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अमर शहीद अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ: व्यक्तित्व और कृतित्व (काकोरी के अमर शहीद का जीवन व रचनाएँ)

Amar Shaheed Ashfaqulla Khan: Personality & Works

अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ 'वारसी' (सम्पादक: बनारसीदास चतुर्वेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished297 पृष्ठ

वह तो अशफाक को एक सामान्य विद्यार्थी ही समझ रहे थे। उनके
उत्साह का उन्हें ज्ञान नहीं। बिना संज्ञान में लिए क्रांतिकारी बात करना
उचित भी नहीं था। इससे अशफाक निराश हुए, उन्हें दुख हुआ। परन्तु
अशफाक का उत्साह मरा नहीं था। बनारसी लाल अभी भी अशफाक के
सम्पर्क में थे। अशफाक ने बनारसी लाल से अनुरोध किया कि वह राम
प्रसाद से मिला दे। अशफाक के बड़े भाई और बिस्मिल साथ-साथ पढ़े भी
थे। भाई के सहपाठी होने के कारण बनारसी लाल ने राम प्रसाद बिस्मिल
से अशफाक को अच्छी तरह से परिचित करा दिया। अशफाक उल्ला खाँ
स्वयं लिखते हैं - "फिर मैंने बनारसी लाल से कहा कि राम प्रसाद के
पास चलो और मुझको उनसे इण्ट्रोड्यूस करा दो। क्योकि राम प्रसाद मेरे
बड़े भाई के क्लासफेलो उर्दू स्कूल में रह चुके थे और आपस में दोस्त भी
थे। मेरे भी स्कूलफेलो रह चुके थे मगर मेरे ताल्लुकात कम थे। चूँकि
राम प्रसाद शुरू से ही खासी शख्सियत रखने वाले इन्सान थे और
कसरती व होशियार तलिबेइल्म समझे जाते थे, आम तौर पर मशहूर भी
थे। मैंने ख्याल किया कि राम प्रसाद से मिलो शायद वहाँ दवा मिल
जाय और कोई तस्कीन कल्ब की सूरत निकल आये। गरज यह कि एक
दिन खन्नौत के किनारे जलसा हुआ। राम प्रसाद ने उसमें एक मुख्तसर
सा लेक्चर दिया और शुरू में यह शेर पढ़ा -
बहे बहरे फना में जल्द या रब लाश बिस्मिल की,
कि भूखी मछलियाँ है जौहरे शमशीरे कातिल की।¹
जो मुझे अब भी याद है इसे मैंने कण्डेम्ड सेल में मुलाकात के वक्त
पढ़ा था। मैंने भी कुछ कहा था। गरज कि बनारसी ने हम दोनों का
इन्ट्रोडक्शन करा दिया। गो कि इससे कब्ल भी एक दिन मैं राम प्रसाद से
मिला था।

  1. अशफाक उल्ला खाँ, भवान सिंह राणा, पृष्ठ-38
    79

मगर वह इतनी सर्दमेहरी से मिले थे कि मुझे बहुत दुख हुआ था।
जिसकी वह माफी अक्सर माँग लिया करते थे।'' चाहे जो हो अशफाक
का प्रयास रंग लाया और वे राम प्रसाद बिस्मिल के सम्पर्क में अच्छी
तरह आ गये।
ऐसी परिस्थितियों में किसी को भी निराशा हो सकती है। जब वह
उत्तेजना और ओज से भरा हो और मन मुताबिक बात न बने। हर
उत्साही अपने अनुसार उत्तर चाहता है। वह अपना मन ऊँचा उठाना
चाहता है। यदि देखा जाय तो राम प्रसाद बिस्मिल ने ठीक ही किया कि
वे निराशा जनक उत्तर दिये। विचारणीय यह है कि, भला वह कैसे एक
ऐसे विद्यार्थी से जो सर्वथा अपरिचित और मैनपुरी षड्यंत्र के विषय में पूछ
रहा है, राम प्रसाद निराश न करते तो क्या करते, जबकि पुलिस हाथ
धोकर पीछे पड़ी है। यह भी संदेह था कि कोई भी व्यक्ति पुलिस का
मुखबिर हो सकता है। लेकिन बाद की स्थिति पर विचार करें तो स्पष्ट
दिख जायेगा कि राम प्रसाद ने ठोंक-बजाकर इस बात का विश्वास कर
लिया कि यह अशफाक सच्चा देश भक्त है, तब उन्होंने अशफाक को
अपना अभिन्नमित्र बना लिया। अब तो दोस्ती एक प्राण हो गयी। एक
हिन्दू एक मुसलमान जिसकी मिसाल दी जाने लगी।
राम प्रसाद बिस्मिल कट्टर आर्य समाजी थे और अशफाक कट्टर
मुस्लिम परिवार के, लेकिन धार्मिकता का लबादा कही रुकावट नही बना
क्योंकि दोनों सच्चे देशभक्त थे। दो दोस्तों के बीच कभी भेद भाव की
दूषित भावना नही रही। दोनो का उद्देश्य भी था कि सामाजिक बुराइयों
को दूर किया जाय और इस प्रकार के भेदभाव को समाप्त किया जाय
और दोनों ने मुकाबला भी किया।
राम प्रसाद बिस्मिल ने अपनी आत्मकथा में लिखा है- ''मुझे भली
भाँति याद है जब मैं बादशाही एलान के बाद शाहजहाँपुर आया था, तो
तुमसे स्कूल में भेट हुई थी। तुम्हारी मुझसे मिलने की बड़ी हार्दिक इच्छा
थी।
80

