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अमर शहीद अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ: व्यक्तित्व और कृतित्व (काकोरी के अमर शहीद का जीवन व रचनाएँ)

अमर शहीद अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ: व्यक्तित्व और कृतित्व (काकोरी के अमर शहीद का जीवन व रचनाएँ)

Amar Shaheed Ashfaqulla Khan: Personality & Works

अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ 'वारसी' (सम्पादक: बनारसीदास चतुर्वेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished297 पृष्ठ

पृष्ठ 127, कुल 297 में से

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अब भी लौट चलो। पर उनका कहना-सुनना बेकार ही गया। पं० राम
प्रसाद बिस्मिल ने मुझे (मन्मथनाथ) बुलाकर कहा कि अशफाक को
समझाओ और उसे बताओ कि लोग उसके विरोध के कारण उसे क्या-क्या
कह रहे हैं। .............मैंने अशफाक को यह बताया कि ऐन मौके पर पहुंच
कर तुम जो विरोध कर रहे हो, उसकी प्रतिक्रिया साथियों पर बड़ा खराब
असर डालेगी। वे तुम्हें डरपोक कहने लगे हैं। दरअसल हमारे कई साथी
कह रहे थे कि अशफाक डर गया है। पं० राम प्रसाद बिस्मिल भी यही
सोच रहे थे कि तुम डर गये हो। परन्तु अशफाक की एक ही रट थी कि

  • लौट चलो, यह काम नहीं होना चाहिए।\’\’¹
    <u>काकोरी ट्रेन डकैती-</u>
    संध्या होने वाली थी। आसमान बादलों से घिरा था। वह रात होने
    वाली थी, जिसका जिक्र किये बिना कोई क्रांतिकारी इतिहास पूरा नहीं
    होता। छिट-पुट बूँदा-बांदी भी हो रही थी। गाड़ी चार बजे शाम को आई
    और सभी सवार हो गये। सुधीर विद्यार्थी ने लिखा है - ‘आज उन्हें
    अपने लक्ष्य की ओर जाना था। वे सिर पर कफन बांधकर एक
    शक्तिशाली साम्राज्य को चुनौती देने निकल पड़े थे। गिनती में सिर्फ दस
    थे वे, पर उनके इरादे ऊँचे और मजबूत थे। वे देश की आजादी के लिए
    क्रांति के इस रास्ते पर सीना तानकर चले थे। इसलिए आज उन्हें अपने
    अभियान पर नाज था।² क्रांतिकारी अपने औजार और हथियार को लिए
    गाड़ी में सवार हो चुके थे। तीन व्यक्ति सेकेण्ड क्लास के डिब्बे में सवार
    हुए थे, इस कार्य हेतु अशफाक उल्ला खां, राजेन्द्र लाहिड़ी और शचीन्द्र
    नाथ बख्शी को चुना गया था।
    1- अशफाक उल्ला खाँ, भवान सिंह राणा, पृष्ठ -64
    2- अशफाक उल्ला खां और उनका युग, सुधीर विद्यार्थी, पृष्ठ-37
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