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अमर शहीद अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ: व्यक्तित्व और कृतित्व (काकोरी के अमर शहीद का जीवन व रचनाएँ)

Amar Shaheed Ashfaqulla Khan: Personality & Works

अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ 'वारसी' (सम्पादक: बनारसीदास चतुर्वेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished297 पृष्ठ

अशफाक उल्ला उनमें प्रमुख थे, पर यह समझना गलत होगा जैसा
कि श्री शचीन्द्र नाथ जिन्हें उनके साथ हवालात में लम्बी अवधि तक रहने
का मौका मिला था, का कहना है कि अशफाक उल्ला स्वयं ही कोशिश
करके क्रांतिकारी दल में आये थे। उनका जन्म एक प्रसिद्ध पठान परिवार
में हुआ था उनके भाई भोपाल राज्य में किसी ऊंचे सरकारी पद पर थे।
असहयोग आन्दोलन के समय जो देश व्यापी लहर आयी थी, उसमें
अशफाक की पढ़ाई खत्म हो गयी और उनकी आत्मा कुछ करने के लिए
व्याकुल रहने लगी। उन्हीं दिनों राम प्रसाद फरारी से लौटकर आये थे
और अशफाक उल्ला ने किसी न किसी तरह उनसे परिचय प्राप्त किया
था।¹ चाहे जो हो अशफाक पूर्ण रूप से समर्पित क्रांतिकारी सदस्य बन
गये थे। अशफाक का क्रांतिकारी दल में सम्मिलित होना एक मुस्लिम
परिवार का होने के कारण एक नया अध्याय जोड़ता है।
अशफाक उल्ला खाँ ने निश्चित ही यह बता दिया कि वे एक ऐसा
समाज चाहते हैं जहाँ धनी-गरीब एक साथ रह सकें। शोषण रहित समाज
की उन्होंने कल्पना की थी। समाजवादी विचारधारा से पोषित अशफाक के
चिन्तन में स्वतंत्र भारत की एक तस्वीर थी। अवश्य ही अशफाक को
समझना भारत की संस्कृति और इतिहास की झलक पाना है। यही नहीं
हिन्दू-मुस्लिम या इसी प्रकार की अन्य प्रदूषित भावनाओं से दूर मानवी
हित की बात अशफाक ने की है। वे एकता के समर्थक थे। अपने विचारों
में उन्होंने एक स्थान पर लिखा भी है - ‘‘मैं हिन्दुस्तान की ऐसी
आजादी का ख्वाहिशमन्द हूँ, जिसमें गरीब खुश और आराम से रहते और
सब बराबर के होते।

  1. अशफाक उल्ला खाँ, भवान सिंह राणा, पृष्ठ -44
    87

क्रांतिधर्मी अशफाक ने शहीद भगत सिंह से पहले कहा था कि अगर
हिन्दुस्तान आजाद हुआ और बजाए हमारे गोरे आकाओं के हमारे वतनी
भाई सल्तनत व हुकूमत की बागडोर अपने हाथ में लेते और तफरी को
तमीज, अमीर व गरीब, जमींदार व काश्तकार में रहें तो ऐ खुदा, मुझे
ऐसी आजादी उस वक्त तक न देना जब तक मेरी मखलूक में मसावात
(बराबरी) कायम न हो जाय।’’$^1$
अशफाक क्रांतिकारी जीवन में अपने मित्रों को भी आत्म बलिदान
की प्रेरणा देते थे। समर्पित जीवन के धनी अशफाक के लिए एक मात्र
लक्ष्य था मातृभूमि की स्वतंत्रता, और इसी लक्ष्य की प्राप्ति हेतु एक
महत्वपूर्ण घटना 'काकोरी काण्ड' नाम से घटी जो क्रांतिकारी इतिहास में
महत्वपूर्ण षड्यंत्रों में गिनी जाती है।

  1. जांबाज पत्रिका (लेख), राजेश कुमार मित्तल, पृष्ठ -59
    88

अध्याय-छः

अध्याय-छ:
काकोरी काण्ड
शचीन्द्रनाथ सन्याल का यह कथन सत्य है कि क्रांतिकारियों ने
राष्ट्रीय मुक्ति संघर्ष को आगे बढ़ाने के लिए उत्प्रेरक तथा पूरक भूमिका
निभायी।¹ वे कांग्रेस द्वारा चलाये गये आन्दोलनों में बाधक भी नहीं
बने। विचारधारा भिन्न जरूर थी। क्रान्तिकारियों ने अपने शौर्यपूर्ण कार्यों
व बलिदानों से जनता में राष्ट्रीय चेतना और जुझारू संघर्ष की भावना
जागृत की।
अशफाक क्रांतिकारियों के गुप्त संगठन 'हिन्दुस्तान गणतांत्रिक संघ'
के सक्रिय सदस्य थे। यही एक ऐसा काण्ड था, जिससे अशफाक को दल
की पूर्ण समस्याओं और कार्यप्रणाली से परिचित होने का अवसर मिला।
स्पष्ट था कि क्रांतिकारी संगठनों के पास धन की समस्या थी। कमजोर
अर्थ पक्ष गतिविधियों को प्रभावित कर रहा था। हिन्दुस्तान गणतांत्रिक
संगठन को भी धनाभाव की विषम परिस्थितियों से गुजरना होता था।
आय का कोई अन्य रास्ता न था। यह भी कहा जा सकता है कि आय
के ठोस स्रोत न होने के कारण आर्थिक समस्याएं क्रांतिकारी संगठन की
असफलता का कारण थीं। राम प्रसाद बिस्मिल ने लिखा है कि - “.......
.........जब कार्य प्रारम्भ हो गया और असहयोग को टटोला गया तो वे
आन्दोलन से कहीं अधिक शिथिल हो चुके थे। उनकी आशाओं पर पूरी
तरह पानी फिर चुका था। अपने पास की पूंजी समाप्त हो चुकी थी। घर
में फाकें हो रहे थे। आगे की भी कोई विशेष आशा नहीं थी। कांग्रेस में
भी स्वराज्य दल पर जोर हो गया था। जिनके पास कुछ धन तथा इष्ट
मित्रों का संगठन था, वे कौंसिल तथा असेम्बली के सदस्य बन गये थे।

