थ हैं। उन्हें समाज के प्रतिक्रियावादी तत्वों जैसे हिन्दू शुद्धि
संगठन, महासभा, जो मुसलमानों को तब लीग तान्जिम जैसे कार्यों को
करने की तरफ उन्मुख किये। वर्तमान समस्या तो समाप्त हो गयी लेकिन
अन्ततः एक बुरी प्रथा का प्रारम्भ हो गया।
इन समस्याओं के मूल में केवल यही प्रतीत होता है कि आन्दोलन
अचानक ठहरने की स्थिति में धर्म ने ही मुख्य भूमिका अदा करनी शुरू
कर दी है। प्राप्त दस्तावेजों में भारतीय आन्दोलन एवं समस्याओं पर
विस्तृत जानकारी दी गयी है। यह भी कहा गया है कि - हमें अपने
देशवासियों को हर प्रकार से आर्थिक कार्यक्रमों को लक्ष्य करते हुए नये
आन्दोलन के लिए प्रभावित करना होगा। तरुण भारत के लिए न तो वेदों
के स्वर्ण युग में जाने की आवश्यकता है और न ही खिलाफत की
सल्तनत को बचाने की आवश्यकता है। भारत के लोगों को राजनीतिक
एवं आर्थिक रूप से स्वतंत्रता दिये जाने की आवश्यकता है। राष्ट्रीय
कार्यक्रमों को भारतीय जनता के लिए उनकी दैनिक आवश्यकताओं जैसे -
भूमि,
124
रोटी, आवास, कपड़े के लिए प्रयास करना चाहिए।¹
कुछ अन्य दस्तावेज भी अशफाक के बक्से से प्राप्त हुए। उनमें से
एक पत्र भी था, जो अशफाक ने अपने माता-पिता को लिखा था।
अशफाक पत्र द्वारा सूचित करते हैं कि वे अभी भारत में ही हैं। अभी न
तो उपयुक्त समय आया है और न ही अवसर ही प्राप्त हुआ है। योजना
बनायी जा रही है। स्पष्ट है कि अशफाक भारत छोड़ना चाहते हैं।² एक
अन्य पत्र जो मौलाना मजिद को है। अशफाक इस पत्र में अपनी फरारी
का जिक्र करते हैं और भारत छोड़ने की मदद मांगते हैं। अशफाक ने दो
रास्ते भी सुझाये हैं। एक रास्ता पासपोर्ट और दूसरा आर्थिक सहायता हेतु
है। वे यह भी लिखते हैं कि यदि पर्याप्त धन वे पा जायें तो बचकर भाग
भी सकते हैं। एक सुझाव वे यह भी देते हैं कि - हो सके तो जहाज में
क्लर्क की नौकरी की व्यवस्था कर दें और मैं जहाज से बम्बई से जर्मनी
चला जाऊं।³ एक अन्य पत्र मौलाना अब्दुल कादिर को लिखा गया है, जो
अवकाश प्राप्त डिप्टी कलेक्टर हैं। अशफाक उल्ला से वे संबंधित है।
अब्दुल कादिर की बन्दूक अशफाक के पास मिली। इस पत्र में भी अपने
जीवन को खतरे में बताते हैं और आर्थिक सहायता की गुहार करते हैं।
वे इस पत्र में हैदराबाद प्रवेश करना चाहते हैं।
पत्रों की श्रृंखला में एक पत्र बहन को लिखा गया है। इस पत्र में
अपने संबोधनों का जिक्र करते हैं और बेदार का नाम लेते हैं। भगवती
सहाय बेदार शाहजहांपुर के षड्यंत्रकारियों में से एक थे।
- सी0आई0डी0, बायल्यूम-2, काकोरी षड्यंत्र केस-उ0प्र0रा0अभि0, पृष्ठ-41
- सी0आई0डी0, बायल्यूम-2, काकोरी षड्यंत्र केस-उ0प्र0रा0अभि0, पृष्ठ-44
- सी0आई0डी0, बायल्यूम-2, काकोरी षड्यंत्र केस-उ0प्र0रा0अभि0, पृष्ठ-45
125
अशफाक द्वारा कोर्ट में दिये गये बयानों से 'रिपब्लिक' का अर्थ
