सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
अमर शहीद अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ: व्यक्तित्व और कृतित्व (काकोरी के अमर शहीद का जीवन व रचनाएँ)

अमर शहीद अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ: व्यक्तित्व और कृतित्व (काकोरी के अमर शहीद का जीवन व रचनाएँ)

Amar Shaheed Ashfaqulla Khan: Personality & Works

अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ 'वारसी' (सम्पादक: बनारसीदास चतुर्वेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished297 पृष्ठ

पृष्ठ 136, कुल 297 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 136

संगठन के सभी सदस्य प्रसन्न थे। राम प्रसाद बिस्मिल एक नये
उत्साह के साथ संगठन को फिर से सशक्त बनाने में जुट गये। दुर्भाग्य
ही था कि सभी लाभ क्षणिक सिद्ध हुए। पुलिस भी सक्रिय हो गयी थी
और संगठन में भी दरार पड़ गयी थी। बिस्मिल को अन्त तक इसका
गहरा दुः ख रहा। स्वयं बिस्मिल ने लिखा है - ''मैं इस विषय में कुछ
भी न जान सका कि दूसरे देश में क्रांतिकारियों ने अपनी आरम्भिक
अवस्था में हम लोगों की भाँति प्रयत्न किया था या नहीं। यदि पर्याप्त
अनुभव होता, तो हम इतनी साधारण भूलें ना करते। त्रुटियों के होते हुए
भी ना बिगड़ता, और ना कुछ भेद खुलता, ना ही इस अवस्था को
पहुँचते, क्योंकि मैंने जो संगठन बनाया था, उसमें किसी भी ओर से मुझे
कमजोरी नहीं दिखाई देती थी। कोई भी किसी प्रकार की त्रुटि नहीं समझ
सकता था। इसी कारण आँख बन्द किये बैठे रहे, किन्तु आस्तीन में साँप
छिपा हुआ था, ऐसा गहरा मुँह मारा कि चारों खाने चित्त कर दिया।
''जिन्हें हम हार समझे थे, गला अपना सजाने को।
वही अब नाग बन बैठे, हमारे काट खाने को।।''
नवयुवकों की आपसी होड़ के कारण आपस में ईर्ष्या-द्वेष फैल रही
थी, जिस कारण रोज कलह हो जाती थी, जो कभी-कभी भयंकर रूप
धारण कर लेती थी। मेरे पास जब कोई मामला आता तो मैं प्रेमपूर्वक
क्रांतिकारी समिति की दशा का अवलोकन कराके उन सबको शान्त कर
देता था। कभी-कभी नेतृत्व को लेकर भी वाद-विवाद चल जाता था। एक
केन्द्र कें निरीक्षक से वहां के कार्यकर्ता अत्यन्त असंतुष्ट थे। क्योंकि
निरीक्षक से अनुशासनहीनता के कारण कुछ भूलें हो गयी थीं। इस
अवस्था को देखकर मुझे बड़ा दुः ख तथा आश्चर्य हुआ, क्योंकि नेतागीरी
का भूत सबसे ज्यादा भयानक होता है। जिस समय यह भूत खोपड़ी पर
सवार होता है, उसी समय सब काम चौपट हो जाता है। केवल एक दूसरे
के दोष देखने में ही समय व्यतीत होता है और वैमनस्य बढ़कर बड़े
भयंकर परिणामों का उत्पादक होता है।
109