तुमने मुझसे मैनपुरी काण्ड के सम्बन्ध में कुछ बातचीत करनी चाही
थी। मैंने वह समझकर कि एक स्कूल का मुसलमान विद्यार्थी मुझसे इस
तरह की बातचीत क्यों करता है, तुम्हारी बातों का उत्तर उपेक्षा की दृष्टि
से दिया था। तुम्हें उस समय बड़ा खेद हुआ था। तुम्हारे मुख से हार्दिक
भावों का प्रकाश हो रहा था। तुमने अपने इरादे को यों ही नहीं छोड़
दिया, अपने निश्चय पर डटे रहे। जिस प्रकार हो सका काँग्रेस में
बातचीत की। अपने इष्ट मित्रों द्वारा इस बात का विश्वास दिलाने की
कोशिश की कि तुम बनावटी आदमी नहीं, तुम्हारे दिल में मुल्क की
खिदमतकरने की ख्वाहिश थी। अन्त में तुम्हारी विजय हुई। तुम्हारी
कोशिशों ने मेरे दिल में जगह पैदा कर ली। तुम्हारे बड़े भाई मेरे उर्दू
मिडिल के सहपाठी तथा मित्र थे। यह जानकर मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई।
थोड़े दिनों में ही तुम मेरे छोटे भाई के समान हो गये थे, किन्तु छोटे
भाई बनकर तुम्हें संतोष न हुआ। तुम समानता के अधिकार चाहते थे,
मित्र की श्रेणी में अपनी गणना चाहते थे, वही हुआ। तुम सच्चे मित्र बन
गये। सबको आश्चर्य था कि एक कट्टर आर्य समाजी और मुसलमान का
मेल कैसा? मैं मुसलमानों की शुद्धि करता था। आर्य समाज मंदिर में
मेरा निवास था, किन्तु तुम इन बातों की किंचित मात्र चिन्ता न करते
थे। मेरे कुछ साथी तुम्हारे मुसलमान होने के कारण कुछ घृणा की दृष्टि
से देखते थे, किन्तु तुम अपने निश्चय में दृढ़ थे। मेरे साथ आर्य समाज
मंदिर में आते जाते थे। हिन्दू-मुस्लिम झगड़ा होने पर तुम्हारे मुहल्ले के
सब कोई तुम्हे खुल्लम खुल्ला गालियाँ देते थे, काफिर के नाम से पुकारते
थे, पर तुम कभी भी उनके विचारों से सहमत न हुए। सदैव हिन्दू-मुस्लिम
ऐक्य के पक्षपाती रहे। तुम एक सच्चे मुसलमान तथा सच्चे स्वदेश भक्त
थे। तुम्हें यदि जीवन में कोई विचार था, तो यही कि मुसलमानों को
खुदा अक्ल देता, कि वे हिन्दुओं के साथ मिल करके हिन्दुस्तान की
भलाई करते। जब मैं हिन्दी में कोई लेख या पुस्तक लिखता तो तुम
सदैव यही अनुरोध करते कि उर्दू में क्यों नहीं लिखते, जो मुसलमान भी
81

