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अमर शहीद अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ: व्यक्तित्व और कृतित्व (काकोरी के अमर शहीद का जीवन व रचनाएँ)

अमर शहीद अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ: व्यक्तित्व और कृतित्व (काकोरी के अमर शहीद का जीवन व रचनाएँ)

Amar Shaheed Ashfaqulla Khan: Personality & Works

अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ 'वारसी' (सम्पादक: बनारसीदास चतुर्वेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished297 पृष्ठ

पृष्ठ 120, कुल 297 में से

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जनता को क्रांतिकारियों के इस संगठन से परिचित होने का अवसर
मिला। इन सब गतिविधियों और आर्थिक संकटों से जूझते आगे बढ़ते हुए
प्रमुख क्रांतिकारी राम प्रसाद बिस्मिल एक दिन शाहजहांपुर से लखनऊ
यात्रा कर रहे थे। वे डिब्बे के बाहर आये। वे गार्ड के पास वाले डिब्बे में
ही बैठे थे। जब स्टेशन पर गाड़ी रुकी तो स्टेशन मास्टर एक थैली लाया
और गार्ड के डिब्बे में डाल दिया। कुछ खटपट की आवाज हुई। राम
प्रसाद ने देखा कि एक लोहे का संदूक रखा है। उन्होंने अनुमान लगा
लिया कि इसी में थैली डाली होगी। अगले स्टेशन पर भी थैली डाली
गयी। लोहे का संदूक गार्ड के डिब्बे में जंजीर से बंधा था और ताला भी
पड़ा था। यह सब राम प्रसाद ने अनुमान ही लगाया। कुछ दिनों के बाद
राम प्रसाद को लखनऊ स्टेशन पर जाने का अवसर प्राप्त हुआ। राम
प्रसाद ने देखा कि गाड़ी में से कुली लोहे का संदूक (आमदनी वाले
सन्दूक) उतार रहे हैं। पता करने पर राम प्रसाद बिस्मिल को ज्ञात हुआ
कि इस सन्दूक में जंजीर ताला कुछ नहीं पड़ता, यूं ही रखा जाता है।
राम प्रसाद ने उसी समय निश्चय किया कि इसी पर हाथ मारूँगा।¹ धुन
सवार हो गयी। राम प्रसाद ने तुरन्त जाकर टाइम-टेबुल देखा और
अनुमान लगाया कि सहारनपुर से गाड़ी चलती है, लखनऊ तक निश्चित
ही दस हजार रू० की आमदनी होती है। बिस्मिल ने अब दृढ़ निश्चय कर
लिया कि अब वे इस खजाने को लूटकर रहेंगे। उन्होंने अपना विचार दल
के अन्य सदस्यों को बता दिया। काफी बहस-विमर्श के बाद तय हुआ था
कि रेल खजाना ही लूटा जाय।

  1. राम प्रसाद बिस्मिल, पूर्वो, पृष्ठ-88

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