  1. स्वतंत्रता आन्दोलन में शाहजहाँपुर का योगदान, पृष्ठ-106 - डॉ०एन०सी०
    मेहोत्रा
    89

ऐसी अवस्थाओं में यदि क्रांतिकारी संगठन-कर्ताओं के पास पर्याप्त
धन होता तो वे असहयोगियों को अपने हाथ में लेकर उनसे काम ले
सकते थे। कितना भी सच्चा काम करने वाला हो, किन्तु पेट तो सबका
है।'' स्पष्ट है कि संगठन को धन की आवश्यकता थी और कोई सार्थक
जरिया दिखाई भी नहीं दे रहा था। प्रसिद्ध क्रांतिकारी और संगठन के
प्रमुख राम प्रसाद इस हेतु मुख्य प्रबन्धक शाहजहांपुर हुए। वे संगठन के
महत्वपूर्ण व्यक्ति थे। धन के अभाव में क्रांतिकारी किसी कार्य को
परिणाम तक पहुंचाने में असफल हो रहे थे। हथियार बढ़ाने, सदस्यों की
संख्या अधिक करने, पर्चे आदि हेतु धन की आवश्यकता थी। सदस्यों
द्वारा अर्जित किये गये चंदे का धन पर्याप्त न था।
संगठन के कुछ सदस्यों ने अपने घरों से पैसा लगाया तो किसी ने
चोरी की। बावजूद इसके धन की कमी रहती ही थी। देश को स्वतंत्र
कराने हेतु पर्याप्त धन आये कहां से यह चिन्ता की बात थी।
क्रांतिकारियों से सहानुभूति रखने वालों से सहायता तो मिलती ही थी,
जिसमें प्रमुख थे - पं० मोती लाल नेहरू, उपन्यासकार शरत् चन्द, राजर्षि
पुरूषोत्तम दास टण्डन, अटार्नी जनरल सर एस०एन० सरकार।¹
राम प्रसाद बिस्मिल के नेतृत्व में क्रांतिकारियों ने गांव भी लूटे,
अशफाक भी पूर्णतः सम्मिलित हुए थे। अशफाक ने अपने भाई की
राइफल का उपयोग भी किया। लेकिन जो धन प्राप्त हुआ था, वह मात्र
सौ से दो सौ रूपये तक ही सीमित रहा। राम प्रसाद इन (डकैती) कार्यों
से प्रसन्न नहीं थे। वैसे भी यह धन राष्ट्र की आजादी के लिए ही खर्च
होता था। लेकिन राम प्रसाद बिस्मिल का मत था कि भारतवासी ग्रामीण
जनता को नुकसान पहुंचाने का कोई अधिकार किसी के पास नहीं है
और यह अनुचित है।

  1. अशफाक उल्ला खाँ, भवान सिंह राणा, पृष्ठ -47
    90

राम प्रसाद बिस्मिल पर क्रांतिकारी गतिविधियों का उत्तरदायित्व अधिक
था, लेकिन वे कर भी क्या सकते थे। संगठन को नियमित रूप से
सहायता देने वालों ने भी हाथ खींच लिया था। कई कार्यकर्ताओं के ऊपर
ऋण का बोझ हो चुका था, अनेकों ने खराब आर्थिक स्थिति के कारण
दल से सम्बन्ध विच्छेद कर लिया था।¹ राम प्रसाद बिस्मिल ने अपनी
जिम्मेदारी पर ऋण लेकर जिला कार्यकर्ताओं को मासिक व्यय हेतु धन
दिया किन्तु ऐसा करना हमेशा सम्भव नहीं था। उसी समय बंगाल में
आर्डीनेंस लागू हो गया, जिसके तहत कई कार्यकर्ता तुरन्त बन्दी बना
लिये गये। कार्यकर्ताओं में उदासीनता व्याप्त होने लगी। संगठन पर
भीषण आर्थिक संकट आ गया, जिसका वर्णन बिस्मिल ने इन शब्दों में
किया है- "इस समय समिति के सदस्यों को बड़ी ही दुर्दशा का सामना
करना पड़ रहा था। चने मिलना भी कठिन था। सब पर कुछ-न-कुछ
कर्ज हो गया था। किसी के पास साबुत कपड़े तक न थे। कुछ विद्यार्थी
बनकर धर्म क्षेत्रों तक में भोजन करते थे। चार-पांच सदस्यों ने
अपने-अपने केन्द्र त्याग दिये थे। पांच सौ से अधिक रूपये मैं कर्ज लेकर
व्यय कर चुका था। यह दुर्दशा देखकर मुझे बड़ा कष्ट होने लगा। मुझसे
भरपेट भोजन नहीं किया जाता था। सहायता के लिए सहानुभूति रखने
वालों का द्वार खटखटाया, किन्तु कोरा उत्तर मिला। किंकर्तव्यविमूढ़ था।
कुछ समझ में नहीं आता था। कोमल “दय नवयुवक मेरे चारों ओर
बैठकर कहा करते थे - 'पंडित जी अब क्या करें।' मैं उनके सूखे मुख
को देखकर बहुधा रो पड़ता था कि स्वदेश सेवा का वत लेने के कारण
उनकी फकीरों से भी बुरी दशा हो रही है। एक-एक कुर्ता तथा धोती भी
ऐसी नहीं थी, जो साबुत होती।