कम्यूनिज़्म लगाया गया था। निश्चित ही अशफाक कम्युनिष्ट सिद्धांतों के
पक्षधर थे और उनके पास एक 'कम्युनिष्ट मैनीफेस्टो' पुस्तक भी प्राप्त
हुई थी।
अशफाक दिल्ली में गिरफ्तार होने के 15 दिनों के बाद लखनऊ
ला ये गये। सुख दर्शन सिंह, मैनेजर, होटल रायल के सबूत से ज्ञात होता
है कि अशफाक 25 अगस्त को मुरारी मोहन के नाम से आए जो कि
होटल बुक में भी लिखा हुआ है। उनके बाक्स से एक पत्र भी प्राप्त हुआ,
जो दर्शाता है कि अशफाक नाम बदलते रहते थे।¹
अशफाक के तीन-चार मास बाद शचीन्द्र नाथ भी बन्दी बना लिये
गये। काकोरी काण्ड के तहत कुल 43 लोग गिरफ्तार किये गये, जिनके
नाम व कोड निम्नवत हैं :-
केन्द्र गिरफ्तार व्यक्तियों के नाम
1.शाहजहांपुर- राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खां, रोशन सिंह,
बनारसी लाल, हरगोविन्द, प्रेम किशन खन्ना, इन्द्र भूषण मित्र
2.बनारस - दामोदर स्वरूप सेठ, मन्मथनाथ गुप्त, राम नाथ
पाण्डेय, डी०डी० भट्टाचार्य, इन्द्र विक्रम सिंह, मुकुन्दी
लाल, राजेन्द्र लाहिड़ी, शचीन्द्रनाथ बख्शी
3.कानपुर - वीरभद्र तिवारी, रामदुलारे त्रिवेदी, गोपी मोहन,
राजकुमार सिन्हा, सुरेश चन्द्र भट्टाचार्य।
4.इलाहाबाद - शीतला सहाय, भूपेन्द्र नाथ सन्याल, शचीन्द्र नाथ
सन्याल
- सी०आई०डी०, काकोरी षड़यंत्र केस-1, उ०प्र०रा०अभि०, पृष्ठ-46
126
केन्द्र गिरफ्तार व्यक्तियों के नाम
5. आगरा- चन्द्रधर जौहरी, चन्द्रभाल जौहरी, शिव चरन लाल शर्मा
6. लखनऊ- हरनाम सुन्दर लाल, शचीन्द्र विश्वास, गोविन्द चरमकर
7. रायबरेली- बनवारी लाल, कुंवर बहादुर
8. मेरठ - विष्णु दुब्लिश
9. एटा - बाबू राम वर्मा
10. कलकत्ता- शरच्चन्द्र गुप्त, योगेश चन्द्र चटर्जी
11. बहरामपुर- कालिदास बोस
12. लाहौर- मोहन लाल गौतम
13. पूना - राम कृष्ण खत्री
14. जबलपुर- प्रमवेश चन्द्र चटर्जी
15. अन्य व्यक्ति - रामदास शुक्ल, मदन लाल, भैरो सिंह, राम रत्न
शुक्ल¹।
गिरफ्तारी के बाद वास्तविक मामला शुरू होने के पहले ही पन्द्रह
व्यक्तियों को छोड़ दिया गया। इन व्यक्तियों के विरुद्ध सरकार को कोई
प्रमाण न मिला। पुलिस का एक उद्देश्य यह भी था कि मुकदमें में
जनता की सहानुभूति बनी रहे। इसी कारण पुलिस ने प्रतिष्ठित लोगों को
छोड़ दिया। रिहा कर दिये गये व्यक्तियों के नाम निम्नवत् हैं - शीतला
सहाय, चन्द्रधर जौहरी, चन्द्रभाल जौहरी, मदन लाल, रामरत्न शुक्ल,
मोहन लाल गौतम, हरनाम सुन्दर लाल, डी०डी० भट्टाचार्य, बाबूराम
वर्मा, गोपी मोहन, शरच्चन्द्र, भैरो सिंह, कालिदास बोस, इन्द्र विक्रम
सिंह, रामदास शुक्ला।²
- राम प्रसाद बिस्मिल, रचनावली, सम्पादक दिनेश शर्मा, पृष्ठ -4
- राम प्रसाद बिस्मिल, रचनावली, सम्पादक दिनेश शर्मा, पृष्ठ -5
127
शेष 28 व्यक्तियों पर निम्नलिखित अभियोग लगाये गये।
1- धारा 121 - ब्रिटिश सम्राट के विरुद्ध युद्ध की घोषणा
2- धारा 120 - राजनीतिक षड़यंत्र करना
