अमर शहीद अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ: व्यक्तित्व और कृतित्व (काकोरी के अमर शहीद का जीवन व रचनाएँ)
Amar Shaheed Ashfaqulla Khan: Personality & Works
अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ 'वारसी' (सम्पादक: बनारसीदास चतुर्वेदी) द्वारा
जनता को क्रांतिकारियों के इस संगठन से परिचित होने का अवसर
मिला। इन सब गतिविधियों और आर्थिक संकटों से जूझते आगे बढ़ते हुए
प्रमुख क्रांतिकारी राम प्रसाद बिस्मिल एक दिन शाहजहांपुर से लखनऊ
यात्रा कर रहे थे। वे डिब्बे के बाहर आये। वे गार्ड के पास वाले डिब्बे में
ही बैठे थे। जब स्टेशन पर गाड़ी रुकी तो स्टेशन मास्टर एक थैली लाया
और गार्ड के डिब्बे में डाल दिया। कुछ खटपट की आवाज हुई। राम
प्रसाद ने देखा कि एक लोहे का संदूक रखा है। उन्होंने अनुमान लगा
लिया कि इसी में थैली डाली होगी। अगले स्टेशन पर भी थैली डाली
गयी। लोहे का संदूक गार्ड के डिब्बे में जंजीर से बंधा था और ताला भी
पड़ा था। यह सब राम प्रसाद ने अनुमान ही लगाया। कुछ दिनों के बाद
राम प्रसाद को लखनऊ स्टेशन पर जाने का अवसर प्राप्त हुआ। राम
प्रसाद ने देखा कि गाड़ी में से कुली लोहे का संदूक (आमदनी वाले
सन्दूक) उतार रहे हैं। पता करने पर राम प्रसाद बिस्मिल को ज्ञात हुआ
कि इस सन्दूक में जंजीर ताला कुछ नहीं पड़ता, यूं ही रखा जाता है।
राम प्रसाद ने उसी समय निश्चय किया कि इसी पर हाथ मारूँगा।¹ धुन
सवार हो गयी। राम प्रसाद ने तुरन्त जाकर टाइम-टेबुल देखा और
अनुमान लगाया कि सहारनपुर से गाड़ी चलती है, लखनऊ तक निश्चित
ही दस हजार रू० की आमदनी होती है। बिस्मिल ने अब दृढ़ निश्चय कर
लिया कि अब वे इस खजाने को लूटकर रहेंगे। उन्होंने अपना विचार दल
के अन्य सदस्यों को बता दिया। काफी बहस-विमर्श के बाद तय हुआ था
कि रेल खजाना ही लूटा जाय।
- राम प्रसाद बिस्मिल, पूर्वो, पृष्ठ-88
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अशफाक का विरोध : -
रेल का खजाना लूटने की योजना राम प्रसाद बिस्मिल के दिमाग
की उपज थी। यह योजना जब दल के अन्य सदस्यों के सामने रखी
गयी, तो सबने इसे स्वीकार कर लिया और अब पूर्णरूप से रेल खजाना
लूटने की योजना बन गयी। किन्तु अशफाक इस योजना से सहमत नहीं
थे। अशफाक का स्पष्ट रूप से कहना था कि सरकारी खजाने पर धावा
बोलना उचित नहीं है, इसका अर्थ सरकार से सीधी टक्कर लेना है।¹
अशफाक ने नये कदम का डटकर मुकाबला किया। उन्होंने कहा कि जहाँ
तक चुनौती का सम्बन्ध है, इस काम से हम सरकार को चुनौती तो
अवश्य दे देंगे लेकिन पार्टी के अन्त का प्रारम्भ हो जायेगा। उन्होंने
साफ-साफ कह दिया कि अभी पार्टी बहुत कमजोर है और इस काबिल
नहीं है कि सरकार के साथ युद्ध कर सके। अशफाक ने यह भी कहा कि
जिस प्रकार यह प्रस्तावित काम करने का इरादा किया जा रहा है, इससे
फौरन सरकार को संदेह हो जायेगा और जल्द ही सरकार हमारे ऊपर टूट
पड़ेगी।² अशफाक कारण जानते थे कि दल के पास धन भी नहीं हैं और
न अन्य साधन। ऐसी स्थिति में सरकार से टक्कर लेना अपना ही सिर
फोड़ना है। अशफाक ने बहुत प्रयास किया कि उनकी बात मान ली
जाय। अशफाक जानते थे कि यह कार्य अपने पैर में कुल्हाड़ी मारने जैसा
है। लेकिन अशफाक को सफलता न मिली। विरोध सार्थक था और इससे
अशफाक की दूरदर्शिता का पता भी चलता है। वे स्थायित्व में विश्वास
करते थे। वे कोई ऐसा कार्य नहीं चाहते थे, जिससे दल को भारी
नुकसान हो। यह विरोधात्मक स्वर भी अशफाक के व्यक्तित्व ही नहीं
कृतित्व को भी दर्शाता है।
- अशफाक उल्ला खाँ, भवान सिंह राणा, पृष्ठ -59
- जांबाज (पत्रिका), मन्मथनाथ गुप्त, पृष्ठ-3
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क्रांतिकारी दल की मुख्य समिति ने बिस्मिल की योजना को
स्वीकृति दे दी। इसके बाद भी अशफाक बार-बार बिस्मिल को इस कार्य
के सम्भावित घातक परिणामों से सचेत करते रहे। लेकिन अब तो जो हो
गया सो हो गया। अब निर्णय को बदलना बिस्मिल के लिए भी असम्भव
था। अन्त में अशफाक को बिस्मिल ने सहमत कर लिया। अन्ततः
रेलगाड़ी लूटने की योजना बनाई गयी। योजना के प्रत्येक पहलू पर खूब
विचार किया गया। प्रथम चरण में यह निश्चित हुआ कि रेलगाड़ी जब