  1. अशफाक उल्ला खां, भवान सिंह राणा, पृष्ठ - 47
    91

सारा-सारा दिन लंगोट बांधकर गुजारते थे। अंगोछे पहनकर नहाते थे,
एक समय भोजन करते थे, एक समय दो-दो पैसे का सत्तू खा लेते थे।
मैं पन्द्रह वर्ष से एक समय दूध पीता था। इन लोगों की दशा देखकर
मुझे दूध पीने का जरा भी साहस नहीं होता था। मैं सबके साथ बैठकर
सत्तू खा लेता था। मैंने विचार किया कि इतने नवयुवकों का जीवन नष्ट
करके उन्हें कहां भेजा जाए? जब समिति का सदस्य बनाया था, तो लोगों
ने बड़ी-बड़ी आशा बंधाई थी। कइयों का पढ़ना लिखना छुड़ाकर काम में
लगा दिया था।'"¹
अर्थ का प्रबन्ध करना आवश्यक था। किन्तु कैसे हो प्रबन्ध? प्रश्न
यह था। कोई उपाय न देख डाका डालना ही तय हुआ। किन्तु किसी
व्यक्ति विशेष के यहां डाका डालना उचित नहीं समझा गया। यह भी
सोचना हुआ कि क्यों न सरकारी खजाना ही लूटा जाय। भीषण अभावों
में जीवन यापन करने वाले मातृभूमि के उपासक अपने उद्देश्यों की पूर्ति
में कोई भी अवसर हाथ से जाने देना नहीं चाहते थे। यह क्रांतिकारियों
का ही साहस था कि संगठन के प्रत्येक केन्द्र पर हथियारों का अच्छा
संग्रह तैयार हो गया और सदा अवसर की ताक में रहते कि कुछ कर
दिखायें। अंग्रेजी सत्ता यह सोचने के लिए बाध्य हो जाये कि कोई
चुनौती देने वाला है। योजना के अनुसार एक ही दिन क्रांति के पर्चे
वितरित करने की बात हुई। पर्चों में अंग्रेजी सरकार के विरुद्ध विद्रोह
करने का जिक्र था। यह भी कहा गया कि क्रांतिकारियों के सामने
सोवियत संघ का आदर्श है।² पर्चों के वितरण का कार्य गोपनीयता से
हुआ। किसी को भनक तक न लगी। सरकार हैरान थी और संगठन की
व्यापकता पर आश्चर्य व्यक्त कर रही थी।

  1. अशफाक उल्ला खाँ, भवान सिंह राणा, पृष्ठ-48
  2. अशफाक उल्ला खाँ, भवान सिंह राणा, पृष्ठ-50
    92

जनता को क्रांतिकारियों के इस संगठन से परिचित होने का अवसर
मिला। इन सब गतिविधियों और आर्थिक संकटों से जूझते आगे बढ़ते हुए
प्रमुख क्रांतिकारी राम प्रसाद बिस्मिल एक दिन शाहजहांपुर से लखनऊ
यात्रा कर रहे थे। वे डिब्बे के बाहर आये। वे गार्ड के पास वाले डिब्बे में
ही बैठे थे। जब स्टेशन पर गाड़ी रुकी तो स्टेशन मास्टर एक थैली लाया
और गार्ड के डिब्बे में डाल दिया। कुछ खटपट की आवाज हुई। राम
प्रसाद ने देखा कि एक लोहे का संदूक रखा है। उन्होंने अनुमान लगा
लिया कि इसी में थैली डाली होगी। अगले स्टेशन पर भी थैली डाली
गयी। लोहे का संदूक गार्ड के डिब्बे में जंजीर से बंधा था और ताला भी
पड़ा था। यह सब राम प्रसाद ने अनुमान ही लगाया। कुछ दिनों के बाद
राम प्रसाद को लखनऊ स्टेशन पर जाने का अवसर प्राप्त हुआ। राम
प्रसाद ने देखा कि गाड़ी में से कुली लोहे का संदूक (आमदनी वाले
सन्दूक) उतार रहे हैं। पता करने पर राम प्रसाद बिस्मिल को ज्ञात हुआ
कि इस सन्दूक में जंजीर ताला कुछ नहीं पड़ता, यूं ही रखा जाता है।
राम प्रसाद ने उसी समय निश्चय किया कि इसी पर हाथ मारूँगा।¹ धुन
सवार हो गयी। राम प्रसाद ने तुरन्त जाकर टाइम-टेबुल देखा और
अनुमान लगाया कि सहारनपुर से गाड़ी चलती है, लखनऊ तक निश्चित
ही दस हजार रू० की आमदनी होती है। बिस्मिल ने अब दृढ़ निश्चय कर
लिया कि अब वे इस खजाने को लूटकर रहेंगे। उन्होंने अपना विचार दल
के अन्य सदस्यों को बता दिया। काफी बहस-विमर्श के बाद तय हुआ था
कि रेल खजाना ही लूटा जाय।

