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अमर शहीद अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ: व्यक्तित्व और कृतित्व (काकोरी के अमर शहीद का जीवन व रचनाएँ)

अमर शहीद अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ: व्यक्तित्व और कृतित्व (काकोरी के अमर शहीद का जीवन व रचनाएँ)

Amar Shaheed Ashfaqulla Khan: Personality & Works

अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ 'वारसी' (सम्पादक: बनारसीदास चतुर्वेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished297 पृष्ठ

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काकोरी काण्ड की योजना का अंतिम चरण
और अशफाक का एक बार पुन: विरोध-
काकोरी नामक स्थान का चयन तो हो ही गया था। काकोरी
लखनऊ जिले का छोटा सा गांव है। इस गांव का कोई खास मतलब भी
नहीं था। काकोरी नाम से रेलवे का छोटा सा स्टेशन भी है। विचार
किया गया कि इसी छोटे स्टेशन पर गाड़ी खड़ी होने पर तुरन्त स्टेशन
तथा वहां स्थित तारघर पर अधिकार कर लिया जाए और गाड़ी का
सन्दूक उतारकर उसे तोड़ डाला जाए। इस कार्य सम्पादन के पश्चात् जो
कुछ भी प्राप्त हो, उसे लेकर तुरन्त भाग लिया जाये। अन्ततः कार्यक्रम
बिल्कुल स्पष्ट हो गया। किन्तु अभी भी कई बातें तय होनी थीं। कार्यक्रम
यह था कि किस स्टेशन पर क्रांतिकारी चढ़ेंगे और किन दो स्थानों के
बीच में जंजीर खींचकर गाड़ी खड़ी करेंगे। यह भी तय हुआ कि गाड़ी
खड़ी करके लोहे का सन्दूक खींच कर बाहर निकाल लिया जाये और उस
पर कब्जा कर लिया जाय। प्रतिदिन सारे स्टेशनों पर जो आमदनी होती
थी, उसे आठ नम्बर की डाउन ट्रेन लेकर लखनऊ हेड आफिस में पहुंचती
थी। योजना यह थी कि सदस्य किसी दिन इसी गाड़ी पर किसी स्टेशन
पर सवार हो जायें और दो स्टेशनों के बीच गाड़ी रोक ली जाय। पहले
यह योजना बनी थी कि किसी स्टेशन पर ही रोककर खजाने को लूटा
जाय। इस हेतु लखनऊ में छेलालाल धर्मशाला में क्रांतिकारी ठहरे थे।¹ ये
सभी सदस्य टोली के रूप में नहीं वरन् एक-दूसरे से अपरिचित बनते हुए
अलग-अलग व्यक्तियों के रूप में ठहरे थे। निश्चित तिथि को अपने-अपने
गुप्त स्थानों पर ठहरे हुए थे। योजना भी यही थी कि गाड़ी खड़ी होने
पर स्टेशन मास्टर को पकड़ लें। सभी क्रांतिकारी लखनऊ के अगले
स्टेशन के लिए पैदल ही चल

  1. जाँबाज (पत्रिका) - मन्मथनाथ गुप्त - पृष्ठ-3
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