3- धारा 369 - हत्या तथा डकैती
4- धारा 302 - हत्या¹
न्यायिक प्रक्रिया-
काकोरी काण्ड के सभी बन्दी लखनऊ में रखे गये। गुप्तचर विभाग
ने ऐसा प्रबन्ध किया था कि ये बन्दी आपस में न मिल सकें। पहली बार
बन्दी बनाये गये अभियुक्तों को सरकारी गवाह बनाने का खूब प्रयास
हुआ। वैसे तो काकोरी काण्ड में दस व्यक्तियों ने भाग लिया था। लेकिन
28 अभियुक्तों पर चार्जशीट लगायी जानी थी। शाहजहाँपुर के बनारसी
लाल और इन्द्र भूषण मित्र मुखबिर बन गये। डकैती में भाग लेने वाला
बनवारी लाल इकबाली गवाह बन गया। कानपुर का गोपी मोहन भी
गवाह बन गया। कुंवर बहादुर ने भी सरकारी गवाह बनना स्वीकार कर लिया।
सेठ दामोदर स्वरूप गम्भीर रूप से बीमार हो गये, इसी कारण से वे अदालत से
मुक्त हो गये।
काकोरी काण्ड में पहले बन्दी बनाये गये अभियुक्तों पर 4 जनवरी,
1926 को मुकदमा आरम्भ हुआ। अशफाक और शचीन्द्र नाथ बख्शी बाद
में बन्दी बनाये गये। अतः उन पर मुकदमा भी अलग से चला। योगेश
चटर्जी के कथनानुसार - 'उस समय ब्रिटिश सरकार क्रांतिकारियों से
निपटने के लिए मुसलमान अधिकारियों पर विश्वास करती थी। क्योंकि
वह सोचती थी कि क्रांतिकारी आन्दोलन मुख्यतः एक हिन्दू आन्दोलन
था।'² ब्रिटिश सरकार की मानसिकता इससे भी जाहिर हो जाती है।
- अशफाक उल्ला खाँ, भवान सिंह राणा, पृष्ठ -105
- पूर्वो, योगेश चन्द्र चटर्जी, पृष्ठ -317
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कि क्रांतिकारियों को पकड़ने के लिए अधिकतर अधिकारी मुसलमान
ही थे। सुनवाई के लिए ऐनुद्दीन की अदालत भी मानसिकता को
प्रभावित करती है। ऐनुद्दीन अभियुक्तों के सामने मधुर व्यवहार करता
था, लगता था कि यह व्यक्ति क्रांतिकारियों का शुभचिन्तक है, किन्तु वह
विष भरा सोने का कलश था। योगेश चन्द्र चटर्जी ने लिखा है - ''स्पेशल
मजिस्ट्रेट ऐनुद्दीन किसी भी व्यक्ति के पीछे से छूरा भोंकने में निपुण थे।
.......यदि कोई व्यक्ति उनकी शिनाख्त संबंधी रिपोर्ट पढ़ ले तो तत्काल
समझ जायेगा कि वे क्रांतिकारियों के शत्रु थे।¹
ऐनुद्दीन के विषय में राम प्रसाद बिस्मिल ने भी लिखा है -
''दिखाने के लिए कागजी कार्यवाही खूब साफ रखी गयी। जबान के बड़े
मीठे थे। प्रत्येक अभियुक्त से बड़े तपाक से मिलते थे। बड़ी मीठी-मीठी
बातें करते थे। सब समझते थे कि हमसे सहानुभूति रखते हैं। कोई न
समझ सका कि अन्दर ही अन्दर घाव कर रहे हैं। इतना चालाक अफसर
शायद ही कोई दूसरा हो। जब तक मुकदमा उनकी अदालत में रहा,
किसी को भी कोई शिकायत का मौका ही नहीं दिया। यदि कभी कोई
बात हो जाती, तो वह ऐसे ढंग से उसे टालने की कोशिश करते कि किसी
को भी बुरा नहीं लगता। बहुधा ऐसा भी हुआ कि खुली अदालत में
अभियुक्तों से क्षमा मांगने में भी उन्हें संकोच नहीं होता। किन्तु कागजी
कार्यवाही में वे इतने होशियार थे कि जो कुछ लिखा, सदैव अभियुक्तों के