  1. राम प्रसाद बिस्मिल, पूर्वो, पृष्ठ-88

93

अशफाक का विरोध : -
रेल का खजाना लूटने की योजना राम प्रसाद बिस्मिल के दिमाग
की उपज थी। यह योजना जब दल के अन्य सदस्यों के सामने रखी
गयी, तो सबने इसे स्वीकार कर लिया और अब पूर्णरूप से रेल खजाना
लूटने की योजना बन गयी। किन्तु अशफाक इस योजना से सहमत नहीं
थे। अशफाक का स्पष्ट रूप से कहना था कि सरकारी खजाने पर धावा
बोलना उचित नहीं है, इसका अर्थ सरकार से सीधी टक्कर लेना है।¹
अशफाक ने नये कदम का डटकर मुकाबला किया। उन्होंने कहा कि जहाँ
तक चुनौती का सम्बन्ध है, इस काम से हम सरकार को चुनौती तो
अवश्य दे देंगे लेकिन पार्टी के अन्त का प्रारम्भ हो जायेगा। उन्होंने
साफ-साफ कह दिया कि अभी पार्टी बहुत कमजोर है और इस काबिल
नहीं है कि सरकार के साथ युद्ध कर सके। अशफाक ने यह भी कहा कि
जिस प्रकार यह प्रस्तावित काम करने का इरादा किया जा रहा है, इससे
फौरन सरकार को संदेह हो जायेगा और जल्द ही सरकार हमारे ऊपर टूट
पड़ेगी।² अशफाक कारण जानते थे कि दल के पास धन भी नहीं हैं और
न अन्य साधन। ऐसी स्थिति में सरकार से टक्कर लेना अपना ही सिर
फोड़ना है। अशफाक ने बहुत प्रयास किया कि उनकी बात मान ली
जाय। अशफाक जानते थे कि यह कार्य अपने पैर में कुल्हाड़ी मारने जैसा
है। लेकिन अशफाक को सफलता न मिली। विरोध सार्थक था और इससे
अशफाक की दूरदर्शिता का पता भी चलता है। वे स्थायित्व में विश्वास
करते थे। वे कोई ऐसा कार्य नहीं चाहते थे, जिससे दल को भारी
नुकसान हो। यह विरोधात्मक स्वर भी अशफाक के व्यक्तित्व ही नहीं
कृतित्व को भी दर्शाता है।


  1. अशफाक उल्ला खाँ, भवान सिंह राणा, पृष्ठ -59
  2. जांबाज (पत्रिका), मन्मथनाथ गुप्त, पृष्ठ-3
    94

क्रांतिकारी दल की मुख्य समिति ने बिस्मिल की योजना को
स्वीकृति दे दी। इसके बाद भी अशफाक बार-बार बिस्मिल को इस कार्य
के सम्भावित घातक परिणामों से सचेत करते रहे। लेकिन अब तो जो हो
गया सो हो गया। अब निर्णय को बदलना बिस्मिल के लिए भी असम्भव
था। अन्त में अशफाक को बिस्मिल ने सहमत कर लिया। अन्ततः
रेलगाड़ी लूटने की योजना बनाई गयी। योजना के प्रत्येक पहलू पर खूब
विचार किया गया। प्रथम चरण में यह निश्चित हुआ कि रेलगाड़ी जब
किसी छोटे स्टेशन पर खड़ी हो तो स्टेशन के तारघर पर अधिकार कर
लिया जाये।¹
अशफाक ने भले ही स्वीकार कर लिया लेकिन उनका भीतरी
व्यक्तित्व इस कार्य हेतु स्वीकृति नहीं देता था। वहीं चन्द्रशेखर आजाद
सबसे अधिक प्रसन्न थे। वे सरकार को खुली चुनौती देते हुए सीधी
टक्कर लेने में विश्वास रखते थे। यही कारण था कि योजना के सबसे
अधिक प्रबल समर्थक चन्द्रशेखर आजाद ही थे। चन्द्रशेखर आजाद जैसी
विचारधारा वाले संगठन के सदस्यों का मत था कि यदि गाड़ी का गार्ड,
ड्राइवर आदि अंग्रेज हुए तो उन्हें भी गोली मार दी जाये। बिस्मिल ऐसे
विचार से कतई सहमत नहीं थे। वे व्यर्थ की हत्या या रक्तपात के विरोधी
थे। अशफाक उल्ला खां तो प्रारम्भ से ही इस प्रकार की डकैती के विरुद्ध
थे।² वे चाहते थे कि क्रांतिकारी जो भी कार्य करें छिपकर करें।
क्रांतिकारी मन्मथ नाथ गुप्त जो स्वयं काकोरी काण्ड में सम्मिलित
हुए थे, वे अशफाक की असहमति पर लिखते हैं कि - 'इस बार एक बड़ी
योजना बनाई गई थी। यह तय किया गया कि लखनऊ के पास काकोरी
नामक स्थान पर 8 डाउन रेल को

  1. स्वतंत्रता आन्दोलन में शाहजहांपुर का योगदान, डॉ० एन०सी० मेहरोत्रा,
    पृष्ठ-118
  2. स्वतंत्रता आन्दोलन में शाहजहांपुर का योगदान, डॉ० एन०सी० मेहरोत्रा,
    पृष्ठ-118
    95

रोककर उसमें आने वाला रेल खजाना लूट लिया जाए। काकोरी स्टेशन
के पास एक वीरान जगह चुन ली गई थी। सारी तैयारियां गुपचुप,
लेकिन बड़ी सरगर्मी के साथ होती रहीं। पर अशफाक अब भी इस डाके
का विरोध करते रहे। यह मानना पड़ेगा कि वह बहुत दूर की चीज सोच
रहे थे। उनका कहना था कि हमारा दल अभी इतना मजबूत नहीं है कि
हम ब्रिटिश सरकार को खुली चुनौती दे सकें। अभी हम इस हालत में
नहीं हैं कि हम सरकार से सीधी लड़ाई छेड़कर दल को कायम रख सकें।
लेकिन सब जोश के मारे फड़क रहे थे, और अशफाक उल्ला की बात
नक्कार खाने में तूती की आवाज बनकर रह गयी।''¹
मन्मथ नाथ गुप्त ने आगे लिखा कि - '.......एक महत्वपूर्ण बात
यह थी कि यों तो अशफाक उल्ला सरकारी खजाने की डकैती के विरोधी
थे, पर जब उन्होंने देखा कि उनकी एक न चली और क्रांतिकारी इस
काम को करने पर ही तुले हैं, तब उन्होंने भी कमर कस ली। उनकी
सुन्दर बड़ी-बड़ी आँखे तेज से दीप्त हो उठीं ओर वह अपना पार्ट अदा
करने के लिए अत्यन्त साहस तथा प्रसन्नता से प्रस्तुत हो गये। उनका
विरोध किसी डर या भय से प्रेरित न था, बल्कि वह बुद्धिमत्ता की
आवाज थी। बाद के इतिहास ने सिद्ध कर दिया कि अशफाक सही थे
और बाकी सभी क्रांतिकारी गलती पर थे। यह बात तो निश्चित है कि
यदि हम इस कार्य को न करते तो इतनी जल्दी हमारे पांव न उखड़ते।''²