किसी छोटे स्टेशन पर खड़ी हो तो स्टेशन के तारघर पर अधिकार कर
लिया जाये।¹
अशफाक ने भले ही स्वीकार कर लिया लेकिन उनका भीतरी
व्यक्तित्व इस कार्य हेतु स्वीकृति नहीं देता था। वहीं चन्द्रशेखर आजाद
सबसे अधिक प्रसन्न थे। वे सरकार को खुली चुनौती देते हुए सीधी
टक्कर लेने में विश्वास रखते थे। यही कारण था कि योजना के सबसे
अधिक प्रबल समर्थक चन्द्रशेखर आजाद ही थे। चन्द्रशेखर आजाद जैसी
विचारधारा वाले संगठन के सदस्यों का मत था कि यदि गाड़ी का गार्ड,
ड्राइवर आदि अंग्रेज हुए तो उन्हें भी गोली मार दी जाये। बिस्मिल ऐसे
विचार से कतई सहमत नहीं थे। वे व्यर्थ की हत्या या रक्तपात के विरोधी
थे। अशफाक उल्ला खां तो प्रारम्भ से ही इस प्रकार की डकैती के विरुद्ध
थे।² वे चाहते थे कि क्रांतिकारी जो भी कार्य करें छिपकर करें।
क्रांतिकारी मन्मथ नाथ गुप्त जो स्वयं काकोरी काण्ड में सम्मिलित
हुए थे, वे अशफाक की असहमति पर लिखते हैं कि - 'इस बार एक बड़ी
योजना बनाई गई थी। यह तय किया गया कि लखनऊ के पास काकोरी
नामक स्थान पर 8 डाउन रेल को
- स्वतंत्रता आन्दोलन में शाहजहांपुर का योगदान, डॉ० एन०सी० मेहरोत्रा,
पृष्ठ-118 - स्वतंत्रता आन्दोलन में शाहजहांपुर का योगदान, डॉ० एन०सी० मेहरोत्रा,
पृष्ठ-118
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रोककर उसमें आने वाला रेल खजाना लूट लिया जाए। काकोरी स्टेशन
के पास एक वीरान जगह चुन ली गई थी। सारी तैयारियां गुपचुप,
लेकिन बड़ी सरगर्मी के साथ होती रहीं। पर अशफाक अब भी इस डाके
का विरोध करते रहे। यह मानना पड़ेगा कि वह बहुत दूर की चीज सोच
रहे थे। उनका कहना था कि हमारा दल अभी इतना मजबूत नहीं है कि
हम ब्रिटिश सरकार को खुली चुनौती दे सकें। अभी हम इस हालत में
नहीं हैं कि हम सरकार से सीधी लड़ाई छेड़कर दल को कायम रख सकें।
लेकिन सब जोश के मारे फड़क रहे थे, और अशफाक उल्ला की बात
नक्कार खाने में तूती की आवाज बनकर रह गयी।''¹
मन्मथ नाथ गुप्त ने आगे लिखा कि - '.......एक महत्वपूर्ण बात
यह थी कि यों तो अशफाक उल्ला सरकारी खजाने की डकैती के विरोधी
थे, पर जब उन्होंने देखा कि उनकी एक न चली और क्रांतिकारी इस
काम को करने पर ही तुले हैं, तब उन्होंने भी कमर कस ली। उनकी
सुन्दर बड़ी-बड़ी आँखे तेज से दीप्त हो उठीं ओर वह अपना पार्ट अदा
करने के लिए अत्यन्त साहस तथा प्रसन्नता से प्रस्तुत हो गये। उनका
विरोध किसी डर या भय से प्रेरित न था, बल्कि वह बुद्धिमत्ता की
आवाज थी। बाद के इतिहास ने सिद्ध कर दिया कि अशफाक सही थे
और बाकी सभी क्रांतिकारी गलती पर थे। यह बात तो निश्चित है कि
यदि हम इस कार्य को न करते तो इतनी जल्दी हमारे पांव न उखड़ते।''²
- अशफाक उल्ला खाँ, भवान सिंह राणा, पृष्ठ -61
- भारतीय क्रांतिकारी आन्दोलन का इतिहास, मन्मथनाथ गुप्त, पृष्ठ-
209-210
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उपरोक्त कथनों से स्पष्ट हो जाता है कि अशफाक उल्ला खां
दूरदर्शी मस्तिष्क के धनी थे और उस समय के क्रांतिकारियों में मानसिक
रूप से उनका स्थान ऊंचा था। अशफाक का विरोधात्मक स्वर व्यर्थ गया
और इस कार्य हेतु दस क्रांतिकारी युवकों का चयन कर लिया गया, जो
इस प्रकार है - पंडित राम प्रसाद बिस्मिल, चन्द्रशेखर आजाद, अशफाक
उल्ला खां, राजेन्द्र नाथ लाहिड़ी, मुकुन्दी लाल, मन्मथनाथ गुप्त, बनवारी
लाल, शचीन्द्र नाथ बख्शी, मुरारी लाल, कुन्दन लाल। राम प्रसाद
बिस्मिल इस योजना को क्रियान्वित करने वाले दल के नेता बने। अत्यन्त
गुप्त रूप से, पूरी सावधानी रखते हुए तेजी से तैयारियों होने लगीं। इसके
लिए लखनऊ से कुछ दूर काकोरी नामक स्थान का चयन भी कर लिया
गया।¹
- अशफाक उल्ला खाँ, भवान सिंह राणा, पृष्ठ -60
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काकोरी काण्ड की योजना का अंतिम चरण
और अशफाक का एक बार पुन: विरोध-
काकोरी नामक स्थान का चयन तो हो ही गया था। काकोरी
लखनऊ जिले का छोटा सा गांव है। इस गांव का कोई खास मतलब भी
नहीं था। काकोरी नाम से रेलवे का छोटा सा स्टेशन भी है। विचार
किया गया कि इसी छोटे स्टेशन पर गाड़ी खड़ी होने पर तुरन्त स्टेशन
तथा वहां स्थित तारघर पर अधिकार कर लिया जाए और गाड़ी का
सन्दूक उतारकर उसे तोड़ डाला जाए। इस कार्य सम्पादन के पश्चात् जो