पढ़ सके? तुमने स्वदेश-भक्ति के भावों को भलीभांति समझने के लिए
हिन्दी का अच्छा अध्ययन किया। अपने घर पर जब माता जी तथा भ्राता
जी से बातचीत करते थे, तो तुम्हारे मुँह से हिन्दी शब्द निकल जाते थे,
जिससे सबको बड़ा आश्चर्य होता था।"
राम प्रसाद बिस्मिल अशफाक के बारे में आगे लिखते हैं -
"तुम्हारी इस प्रकार की प्रवृत्ति देखकर बहुतो को संदेह होता था, कि
कही इस्लाम धर्म त्यागकर शुद्धि न करा लो। पर तुम्हारा हृदय तो किसी
प्रकार अशुद्ध न था, फिर तुम शुद्धि किस वस्तु का कराते? तुम्हारी इस
प्रकार की प्रगति ने मेरे हृदय पर पूर्ण विजय पा ली। बहुधा मित्र मण्डली
में बात छिड़ती कि कहीं मुसलमान पर विश्वास करके धोखा न खाना।
तुम्हारी जीत हुई, मुझमें तुममें कोई भेद न था। बहुधा मैंने तुमने एक
थाली में भोजन किए। मेरे हृदय से यह विचार ही जाता रहा कि
हिन्दू-मुसलमान में कोई भेद है। तुम मुझ पर अटल विश्वास तथ अगाध
प्रीति रखते थे। हाँ तुम मेरा नाम लेकर नही पुकार सकते थे। तुम मुझे
सदैव 'राम' कहा करते थे। एक समय जब तुम्हें हृदय कम्प का दौरा हुआ
था, तुम अचेत थे, तुम्हारे मुँह से बराबर 'राम' 'हाय राम' शब्द निकल
रहे थे। पास खड़े हुए भाई बांधवों को आश्चर्य हुआ कि 'राम' 'राम'
कहता है। कहते कि 'अल्लाह' 'अल्लाह' कहो, पर तुम्हारी 'राम-राम' की
रट थी। उसी समय किसी मित्र का आगमन हुआ, जो राम के भेद को
जानते थे। तुरन्त मैं बुलाया गया। मुझसे मिलने पर तुम्हें शान्ति हुई।
तब सब लोग 'राम! राम!' के भेद को समझे।
अन्त में इस प्रेम, प्रीति तथ्य मित्रता का परिणाम क्या हुआ? मेरे
विचारों के रंग में तुम भी रंग गये। तुम भी एक कट्टर क्रांतिकारी बन
गये। अब तो तुम्हारा दिन रात प्रयत्न यही था कि, कि किस प्रकार हो
मुसलमान नवयुवकों में भी क्रांतिकारी भावों का प्रवेश हो। वे भी
क्रांतिकारी आन्दोलन में सहयोग दें। जितने तुम्हारे बन्धु तथा मित्र थे सब
पर तुमने अपने विचारों का प्रभाव डालने का प्रयत्न किया। बहुधा
क्रांतिकारी सदस्यों को भी बड़ा आश्चर्य होता कि मैंने कैसे एक मुसलमान
82 459860
459860

को क्रांतिकारी दल का प्रतिष्ठित सदस्य बना लिया। मेरे साथ तुमने जो
कार्य किये वे सराहनीय हैं। तुमने कभी भी मेरी आज्ञा की अवहेलना
नहीं की। एक आज्ञाकारी भक्त के समान मेरी आज्ञा पालन में तत्पर
रहते थे। तुम्हारा हृदय बड़ा विशाल था। तुम्हारे भाव ऊँचे थे। मुझे शान्ति
है तो यही कि तुमने संसार में मेरा मुख उज्जवल कर दिया। भारत के
इतिहास में यह घटना भी उल्लेखनीय हो गयी कि अशफाक उल्ला ने
क्रांतिकारी आन्दोलन में योगदान दिया। अपने भाई बन्धु तथा संबंधियों
के समझाने पर कुछ भी ध्यान न दिया। गिरफ्तार हो जाने पर भी अपने
विचारों में दृढ़ रहे। जैसे तुम शारीरिक बलशाली थे वैसे ही मानसिक वीर
तथा आत्मा से उच्च सिद्ध हुए। इन सबके परिणाम स्वरूप अदालत में
तुमको मेरा सहकारी (लेफ्टीनेन्ट) ठहराया गया और जज ने मुकदमें का
फैसला लिखते समय तुम्हारे गले में जयमाल (फाँसी की रस्सी) पहना
दी। प्यारे भाई, तुम्हें यह समझ कर संतोष होगा कि जिसने अपने
माता-पिता की धन-सम्पत्ति को देश सेवा में अर्पण करके उन्हें भिखारी
बना दिया, जिसने अपने सहोदर के भावी भाग्य को भी देश सेवा की भेंट
कर दिया, जिसने अपना तन-मन धन सर्वस्व मातृ सेवा में अर्पण करके
अपना अन्तिम बलिदान भी दे दिया, उसने अपने प्रिय सखा अशफाक को
भी उसी मातृभूमि की भेंट चढ़ा दिया।
'असगर' हरीम इश्क में हस्ती ही जुर्म है।
रखना कभी न पाँव यहाँ सर किये हुए।।''¹
राम प्रसाद बिस्मिल के उपरोक्त कथन से अशफाक के व्यक्तित्व को पूरी
तरह स्पष्टतः देखा जा सकता है। मुसलमानों में सबसे बड़ा दोष माना
जाता है जब कोई मुसलमान काफिर कहलाता है। काफिर धर्म से डिगने
वाला व्यक्ति होता है। अशफाक 'काफिर' शब्द सुनते हैं लेकिन यह शब्द

