अमर शहीद अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ: व्यक्तित्व और कृतित्व (काकोरी के अमर शहीद का जीवन व रचनाएँ)
Amar Shaheed Ashfaqulla Khan: Personality & Works
अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ 'वारसी' (सम्पादक: बनारसीदास चतुर्वेदी) द्वारा
गाड़ी के दोनों ओर पगदण्डी को छोड़कर घास के मैदानों में दो-दो
युवकों को नियुक्त कर दिया गया, उनके पास माऊजर पिस्तौले थीं। इन
पिस्तौलों को बट पहनाकर राइफल की तरह प्रयोग में लाया जा सकता
था, जिससे यह एक हजार गज तक मारकर सकती थी। इन दो युवकों
को कठोर आदेश दिया गया था कि किसी भी व्यक्ति पर गोली न चलायी
जाये। सिर्फ हवा में कुछ देर तक गोलियाँ चलाई जाती रहें। संयोग ही
ऐसा था कि अमजद अली नामक एक युवक व्यर्थ में मारा गया। उस
व्यक्ति का नया विवाह हुआ था और उसकी पत्नी महिलाओं वाले डिब्बे
में बैठी थी। क्रांतिकारियों की बार-बार चेतावनी के बावजूद वह डिब्बे से
बाहर निकल आया, शायद वह अपनी पत्नी को आश्वस्त करने जा रहा
था कि गोली का शिकार हो गया और मारा गया।¹ राम प्रसाद बिस्मिल
ने घटना का वर्णन करते हुए लिखा है - ‘'एक सज्जन गार्ड के डिब्बे से
उतरे। उनके पास भी माऊजर पिस्तौल थी। विचारा कि ऐसा शुभ अवसर
जाने कब हाथ आए। माऊजर पिस्तौल काहे को चलाने को मिलेगा। इसी
उमंग में सीधी गोली दागने लगे। मैंने जो देखा तो डांटा क्योंकि गोली
चलाने की उनकी ड्यूटी ही नहीं थी। फिर भी यदि कोई मुसाफिर
कौतूहलवश बाहर को सिर निकाले, तो उसको गोली जरूर लग जायेगी।
हुआ भी ऐसा ही जो व्यक्ति रेल से उतरकर अपनी स्त्री के पास जा रहा
था, मेरा ख्याल है कि इन्हीं महाशय की गोली उसके लग गई, क्योंकि
जिस समय यह महाशय सन्दूक नीचे डालकर गार्ड के डिब्बे से उतरे थे,
केवल दो-तीन फायर हुए थे। उसी समय स्त्री ने कोलाहल किया होगा
और उसका पति उसके पास जा रहा था, जो उस महाशय की उमंग का
शिकार हो गया।
- अशफाक उल्ला खाँ, भवान सिंह राणा, पृष्ठ-65
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मैंने यथा शीघ्र पूर्ण प्रबन्ध किया था कि जब तक कोई व्यक्ति
बन्दूक लेकर सामना करने न आये या मुकाबले में गोली न चले, तब
तक किसी आदमी पर फायर न होने पाये। मैं नर -हत्या कराके डकैती
को भीषण रूप नहीं देना चाहता था। फिर भी मेरा कहा न मानकर
अपना काम छोड़ गोली चला देने का यह परिणाम हुआ। गोली चलाने
की ड्यूटी जिनको मैंने दी थी, वे बड़े दक्ष तथा अनुभवी मनुष्य थे।
उनसे भूल होना सम्भव न था। उन लोगों को मैंने देखा था कि वे
अपने स्थान से पाँच मिनट बाद पाँच फायर करते थे। यही मेरा आदेश
था।''¹
कार्य को परिणाम तक पहुँचाने का उपक्रम सुनियोजित तरीके से हो
रहा था। दो व्यक्ति घास में पगडंडियों के पास तो थे ही, जो ट्रेन की
निगरानी कर रहे थे। बाकी सदस्य खजाने वाले डिब्बे में घुस गये और
धक्का देकर खजाने के सन्दूक को डिब्बे से नीचे गिरा दिया। सभी उसे
तोड़ने लगे। सन्दूक इतना मजबूत था कि टूटने का नाम ही नहीं ले रहा
था। हाँ बार-बार प्रहार से उसमें छेद अवश्य हो गया था। गार्ड या किसी
अन्य के पास चाबी होती तो खोलने की समस्या हल हो जाती, किन्तु
गाड़ी में किसी के पास चाबी नहीं थी।² तरीका यह था कि प्रत्येक स्टेशन
मास्टर अपना थैला लाकर उस सन्दूक में डाल जाता था। यदि कोई
उसमें थैला डालना चाहे तो डाल सकता है किन्तु कोई उसमें से निकाल
नहीं सकता। उसकी बनावट ही ऐसी होती है।³ .....घन पर घन बरसते
रहे परन्तु प्रयास व्यर्थ ही रहा। अशफाक उल्ला पहरा देने वाले व्यक्तियों
में थे और जब उन्होंने देखा कि यह दशा तो उचित परिणाम तक नहीं
पहुंचाएगी तो पिस्तौल मन्मथनाथ गुप्त को दे दी
1.अशफाक उल्ला खां, भवान सिंह राणा - पृष्ठ -66
2.भारतीय क्रांतिकारी आन्दोलन का इतिहास, मन्मथनाथ गुप्त, पृष्ठ -210
3.भारतीय क्रांतिकारी आन्दोलन का इतिहास, मन्मथनाथ गुप्त, पृष्ठ -210
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और घन लेकर जुट गये। अशफाक सभी सदस्यों से बलिष्ठ थे,
इसलिए थोड़ी देर में सुराख बड़ा हो गया और रूपये से भरी थैलियां बाहर