कुछ भी प्राप्त हो, उसे लेकर तुरन्त भाग लिया जाये। अन्ततः कार्यक्रम
बिल्कुल स्पष्ट हो गया। किन्तु अभी भी कई बातें तय होनी थीं। कार्यक्रम
यह था कि किस स्टेशन पर क्रांतिकारी चढ़ेंगे और किन दो स्थानों के
बीच में जंजीर खींचकर गाड़ी खड़ी करेंगे। यह भी तय हुआ कि गाड़ी
खड़ी करके लोहे का सन्दूक खींच कर बाहर निकाल लिया जाये और उस
पर कब्जा कर लिया जाय। प्रतिदिन सारे स्टेशनों पर जो आमदनी होती
थी, उसे आठ नम्बर की डाउन ट्रेन लेकर लखनऊ हेड आफिस में पहुंचती
थी। योजना यह थी कि सदस्य किसी दिन इसी गाड़ी पर किसी स्टेशन
पर सवार हो जायें और दो स्टेशनों के बीच गाड़ी रोक ली जाय। पहले
यह योजना बनी थी कि किसी स्टेशन पर ही रोककर खजाने को लूटा
जाय। इस हेतु लखनऊ में छेलालाल धर्मशाला में क्रांतिकारी ठहरे थे।¹ ये
सभी सदस्य टोली के रूप में नहीं वरन् एक-दूसरे से अपरिचित बनते हुए
अलग-अलग व्यक्तियों के रूप में ठहरे थे। निश्चित तिथि को अपने-अपने
गुप्त स्थानों पर ठहरे हुए थे। योजना भी यही थी कि गाड़ी खड़ी होने
पर स्टेशन मास्टर को पकड़ लें। सभी क्रांतिकारी लखनऊ के अगले
स्टेशन के लिए पैदल ही चल
- जाँबाज (पत्रिका) - मन्मथनाथ गुप्त - पृष्ठ-3
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पड़े किन्तु अभी वे अगले स्टेशन के सिग्नल के पास भी नहीं पहुँच पाये
थे कि गाड़ी निकली चली जा रही है, जिसमें खजाना लूटा जाना है।
मन्मथ नाथ गुप्त लिखते हैं कि - 'हमें इससे गहरी निराशा हुई, उसकी
कल्पना आसानी से नहीं की जा सकती।' यह देरी खल गयी और
क्रांतिकारी पैदल ही लखनऊ लौट आये। फिर पता किया गया कि यह
गाड़ी 8 डाउन ही थी कि नहीं। पता चला कि वह गाड़ी 8 डाउन ही
थी। मुकुन्दी लाल के अनुसार - 'इसी प्रकार दो दिन असफलता का मुंह
देखना पड़ा था। दो दिन तक लगातार कोशिशों के बावजूद वह असफल
रहे। तीसरे दिन 9 अगस्त, 1925 को हमारे साथी योजना में आखिर
कामयाब हो गये'। स्पष्ट है कि क्रांतिकारी इस कार्य हेतु 7 और 8 अगस्त को
प्रयत्नशील रहे। ................और अभियान में सफलता नहीं मिली। दो दिन
की असफलता के बाद दल शाहजहांपुर चला गया था। इस संबंध में
मन्मथनाथ गुप्त ने लिखा है - 'हम लोग 9 तारीख की संध्या समय
शाहजहांपुर में हथियार छेनी, घन, हथौड़े आदि से लैस होकर गाड़ी पर
सवार हो गये।'¹ स्टेशन पर खजाना लूटने की योजना को त्याग दिया
गया था क्योंकि इस कार्य हेतु अधिक लोगों की आवश्यकता थी। अतः
यह योजना बन गयी कि अब दो स्टेशनों के बीच में गाड़ी रोककर
खजाना लूटा जाय और इसी कार्य हेतु दल के सदस्य ट्रेन में सवार हुए
थे। अशफाक ने अपने साथियों से खूब विरोध जताया। यह उनका
अन्तिम प्रयास था। बिस्मिल दल के नेता थे, अशफाक बार-बार उन्हें
समझाते, परन्तु बिस्मिल के सिर पर तो कुछ और जुनून सवार था, वे
समझा-बुझा कर अशफाक को शांतकर देते थे। मन्मथ नाथ गुप्त ने
लिखा है - ''9 अगस्त 1925 को ट्रेन डकैती का निश्चय किया गया था।
हम लोग जब दस आदमी काकोरी स्टेशन पहुँचे, उस समय भी अशफ़ाक यही कहते
रहे कि राम प्रसाद मेरी बात मान जाओ।
- भारतीय क्रांतिकारी आन्दोलन का इतिहास, मन्मथनाथ गुप्त, पृष्ठ -209
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अब भी लौट चलो। पर उनका कहना-सुनना बेकार ही गया। पं० राम
प्रसाद बिस्मिल ने मुझे (मन्मथनाथ) बुलाकर कहा कि अशफाक को
समझाओ और उसे बताओ कि लोग उसके विरोध के कारण उसे क्या-क्या
कह रहे हैं। .............मैंने अशफाक को यह बताया कि ऐन मौके पर पहुंच
कर तुम जो विरोध कर रहे हो, उसकी प्रतिक्रिया साथियों पर बड़ा खराब
असर डालेगी। वे तुम्हें डरपोक कहने लगे हैं। दरअसल हमारे कई साथी
कह रहे थे कि अशफाक डर गया है। पं० राम प्रसाद बिस्मिल भी यही
सोच रहे थे कि तुम डर गये हो। परन्तु अशफाक की एक ही रट थी कि
- लौट चलो, यह काम नहीं होना चाहिए।\’\’¹
<u>काकोरी ट्रेन डकैती-</u>
संध्या होने वाली थी। आसमान बादलों से घिरा था। वह रात होने
वाली थी, जिसका जिक्र किये बिना कोई क्रांतिकारी इतिहास पूरा नहीं
होता। छिट-पुट बूँदा-बांदी भी हो रही थी। गाड़ी चार बजे शाम को आई
और सभी सवार हो गये। सुधीर विद्यार्थी ने लिखा है - ‘आज उन्हें
अपने लक्ष्य की ओर जाना था। वे सिर पर कफन बांधकर एक
