अमर शहीद अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ: व्यक्तित्व और कृतित्व (काकोरी के अमर शहीद का जीवन व रचनाएँ)
Amar Shaheed Ashfaqulla Khan: Personality & Works
अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ 'वारसी' (सम्पादक: बनारसीदास चतुर्वेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंऔर घन लेकर जुट गये। अशफाक सभी सदस्यों से बलिष्ठ थे,
इसलिए थोड़ी देर में सुराख बड़ा हो गया और रूपये से भरी थैलियां बाहर
निकालकर चादर में बाँध दिया गया।........और इसी वक्त कोई दूसरी
गाड़ी आ गयी तो क्रांतिकारियों की मनोदशा क्या रही होगी, अनुमान
लगाना कठिन है। इसका वर्णन स्वयं मन्मथनाथ गुप्त ने किया है -'इस
समय जबकि सफलता बिल्कुल सामने थी। एक गाड़ी की आवाज आती
हुई सुनाई पड़ी। हाँ इसमें कोई संदेह नहीं था कि गाड़ी हमारी तरफ आ
रही थी। भला यह कैसी गाड़ी थी? यह कैसे हो गया कि अगले स्टेशन
पर हमारी खबर पहुँच गयी। यह सम्भव नहीं था, तो क्या इसके मायने
यह हुआ कि किसी ने विश्वासघात किया? अन्य कितने ही प्रश्न हमारे
मन में कौंध गये। सम्भव है कि यह सैनिक गाड़ी है। यह सम्भावना
करीब-करीब जम गयी। .......अब हमारे नेता लोहे के सन्दूक के पास आ
गये। हमने उनकी तरफ देखा। वे बिल्कुल स्थिर खड़े थे और अन्य सब
लोगों की तरह एकाग्र होकर ट्रेन की तरफ देख रहे थे। ऐसा लगा कि
ट्रेन के यात्रियों में भी थोड़ी-बहुत सुगसुगाहट हो रही थी। हम चाहते तो
उस वक्त अंधेरे में लुप्त हो सकते थे, पर हमने फैसला किया कि अब जो
कुछ भी हो, उसका सामना करना ही है। अधिक से अधिक यह हो
सकता था कि दोनो तरफ से गोलियों की बौछारें हों और हम लोग सब
मारे जाएं। पर जबकि हम पर खतरा आ चुका था, हमें बिल्कुल डर नहीं
लग रहा था। क्या यह बात सच नहीं है कि हम मौका मिलने पर वीरता
का आदर्श पेश करना चाहते थे। हमने हाथों में अपने अस्त्रों को कसकर
पकड़ लिया और आती हुई रेलगाड़ी की तरफ देखने लगे। अशफाक
हथौड़ा चलाकर अपना काम आगे बढ़ा रहे थे और छेद करीब-करीब इतने
बड़े हो गये थे कि सन्दूक में पड़ी थैलियां निकाली जा सकती थीं। इस
समय हथौड़े की चोट के अलावा बाकी सब लोग शान्त थे।
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