निकालकर चादर में बाँध दिया गया।........और इसी वक्त कोई दूसरी
गाड़ी आ गयी तो क्रांतिकारियों की मनोदशा क्या रही होगी, अनुमान
लगाना कठिन है। इसका वर्णन स्वयं मन्मथनाथ गुप्त ने किया है -'इस
समय जबकि सफलता बिल्कुल सामने थी। एक गाड़ी की आवाज आती
हुई सुनाई पड़ी। हाँ इसमें कोई संदेह नहीं था कि गाड़ी हमारी तरफ आ
रही थी। भला यह कैसी गाड़ी थी? यह कैसे हो गया कि अगले स्टेशन
पर हमारी खबर पहुँच गयी। यह सम्भव नहीं था, तो क्या इसके मायने
यह हुआ कि किसी ने विश्वासघात किया? अन्य कितने ही प्रश्न हमारे
मन में कौंध गये। सम्भव है कि यह सैनिक गाड़ी है। यह सम्भावना
करीब-करीब जम गयी। .......अब हमारे नेता लोहे के सन्दूक के पास आ
गये। हमने उनकी तरफ देखा। वे बिल्कुल स्थिर खड़े थे और अन्य सब
लोगों की तरह एकाग्र होकर ट्रेन की तरफ देख रहे थे। ऐसा लगा कि
ट्रेन के यात्रियों में भी थोड़ी-बहुत सुगसुगाहट हो रही थी। हम चाहते तो
उस वक्त अंधेरे में लुप्त हो सकते थे, पर हमने फैसला किया कि अब जो
कुछ भी हो, उसका सामना करना ही है। अधिक से अधिक यह हो
सकता था कि दोनो तरफ से गोलियों की बौछारें हों और हम लोग सब
मारे जाएं। पर जबकि हम पर खतरा आ चुका था, हमें बिल्कुल डर नहीं
लग रहा था। क्या यह बात सच नहीं है कि हम मौका मिलने पर वीरता
का आदर्श पेश करना चाहते थे। हमने हाथों में अपने अस्त्रों को कसकर
पकड़ लिया और आती हुई रेलगाड़ी की तरफ देखने लगे। अशफाक
हथौड़ा चलाकर अपना काम आगे बढ़ा रहे थे और छेद करीब-करीब इतने
बड़े हो गये थे कि सन्दूक में पड़ी थैलियां निकाली जा सकती थीं। इस
समय हथौड़े की चोट के अलावा बाकी सब लोग शान्त थे।
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यात्रियों को ट्रेन के अन्दर रखने के लिए बराबर गोलियां दागी जा
रही थी।''¹ मन्मथ नाथ गुप्त ने आगे भी इसका वर्णन करते हुए लिखा
है - ‘‘हिमगिरी की तेजी से रेल हमारी तरफ दौड़ी आ रही थी। रेल की
आवाज चारो तरफ छाई हुई थी। आखिर क्या होने वाला है? मृत्यु ?
कौन जानता है क्या होगा? पर अब हमें कोई भय नहीं था। उसी समय
राम प्रसाद ने देखा कि जहाँ हम खड़े थे, वहाँ डबल लाइन थी। एकाएक
उनको याद आया कि पंजाब मेल आ रही है और इसमें कोई संदेह नहीं
था कि यह रात वाली पंजाब मेल थी। उन्होंने यह बात हमें बता दी।
हमारे नेता सामने मौजूद थे। उनकी तात्कालिक बुद्धि बड़ी प्रखर थी।
उन्होंने इससे पहले खतरों की स्थिति से निकाला था। क्या यह बात सच
नहीं थी कि इससे पहले हर मौके पर उन्होंने इससे भी गम्भीर स्थिति में
सही फैसले किये थे। शायद वे हमसे कहें कि लौट चलो या कहें कि पास
के पेड़ों के पीछे हो जाओ और वहाँ से जबरदस्त मोर्चा सम्भालो।‘’
‘‘आती हुई गाड़ी पास पहुँचने ही वाली थी। ऐसे मौके पर बिस्मिल ने
हमसे कहा कि हम अपने अस्त्रों को छिपा लें। उससे यह होगा कि यदि
कोई गाड़ी से झाँकेगा, तो हम लोगों को साधारण भटके हुए यात्रियों के
रूप में देखेंगे। उन्होंने अशफाक को इस प्रकार खड़े होने के लिए कहा
मानो वे कोई दृश्य देख रहे हों। गाड़ी बहुत तेजी से आ रही थी और
चारो तरफ उसका शोर था। एक लम्हे के अन्दर गाड़ी हमारे सामने से
निकल गयी और सारी स्थिति एक दुः स्वप्न की तरह होकर चली गयी।
अब वह एक गोली की तरह अगले स्टेशन की ओर जा रही थी। हमारे
चेहरों पर तथा हमारी गाड़ी पर तेज रोशनी गिरी, बहुत जोर से दोनों
गाड़ियों की हवाएं टकरायीं और देखते-देखते सब खत्म हो गया। इस
प्रकार यह खतरा टल गया
- अशफाक उल्ला खां, भवान सिंह राणा, पृष्ठ-67
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और हर मिनट उस गाड़ी का शब्द धीमा होता चला गया।''¹
अशफाक उल्ला खां का कृतित्व ही ऐसा था कि जहां बल का काम
हो बिना अशफाक के सम्भव कहाँ। अशफाक के पास भीमबल था।
अनेक इतिहासकारों, टिप्पणीकारों ने उनके इस अद्भुत बल शौर्य का
बखान किया है। ............रेल रोकने और तिजोरी लूटने में मात्र दस
मिनट का समय लगा होगा। यह अशफाक के कारण ही हुआ कि कार्य
में सफलता मिली। यह भी ज्ञातव्य है कि उसी ट्रेन में चौदह पुरुष ऐसे थे,
जिनके पास बन्दूके थीं या रायफलें थीं। दो सशस्त्र अंग्रेजी फौजी जवान