विरुद्ध। जब मामला सेशन सुपुर्द किया और आज्ञा पत्र में युक्तियां दीं,
तब आंखे खुली कि कितना गहरा घाव मार दिया था।² पुलिस की मदद
ऐनुद्दीन ने खूब किया। क्रांतिकारी खुली गाड़ी में पुलिस स्टेशन लाये
जाते थे।
- पूर्वो, योगेश चन्द्र चटर्जी, पृष्ठ -318
- पूर्वो, राम प्रसाद बिस्मिल, पृष्ठ -96
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पुलिस सादी वर्दी में रहती थी। शिनाख्त के समय भिन्न लोगों के
सामने क्रांतिकारी खड़े किये जाते। शिनाख्त सफल न होती, तब भी
मुकदमा चलाया जाता। कोई भी व्यक्ति जमानत पर नहीं छोड़ा जाता।¹
क्रांतिकारियों की सहायता के लिए एक डिफेन्स कमेटी बनाई गयी,
जिसमें मोती लाल नेहरू, गणेश शंकर विद्यार्थी, शिव प्रसाद गुप्त, गोविन्द
बल्लभ पंत, श्री प्रकाश तथा जवाहर लाल नेहरू किसी न किसी रूप में
सम्बद्ध थे। हरकरन लाल मिश्र, मोहनलाल सक्सेना, चन्द्रभान गुप्त, कृपा
शंकर हजेला, क्रांतिकारियों की ओर से वकील थे। डिफेन्स कमेटी की
ओर से कलकत्ता के बैरिस्टर वी०के० चौधरी को भी मुकदमों की पैरवी के
लिए बुलाया गया था। मोती लाल नेहरू तथा लाला लाजपत राय ने
सार्वजनिक रूप से क्रांतिकारियों के प्रति सहानुभूति प्रकट की। श्रीप्रकाश,
आचार्य नरेन्द्र देव सहित अनेक प्रमुख कांग्रेसी नेता क्रांतिकारियों से जेल
में मिलने गये परन्तु सरकार ने आचार्य नरेन्द्र देव को क्रांतिकारियों से
मिलने नहीं दिया।² गणेश शंकर विद्यार्थी का 'प्रताप' समाचार पत्र
क्रांतिकारियों की सबसे अधिक मदद करता था।
स्पेशल मजिस्ट्रेट ऐनुद्दीन ने मुकदमें को सेशन सुपुर्द करने के
आदेश तैयार करने में अधिक समय लगाया। कारण था कि - प्रत्येक
क्रांतिकारी की अत्यधिक खराब तस्वीर पेश करने में उन्होंने कोई कसर
नहीं उठा रखी। उनके न्यायालय में 28 व्यक्तियों पर मुकदमा चलाया
गया। इनमें तीन क्रांतिकारी क्रमशः शचीन्द्र नाथ बख्शी, चन्द्रशेखर
आजाद और अशफाक उल्ला खाँ फरार रहे। दो क्रांतिकारियों से मुकदमा
उठा लिया गया और दो क्रांतिकारी सरकारी गवाह बनाकर छोड़ दिये
गये। शेष 21 व्यक्तियों को सेशन सुपुर्द किया गया।
- पूर्वो, बनारसी दास चतुर्वेदी, पृष्ठ 31-37
- दे लिव्ड डेन्जरसली, मन्मथ नाथ गुप्त, पृष्ठ-166
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अशफाक का मुकदमा - अशफाक का बयान
अशफाक और शचीन्द्र नाथ बख्शी का मुकदमा बाद में चला। यह
मुकदमा पहले ऐनुद्दीन की अदालत में पेश किया गया। अशफाक के बड़े
भाई रियासत उल्ला खां ने चन्द्रभानु गुप्त के कहने पर श्री कृपाशंकर
हजेला को अपना वकील बनाया। 24 मार्च, 1927 को यह मुकदमा सत्र
न्यायालय भेजा गया।¹
अपने बयान में मजिस्ट्रेट के समक्ष अशफाक उल्ला खान ने अपने
विरुद्ध लगाये गये समस्त आरोपों को नकार दिया। उन्होंने कहा कि वे
राम प्रसाद बिस्मिल, हरगोविन्द, प्रेम किशन, बनारसी लाल और