  1. अशफाक उल्ला खाँ, भवान सिंह राणा, पृष्ठ -61
  2. भारतीय क्रांतिकारी आन्दोलन का इतिहास, मन्मथनाथ गुप्त, पृष्ठ-
    209-210
    96

उपरोक्त कथनों से स्पष्ट हो जाता है कि अशफाक उल्ला खां
दूरदर्शी मस्तिष्क के धनी थे और उस समय के क्रांतिकारियों में मानसिक
रूप से उनका स्थान ऊंचा था। अशफाक का विरोधात्मक स्वर व्यर्थ गया
और इस कार्य हेतु दस क्रांतिकारी युवकों का चयन कर लिया गया, जो
इस प्रकार है - पंडित राम प्रसाद बिस्मिल, चन्द्रशेखर आजाद, अशफाक
उल्ला खां, राजेन्द्र नाथ लाहिड़ी, मुकुन्दी लाल, मन्मथनाथ गुप्त, बनवारी
लाल, शचीन्द्र नाथ बख्शी, मुरारी लाल, कुन्दन लाल। राम प्रसाद
बिस्मिल इस योजना को क्रियान्वित करने वाले दल के नेता बने। अत्यन्त
गुप्त रूप से, पूरी सावधानी रखते हुए तेजी से तैयारियों होने लगीं। इसके
लिए लखनऊ से कुछ दूर काकोरी नामक स्थान का चयन भी कर लिया
गया।¹

  1. अशफाक उल्ला खाँ, भवान सिंह राणा, पृष्ठ -60
    97

काकोरी काण्ड की योजना का अंतिम चरण
और अशफाक का एक बार पुन: विरोध-
काकोरी नामक स्थान का चयन तो हो ही गया था। काकोरी
लखनऊ जिले का छोटा सा गांव है। इस गांव का कोई खास मतलब भी
नहीं था। काकोरी नाम से रेलवे का छोटा सा स्टेशन भी है। विचार
किया गया कि इसी छोटे स्टेशन पर गाड़ी खड़ी होने पर तुरन्त स्टेशन
तथा वहां स्थित तारघर पर अधिकार कर लिया जाए और गाड़ी का
सन्दूक उतारकर उसे तोड़ डाला जाए। इस कार्य सम्पादन के पश्चात् जो
कुछ भी प्राप्त हो, उसे लेकर तुरन्त भाग लिया जाये। अन्ततः कार्यक्रम
बिल्कुल स्पष्ट हो गया। किन्तु अभी भी कई बातें तय होनी थीं। कार्यक्रम
यह था कि किस स्टेशन पर क्रांतिकारी चढ़ेंगे और किन दो स्थानों के
बीच में जंजीर खींचकर गाड़ी खड़ी करेंगे। यह भी तय हुआ कि गाड़ी
खड़ी करके लोहे का सन्दूक खींच कर बाहर निकाल लिया जाये और उस
पर कब्जा कर लिया जाय। प्रतिदिन सारे स्टेशनों पर जो आमदनी होती
थी, उसे आठ नम्बर की डाउन ट्रेन लेकर लखनऊ हेड आफिस में पहुंचती
थी। योजना यह थी कि सदस्य किसी दिन इसी गाड़ी पर किसी स्टेशन
पर सवार हो जायें और दो स्टेशनों के बीच गाड़ी रोक ली जाय। पहले
यह योजना बनी थी कि किसी स्टेशन पर ही रोककर खजाने को लूटा
जाय। इस हेतु लखनऊ में छेलालाल धर्मशाला में क्रांतिकारी ठहरे थे।¹ ये
सभी सदस्य टोली के रूप में नहीं वरन् एक-दूसरे से अपरिचित बनते हुए
अलग-अलग व्यक्तियों के रूप में ठहरे थे। निश्चित तिथि को अपने-अपने
गुप्त स्थानों पर ठहरे हुए थे। योजना भी यही थी कि गाड़ी खड़ी होने
पर स्टेशन मास्टर को पकड़ लें। सभी क्रांतिकारी लखनऊ के अगले
स्टेशन के लिए पैदल ही चल