भी थे परन्तु सब शान्त रहे। ड्राइवर और इंजीनियर का बुरा हाल था। ये
दोनों अंग्रेज थे। ड्राइवर महाशय इंजिन में लेट गये थे और इंजीनियर
साहब पाखाने में जा छिपे थे।² मुसाफिर भी डरे थे, वे समझ बैठे थे कि
गाड़ी को लगभग चालीस आदमियों ने घेर लिया है। केवल दस युवकों
ने इतना बड़ा काण्ड कर डाला। साधारण रूप से विश्वास नहीं होता था,
लेकिन यह सत्य था कि राम प्रसाद बिस्मिल के कुशल नेतृत्व में और
अशफाक के भीमबल के कारण खजाना लूट लिया गया और इस
असाधारण कार्य को परिणाम तक पहुँचा दिया गया। रूपये की थैलियों
को बाँध लेने के बाद बिस्मिल ने सभी सदस्यों को सावधान किया कि वे
स्थान को अच्छी तरह देख लें कि कोई वस्तु छूट तो नहीं गयी। इसके
बावजूद एक सदस्य अपनी चादर वहीं भूल आया था। यात्रियों को धोखा
देने के लिए क्रांतिकारी पहले तो विपरीत दिशा में भागे परन्तु झाड़ियों में
लुप्त होने के बाद सभी एक साथ लखनऊ की ओर मुड़ गये। लूटे हुए
रूपये चमड़े के थैलों में थे। रास्ते में ये रूपये निकाल लिए गये और
थैलों को खाली ही बरसात में रुके हुए पानी के गड्ढों में डाल दिये।
- अशफाक उल्ला खाँ, भवान् सिंह राणा, पृष्ठ -68
- राम प्रसाद बिस्मिल, रचनावली सम्पादक, दिनेश शर्मा, पृष्ठ -3
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इसके बाद सभी युवक चौक की ओर से लखनऊ शहर में प्रवेश
किये। क्रांतिकारियों ने शहर में इस रास्ते से प्रवेश इसलिए किया कि कोई
संदेह नहीं कर सकता था। रात्रि में अन्य स्थानों से जाने पर शक पैदा
हो सकता था और यह इलाका वेश्याओं का था और इधर रात भर चहल-पहल
रहती थी।
दल के नेता बिस्मिल पर संगठन की अर्थव्यवस्था का भार था।
लखनऊ पहुँचने पर राम प्रसाद बिस्मिल ने समस्त धनराशि अपने किसी
विश्वसनीय व्यक्ति के पास छिपा दी थी। इस विषय में अन्य किसी
सदस्य को जानकारी नहीं थी। इस कार्य के बाद सभी सदस्य
अपने-अपने परिचितों के यहाँ चले गये। चन्द्रशेखर आजाद और मन्मथ
नाथ गुप्त का लखनऊ में कोई परिचित नहीं था और वे एक पार्क में
जाकर सो गये।¹ इस काण्ड की सूचना समाचार पत्रों को रात्रि में ही मिल
गयी थी। मन्मथनाथ गुप्त ने लिखा है - ''जब प्रातः काल भक्तगण
गोमती में स्नान करने के लिए जा रहे थे, इस समय हम अपने गुप्त
स्थानों से प्रकट हुए। थोड़ी देर में हम सड़क की बढ़ती हुई जनता में
मिल गये। इसके बाद हमने सुना कि उस समय लखनऊ के प्रसिद्ध
'इण्डियन डेली टेलीग्राफ' के हॉकर जोर-जोर से चिल्ला रहे थे - 'काकोरी
के पास सनसनीपूर्ण ट्रेन डकैती।' मैंने इस अखबार की एक प्रति खरीदी
और प्रातः काल की धुँधली रोशनी में इस घटना की कई कालमों की
विस्तृत अजीबोगरीब रिपोर्ट पढ़ी। इस रिपोर्ट से हमें ज्ञात हुआ कि तीन
व्यक्ति, जिसमें एक गोरा भी था, मारे गये। हमें इन हत्याओं के संबंध में
कुछ पता नहीं था। चूँकि उस समय मैं एक आतंकवादी ऐडवेन्चरिस्ट था।
इसलिए मैंने इस खबर का स्वागत किया, कि इस अवसर पर एक गोरा
मारा गया है, किन्तु दो भारतीयों की हत्या से मुझे दुः ख हुआ।
- अशफाक उल्ला खां, भवान सिंह राणा, पृष्ठ-71
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........मैंने उस समय जो कुछ सोचा और अनुभव किया उसी का सच्चा
चित्र पाठकों के सम्मुख रख रहा हूँ। किन्तु इस स्थल में यह भी बता रहा
हूँ कि ‘इंडियन डेली टेलीग्राफ' की दी हुई खबर बिल्कुल गलत थी। बाद
में हमें ज्ञात हुआ कि कोई गोरा नहीं मारा गया। .....जहां तक गोरे के
मारे जाने का सम्बन्ध है, तथ्य कुछ और ही निकला। जिस गोरे के
विषय में यह बात कही गई थी, वह पलटन का मेजर या कर्नल था।
जिस समय गोली चल रही थी, उस समय उसने अपने डिब्बे के सारे
दरवाजे बन्द कर लिये थे और शौचालय के अन्दर अपने को बन्द कर
लिया था। जब गाड़ी लखनऊ पहुंची, तभी यह गोरा अपने को सुरक्षित
स्थान से निकाला।’’¹
‘‘अशफाक की बात सही निकली। ट्रेन डकैती सर्वशक्तिमान ब्रिटिश
सरकार के प्रति एक चुनौती थी और सरकार ने इसे इसी रूप में लिया
भी। पुलिस फौरन समझ गयी थी कि यह एक राजनैतिक डकैती है।
पहले पुलिस यदा-कदा हमारी खबर जान लिया करती थी, किन्तु अब
