अमर शहीद अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ: व्यक्तित्व और कृतित्व (काकोरी के अमर शहीद का जीवन व रचनाएँ)
Amar Shaheed Ashfaqulla Khan: Personality & Works
अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ 'वारसी' (सम्पादक: बनारसीदास चतुर्वेदी) द्वारा
पृष्ठ 148, कुल 297 में से
संदर्भ में पढ़ेंबंगला साहित्य के सम्पर्क में आने के कारण उन्हें हिन्दू संस्कृति का
अच्छा परिचय मिला। वे पठान होते हुए भी हिन्दू संस्कृति की तह तक
पहुंच गये थे। डाल्टनगंज में आठ महीने अध्ययन, शिकार और शायरी में
अशफाक ने बिताए। उन दिनों मैं पलामू से सौ मील के अन्दर भागलपुर
और हजारीबाग में रहा, पर मेरा अशफाक से कोई सम्पर्क स्थापित न हो
सका, क्योंकि हम दोनों एक-दूसरे की स्थिति से एकदम अनभिज्ञ थे। न
तो मुझे मालूम हुआ था कि अशफाक मेरे इतने करीब हैं और ना ही
अशफाक यह जानते थे कि मैं यहीं भागलपुर में हूँ, ये बातें हमें बाद में
मालुम हुई, जब हम दोनों गिरफ्तार होकर लखनऊ सेन्ट्रल जेल में जाकर
मिले।¹
आठ-दस माह तक डाल्टनगंज में रहने के बाद अशफाक ने वह
स्थान छोड़ दिया। वे एक बार शाहजहांपुर भी सिख के भेष में आये थे।
वे अपने मित्र मुहम्मद फकीर उल्ला से मिलना चाहते थे लेकिन असमय
ही फकीर उल्ला की मौत हो चुकी थी। अशफाक को बहुत दुःख हुआ।
अशफाक वापस डाल्टनगंज आ गये। उन्होंने प्रतापगढ़ में अपनी बहन को
पत्र भी लिखा और भेजा था लेकिन पत्र शायद गुप्तचर विभाग के हाथ
लग गया और घर तक नहीं पहुंच पाया।
अशफाक के चले जाने के बाद पुलिस ने उनके परिवारवालों को
खूब परेशान किया। खानदान के एक महाशय अशफाक को गिरफ्तार
कराना चाहते थे। वे पुलिस विभाग में थे और पुलिस तो चाहती ही थी,
घर की कुर्की तक हुई। अशफाक डाल्टनगंज से पुनः गणेश शंकर विद्यार्थी
के यहां कानपुर आये। दो दिन बाद विद्यार्थी ने उन्हें दो सौ रुपये देकर उनके
भाई शहंशाह खाँ के पास भोपाल भेज दिया।
- अशफाक उल्ला खाँ, भवान सिंह राणा, पृष्ठ -87
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