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अमर शहीद अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ: व्यक्तित्व और कृतित्व (काकोरी के अमर शहीद का जीवन व रचनाएँ)

अमर शहीद अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ: व्यक्तित्व और कृतित्व (काकोरी के अमर शहीद का जीवन व रचनाएँ)

Amar Shaheed Ashfaqulla Khan: Personality & Works

अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ 'वारसी' (सम्पादक: बनारसीदास चतुर्वेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished297 पृष्ठ

पृष्ठ 119, कुल 297 में से

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सारा-सारा दिन लंगोट बांधकर गुजारते थे। अंगोछे पहनकर नहाते थे,
एक समय भोजन करते थे, एक समय दो-दो पैसे का सत्तू खा लेते थे।
मैं पन्द्रह वर्ष से एक समय दूध पीता था। इन लोगों की दशा देखकर
मुझे दूध पीने का जरा भी साहस नहीं होता था। मैं सबके साथ बैठकर
सत्तू खा लेता था। मैंने विचार किया कि इतने नवयुवकों का जीवन नष्ट
करके उन्हें कहां भेजा जाए? जब समिति का सदस्य बनाया था, तो लोगों
ने बड़ी-बड़ी आशा बंधाई थी। कइयों का पढ़ना लिखना छुड़ाकर काम में
लगा दिया था।'"¹
अर्थ का प्रबन्ध करना आवश्यक था। किन्तु कैसे हो प्रबन्ध? प्रश्न
यह था। कोई उपाय न देख डाका डालना ही तय हुआ। किन्तु किसी
व्यक्ति विशेष के यहां डाका डालना उचित नहीं समझा गया। यह भी
सोचना हुआ कि क्यों न सरकारी खजाना ही लूटा जाय। भीषण अभावों
में जीवन यापन करने वाले मातृभूमि के उपासक अपने उद्देश्यों की पूर्ति
में कोई भी अवसर हाथ से जाने देना नहीं चाहते थे। यह क्रांतिकारियों
का ही साहस था कि संगठन के प्रत्येक केन्द्र पर हथियारों का अच्छा
संग्रह तैयार हो गया और सदा अवसर की ताक में रहते कि कुछ कर
दिखायें। अंग्रेजी सत्ता यह सोचने के लिए बाध्य हो जाये कि कोई
चुनौती देने वाला है। योजना के अनुसार एक ही दिन क्रांति के पर्चे
वितरित करने की बात हुई। पर्चों में अंग्रेजी सरकार के विरुद्ध विद्रोह
करने का जिक्र था। यह भी कहा गया कि क्रांतिकारियों के सामने
सोवियत संघ का आदर्श है।² पर्चों के वितरण का कार्य गोपनीयता से
हुआ। किसी को भनक तक न लगी। सरकार हैरान थी और संगठन की
व्यापकता पर आश्चर्य व्यक्त कर रही थी।

  1. अशफाक उल्ला खाँ, भवान सिंह राणा, पृष्ठ-48
  2. अशफाक उल्ला खाँ, भवान सिंह राणा, पृष्ठ-50
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