दिन-रात हमारे पीछे खुफिया चलने लगे। दो खुफिया दिन-रात मेरे
इर्द-गिर्द रहने लगे।’’²
काकोरी काण्ड से संगठन को अवश्य ही कुछ आर्थिक लाभ हुआ।
पहली बात तो यह थी कि दल के सदस्यों का आत्मविश्वास बढ़ा, वे
साहस से भर गये। उन्हें अपने ऊपर विश्वास हो गया कि वे भविष्य में
ऐसी बड़ी घटना को अंजाम दे सकते हैं। दूसरा लाभ यह हुआ कि संगठन
के ऊपर जो ऋण हो गया था, उसे चुका दिया गया। नये अस्त्र-शस्त्र हेतु
भी रूपये भेजे जाने लगे। तीसरा लाभ यह रहा कि प्रत्येक केन्द्र की
व्यवस्था को सुचारु रूप से चलाने के लिए और उसकी व्यवस्था हेतु नये
कार्यकर्ताओं को भी भेज दिया गया। अब अर्थ आड़े नही आ रहा था।
- जांबाज पत्रिका, मन्मथनाथ गुप्त, पृष्ठ -7
- जांबाज पत्रिका, मन्मथनाथ गुप्त, पृष्ठ-7
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संगठन के सभी सदस्य प्रसन्न थे। राम प्रसाद बिस्मिल एक नये
उत्साह के साथ संगठन को फिर से सशक्त बनाने में जुट गये। दुर्भाग्य
ही था कि सभी लाभ क्षणिक सिद्ध हुए। पुलिस भी सक्रिय हो गयी थी
और संगठन में भी दरार पड़ गयी थी। बिस्मिल को अन्त तक इसका
गहरा दुः ख रहा। स्वयं बिस्मिल ने लिखा है - ''मैं इस विषय में कुछ
भी न जान सका कि दूसरे देश में क्रांतिकारियों ने अपनी आरम्भिक
अवस्था में हम लोगों की भाँति प्रयत्न किया था या नहीं। यदि पर्याप्त
अनुभव होता, तो हम इतनी साधारण भूलें ना करते। त्रुटियों के होते हुए
भी ना बिगड़ता, और ना कुछ भेद खुलता, ना ही इस अवस्था को
पहुँचते, क्योंकि मैंने जो संगठन बनाया था, उसमें किसी भी ओर से मुझे
कमजोरी नहीं दिखाई देती थी। कोई भी किसी प्रकार की त्रुटि नहीं समझ
सकता था। इसी कारण आँख बन्द किये बैठे रहे, किन्तु आस्तीन में साँप
छिपा हुआ था, ऐसा गहरा मुँह मारा कि चारों खाने चित्त कर दिया।
''जिन्हें हम हार समझे थे, गला अपना सजाने को।
वही अब नाग बन बैठे, हमारे काट खाने को।।''
नवयुवकों की आपसी होड़ के कारण आपस में ईर्ष्या-द्वेष फैल रही
थी, जिस कारण रोज कलह हो जाती थी, जो कभी-कभी भयंकर रूप
धारण कर लेती थी। मेरे पास जब कोई मामला आता तो मैं प्रेमपूर्वक
क्रांतिकारी समिति की दशा का अवलोकन कराके उन सबको शान्त कर
देता था। कभी-कभी नेतृत्व को लेकर भी वाद-विवाद चल जाता था। एक
केन्द्र कें निरीक्षक से वहां के कार्यकर्ता अत्यन्त असंतुष्ट थे। क्योंकि
निरीक्षक से अनुशासनहीनता के कारण कुछ भूलें हो गयी थीं। इस
अवस्था को देखकर मुझे बड़ा दुः ख तथा आश्चर्य हुआ, क्योंकि नेतागीरी
का भूत सबसे ज्यादा भयानक होता है। जिस समय यह भूत खोपड़ी पर
सवार होता है, उसी समय सब काम चौपट हो जाता है। केवल एक दूसरे
के दोष देखने में ही समय व्यतीत होता है और वैमनस्य बढ़कर बड़े
भयंकर परिणामों का उत्पादक होता है।
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इस प्रकार के समाचारों को सुनकर मैंने सबको एकत्रित कर खूब
फटकारा। उस समय सब अपनी त्रुटि समझकर पछताए और प्रेमपूर्वक
आपस में मिलकर सारे कार्य करने लगे। पर ऐसी अवस्था हो गयी थी
कि दल गुटबन्दी का शिकार हो गया था। इस पर भी मुझ पर सबकी
श्रद्धा थी और मेरी बात को सब मान लेते थे। इतना सब कुछ होने पर
भी मुझे किसी प्रकार का संदेह न था। किन्तु परमात्मा को ऐसा ही
स्वीकार था, जो इस अवस्था का दर्शन करना पड़ा।''¹
काकोरी काण्ड से अशफाक का कृतित्व स्पष्ट होकर दिखता है।
अशफाक की दूरदर्शिता और उनका भीमबल निश्चित ही दृष्टिगत होता है।
अब पछतावा होता है कि काश अशफाक इस काण्ड से अपने को रोक
लिए होते। अशफाक के एक-एक कथन सत्य साबित हो रहे थे और
निश्चित ही क्रांतिकारी अपने पैरों में कुल्हाड़ी मार चुके थे। यह जोश में
आकर होश खोने जैसा था। अशफाक ही एक ऐसे क्रान्तिकारी व्यक्ति थे,
जो हमेशा सचेत रहते थे, उनके लिए जोश में आकर होश खोने वाली
कोई बात नहीं थी। बाद के इतिहास ने सिद्ध कर दिया कि अशफाक सही
थे और अन्य क्रांतिकारियों का निर्णय नितांत आत्मघाती था। बहुमत की
बात भले हो किन्तु यह सत्य हो अथवा उचित हो कोई आवश्यक नहीं है।
बहुमत से अल्पमत या एक व्यक्ति की बात भी सत्य अथवा कल्याणकारी,