  1. राम प्रसाद बिस्मिल रचनावली, दिनेश शर्मा, पृष्ठ 101 से 103 तक
    83

उन्हें अपने कर्म से डिगा नही पाता। अशफाक प्रयास करते हैं कि
वे क्रांतिकारी बनें। राम प्रसाद बिस्मिल ने उनके प्रयास को स्वीकार ही
नहीं किया है, सराहा भी है। अशफाक को कितना सच्चा और शुद्ध
मनुष्य समझते थे राम प्रसाद बिस्मिल यह भी स्पष्ट हो जाता है। यह
भेदभाव से परे साम्प्रदायिक एकता ही नहीं वरन् एक मानवीय समाज की
संरचना की ओर संकेत भी हैं। अशफाक घृणा से घबराते नहीं है, शान्ति
के साथ मुस्कराते हुए उसका सामना करते हैं। भावनाओं की जीत होती
है। निश्चित ही अशफाक के भीतर एक सामाजिक विचारधारा प्रवाहित हो
रही थी, जो देश भक्ति की नदी में बह रही थी।
अशफाक कट्टर मुसलमान ही नहीं वे हिन्दू-मुस्लिम एकता के भी
कट्टर समर्थक थे। भाषा का भेद भी नहीं था, अशफाक हिन्दी जानने
की कोशिश करते और बिस्मिल से उर्दू में लिखने को कहते। यह चीज
अशफाक को महान बनाती है। अशफाक राम प्रसाद बिस्मिल के सम्पर्क
में सच्चे देश भक्त तो बन ही गये, एक सुसंस्कृत, सुसभ्य, अच्छे इन्सान
भी बन गये। वे सिर्फ मनुष्य के लिए निर्मित हो गये।
1920 में जब क्षमादान दिया गया तो राम प्रसाद बिस्मिल का अन्य
क्रांतिकारियों से लगभग सम्बन्ध समाप्त हो गया और क्रांतिकारी
गतिविधियाँ भी प्रायः समाप्त हो गयी।
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चौरी-चौरा की घटना पर महात्मा गाँधी ने अपना असहयोग
आन्दोलन वापस ले लिया, जिसके कारण युवा वर्ग बेचैन हो गया।¹ इसी
समय प्रसिद्ध क्रांतिकारी शचीन्द्र नाथ सन्याल ने एक क्रांतिकारी संगठन
बनाया। शचीन्द्रनाथ का मुख्य केन्द्र बनारस था। कुछ दिनों बाद
‘अनुशीलन समिति’ को भी मिला लिया गया। अब ‘हिन्दुस्तान
रिपब्लिकन एसोसिएशन’ या ‘हिन्दुस्तान गण- तांत्रिक संघ’ नामक
संगठन बना।² जिसका उद्देश्य था, क्रांति द्वारा राज्यों का एक गणतंत्रिक
संघ स्थापित करना। उद्देश्यों की पंक्ति में यह भी था कि संघ शोषण
रहित समाज की स्थापना करेगा। यह स्पष्ट होता है कि हिन्दुस्तान
गणतंत्रिक संगठन पर सोवियत संघ की क्रांति का प्रभाव था लेकिन
मन्मथनाथ गुप्त का मत था कि -‘‘यह सब बातें होते हुए भी यह नहीं
कहा जा सकता है कि इस विधान के बनाने वालों का आदर्श सोवियत
रूस या किसान मजदूर वर्ग का अधिनायकत्व था। इस षड्यंत्र के
सिलसिले में बहुत दिनों बाद जाकर अर्थात् जनवरी सन् 1925 में एक
क्रांतिकारी पर्चा बाँटा गया, जिसका नाम ‘The Revolutionary' था। उसमें यह
लिखा गया था कि हमारे सामने आधुनिक रूस का आदर्श है, किन्तु
लेखक ने इस वक्तव्य को बिना पूरी तरह समझे ऐसा लिखा था। जहाँ
उसमें यह बात थी कि रूस का आदर्श भी हमारे सम्मुख है, - वहाँ यह
बात भी थी कि प्राचीन ऋषियों मुनियों का आदर्श भी हमारे सम्मुख है।
इससे भी यही ज्ञात होता है कि प्राचीन ऋषियों का आदर्श उनके सम्मुख
था।