शक्तिशाली साम्राज्य को चुनौती देने निकल पड़े थे। गिनती में सिर्फ दस
थे वे, पर उनके इरादे ऊँचे और मजबूत थे। वे देश की आजादी के लिए
क्रांति के इस रास्ते पर सीना तानकर चले थे। इसलिए आज उन्हें अपने
अभियान पर नाज था।² क्रांतिकारी अपने औजार और हथियार को लिए
गाड़ी में सवार हो चुके थे। तीन व्यक्ति सेकेण्ड क्लास के डिब्बे में सवार
हुए थे, इस कार्य हेतु अशफाक उल्ला खां, राजेन्द्र लाहिड़ी और शचीन्द्र
नाथ बख्शी को चुना गया था।
1- अशफाक उल्ला खाँ, भवान सिंह राणा, पृष्ठ -64
2- अशफाक उल्ला खां और उनका युग, सुधीर विद्यार्थी, पृष्ठ-37
100
शेष सात सदस्य तीसरे क्लास डिब्बे में सवार हुए थे। राम प्रसाद बिस्मिल
दल का नेतृत्व कर रहे थे। ऐसे कार्यों में वे सदैव नेतृत्व ही किया करते
थे। तीसरे डिब्बे में सवार सदस्यों के नाम इस प्रकार हैं - बिस्मिल, केशव
चक्रवती, मुरारी लाल, मुकुन्दीलाल, चन्द्रशेखर आजाद, बनवारी लाल और
मन्मथ नाथ गुप्त। दल के सदस्य गाड़ी में फैले हुए थे। अशफाक उल्ला
खां, राजेन्द्र लाहिड़ी, शचीन्द्र नाथ बख्शी का काम था कि जंजीर
खींचकर गाड़ी को खड़ी कर देंगे। क्रांतिकारियों के पास चार नए माऊजर
पिस्तौल थी और अन्य छोट-मोटे हथियार थे। प्रत्येक पिस्तौल के लिए
पचास से अधिक गोलियाँ थीं। योजना के अनुसार अक्षरशः पालन
हुआ। निर्धारित स्थान पर जंजीर खींच दी गयी।¹ जंजीर खींचते ही गाड़ी
रुक गयी। उस समय संध्या का समय था, अँधेरा छाने लगा था। गाड़ी
के रुकते ही मुसाफिर जंगले से मुँह निकालकर झाँकने लगे। वह यह
जानना चाहते थे कि मामला क्या है। गार्ड भी उतरकर उसी ओर जाने
लगा कि मामला क्या है? अभी दिन की रोशनी थोड़ी बाकी थी। गाड़ी
खड़ी होते ही दल के सदस्य अपने-अपने डिब्बों से उतर गये और कुछ
क्षणों में कार्य प्रारम्भ कर दिया गया। गार्ड साहब को क्रांतिकारियों ने
पिस्तौल दिखाकर जमीन पर लेटने के लिए आज्ञा दे दी। गार्ड साहब
औंधे मुंह जमीन पर लेट गये। दल के सभी सदस्यों ने अपने-अपने
हथियार निकाल लिए। माऊजर पिस्तौलें भी निकाल ली गयी थीं। इस
पिस्तौल की मार एक हजार गज तक होती थी और एक साथ दस
गोलियां भरी जाती थीं। दल के सदस्यों ने एक-दो हवाई फायर करते हुए
यात्रियों को चेतावनी दी कि वे सभी तुरन्त अपने-अपने डिब्बों के अन्दर
रहें। यात्रियों को कुछ नहीं कहा जायेगा, सिर्फ सरकारी खजाना लूटा
जायेगा। यात्री किसी प्रकार की चिन्ता न करें, वे केवल अपने-अपने
स्थानों पर शांतिपूर्वक बैठे रहें।
- भारतीय क्रांतिकारी आन्दोलन का इतिहास, मन्मथनाथ गुप्त, पृष्ठ-210
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गाड़ी के दोनों ओर पगदण्डी को छोड़कर घास के मैदानों में दो-दो
युवकों को नियुक्त कर दिया गया, उनके पास माऊजर पिस्तौले थीं। इन
पिस्तौलों को बट पहनाकर राइफल की तरह प्रयोग में लाया जा सकता
था, जिससे यह एक हजार गज तक मारकर सकती थी। इन दो युवकों
को कठोर आदेश दिया गया था कि किसी भी व्यक्ति पर गोली न चलायी
जाये। सिर्फ हवा में कुछ देर तक गोलियाँ चलाई जाती रहें। संयोग ही
ऐसा था कि अमजद अली नामक एक युवक व्यर्थ में मारा गया। उस
व्यक्ति का नया विवाह हुआ था और उसकी पत्नी महिलाओं वाले डिब्बे
में बैठी थी। क्रांतिकारियों की बार-बार चेतावनी के बावजूद वह डिब्बे से
बाहर निकल आया, शायद वह अपनी पत्नी को आश्वस्त करने जा रहा
था कि गोली का शिकार हो गया और मारा गया।¹ राम प्रसाद बिस्मिल
ने घटना का वर्णन करते हुए लिखा है - ‘'एक सज्जन गार्ड के डिब्बे से
उतरे। उनके पास भी माऊजर पिस्तौल थी। विचारा कि ऐसा शुभ अवसर
जाने कब हाथ आए। माऊजर पिस्तौल काहे को चलाने को मिलेगा। इसी
उमंग में सीधी गोली दागने लगे। मैंने जो देखा तो डांटा क्योंकि गोली
चलाने की उनकी ड्यूटी ही नहीं थी। फिर भी यदि कोई मुसाफिर
कौतूहलवश बाहर को सिर निकाले, तो उसको गोली जरूर लग जायेगी।
हुआ भी ऐसा ही जो व्यक्ति रेल से उतरकर अपनी स्त्री के पास जा रहा
था, मेरा ख्याल है कि इन्हीं महाशय की गोली उसके लग गई, क्योंकि
जिस समय यह महाशय सन्दूक नीचे डालकर गार्ड के डिब्बे से उतरे थे,
केवल दो-तीन फायर हुए थे। उसी समय स्त्री ने कोलाहल किया होगा
और उसका पति उसके पास जा रहा था, जो उस महाशय की उमंग का