उपयोगी सिद्ध होती है। .............निश्चित ही हमें अशफाक के मानसिक बल की
भी पहचान होती है।
- अशफाक उल्ला खाँ, भवान सिंह राणा, पृष्ठ-73
110
अध्याय-सात
अध्याय-सात
काकोरी काण्ड के बाद की स्थिति का अध्ययन
जांच : काकोरी काण्ड को सरकार ने एक खुली चुनौती के रूप में
लिया। सरकार पूरी तरह सावधान हो गयी। सरकार के दो महत्वपूर्ण
विभाग सक्रिय हो गये, ये विभाग थे पुलिस और गुप्तचर विभाग। ऐसी
रोमांचकारी घटना पहले कभी सुनी नहीं गयी थी। अतः सबका चकित
होना स्वाभाविक। इसमें किसी मुसाफिर को लूटने का प्रयास नहीं किया
गया था। लखनऊ के मुख्य चीफ कोर्ट के प्रधान न्यायाधीश ने अपने
फैसले में इस डकैती को भारत की अनोखी डकैती बतलाया।¹
यह घटना सरकार के लिए एक चुनौती थी। इस ट्रेन डकैती का
पता लगाने के लिए सरकार द्वारा हार्टन की अध्यक्षता में एक विशेष
पुलिस इकाई गठित की गयी। सरकार के सौभाग्य से हार्टन को सफलता
मिलने लगी थी।² घटना स्थल पर मिले साक्ष्यों से रेलवे पुलिस की
रिपोर्ट का अध्ययन करने के बाद यह जांच दल इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि
यह कार्य क्रांतिकारियों का ही हो सकता है। सरकार इसे राजनैतिक डकैती
मानती थी। मन्मथनाथ गुप्त ने लिखा है- ''अशफाक ने जो भविष्यवाणी
की थी, वह सत्य ही सिद्ध हुई। हमने जो कहा था कि हम सरकारी
खजाना लूटना चाहते हैं, किसी यात्री से लूटमार करना हमारा उद्देश्य
नहीं है, उससे हमारा राजनीतिक रूप सामने आ गया था। यों तो पुलिस
वाले बड़े आलसी और धीरे काम करने वाले होते हैं, पर इस सूचना से
उनमें बिजली सी दौड़ गयी।'' स्पष्ट है कि क्रांतिकारी पुलिस वालों को
मूर्ख और अयोग्य समझते थे और
- पूर्वो, बनारसी दास चतुर्वेदी, पृष्ठ -11
2.स्वतंत्रता आन्दोलन में जनपद शाहजहाँपुर का योगदान, एन०सी०मेहेरोत्रा, पृष्ठ 121
111
इधर सरकार के लिए यह डकैती प्रतिष्ठता का प्रश्न बन गयी। जांच दल
को ट्रेन डकैती के तीन नोट शाहजहांपुर में मिले। पुलिस को यह भी
पता चला कि 8, 9, 10 अगस्त, 1925 को राम प्रसाद बिस्मिल शाहजहांपुर
में नहीं थे। अब पुलिस ने जांच में तीव्रता दिखाई। मालूम हुआ कि
शाहजहांपुर के गवर्नमेण्ट हाईस्कूल के एक विद्यार्थी इन्द्र भूषण मिश्र के
पास बिस्मिल के क्रांतिकारी दल संबंधी पत्र आते थे, जो वह बिस्मिल को
देता था। इन्हीं पत्रों के आधार पर हार्टन को मेरठ में 13 सितम्बर, 1925
को होने वाली बैठक की जानकारी मिली। इस बैठक में एक श्राद्ध का
जिक्र था।
<u>मेरठ की बैठक</u> - काकोरी ट्रेन डकैती के उपरान्त संगठन को अधिक
सक्रिय बनाने के लिए राम प्रसाद बिस्मिल ने मेरठ अनाथालय में 13
सितम्बर, 1925 को एक बैठक बुलाई थी, जिसमें दल की केन्द्रीय समिति
तथा कुछ जिला संगठन के विशिष्ट कार्यकर्ताओं को आमंत्रित किया गया
था। बिस्मिल ने एक पत्र अंग्रेजी में लिखा था - उसका हिन्दी अनुवाद
निम्नवत् है -
‘‘ मेरे प्यारे,
हम अच्छी तरह से हैं। सम्भवतः आपको मालूम ही होगा कि हमारे
पितामह का श्राद्ध संस्कार इस महीने की तेरहवीं तारीख (रविवार) को
होगा। उसमें आपकी उपस्थिति अनिवार्य है। अतः मेरा निवेदन है कि
नियत समय पर पहुंचे और कृतार्थ करें।
आपका
रुद्र
पुनश्चः -कृपया इस महीने की बारहवीं तारीख को दिल्ली के लिए
प्रस्थान करें। वहां से आपको आसानी से गाड़ी मिल जायेगी।
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आप मुझे अनाथालय में मिल सकेंगे।,' '¹
क्रांतिकारी उस समय छद्म नाम रखकर काम करते थे। राम प्रसाद
बिस्मिल के कई नाम थे, इसी में से एक नाम 'रुद्र राय' भी था। अन्य
क्रांतिकारियों के छद्म नाम की चर्चा योगेश चन्द्र चटर्जी ने की है, जो
निम्न है -
वास्तविक नाम छद्म नाम
- राम प्रसाद बिस्मिल- आनंद प्रकाश, रुद्रराय, मास्टर महाशय, महंत
- राजेन्द्र नाथ लाहिड़ी- निताई, निताई चन्द्र, निताई मामा, जुगुल
किशोर, दीक्षित, मथुरा प्रसाद, जवाहर लाल
बाजपेई, के०पी० श्रीवास्तव। - राम कृष्ण खत्री - नरेन्द्र, गंगाराम, गोविन्द प्रकाश
- योगेश चन्द्र चटर्जी- राय, प्रफुल्ल चन्द्र राय, राय महाशय
- मुकुन्दी लाल - महाराज
- बनवारी लाल - तारा सिंह, रामान्दा सिंह