इन्द्रभूषण को ऐसे ही जानते हैं, जैसे शाहजहांपुर के अन्य निवासियों को।
उन्होंने सफेद और पीले पैकेट से संबंधित जानकारी से इंकार किया। यही
नहीं अशफाक ने अपनी गिरफ्तारी के समय पाये गये समस्त कागजात
और पत्रों को स्वीकार नहीं किया। उन्होंने बनारसी लाल से किये गये
पत्राचार को भी इंकार कर दिया। यह भी इंकार किया कि वे 25 और 26
अगस्त, 1926 को रायल होटल दिल्ली में 'मुरारी मोहन' के नाम से टिके
थे।²
अशफाक ने स्वीकार किया कि वे 26 सितम्बर, 1925 को पुलिस के
डर से लुप्त हो गये थे क्योंकि उनके नाम के वारन्ट का पता चला था।
उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि आबिद रजा खान के नाम से दस्तखत
किया लेकिन यह सब मजाक में ही किया गया था। अशफाक ने बयान
दिया कि उनकी पहचान गवाह के द्वारा उनके फोटोग्राफ जो कि पुलिस
के अधिकार में थे, की वजह से हुई जबकि
1.अशफाक उल्ला खाँ, भवान सिंह राणा, पृष्ठ -109
2.सी0आई0डी0, वायल्यूम -2, काकोरी षड़यंत्र केस -उ0प्र0रा0अभि0, पृष्ठ-95
131
पहचान के वक्त खैरात नबी पब्लिक प्रासीक्यूटर ने पहचान के विषय में
कोई प्रश्न नहीं किया। यह आरोप झूठे सबूत की वजह से मजिस्ट्रेट खान
बहादुर सैयद ऐनुद्दीन के समक्ष बेकार साबित हुआ, जिससे पहचान को
छिपाये रखे जाने की स्थिति स्पष्ट होती है।¹
इस न्यायालय में अशफाक ने पहचान के विषय में अपने
आब्जेक्शन को विस्तार दिया और कहा कि दिल्ली में उनकी गिरफ्तारी के
पश्चात् उनका चेहरा अनेकों अवसरों पर खुला रखा गया। एक फोटो
उनके बक्से से प्राप्त हुई, जो मजिस्ट्रेट से अनुरोध के बाद भी सील नहीं
किया गया, जिन पांच व्यक्तियों की परेड उनके समक्ष की गयी, उनमें
भी भिन्नता है। बनारसी लाल के संबंधों को भी अशफाक नकारते हैं कि
दो-तीन साल से बनारसी से उनके संबंध नहीं है। अशफाक ने 1924 में
शाहजहांपुर में हुए दंगों के समय राम प्रसाद बिस्मिल से हुए संबंधों को
स्वीकार किया। इसका कारण स्वयं बताते हैं कि यूरोपीयन वस्त्रों की
होली जलाने के कारण बनारसी से संबंध बने। बक्से में रखी
पाण्डुलिपियों की लेखनी (हस्तलिखित) भी वे स्वीकारते हैं। बक्से में
‘मैनीफेस्टो ऑफ कम्युनिस्ट पार्टी’ होने में वे असहजता महसूस करते हैं
और स्वीकारने से कतराते हैं कि किसी ने उनके बक्से में रख दिया होगा
या किसी कारण से बक्से में रख दिया गया होगा।²
अशफाक उल्ला खां ने स्वीकार किया कि 1921 में वे स्कूल छोड़
दिये और असहयोग आन्दोलन में शामिल हो गये। बाद में उन्हें इससे
अरुचि होने लगी और वे पुनः स्कूल में प्रवेश ले लिए, तब तक उन्हें
राजनीति में कोई रुचि नहीं थी।
1.सी0आई0डी0, वाल्यूम -2, काकोरी षड़यंत्र केस-उ0प्र0रा0अभि0, पृष्ठ -95
2.सी0आई0डी0, वाल्यूम -2, काकोरी षड़यंत्र केस-उ0प्र0रा0अभि0, पृष्ठ -96
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