अमर शहीद अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ: व्यक्तित्व और कृतित्व (काकोरी के अमर शहीद का जीवन व रचनाएँ)
Amar Shaheed Ashfaqulla Khan: Personality & Works
अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ 'वारसी' (सम्पादक: बनारसीदास चतुर्वेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंवहां भी अशफाक ने अनुमान लगाया कि पुलिस को संदेह हो गया है।
इसके पहले कि पुलिस उन तक पहुंचती, वे वहां से भाग गये। वे नेपाल
से चलकर दिल्ली आये। वहां लकड़ी का ठेकेदार परिचित था, उसने
अशफाक को पहचान लिया। फिर अशफाक घर समाचार भेजने को कहकर
लखनऊ चले आये। कुछ दिनों तक लखनऊ रहने के बाद वे कानपुर
चले आये। गणेश शंकर विद्यार्थी अशफाक के प्रशंसक थे। अशफाक गणेश
शंकर विद्यार्थी के पास जा पहुंचे। उस समय वे 'प्रताप' नामक समाचार
पत्र का सम्पादन कर रहे थे। विद्यार्थी जी ने दो दिन तक कार्यालय में
छिपाकर रखा और फिर कुछ रूपये देकर बनारस चले जाने का परामर्श
दिया।¹
अशफाक उल्ला बनारस जा पहुंचे। बनारस में उन्हें कोई क्रांतिकारी
नहीं मिला। पुलिस के भय से सभी भूमिगत हो गये थे या तो बन्दी बना
लिए गये थे। अशफाक वहां से डाल्टनगंज (बिहार) एक अधिशासी
अभियंता के पास पहुंचे। अशफाक ने यहां स्वयं को मथुरा का कायस्थ
बताया और हिन्दू बनकर उसके यहां नौकरी करने लगे। अधिशासी
अभियंता साहित्य प्रेमी था। उसे जब पता चला कि अशफाक शायर हैं,
तो खूब प्रभावित हुआ और अशफाक का वेतन बढ़ा दिया। यहां रहकर
अशफाक ने बंगला भाषा और साहित्य का अध्ययन किया। शचीन्द्र नाथ
बख्शी भी हजारी बाग और भागलपुर में छिपकर रह रहे थे, लेकिन
अशफाक के डाल्टनगंज में होने की सूचना से बेखबर थे। शचीन्द्र नाथ
ने लिखा है -
"डाल्टनगंज में रहने के दौरान ही अशफाक उल्ला खां ने बंगला
भाषा सीख ली थी और बंगला थोड़ी-बहुत बोलने भी लगे थे और
समझने भी लगे थे। उन्हें बंगला गानों का भी अभ्यास हो गया था।
- अशफाक उल्ला खाँ, भवान सिंह राणा, पृष्ठ-86
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