सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
अमर शहीद अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ: व्यक्तित्व और कृतित्व (काकोरी के अमर शहीद का जीवन व रचनाएँ)

अमर शहीद अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ: व्यक्तित्व और कृतित्व (काकोरी के अमर शहीद का जीवन व रचनाएँ)

Amar Shaheed Ashfaqulla Khan: Personality & Works

अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ 'वारसी' (सम्पादक: बनारसीदास चतुर्वेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished297 पृष्ठ

पृष्ठ 135, कुल 297 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 135

........मैंने उस समय जो कुछ सोचा और अनुभव किया उसी का सच्चा
चित्र पाठकों के सम्मुख रख रहा हूँ। किन्तु इस स्थल में यह भी बता रहा
हूँ कि ‘इंडियन डेली टेलीग्राफ' की दी हुई खबर बिल्कुल गलत थी। बाद
में हमें ज्ञात हुआ कि कोई गोरा नहीं मारा गया। .....जहां तक गोरे के
मारे जाने का सम्बन्ध है, तथ्य कुछ और ही निकला। जिस गोरे के
विषय में यह बात कही गई थी, वह पलटन का मेजर या कर्नल था।
जिस समय गोली चल रही थी, उस समय उसने अपने डिब्बे के सारे
दरवाजे बन्द कर लिये थे और शौचालय के अन्दर अपने को बन्द कर
लिया था। जब गाड़ी लखनऊ पहुंची, तभी यह गोरा अपने को सुरक्षित
स्थान से निकाला।’’¹
‘‘अशफाक की बात सही निकली। ट्रेन डकैती सर्वशक्तिमान ब्रिटिश
सरकार के प्रति एक चुनौती थी और सरकार ने इसे इसी रूप में लिया
भी। पुलिस फौरन समझ गयी थी कि यह एक राजनैतिक डकैती है।
पहले पुलिस यदा-कदा हमारी खबर जान लिया करती थी, किन्तु अब
दिन-रात हमारे पीछे खुफिया चलने लगे। दो खुफिया दिन-रात मेरे
इर्द-गिर्द रहने लगे।’’²
काकोरी काण्ड से संगठन को अवश्य ही कुछ आर्थिक लाभ हुआ।
पहली बात तो यह थी कि दल के सदस्यों का आत्मविश्वास बढ़ा, वे
साहस से भर गये। उन्हें अपने ऊपर विश्वास हो गया कि वे भविष्य में
ऐसी बड़ी घटना को अंजाम दे सकते हैं। दूसरा लाभ यह हुआ कि संगठन
के ऊपर जो ऋण हो गया था, उसे चुका दिया गया। नये अस्त्र-शस्त्र हेतु
भी रूपये भेजे जाने लगे। तीसरा लाभ यह रहा कि प्रत्येक केन्द्र की
व्यवस्था को सुचारु रूप से चलाने के लिए और उसकी व्यवस्था हेतु नये
कार्यकर्ताओं को भी भेज दिया गया। अब अर्थ आड़े नही आ रहा था।

  1. जांबाज पत्रिका, मन्मथनाथ गुप्त, पृष्ठ -7
  2. जांबाज पत्रिका, मन्मथनाथ गुप्त, पृष्ठ-7
    108