अमर शहीद अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ: व्यक्तित्व और कृतित्व (काकोरी के अमर शहीद का जीवन व रचनाएँ)
Amar Shaheed Ashfaqulla Khan: Personality & Works
अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ 'वारसी' (सम्पादक: बनारसीदास चतुर्वेदी) द्वारा
पृष्ठ 160, कुल 297 में से
संदर्भ में पढ़ेंपहचान के वक्त खैरात नबी पब्लिक प्रासीक्यूटर ने पहचान के विषय में
कोई प्रश्न नहीं किया। यह आरोप झूठे सबूत की वजह से मजिस्ट्रेट खान
बहादुर सैयद ऐनुद्दीन के समक्ष बेकार साबित हुआ, जिससे पहचान को
छिपाये रखे जाने की स्थिति स्पष्ट होती है।¹
इस न्यायालय में अशफाक ने पहचान के विषय में अपने
आब्जेक्शन को विस्तार दिया और कहा कि दिल्ली में उनकी गिरफ्तारी के
पश्चात् उनका चेहरा अनेकों अवसरों पर खुला रखा गया। एक फोटो
उनके बक्से से प्राप्त हुई, जो मजिस्ट्रेट से अनुरोध के बाद भी सील नहीं
किया गया, जिन पांच व्यक्तियों की परेड उनके समक्ष की गयी, उनमें
भी भिन्नता है। बनारसी लाल के संबंधों को भी अशफाक नकारते हैं कि
दो-तीन साल से बनारसी से उनके संबंध नहीं है। अशफाक ने 1924 में
शाहजहांपुर में हुए दंगों के समय राम प्रसाद बिस्मिल से हुए संबंधों को
स्वीकार किया। इसका कारण स्वयं बताते हैं कि यूरोपीयन वस्त्रों की
होली जलाने के कारण बनारसी से संबंध बने। बक्से में रखी
पाण्डुलिपियों की लेखनी (हस्तलिखित) भी वे स्वीकारते हैं। बक्से में
‘मैनीफेस्टो ऑफ कम्युनिस्ट पार्टी’ होने में वे असहजता महसूस करते हैं
और स्वीकारने से कतराते हैं कि किसी ने उनके बक्से में रख दिया होगा
या किसी कारण से बक्से में रख दिया गया होगा।²
अशफाक उल्ला खां ने स्वीकार किया कि 1921 में वे स्कूल छोड़
दिये और असहयोग आन्दोलन में शामिल हो गये। बाद में उन्हें इससे
अरुचि होने लगी और वे पुनः स्कूल में प्रवेश ले लिए, तब तक उन्हें
राजनीति में कोई रुचि नहीं थी।
1.सी0आई0डी0, वाल्यूम -2, काकोरी षड़यंत्र केस-उ0प्र0रा0अभि0, पृष्ठ -95
2.सी0आई0डी0, वाल्यूम -2, काकोरी षड़यंत्र केस-उ0प्र0रा0अभि0, पृष्ठ -96
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