  1. जाँबाज (पत्रिका) - मन्मथनाथ गुप्त - पृष्ठ-3
    98

पड़े किन्तु अभी वे अगले स्टेशन के सिग्नल के पास भी नहीं पहुँच पाये
थे कि गाड़ी निकली चली जा रही है, जिसमें खजाना लूटा जाना है।
मन्मथ नाथ गुप्त लिखते हैं कि - 'हमें इससे गहरी निराशा हुई, उसकी
कल्पना आसानी से नहीं की जा सकती।' यह देरी खल गयी और
क्रांतिकारी पैदल ही लखनऊ लौट आये। फिर पता किया गया कि यह
गाड़ी 8 डाउन ही थी कि नहीं। पता चला कि वह गाड़ी 8 डाउन ही
थी। मुकुन्दी लाल के अनुसार - 'इसी प्रकार दो दिन असफलता का मुंह
देखना पड़ा था। दो दिन तक लगातार कोशिशों के बावजूद वह असफल
रहे। तीसरे दिन 9 अगस्त, 1925 को हमारे साथी योजना में आखिर
कामयाब हो गये'। स्पष्ट है कि क्रांतिकारी इस कार्य हेतु 7 और 8 अगस्त को
प्रयत्नशील रहे। ................और अभियान में सफलता नहीं मिली। दो दिन
की असफलता के बाद दल शाहजहांपुर चला गया था। इस संबंध में
मन्मथनाथ गुप्त ने लिखा है - 'हम लोग 9 तारीख की संध्या समय
शाहजहांपुर में हथियार छेनी, घन, हथौड़े आदि से लैस होकर गाड़ी पर
सवार हो गये।'¹ स्टेशन पर खजाना लूटने की योजना को त्याग दिया
गया था क्योंकि इस कार्य हेतु अधिक लोगों की आवश्यकता थी। अतः
यह योजना बन गयी कि अब दो स्टेशनों के बीच में गाड़ी रोककर
खजाना लूटा जाय और इसी कार्य हेतु दल के सदस्य ट्रेन में सवार हुए
थे। अशफाक ने अपने साथियों से खूब विरोध जताया। यह उनका
अन्तिम प्रयास था। बिस्मिल दल के नेता थे, अशफाक बार-बार उन्हें
समझाते, परन्तु बिस्मिल के सिर पर तो कुछ और जुनून सवार था, वे
समझा-बुझा कर अशफाक को शांतकर देते थे। मन्मथ नाथ गुप्त ने
लिखा है - ''9 अगस्त 1925 को ट्रेन डकैती का निश्चय किया गया था।
हम लोग जब दस आदमी काकोरी स्टेशन पहुँचे, उस समय भी अशफ़ाक यही कहते
रहे कि राम प्रसाद मेरी बात मान जाओ।


  1. भारतीय क्रांतिकारी आन्दोलन का इतिहास, मन्मथनाथ गुप्त, पृष्ठ -209

99

अब भी लौट चलो। पर उनका कहना-सुनना बेकार ही गया। पं० राम
प्रसाद बिस्मिल ने मुझे (मन्मथनाथ) बुलाकर कहा कि अशफाक को
समझाओ और उसे बताओ कि लोग उसके विरोध के कारण उसे क्या-क्या
कह रहे हैं। .............मैंने अशफाक को यह बताया कि ऐन मौके पर पहुंच
कर तुम जो विरोध कर रहे हो, उसकी प्रतिक्रिया साथियों पर बड़ा खराब
असर डालेगी। वे तुम्हें डरपोक कहने लगे हैं। दरअसल हमारे कई साथी
कह रहे थे कि अशफाक डर गया है। पं० राम प्रसाद बिस्मिल भी यही
सोच रहे थे कि तुम डर गये हो। परन्तु अशफाक की एक ही रट थी कि

  • लौट चलो, यह काम नहीं होना चाहिए।\’\’¹
    <u>काकोरी ट्रेन डकैती-</u>
    संध्या होने वाली थी। आसमान बादलों से घिरा था। वह रात होने
    वाली थी, जिसका जिक्र किये बिना कोई क्रांतिकारी इतिहास पूरा नहीं
    होता। छिट-पुट बूँदा-बांदी भी हो रही थी। गाड़ी चार बजे शाम को आई
    और सभी सवार हो गये। सुधीर विद्यार्थी ने लिखा है - ‘आज उन्हें
    अपने लक्ष्य की ओर जाना था। वे सिर पर कफन बांधकर एक
    शक्तिशाली साम्राज्य को चुनौती देने निकल पड़े थे। गिनती में सिर्फ दस
    थे वे, पर उनके इरादे ऊँचे और मजबूत थे। वे देश की आजादी के लिए
    क्रांति के इस रास्ते पर सीना तानकर चले थे। इसलिए आज उन्हें अपने
    अभियान पर नाज था।² क्रांतिकारी अपने औजार और हथियार को लिए
    गाड़ी में सवार हो चुके थे। तीन व्यक्ति सेकेण्ड क्लास के डिब्बे में सवार
    हुए थे, इस कार्य हेतु अशफाक उल्ला खां, राजेन्द्र लाहिड़ी और शचीन्द्र
    नाथ बख्शी को चुना गया था।
    1- अशफाक उल्ला खाँ, भवान सिंह राणा, पृष्ठ -64
    2- अशफाक उल्ला खां और उनका युग, सुधीर विद्यार्थी, पृष्ठ-37
    100

शेष सात सदस्य तीसरे क्लास डिब्बे में सवार हुए थे। राम प्रसाद बिस्मिल
दल का नेतृत्व कर रहे थे। ऐसे कार्यों में वे सदैव नेतृत्व ही किया करते
थे। तीसरे डिब्बे में सवार सदस्यों के नाम इस प्रकार हैं - बिस्मिल, केशव
चक्रवती, मुरारी लाल, मुकुन्दीलाल, चन्द्रशेखर आजाद, बनवारी लाल और
मन्मथ नाथ गुप्त। दल के सदस्य गाड़ी में फैले हुए थे। अशफाक उल्ला
खां, राजेन्द्र लाहिड़ी, शचीन्द्र नाथ बख्शी का काम था कि जंजीर
खींचकर गाड़ी को खड़ी कर देंगे। क्रांतिकारियों के पास चार नए माऊजर
पिस्तौल थी और अन्य छोट-मोटे हथियार थे। प्रत्येक पिस्तौल के लिए
पचास से अधिक गोलियाँ थीं। योजना के अनुसार अक्षरशः पालन
हुआ। निर्धारित स्थान पर जंजीर खींच दी गयी।¹ जंजीर खींचते ही गाड़ी
रुक गयी। उस समय संध्या का समय था, अँधेरा छाने लगा था। गाड़ी
के रुकते ही मुसाफिर जंगले से मुँह निकालकर झाँकने लगे। वह यह
जानना चाहते थे कि मामला क्या है। गार्ड भी उतरकर उसी ओर जाने
लगा कि मामला क्या है? अभी दिन की रोशनी थोड़ी बाकी थी। गाड़ी
खड़ी होते ही दल के सदस्य अपने-अपने डिब्बों से उतर गये और कुछ
क्षणों में कार्य प्रारम्भ कर दिया गया। गार्ड साहब को क्रांतिकारियों ने
पिस्तौल दिखाकर जमीन पर लेटने के लिए आज्ञा दे दी। गार्ड साहब
औंधे मुंह जमीन पर लेट गये। दल के सभी सदस्यों ने अपने-अपने
हथियार निकाल लिए। माऊजर पिस्तौलें भी निकाल ली गयी थीं। इस
पिस्तौल की मार एक हजार गज तक होती थी और एक साथ दस
गोलियां भरी जाती थीं। दल के सदस्यों ने एक-दो हवाई फायर करते हुए
यात्रियों को चेतावनी दी कि वे सभी तुरन्त अपने-अपने डिब्बों के अन्दर
रहें। यात्रियों को कुछ नहीं कहा जायेगा, सिर्फ सरकारी खजाना लूटा
जायेगा। यात्री किसी प्रकार की चिन्ता न करें, वे केवल अपने-अपने
स्थानों पर शांतिपूर्वक बैठे रहें।