शिकार हो गया।
- अशफाक उल्ला खाँ, भवान सिंह राणा, पृष्ठ-65
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मैंने यथा शीघ्र पूर्ण प्रबन्ध किया था कि जब तक कोई व्यक्ति
बन्दूक लेकर सामना करने न आये या मुकाबले में गोली न चले, तब
तक किसी आदमी पर फायर न होने पाये। मैं नर -हत्या कराके डकैती
को भीषण रूप नहीं देना चाहता था। फिर भी मेरा कहा न मानकर
अपना काम छोड़ गोली चला देने का यह परिणाम हुआ। गोली चलाने
की ड्यूटी जिनको मैंने दी थी, वे बड़े दक्ष तथा अनुभवी मनुष्य थे।
उनसे भूल होना सम्भव न था। उन लोगों को मैंने देखा था कि वे
अपने स्थान से पाँच मिनट बाद पाँच फायर करते थे। यही मेरा आदेश
था।''¹
कार्य को परिणाम तक पहुँचाने का उपक्रम सुनियोजित तरीके से हो
रहा था। दो व्यक्ति घास में पगडंडियों के पास तो थे ही, जो ट्रेन की
निगरानी कर रहे थे। बाकी सदस्य खजाने वाले डिब्बे में घुस गये और
धक्का देकर खजाने के सन्दूक को डिब्बे से नीचे गिरा दिया। सभी उसे
तोड़ने लगे। सन्दूक इतना मजबूत था कि टूटने का नाम ही नहीं ले रहा
था। हाँ बार-बार प्रहार से उसमें छेद अवश्य हो गया था। गार्ड या किसी
अन्य के पास चाबी होती तो खोलने की समस्या हल हो जाती, किन्तु
गाड़ी में किसी के पास चाबी नहीं थी।² तरीका यह था कि प्रत्येक स्टेशन
मास्टर अपना थैला लाकर उस सन्दूक में डाल जाता था। यदि कोई
उसमें थैला डालना चाहे तो डाल सकता है किन्तु कोई उसमें से निकाल
नहीं सकता। उसकी बनावट ही ऐसी होती है।³ .....घन पर घन बरसते
रहे परन्तु प्रयास व्यर्थ ही रहा। अशफाक उल्ला पहरा देने वाले व्यक्तियों
में थे और जब उन्होंने देखा कि यह दशा तो उचित परिणाम तक नहीं
पहुंचाएगी तो पिस्तौल मन्मथनाथ गुप्त को दे दी
1.अशफाक उल्ला खां, भवान सिंह राणा - पृष्ठ -66
2.भारतीय क्रांतिकारी आन्दोलन का इतिहास, मन्मथनाथ गुप्त, पृष्ठ -210
3.भारतीय क्रांतिकारी आन्दोलन का इतिहास, मन्मथनाथ गुप्त, पृष्ठ -210
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और घन लेकर जुट गये। अशफाक सभी सदस्यों से बलिष्ठ थे,
इसलिए थोड़ी देर में सुराख बड़ा हो गया और रूपये से भरी थैलियां बाहर
निकालकर चादर में बाँध दिया गया।........और इसी वक्त कोई दूसरी
गाड़ी आ गयी तो क्रांतिकारियों की मनोदशा क्या रही होगी, अनुमान
लगाना कठिन है। इसका वर्णन स्वयं मन्मथनाथ गुप्त ने किया है -'इस
समय जबकि सफलता बिल्कुल सामने थी। एक गाड़ी की आवाज आती
हुई सुनाई पड़ी। हाँ इसमें कोई संदेह नहीं था कि गाड़ी हमारी तरफ आ
रही थी। भला यह कैसी गाड़ी थी? यह कैसे हो गया कि अगले स्टेशन
पर हमारी खबर पहुँच गयी। यह सम्भव नहीं था, तो क्या इसके मायने
यह हुआ कि किसी ने विश्वासघात किया? अन्य कितने ही प्रश्न हमारे
मन में कौंध गये। सम्भव है कि यह सैनिक गाड़ी है। यह सम्भावना
करीब-करीब जम गयी। .......अब हमारे नेता लोहे के सन्दूक के पास आ
गये। हमने उनकी तरफ देखा। वे बिल्कुल स्थिर खड़े थे और अन्य सब
लोगों की तरह एकाग्र होकर ट्रेन की तरफ देख रहे थे। ऐसा लगा कि
ट्रेन के यात्रियों में भी थोड़ी-बहुत सुगसुगाहट हो रही थी। हम चाहते तो
उस वक्त अंधेरे में लुप्त हो सकते थे, पर हमने फैसला किया कि अब जो
कुछ भी हो, उसका सामना करना ही है। अधिक से अधिक यह हो
सकता था कि दोनो तरफ से गोलियों की बौछारें हों और हम लोग सब
मारे जाएं। पर जबकि हम पर खतरा आ चुका था, हमें बिल्कुल डर नहीं
लग रहा था। क्या यह बात सच नहीं है कि हम मौका मिलने पर वीरता
का आदर्श पेश करना चाहते थे। हमने हाथों में अपने अस्त्रों को कसकर
पकड़ लिया और आती हुई रेलगाड़ी की तरफ देखने लगे। अशफाक
हथौड़ा चलाकर अपना काम आगे बढ़ा रहे थे और छेद करीब-करीब इतने
बड़े हो गये थे कि सन्दूक में पड़ी थैलियां निकाली जा सकती थीं। इस
समय हथौड़े की चोट के अलावा बाकी सब लोग शान्त थे।
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यात्रियों को ट्रेन के अन्दर रखने के लिए बराबर गोलियां दागी जा
रही थी।''¹ मन्मथ नाथ गुप्त ने आगे भी इसका वर्णन करते हुए लिखा
है - ‘‘हिमगिरी की तेजी से रेल हमारी तरफ दौड़ी आ रही थी। रेल की
आवाज चारो तरफ छाई हुई थी। आखिर क्या होने वाला है? मृत्यु ?
