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अमर शहीद अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ: व्यक्तित्व और कृतित्व (काकोरी के अमर शहीद का जीवन व रचनाएँ)

अमर शहीद अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ: व्यक्तित्व और कृतित्व (काकोरी के अमर शहीद का जीवन व रचनाएँ)

Amar Shaheed Ashfaqulla Khan: Personality & Works

अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ 'वारसी' (सम्पादक: बनारसीदास चतुर्वेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished297 पृष्ठ

पृष्ठ 130, कुल 297 में से

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मैंने यथा शीघ्र पूर्ण प्रबन्ध किया था कि जब तक कोई व्यक्ति
बन्दूक लेकर सामना करने न आये या मुकाबले में गोली न चले, तब
तक किसी आदमी पर फायर न होने पाये। मैं नर -हत्या कराके डकैती
को भीषण रूप नहीं देना चाहता था। फिर भी मेरा कहा न मानकर
अपना काम छोड़ गोली चला देने का यह परिणाम हुआ। गोली चलाने
की ड्यूटी जिनको मैंने दी थी, वे बड़े दक्ष तथा अनुभवी मनुष्य थे।
उनसे भूल होना सम्भव न था। उन लोगों को मैंने देखा था कि वे
अपने स्थान से पाँच मिनट बाद पाँच फायर करते थे। यही मेरा आदेश
था।''¹
कार्य को परिणाम तक पहुँचाने का उपक्रम सुनियोजित तरीके से हो
रहा था। दो व्यक्ति घास में पगडंडियों के पास तो थे ही, जो ट्रेन की
निगरानी कर रहे थे। बाकी सदस्य खजाने वाले डिब्बे में घुस गये और
धक्का देकर खजाने के सन्दूक को डिब्बे से नीचे गिरा दिया। सभी उसे
तोड़ने लगे। सन्दूक इतना मजबूत था कि टूटने का नाम ही नहीं ले रहा
था। हाँ बार-बार प्रहार से उसमें छेद अवश्य हो गया था। गार्ड या किसी
अन्य के पास चाबी होती तो खोलने की समस्या हल हो जाती, किन्तु
गाड़ी में किसी के पास चाबी नहीं थी।² तरीका यह था कि प्रत्येक स्टेशन
मास्टर अपना थैला लाकर उस सन्दूक में डाल जाता था। यदि कोई
उसमें थैला डालना चाहे तो डाल सकता है किन्तु कोई उसमें से निकाल
नहीं सकता। उसकी बनावट ही ऐसी होती है।³ .....घन पर घन बरसते
रहे परन्तु प्रयास व्यर्थ ही रहा। अशफाक उल्ला पहरा देने वाले व्यक्तियों
में थे और जब उन्होंने देखा कि यह दशा तो उचित परिणाम तक नहीं
पहुंचाएगी तो पिस्तौल मन्मथनाथ गुप्त को दे दी
1.अशफाक उल्ला खां, भवान सिंह राणा - पृष्ठ -66
2.भारतीय क्रांतिकारी आन्दोलन का इतिहास, मन्मथनाथ गुप्त, पृष्ठ -210
3.भारतीय क्रांतिकारी आन्दोलन का इतिहास, मन्मथनाथ गुप्त, पृष्ठ -210
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