  1. भारतीय क्रांतिकारी आन्दोलन का इतिहास, मन्मथनाथ गुप्त, पृष्ठ-210

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गाड़ी के दोनों ओर पगदण्डी को छोड़कर घास के मैदानों में दो-दो
युवकों को नियुक्त कर दिया गया, उनके पास माऊजर पिस्तौले थीं। इन
पिस्तौलों को बट पहनाकर राइफल की तरह प्रयोग में लाया जा सकता
था, जिससे यह एक हजार गज तक मारकर सकती थी। इन दो युवकों
को कठोर आदेश दिया गया था कि किसी भी व्यक्ति पर गोली न चलायी
जाये। सिर्फ हवा में कुछ देर तक गोलियाँ चलाई जाती रहें। संयोग ही
ऐसा था कि अमजद अली नामक एक युवक व्यर्थ में मारा गया। उस
व्यक्ति का नया विवाह हुआ था और उसकी पत्नी महिलाओं वाले डिब्बे
में बैठी थी। क्रांतिकारियों की बार-बार चेतावनी के बावजूद वह डिब्बे से
बाहर निकल आया, शायद वह अपनी पत्नी को आश्वस्त करने जा रहा
था कि गोली का शिकार हो गया और मारा गया।¹ राम प्रसाद बिस्मिल
ने घटना का वर्णन करते हुए लिखा है - ‘'एक सज्जन गार्ड के डिब्बे से
उतरे। उनके पास भी माऊजर पिस्तौल थी। विचारा कि ऐसा शुभ अवसर
जाने कब हाथ आए। माऊजर पिस्तौल काहे को चलाने को मिलेगा। इसी
उमंग में सीधी गोली दागने लगे। मैंने जो देखा तो डांटा क्योंकि गोली
चलाने की उनकी ड्यूटी ही नहीं थी। फिर भी यदि कोई मुसाफिर
कौतूहलवश बाहर को सिर निकाले, तो उसको गोली जरूर लग जायेगी।
हुआ भी ऐसा ही जो व्यक्ति रेल से उतरकर अपनी स्त्री के पास जा रहा
था, मेरा ख्याल है कि इन्हीं महाशय की गोली उसके लग गई, क्योंकि
जिस समय यह महाशय सन्दूक नीचे डालकर गार्ड के डिब्बे से उतरे थे,
केवल दो-तीन फायर हुए थे। उसी समय स्त्री ने कोलाहल किया होगा
और उसका पति उसके पास जा रहा था, जो उस महाशय की उमंग का
शिकार हो गया।