कौन जानता है क्या होगा? पर अब हमें कोई भय नहीं था। उसी समय
राम प्रसाद ने देखा कि जहाँ हम खड़े थे, वहाँ डबल लाइन थी। एकाएक
उनको याद आया कि पंजाब मेल आ रही है और इसमें कोई संदेह नहीं
था कि यह रात वाली पंजाब मेल थी। उन्होंने यह बात हमें बता दी।
हमारे नेता सामने मौजूद थे। उनकी तात्कालिक बुद्धि बड़ी प्रखर थी।
उन्होंने इससे पहले खतरों की स्थिति से निकाला था। क्या यह बात सच
नहीं थी कि इससे पहले हर मौके पर उन्होंने इससे भी गम्भीर स्थिति में
सही फैसले किये थे। शायद वे हमसे कहें कि लौट चलो या कहें कि पास
के पेड़ों के पीछे हो जाओ और वहाँ से जबरदस्त मोर्चा सम्भालो।‘’
‘‘आती हुई गाड़ी पास पहुँचने ही वाली थी। ऐसे मौके पर बिस्मिल ने
हमसे कहा कि हम अपने अस्त्रों को छिपा लें। उससे यह होगा कि यदि
कोई गाड़ी से झाँकेगा, तो हम लोगों को साधारण भटके हुए यात्रियों के
रूप में देखेंगे। उन्होंने अशफाक को इस प्रकार खड़े होने के लिए कहा
मानो वे कोई दृश्य देख रहे हों। गाड़ी बहुत तेजी से आ रही थी और
चारो तरफ उसका शोर था। एक लम्हे के अन्दर गाड़ी हमारे सामने से
निकल गयी और सारी स्थिति एक दुः स्वप्न की तरह होकर चली गयी।
अब वह एक गोली की तरह अगले स्टेशन की ओर जा रही थी। हमारे
चेहरों पर तथा हमारी गाड़ी पर तेज रोशनी गिरी, बहुत जोर से दोनों
गाड़ियों की हवाएं टकरायीं और देखते-देखते सब खत्म हो गया। इस
प्रकार यह खतरा टल गया
- अशफाक उल्ला खां, भवान सिंह राणा, पृष्ठ-67
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और हर मिनट उस गाड़ी का शब्द धीमा होता चला गया।''¹
अशफाक उल्ला खां का कृतित्व ही ऐसा था कि जहां बल का काम
हो बिना अशफाक के सम्भव कहाँ। अशफाक के पास भीमबल था।
अनेक इतिहासकारों, टिप्पणीकारों ने उनके इस अद्भुत बल शौर्य का
बखान किया है। ............रेल रोकने और तिजोरी लूटने में मात्र दस
मिनट का समय लगा होगा। यह अशफाक के कारण ही हुआ कि कार्य
में सफलता मिली। यह भी ज्ञातव्य है कि उसी ट्रेन में चौदह पुरुष ऐसे थे,
जिनके पास बन्दूके थीं या रायफलें थीं। दो सशस्त्र अंग्रेजी फौजी जवान
भी थे परन्तु सब शान्त रहे। ड्राइवर और इंजीनियर का बुरा हाल था। ये
दोनों अंग्रेज थे। ड्राइवर महाशय इंजिन में लेट गये थे और इंजीनियर
साहब पाखाने में जा छिपे थे।² मुसाफिर भी डरे थे, वे समझ बैठे थे कि
गाड़ी को लगभग चालीस आदमियों ने घेर लिया है। केवल दस युवकों
ने इतना बड़ा काण्ड कर डाला। साधारण रूप से विश्वास नहीं होता था,
लेकिन यह सत्य था कि राम प्रसाद बिस्मिल के कुशल नेतृत्व में और
अशफाक के भीमबल के कारण खजाना लूट लिया गया और इस
असाधारण कार्य को परिणाम तक पहुँचा दिया गया। रूपये की थैलियों
को बाँध लेने के बाद बिस्मिल ने सभी सदस्यों को सावधान किया कि वे
स्थान को अच्छी तरह देख लें कि कोई वस्तु छूट तो नहीं गयी। इसके
बावजूद एक सदस्य अपनी चादर वहीं भूल आया था। यात्रियों को धोखा
देने के लिए क्रांतिकारी पहले तो विपरीत दिशा में भागे परन्तु झाड़ियों में
लुप्त होने के बाद सभी एक साथ लखनऊ की ओर मुड़ गये। लूटे हुए
रूपये चमड़े के थैलों में थे। रास्ते में ये रूपये निकाल लिए गये और
थैलों को खाली ही बरसात में रुके हुए पानी के गड्ढों में डाल दिये।
- अशफाक उल्ला खाँ, भवान् सिंह राणा, पृष्ठ -68
- राम प्रसाद बिस्मिल, रचनावली सम्पादक, दिनेश शर्मा, पृष्ठ -3
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इसके बाद सभी युवक चौक की ओर से लखनऊ शहर में प्रवेश
किये। क्रांतिकारियों ने शहर में इस रास्ते से प्रवेश इसलिए किया कि कोई
संदेह नहीं कर सकता था। रात्रि में अन्य स्थानों से जाने पर शक पैदा
हो सकता था और यह इलाका वेश्याओं का था और इधर रात भर चहल-पहल
रहती थी।
दल के नेता बिस्मिल पर संगठन की अर्थव्यवस्था का भार था।
लखनऊ पहुँचने पर राम प्रसाद बिस्मिल ने समस्त धनराशि अपने किसी
विश्वसनीय व्यक्ति के पास छिपा दी थी। इस विषय में अन्य किसी
सदस्य को जानकारी नहीं थी। इस कार्य के बाद सभी सदस्य
अपने-अपने परिचितों के यहाँ चले गये। चन्द्रशेखर आजाद और मन्मथ