- अशफाक उल्ला - कुंवर जी, मन्ताना, वारी, कृष्ण
- बनारसी - बाबा
- मन्मथनाथ गुप्त - नवाब, नवाब साहब
- चन्द्रशेखर आजाद - क्यूइक सिल्वर
- एस०एन० बख्शी - बद्री, कन्हई लाल, बागची
- सेठ दामोदर स्वरूप- लाला जी
- जी०सी० कर - चौधरी
- पूर्वो, सुधीर विद्यार्थी (उद्धत), पृष्ठ -37
113
वास्तविक नाम छद्म नाम
14. इन्द्रभूषण - गोवर्ड-¹
एक सरकारी रिपोर्ट के अनुसार मीटिंग का उद्देश्य पिछले कार्यों की
समीक्षा करना तथा भविष्य के कार्यक्रम की रूपरेखा तैयार करना था।
रिपोर्ट के अनुसार मेरठ की बैठक में राम प्रसाद बिस्मिल, राजेन्द्र नाथ
लाहिड़ी, सुरेश चन्द्र भट्टाचार्य सहित अनेक सदस्य अनाथालय में विष्णु
शरण दुबलिस के रहने के स्थान पर इकट्ठा हुए थे। इस कार्यवाही को
पुलिस सब-इंस्पेक्टर बह्मा सिंह और पेरू सिंह ने देखा था।²
<u>गिरफ्तारियां -</u>
बिस्मिल और अशफाक अपने-अपने घर शाहजहांपुर पहुंच गये थे।
अन्य क्रांतिकारी भी अपने-अपने जिला केन्द्रों की ओर चले गये थे।
पुलिस उनकी गतिविधियों पर नजर रख रही थी। डकैती में लूटे गये
नोटों के नम्बरों के आधार पर पुलिस को इस बात का पूरा संदेह हो गया
था कि शाहजहांपुर का कोई न कोई व्यक्ति काकोरी की डकैती में अवश्य
सम्बद्ध है। राम प्रसाद बिस्मिल को बन्दी बनाये जाने की आशंका को
देखकर उनके कुछ मित्रों ने उन्हें पूरी तरह सावधान रहने का परामर्श
दिया था, किन्तु बिस्मिल को इस बात का पूरा विश्वास था कि पुलिस को
उनके विरुद्ध कोई प्रमाण नहीं मिलेगा। सरकार ने डकैती में शामिल
किसी भी अभियुक्त को पकड़वाने में मदद करने वाले को 5000 रू०
इनाम देने की घोषणा की।
- पूर्वो, योगेश चन्द्र चटर्जी, पृष्ठ -379-80
- पूर्वो, योगेश चन्द्र चटर्जी, पृष्ठ -351-352
114
इस घोषणा के इस्तहार प्रत्येक रेलवे स्टेशन और पुलिस थाने पर चस्पा
कर दिये गये थें।¹ पुलिस ने एकाएक संदिग्ध व्यक्तियों के घरों पर छापे
मारे, जिससे पुलिस को महत्वपूर्ण दस्तावेज हाथ लगे, जिसके द्वारा उन
व्यक्तियों का क्रांतिकारी गतिविधियों से सम्पर्क होने का पता लगता था।
जब गोविन्द चरण को लखनऊ में गिरफ्तार कर लिया गया, तो उनके
कमरे से पार्टी के संविधान का पीला कागज प्राप्त हुआ।² 26 सितम्बर,
1925 की प्रातः चार बजे समूचे प्रान्त की पुलिस ने एक साथ छापा मारा,
जिसमें अनेक व्यक्तियों को एक साथ गिरफ्तार किया गया किन्तु अशफाक
उल्ला खां, चन्द्रशेखर आजाद, राजेन्द्र नाथ लाहिड़ी और शचीन्द्र नाथ
बख्शी उसी दिन गिरफ्तार नहीं किये जा सके।³ राम प्रसाद बिस्मिल उसी
दिन अवश्य गिरफ्तार हो गये। राम प्रसाद बिस्मिल ने इसका जिक्र किया
है - ‘‘रात्रि के समय ग्यारह बजे के लगभग एक मित्र के यहां से अपने
घर पर गया। रास्ते में खुफिया पुलिस के सिपाहियों से भेंट हुई। कुछ
विशेष रूप से उस समय भी वे मेरी देखभाल कर रहे थे। मैंने कोई
चिन्ता न की और घर पर जाकर सो गया। प्रातः काल चार बजने पर
जगा, शौचादि से निवृत होने पर बाहर द्वार पर बन्दूक के कुन्दों के शब्द
सुनाई दिये। मैं समझ गया कि पुलिस आ गयी है। मैं तुरन्त ही द्वार
खोलकर बाहर आया। एक पुलिस अफसर ने बढ़कर हाथ पकड़ लिया। मैं
गिरफ्तार हो गया। मैं केवल एक अंगोछा पहने हुए था।’'⁴ पुलिस ने घर
की तलाशी ली परन्तु कोई आपत्तिजनक वस्तु नहीं मिली लेकिन
बिस्मिल की तलाशी लेने पर जेब से कुछ पत्र मिल गये, जो उन्होंने
लिखे थे।
- दे लिव्ड डेन्जरसली, मन्मथनाथ गुप्त, पृष्ठ -144
- कार्यवाही काकोरी षड़यंत्र केस अपील - पृष्ठ -37
- अशफाक उल्ला खाँ, भवान सिंह राणा, पृष्ठ -77
- पूर्वो, राम प्रसाद बिस्मिल, पृष्ठ -92-93
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वह उन्हें डालने के लिए डाकखाने भी गये थे, परन्तु डाक निकल जाने
के कारण वह लेटर बाक्स में न डाल सके। इसलिए वापस ले आये थे।
उनकी यही असावधानी उनके लिए दुर्भाग्यपूर्ण सिद्ध हुई। इसमें एक पत्र
दल की गतिविधियों के विषय में था, जिसे पुलिस ने अपने अधिकार में
ले लिया।
अशफाक उल्ला खाँ शाहजहाँपुर से फरार हो गये थे। उनके मन में
रूस जाने का विचार आया था। इसके लिए वे पहले काबुल जाना चाहते