  1. अशफाक उल्ला खाँ, भवान सिंह राणा, पृष्ठ-65

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मैंने यथा शीघ्र पूर्ण प्रबन्ध किया था कि जब तक कोई व्यक्ति
बन्दूक लेकर सामना करने न आये या मुकाबले में गोली न चले, तब
तक किसी आदमी पर फायर न होने पाये। मैं नर -हत्या कराके डकैती
को भीषण रूप नहीं देना चाहता था। फिर भी मेरा कहा न मानकर
अपना काम छोड़ गोली चला देने का यह परिणाम हुआ। गोली चलाने
की ड्यूटी जिनको मैंने दी थी, वे बड़े दक्ष तथा अनुभवी मनुष्य थे।
उनसे भूल होना सम्भव न था। उन लोगों को मैंने देखा था कि वे
अपने स्थान से पाँच मिनट बाद पाँच फायर करते थे। यही मेरा आदेश
था।''¹
कार्य को परिणाम तक पहुँचाने का उपक्रम सुनियोजित तरीके से हो
रहा था। दो व्यक्ति घास में पगडंडियों के पास तो थे ही, जो ट्रेन की
निगरानी कर रहे थे। बाकी सदस्य खजाने वाले डिब्बे में घुस गये और
धक्का देकर खजाने के सन्दूक को डिब्बे से नीचे गिरा दिया। सभी उसे
तोड़ने लगे। सन्दूक इतना मजबूत था कि टूटने का नाम ही नहीं ले रहा
था। हाँ बार-बार प्रहार से उसमें छेद अवश्य हो गया था। गार्ड या किसी
अन्य के पास चाबी होती तो खोलने की समस्या हल हो जाती, किन्तु
गाड़ी में किसी के पास चाबी नहीं थी।² तरीका यह था कि प्रत्येक स्टेशन
मास्टर अपना थैला लाकर उस सन्दूक में डाल जाता था। यदि कोई
उसमें थैला डालना चाहे तो डाल सकता है किन्तु कोई उसमें से निकाल
नहीं सकता। उसकी बनावट ही ऐसी होती है।³ .....घन पर घन बरसते
रहे परन्तु प्रयास व्यर्थ ही रहा। अशफाक उल्ला पहरा देने वाले व्यक्तियों
में थे और जब उन्होंने देखा कि यह दशा तो उचित परिणाम तक नहीं
पहुंचाएगी तो पिस्तौल मन्मथनाथ गुप्त को दे दी
1.अशफाक उल्ला खां, भवान सिंह राणा - पृष्ठ -66
2.भारतीय क्रांतिकारी आन्दोलन का इतिहास, मन्मथनाथ गुप्त, पृष्ठ -210
3.भारतीय क्रांतिकारी आन्दोलन का इतिहास, मन्मथनाथ गुप्त, पृष्ठ -210
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और घन लेकर जुट गये। अशफाक सभी सदस्यों से बलिष्ठ थे,
इसलिए थोड़ी देर में सुराख बड़ा हो गया और रूपये से भरी थैलियां बाहर
निकालकर चादर में बाँध दिया गया।........और इसी वक्त कोई दूसरी
गाड़ी आ गयी तो क्रांतिकारियों की मनोदशा क्या रही होगी, अनुमान
लगाना कठिन है। इसका वर्णन स्वयं मन्मथनाथ गुप्त ने किया है -'इस
समय जबकि सफलता बिल्कुल सामने थी। एक गाड़ी की आवाज आती
हुई सुनाई पड़ी। हाँ इसमें कोई संदेह नहीं था कि गाड़ी हमारी तरफ आ
रही थी। भला यह कैसी गाड़ी थी? यह कैसे हो गया कि अगले स्टेशन
पर हमारी खबर पहुँच गयी। यह सम्भव नहीं था, तो क्या इसके मायने
यह हुआ कि किसी ने विश्वासघात किया? अन्य कितने ही प्रश्न हमारे
मन में कौंध गये। सम्भव है कि यह सैनिक गाड़ी है। यह सम्भावना
करीब-करीब जम गयी। .......अब हमारे नेता लोहे के सन्दूक के पास आ
गये। हमने उनकी तरफ देखा। वे बिल्कुल स्थिर खड़े थे और अन्य सब
लोगों की तरह एकाग्र होकर ट्रेन की तरफ देख रहे थे। ऐसा लगा कि
ट्रेन के यात्रियों में भी थोड़ी-बहुत सुगसुगाहट हो रही थी। हम चाहते तो
उस वक्त अंधेरे में लुप्त हो सकते थे, पर हमने फैसला किया कि अब जो
कुछ भी हो, उसका सामना करना ही है। अधिक से अधिक यह हो
सकता था कि दोनो तरफ से गोलियों की बौछारें हों और हम लोग सब
मारे जाएं। पर जबकि हम पर खतरा आ चुका था, हमें बिल्कुल डर नहीं
लग रहा था। क्या यह बात सच नहीं है कि हम मौका मिलने पर वीरता
का आदर्श पेश करना चाहते थे। हमने हाथों में अपने अस्त्रों को कसकर
पकड़ लिया और आती हुई रेलगाड़ी की तरफ देखने लगे। अशफाक
हथौड़ा चलाकर अपना काम आगे बढ़ा रहे थे और छेद करीब-करीब इतने
बड़े हो गये थे कि सन्दूक में पड़ी थैलियां निकाली जा सकती थीं। इस
समय हथौड़े की चोट के अलावा बाकी सब लोग शान्त थे।
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यात्रियों को ट्रेन के अन्दर रखने के लिए बराबर गोलियां दागी जा
रही थी।''¹ मन्मथ नाथ गुप्त ने आगे भी इसका वर्णन करते हुए लिखा
है - ‘‘हिमगिरी की तेजी से रेल हमारी तरफ दौड़ी आ रही थी। रेल की
आवाज चारो तरफ छाई हुई थी। आखिर क्या होने वाला है? मृत्यु ?
कौन जानता है क्या होगा? पर अब हमें कोई भय नहीं था। उसी समय
राम प्रसाद ने देखा कि जहाँ हम खड़े थे, वहाँ डबल लाइन थी। एकाएक
उनको याद आया कि पंजाब मेल आ रही है और इसमें कोई संदेह नहीं
था कि यह रात वाली पंजाब मेल थी। उन्होंने यह बात हमें बता दी।
हमारे नेता सामने मौजूद थे। उनकी तात्कालिक बुद्धि बड़ी प्रखर थी।
उन्होंने इससे पहले खतरों की स्थिति से निकाला था। क्या यह बात सच
नहीं थी कि इससे पहले हर मौके पर उन्होंने इससे भी गम्भीर स्थिति में
सही फैसले किये थे। शायद वे हमसे कहें कि लौट चलो या कहें कि पास
के पेड़ों के पीछे हो जाओ और वहाँ से जबरदस्त मोर्चा सम्भालो।‘’
‘‘आती हुई गाड़ी पास पहुँचने ही वाली थी। ऐसे मौके पर बिस्मिल ने
हमसे कहा कि हम अपने अस्त्रों को छिपा लें। उससे यह होगा कि यदि
कोई गाड़ी से झाँकेगा, तो हम लोगों को साधारण भटके हुए यात्रियों के
रूप में देखेंगे। उन्होंने अशफाक को इस प्रकार खड़े होने के लिए कहा
मानो वे कोई दृश्य देख रहे हों। गाड़ी बहुत तेजी से आ रही थी और
चारो तरफ उसका शोर था। एक लम्हे के अन्दर गाड़ी हमारे सामने से
निकल गयी और सारी स्थिति एक दुः स्वप्न की तरह होकर चली गयी।
अब वह एक गोली की तरह अगले स्टेशन की ओर जा रही थी। हमारे
चेहरों पर तथा हमारी गाड़ी पर तेज रोशनी गिरी, बहुत जोर से दोनों
गाड़ियों की हवाएं टकरायीं और देखते-देखते सब खत्म हो गया। इस
प्रकार यह खतरा टल गया

  1. अशफाक उल्ला खां, भवान सिंह राणा, पृष्ठ-67
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