नाथ गुप्त का लखनऊ में कोई परिचित नहीं था और वे एक पार्क में
जाकर सो गये।¹ इस काण्ड की सूचना समाचार पत्रों को रात्रि में ही मिल
गयी थी। मन्मथनाथ गुप्त ने लिखा है - ''जब प्रातः काल भक्तगण
गोमती में स्नान करने के लिए जा रहे थे, इस समय हम अपने गुप्त
स्थानों से प्रकट हुए। थोड़ी देर में हम सड़क की बढ़ती हुई जनता में
मिल गये। इसके बाद हमने सुना कि उस समय लखनऊ के प्रसिद्ध
'इण्डियन डेली टेलीग्राफ' के हॉकर जोर-जोर से चिल्ला रहे थे - 'काकोरी
के पास सनसनीपूर्ण ट्रेन डकैती।' मैंने इस अखबार की एक प्रति खरीदी
और प्रातः काल की धुँधली रोशनी में इस घटना की कई कालमों की
विस्तृत अजीबोगरीब रिपोर्ट पढ़ी। इस रिपोर्ट से हमें ज्ञात हुआ कि तीन
व्यक्ति, जिसमें एक गोरा भी था, मारे गये। हमें इन हत्याओं के संबंध में
कुछ पता नहीं था। चूँकि उस समय मैं एक आतंकवादी ऐडवेन्चरिस्ट था।
इसलिए मैंने इस खबर का स्वागत किया, कि इस अवसर पर एक गोरा
मारा गया है, किन्तु दो भारतीयों की हत्या से मुझे दुः ख हुआ।
- अशफाक उल्ला खां, भवान सिंह राणा, पृष्ठ-71
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........मैंने उस समय जो कुछ सोचा और अनुभव किया उसी का सच्चा
चित्र पाठकों के सम्मुख रख रहा हूँ। किन्तु इस स्थल में यह भी बता रहा
हूँ कि ‘इंडियन डेली टेलीग्राफ' की दी हुई खबर बिल्कुल गलत थी। बाद
में हमें ज्ञात हुआ कि कोई गोरा नहीं मारा गया। .....जहां तक गोरे के
मारे जाने का सम्बन्ध है, तथ्य कुछ और ही निकला। जिस गोरे के
विषय में यह बात कही गई थी, वह पलटन का मेजर या कर्नल था।
जिस समय गोली चल रही थी, उस समय उसने अपने डिब्बे के सारे
दरवाजे बन्द कर लिये थे और शौचालय के अन्दर अपने को बन्द कर
लिया था। जब गाड़ी लखनऊ पहुंची, तभी यह गोरा अपने को सुरक्षित
स्थान से निकाला।’’¹
‘‘अशफाक की बात सही निकली। ट्रेन डकैती सर्वशक्तिमान ब्रिटिश
सरकार के प्रति एक चुनौती थी और सरकार ने इसे इसी रूप में लिया
भी। पुलिस फौरन समझ गयी थी कि यह एक राजनैतिक डकैती है।
पहले पुलिस यदा-कदा हमारी खबर जान लिया करती थी, किन्तु अब
दिन-रात हमारे पीछे खुफिया चलने लगे। दो खुफिया दिन-रात मेरे
इर्द-गिर्द रहने लगे।’’²
काकोरी काण्ड से संगठन को अवश्य ही कुछ आर्थिक लाभ हुआ।
पहली बात तो यह थी कि दल के सदस्यों का आत्मविश्वास बढ़ा, वे
साहस से भर गये। उन्हें अपने ऊपर विश्वास हो गया कि वे भविष्य में
ऐसी बड़ी घटना को अंजाम दे सकते हैं। दूसरा लाभ यह हुआ कि संगठन
के ऊपर जो ऋण हो गया था, उसे चुका दिया गया। नये अस्त्र-शस्त्र हेतु
भी रूपये भेजे जाने लगे। तीसरा लाभ यह रहा कि प्रत्येक केन्द्र की
व्यवस्था को सुचारु रूप से चलाने के लिए और उसकी व्यवस्था हेतु नये
कार्यकर्ताओं को भी भेज दिया गया। अब अर्थ आड़े नही आ रहा था।
- जांबाज पत्रिका, मन्मथनाथ गुप्त, पृष्ठ -7
- जांबाज पत्रिका, मन्मथनाथ गुप्त, पृष्ठ-7
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संगठन के सभी सदस्य प्रसन्न थे। राम प्रसाद बिस्मिल एक नये
उत्साह के साथ संगठन को फिर से सशक्त बनाने में जुट गये। दुर्भाग्य
ही था कि सभी लाभ क्षणिक सिद्ध हुए। पुलिस भी सक्रिय हो गयी थी
और संगठन में भी दरार पड़ गयी थी। बिस्मिल को अन्त तक इसका
गहरा दुः ख रहा। स्वयं बिस्मिल ने लिखा है - ''मैं इस विषय में कुछ
भी न जान सका कि दूसरे देश में क्रांतिकारियों ने अपनी आरम्भिक
अवस्था में हम लोगों की भाँति प्रयत्न किया था या नहीं। यदि पर्याप्त
अनुभव होता, तो हम इतनी साधारण भूलें ना करते। त्रुटियों के होते हुए
भी ना बिगड़ता, और ना कुछ भेद खुलता, ना ही इस अवस्था को
पहुँचते, क्योंकि मैंने जो संगठन बनाया था, उसमें किसी भी ओर से मुझे
कमजोरी नहीं दिखाई देती थी। कोई भी किसी प्रकार की त्रुटि नहीं समझ
सकता था। इसी कारण आँख बन्द किये बैठे रहे, किन्तु आस्तीन में साँप
छिपा हुआ था, ऐसा गहरा मुँह मारा कि चारों खाने चित्त कर दिया।
''जिन्हें हम हार समझे थे, गला अपना सजाने को।
वही अब नाग बन बैठे, हमारे काट खाने को।।''
नवयुवकों की आपसी होड़ के कारण आपस में ईर्ष्या-द्वेष फैल रही