थे। छापामारी के दौरान फसाहत हुसैन सब-इंस्पेक्टर ने बताया कि वे
अशफाक उल्ला खां के घर पांच बजे 26 सितम्बर, 1925 को गये। वे साथ
में एक सर्च वारन्ट लेकर गये थे। अशफाक उल्ला खां अनुपस्थित थे और
उनके भाई ने इंस्पेक्टर से कहा कि उन्होंने रिश्तेदार अब्दुल कादिर खान
डिप्टी कलेक्टर के यहां रात बिताई। सब-इंस्पेक्टर वहां भी गया, जिससे
अशफाक उल्ला को गिरफ्तार किया जा सके, परन्तु वे वहां भी आरोपी
को पाने में असफल रहे। अशफाक उल्ला के घर 12 बोर की बन्दूक, ढेर
सारी खाली-खाली गोलियां, एक सही गोली और चार झोले छोटी
गोलियां प्राप्त हुईं। बन्दूक अब्दुल कादिर खान की थी और एक लाइसेंस
मिला, जिसमें अशफाक उल्ला के भाई का नाम था। बन्दूक और गोली
का मिलना यह प्रदर्शित करता है कि अशफाक उल्ला की पहुंच गोली एवं
बन्दूक तक है।¹
उसी दिन (26 सितम्बर, 1925) प्रेम किशन खन्ना, इन्द्र भूषण मित्र,
हरगोविन्द और बनारसी लाल को पकड़ लिया गया। ठाकुर रोशन सिंह
भी पुलिस की पकड़ में आ गये। कानपुर में कांग्रेस कार्यालय सहित
क्रांतिकारी वीरभद्र तिवारी और 'प्रताप' समाचार पत्र के सहायक सम्पादक
सुरेश चन्द्र भट्टाचार्य के यहां छापे मारे गये।
- सी०आई०डी० वाल्यूम-2, काकोरी षड्यन्त्र केस, उ०प्र० राजकीय अभिलेखागार,
पृष्ठ-41
116
राजेन्द्र लाहिड़ी के घर भी छापा मारा गया किन्तु वे दल की ओर से बम
बनाना सिखाने के लिए कलकत्ता जा चुके थे।¹
राजकुमार सिन्हा को गिरफ्तार कर लिया गया। बनारस हिन्दू
विश्वविद्यालय के जिस कमरे में रहते थे, उसकी तलाशी ली गयी, जहां से
दो राइफलें पकड़ी गयीं। रामकृष्ण खत्री पूना में पकड़े गये। भूपेन्द्र नाथ
सन्याल इलाहाबाद में पुलिस द्वारा पकड़े गये। इलाहाबाद में हीबट रोड
पर जब एक बंगाली छात्र बम लेकर जा रहा था, तो अचानक बम फट
गया और छात्र घायल हो गया। उसने पकड़े जाने पर भूपेन्द्र नाथ
सन्याल का नाम बताया। इस प्रकार भूपेन्द्र नाथ को भी काकोरी केस में
शामिल कर लिया गया। इसी प्रकार शचीन्द्र नाथ सन्याल को लखनऊ
में, विष्णु शरण दुबलिस को मेरठ में, शिव चरन लाल को मथुरा में,
बनवारी लाल को रायबरेली में तथा मुकुन्दी लाल को बनारस में पकड़ा
गया।²
कुन्दल लाल और चन्द्रशेखर आजाद को फरार घोषित किया गया।
आजाद की गिरफ्तारी पर दो हजार रू० का ईनाम था परन्तु आजाद को
गिरफ्तार करना कोई सरल कार्य न था। आजाद कहा करते थे कि उन्हें
कोई गिरफ्तार नहीं कर सकता ओर वे आजाद के रूप में जीवित रहेंगे।³
जब कभी आजाद का कोई साथी पकड़ा जाता था तो वे अपने रहने का
स्थान बदल देते थे और किसी से पत्र व्यवहार नहीं करते थे।⁴ पुलिस
बेचैन हो गयी अशफाक को गिरफ्तार करने के लिए और अशफाक उल्ला
फरार हो गये। पुलिस ने अशफाक को गिरफ्तार करने की चाल भी
चली।
- स्वतंत्रता आन्दोलन में जनपद शाहजहाँपुर का योगदान, एन०सी०मेहोत्रा, पृष्ठ-123
- स्वतंत्रता आन्दोलन में जनपद शाहजहाँपुर का योगदान, एन०सी०मेहोत्रा, पृष्ठ-123
- मैमायर्स, शिव वर्मा, पृष्ठ -54
- अमर शहीद चन्द्रशेखर आजाद, वैशम्पायन, पृष्ठ -6 एवं 225
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फैजाबाद जेल डायरी, अदालती बयान एवं देशवासियों के नाम अन्तिम सन्देश
इन्द्रभूषण मित्र जो अशफाक का मित्र ही था, पुलिस का मुखबिर
बन गया था। लेकिन इन्द्रभूषण द्वारा पुलिस की चाल को अशफाक के
भाई रियासत उल्ला खाँ ने नाकाम कर दिया। इस घटना से और
असफलता के कारण हार्टन रियासत उल्ला पर नाराज भी हो गये और
मुकदमा चलाने की धमकी भी दी, परन्तु खान बहादुर तसद्दुक हुसैन
डिप्टी सुपरिण्टेण्डेंट पुलिस ने अपना दोस्त बताकर माफी दिला दी लेकिन
पुलिस रियासत पर दबाव डालती रही कि अशफाक को सरकारी गवाह
बना दिया जाय। पुलिस तुली हुई थी कि अशफाक अपना मार्ग छोड़कर
सरकारी गवाह बन जाये। पुलिस ने इस हेतु अशफाक के घर के लोगों
को तंग भी किया। गुप्तचर विभाग के लोग कई प्रकार से भेष बदलकर,
जिनमें प्रायः महिलाएं होती थी, घर जाते थे, लेकिन अशफाक तो फरार
थे। बाद में पुलिस को विश्वास हो गया कि अशफाक उल्ला. वास्तव में
फरार है। पुलिस किसी भी कीमत पर अशफाक को गिरफ्तार करना
