अमर शहीद अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ: व्यक्तित्व और कृतित्व (काकोरी के अमर शहीद का जीवन व रचनाएँ)
Amar Shaheed Ashfaqulla Khan: Personality & Works
अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ 'वारसी' (सम्पादक: बनारसीदास चतुर्वेदी) द्वारा
पृष्ठ 126, कुल 297 में से
संदर्भ में पढ़ेंपड़े किन्तु अभी वे अगले स्टेशन के सिग्नल के पास भी नहीं पहुँच पाये
थे कि गाड़ी निकली चली जा रही है, जिसमें खजाना लूटा जाना है।
मन्मथ नाथ गुप्त लिखते हैं कि - 'हमें इससे गहरी निराशा हुई, उसकी
कल्पना आसानी से नहीं की जा सकती।' यह देरी खल गयी और
क्रांतिकारी पैदल ही लखनऊ लौट आये। फिर पता किया गया कि यह
गाड़ी 8 डाउन ही थी कि नहीं। पता चला कि वह गाड़ी 8 डाउन ही
थी। मुकुन्दी लाल के अनुसार - 'इसी प्रकार दो दिन असफलता का मुंह
देखना पड़ा था। दो दिन तक लगातार कोशिशों के बावजूद वह असफल
रहे। तीसरे दिन 9 अगस्त, 1925 को हमारे साथी योजना में आखिर
कामयाब हो गये'। स्पष्ट है कि क्रांतिकारी इस कार्य हेतु 7 और 8 अगस्त को
प्रयत्नशील रहे। ................और अभियान में सफलता नहीं मिली। दो दिन
की असफलता के बाद दल शाहजहांपुर चला गया था। इस संबंध में
मन्मथनाथ गुप्त ने लिखा है - 'हम लोग 9 तारीख की संध्या समय
शाहजहांपुर में हथियार छेनी, घन, हथौड़े आदि से लैस होकर गाड़ी पर
सवार हो गये।'¹ स्टेशन पर खजाना लूटने की योजना को त्याग दिया
गया था क्योंकि इस कार्य हेतु अधिक लोगों की आवश्यकता थी। अतः
यह योजना बन गयी कि अब दो स्टेशनों के बीच में गाड़ी रोककर
खजाना लूटा जाय और इसी कार्य हेतु दल के सदस्य ट्रेन में सवार हुए
थे। अशफाक ने अपने साथियों से खूब विरोध जताया। यह उनका
अन्तिम प्रयास था। बिस्मिल दल के नेता थे, अशफाक बार-बार उन्हें
समझाते, परन्तु बिस्मिल के सिर पर तो कुछ और जुनून सवार था, वे
समझा-बुझा कर अशफाक को शांतकर देते थे। मन्मथ नाथ गुप्त ने
लिखा है - ''9 अगस्त 1925 को ट्रेन डकैती का निश्चय किया गया था।
हम लोग जब दस आदमी काकोरी स्टेशन पहुँचे, उस समय भी अशफ़ाक यही कहते
रहे कि राम प्रसाद मेरी बात मान जाओ।
- भारतीय क्रांतिकारी आन्दोलन का इतिहास, मन्मथनाथ गुप्त, पृष्ठ -209
99