थी, जिस कारण रोज कलह हो जाती थी, जो कभी-कभी भयंकर रूप
धारण कर लेती थी। मेरे पास जब कोई मामला आता तो मैं प्रेमपूर्वक
क्रांतिकारी समिति की दशा का अवलोकन कराके उन सबको शान्त कर
देता था। कभी-कभी नेतृत्व को लेकर भी वाद-विवाद चल जाता था। एक
केन्द्र कें निरीक्षक से वहां के कार्यकर्ता अत्यन्त असंतुष्ट थे। क्योंकि
निरीक्षक से अनुशासनहीनता के कारण कुछ भूलें हो गयी थीं। इस
अवस्था को देखकर मुझे बड़ा दुः ख तथा आश्चर्य हुआ, क्योंकि नेतागीरी
का भूत सबसे ज्यादा भयानक होता है। जिस समय यह भूत खोपड़ी पर
सवार होता है, उसी समय सब काम चौपट हो जाता है। केवल एक दूसरे
के दोष देखने में ही समय व्यतीत होता है और वैमनस्य बढ़कर बड़े
भयंकर परिणामों का उत्पादक होता है।
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इस प्रकार के समाचारों को सुनकर मैंने सबको एकत्रित कर खूब
फटकारा। उस समय सब अपनी त्रुटि समझकर पछताए और प्रेमपूर्वक
आपस में मिलकर सारे कार्य करने लगे। पर ऐसी अवस्था हो गयी थी
कि दल गुटबन्दी का शिकार हो गया था। इस पर भी मुझ पर सबकी
श्रद्धा थी और मेरी बात को सब मान लेते थे। इतना सब कुछ होने पर
भी मुझे किसी प्रकार का संदेह न था। किन्तु परमात्मा को ऐसा ही
स्वीकार था, जो इस अवस्था का दर्शन करना पड़ा।''¹
काकोरी काण्ड से अशफाक का कृतित्व स्पष्ट होकर दिखता है।
अशफाक की दूरदर्शिता और उनका भीमबल निश्चित ही दृष्टिगत होता है।
अब पछतावा होता है कि काश अशफाक इस काण्ड से अपने को रोक
लिए होते। अशफाक के एक-एक कथन सत्य साबित हो रहे थे और
निश्चित ही क्रांतिकारी अपने पैरों में कुल्हाड़ी मार चुके थे। यह जोश में
आकर होश खोने जैसा था। अशफाक ही एक ऐसे क्रान्तिकारी व्यक्ति थे,
जो हमेशा सचेत रहते थे, उनके लिए जोश में आकर होश खोने वाली
कोई बात नहीं थी। बाद के इतिहास ने सिद्ध कर दिया कि अशफाक सही
थे और अन्य क्रांतिकारियों का निर्णय नितांत आत्मघाती था। बहुमत की
बात भले हो किन्तु यह सत्य हो अथवा उचित हो कोई आवश्यक नहीं है।
बहुमत से अल्पमत या एक व्यक्ति की बात भी सत्य अथवा कल्याणकारी,
उपयोगी सिद्ध होती है। .............निश्चित ही हमें अशफाक के मानसिक बल की
भी पहचान होती है।
- अशफाक उल्ला खाँ, भवान सिंह राणा, पृष्ठ-73
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अध्याय-सात
अध्याय-सात
काकोरी काण्ड के बाद की स्थिति का अध्ययन
जांच : काकोरी काण्ड को सरकार ने एक खुली चुनौती के रूप में
लिया। सरकार पूरी तरह सावधान हो गयी। सरकार के दो महत्वपूर्ण
विभाग सक्रिय हो गये, ये विभाग थे पुलिस और गुप्तचर विभाग। ऐसी
रोमांचकारी घटना पहले कभी सुनी नहीं गयी थी। अतः सबका चकित
होना स्वाभाविक। इसमें किसी मुसाफिर को लूटने का प्रयास नहीं किया
गया था। लखनऊ के मुख्य चीफ कोर्ट के प्रधान न्यायाधीश ने अपने
फैसले में इस डकैती को भारत की अनोखी डकैती बतलाया।¹
यह घटना सरकार के लिए एक चुनौती थी। इस ट्रेन डकैती का
पता लगाने के लिए सरकार द्वारा हार्टन की अध्यक्षता में एक विशेष
पुलिस इकाई गठित की गयी। सरकार के सौभाग्य से हार्टन को सफलता
मिलने लगी थी।² घटना स्थल पर मिले साक्ष्यों से रेलवे पुलिस की
रिपोर्ट का अध्ययन करने के बाद यह जांच दल इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि
यह कार्य क्रांतिकारियों का ही हो सकता है। सरकार इसे राजनैतिक डकैती
मानती थी। मन्मथनाथ गुप्त ने लिखा है- ''अशफाक ने जो भविष्यवाणी
की थी, वह सत्य ही सिद्ध हुई। हमने जो कहा था कि हम सरकारी
खजाना लूटना चाहते हैं, किसी यात्री से लूटमार करना हमारा उद्देश्य
नहीं है, उससे हमारा राजनीतिक रूप सामने आ गया था। यों तो पुलिस
वाले बड़े आलसी और धीरे काम करने वाले होते हैं, पर इस सूचना से
उनमें बिजली सी दौड़ गयी।'' स्पष्ट है कि क्रांतिकारी पुलिस वालों को
मूर्ख और अयोग्य समझते थे और
- पूर्वो, बनारसी दास चतुर्वेदी, पृष्ठ -11
2.स्वतंत्रता आन्दोलन में जनपद शाहजहाँपुर का योगदान, एन०सी०मेहेरोत्रा, पृष्ठ 121
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