चाहती थी। उन्हें घर में न पाकर पुलिस ने उनके भाई की बन्दूक जब्त
कर ली थी।¹
अशफाक का फरार होना-
अशफाक उल्ला खाँ को अब घर में रखना उचित नहीं था। वे घर
से बाहर आधा मील दूर एक गन्ने के खेत में छिपे रहते थे। घरवालों से
सम्पर्क बना हुआ था, उनका खाना वहीं पहुंचा दिया जाता था। यही
नहीं अशफाक को पुलिस की गतिविधियों की जानकारी भी मिलती थी।
अशफाक चार दिनों तक गन्ने के खेत में छिपे रहे।
पुलिस के गुप्तचर विभाग का जब आना-जाना कम हुआ तो
घरवालों ने उन्हें कुछ रूपये देकर नेपाल भेज दिया। वहां तक पहुंचाने चार
सशस्त्र व्यक्ति भी साथ गये।
- अशफाक उल्ला खाँ, भवान सिंह राणा, पृष्ठ -84
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वहां भी अशफाक ने अनुमान लगाया कि पुलिस को संदेह हो गया है।
इसके पहले कि पुलिस उन तक पहुंचती, वे वहां से भाग गये। वे नेपाल
से चलकर दिल्ली आये। वहां लकड़ी का ठेकेदार परिचित था, उसने
अशफाक को पहचान लिया। फिर अशफाक घर समाचार भेजने को कहकर
लखनऊ चले आये। कुछ दिनों तक लखनऊ रहने के बाद वे कानपुर
चले आये। गणेश शंकर विद्यार्थी अशफाक के प्रशंसक थे। अशफाक गणेश
शंकर विद्यार्थी के पास जा पहुंचे। उस समय वे 'प्रताप' नामक समाचार
पत्र का सम्पादन कर रहे थे। विद्यार्थी जी ने दो दिन तक कार्यालय में
छिपाकर रखा और फिर कुछ रूपये देकर बनारस चले जाने का परामर्श
दिया।¹
अशफाक उल्ला बनारस जा पहुंचे। बनारस में उन्हें कोई क्रांतिकारी
नहीं मिला। पुलिस के भय से सभी भूमिगत हो गये थे या तो बन्दी बना
लिए गये थे। अशफाक वहां से डाल्टनगंज (बिहार) एक अधिशासी
अभियंता के पास पहुंचे। अशफाक ने यहां स्वयं को मथुरा का कायस्थ
बताया और हिन्दू बनकर उसके यहां नौकरी करने लगे। अधिशासी
अभियंता साहित्य प्रेमी था। उसे जब पता चला कि अशफाक शायर हैं,
तो खूब प्रभावित हुआ और अशफाक का वेतन बढ़ा दिया। यहां रहकर
अशफाक ने बंगला भाषा और साहित्य का अध्ययन किया। शचीन्द्र नाथ
बख्शी भी हजारी बाग और भागलपुर में छिपकर रह रहे थे, लेकिन
अशफाक के डाल्टनगंज में होने की सूचना से बेखबर थे। शचीन्द्र नाथ
ने लिखा है -
"डाल्टनगंज में रहने के दौरान ही अशफाक उल्ला खां ने बंगला
भाषा सीख ली थी और बंगला थोड़ी-बहुत बोलने भी लगे थे और
समझने भी लगे थे। उन्हें बंगला गानों का भी अभ्यास हो गया था।
- अशफाक उल्ला खाँ, भवान सिंह राणा, पृष्ठ-86
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बंगला साहित्य के सम्पर्क में आने के कारण उन्हें हिन्दू संस्कृति का
अच्छा परिचय मिला। वे पठान होते हुए भी हिन्दू संस्कृति की तह तक
पहुंच गये थे। डाल्टनगंज में आठ महीने अध्ययन, शिकार और शायरी में
अशफाक ने बिताए। उन दिनों मैं पलामू से सौ मील के अन्दर भागलपुर
और हजारीबाग में रहा, पर मेरा अशफाक से कोई सम्पर्क स्थापित न हो
सका, क्योंकि हम दोनों एक-दूसरे की स्थिति से एकदम अनभिज्ञ थे। न
तो मुझे मालूम हुआ था कि अशफाक मेरे इतने करीब हैं और ना ही
अशफाक यह जानते थे कि मैं यहीं भागलपुर में हूँ, ये बातें हमें बाद में
मालुम हुई, जब हम दोनों गिरफ्तार होकर लखनऊ सेन्ट्रल जेल में जाकर
मिले।¹
आठ-दस माह तक डाल्टनगंज में रहने के बाद अशफाक ने वह
स्थान छोड़ दिया। वे एक बार शाहजहांपुर भी सिख के भेष में आये थे।
वे अपने मित्र मुहम्मद फकीर उल्ला से मिलना चाहते थे लेकिन असमय
ही फकीर उल्ला की मौत हो चुकी थी। अशफाक को बहुत दुःख हुआ।
अशफाक वापस डाल्टनगंज आ गये। उन्होंने प्रतापगढ़ में अपनी बहन को
पत्र भी लिखा और भेजा था लेकिन पत्र शायद गुप्तचर विभाग के हाथ
लग गया और घर तक नहीं पहुंच पाया।
अशफाक के चले जाने के बाद पुलिस ने उनके परिवारवालों को
खूब परेशान किया। खानदान के एक महाशय अशफाक को गिरफ्तार
कराना चाहते थे। वे पुलिस विभाग में थे और पुलिस तो चाहती ही थी,
घर की कुर्की तक हुई। अशफाक डाल्टनगंज से पुनः गणेश शंकर विद्यार्थी
के यहां कानपुर आये। दो दिन बाद विद्यार्थी ने उन्हें दो सौ रुपये देकर उनके
भाई शहंशाह खाँ के पास भोपाल भेज दिया।
- अशफाक उल्ला खाँ, भवान सिंह राणा, पृष्ठ -87
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