  1. अशफाक उल्ला खाँ, भवान सिंह राणा, पृष्ठ 41
  2. अशफाक उल्ला खाँ, भवान सिंह राणा, पृष्ठ 42
    85

साथ ही यह भी ज्ञात होता है कि लेखक ने रूस के आदर्श को
अच्छी तरह नहीं समझा था। इस युग का कोई भी व्यक्ति इस आदर्श को
पूरी तरह नहीं समझ पाया था।''¹ चाहे जो हो यह तो स्पष्ट ही है कि
समाजवादी विचारधारा क्रांतिकारियों में प्रवाहित हो रही थी और अशफाक
इससे खूब प्रभावित थे, मन ही मन भेद भाव रहित समाज चाहते थे।
राम प्रसाद बिस्मिल तो जन्मजात क्रांतिकारी थे। कुछ दिनों के ठहराव के
बाद वे एक नये क्रांतिकारी संगठन में शामिल कर लिए गये। संगठन में
शामिल होने के लिए बिस्मिल 1923 में कानपुर पहुँचे थे और उनका
अनुभव काम आया।
राम प्रसाद बिस्मिल को हिन्दुस्तान गण तांत्रिक संगठन में पाकर
योगेश चन्द्र चटर्जी खुश हुए थे। शीघ ही बिस्मिल महत्वपूर्ण सदस्यों की
श्रेणी में आ गये। बिस्मिल को दल के लिए हथियार इकठ्ठा करने का
काम सौंपा गया। अब क्या था, जब राम प्रसाद स्वयं क्रांतिकारी दल के
मुख्य सदस्यों में आ गये तो अशफाक कैसे वंचित रह सकते हैं। अशफाक
भी संगठन के सदस्य बन गये। अशफाक के हृदय में देश भक्ति का जोश
तो था ही, मातृभूमि की भावना से भरे अशफाक कुछ कर दिखाना चाहते
थे। राम प्रसाद बिस्मिल ने अपनी आत्मकथा में अशफाक के विषय में
वृहद चर्चा की है, जिसका उल्लेख किया जा चुका है।
शचीन्द्र नाथ ने भी लिखा है -‘‘अशफाक उल्ला खाँ स्वयं अपने
प्रयत्नों से ही क्रांतिकारी दल के सदस्य बने थे।''² उनके इस कथन का
समर्थन बिस्मिल की आत्मकथा से नहीं होता। मन्मथनाथ गुप्त कहते हैं

  • ‘‘राम प्रसाद बिस्मिल ने जिन युवकों को शाहजहाँपुर में क्रांतिकारी दल
    की ओर प्रवृत्त किया था,
  1. अशफाक उल्ला खाँ, भवान सिंह राणा, पृष्ठ -42
  2. अशफाक उल्ला खाँ, भवान सिंह राणा, पृष्ठ -44
    86

अशफाक उल्ला उनमें प्रमुख थे, पर यह समझना गलत होगा जैसा
कि श्री शचीन्द्र नाथ जिन्हें उनके साथ हवालात में लम्बी अवधि तक रहने
का मौका मिला था, का कहना है कि अशफाक उल्ला स्वयं ही कोशिश
करके क्रांतिकारी दल में आये थे। उनका जन्म एक प्रसिद्ध पठान परिवार
में हुआ था उनके भाई भोपाल राज्य में किसी ऊंचे सरकारी पद पर थे।
असहयोग आन्दोलन के समय जो देश व्यापी लहर आयी थी, उसमें
अशफाक की पढ़ाई खत्म हो गयी और उनकी आत्मा कुछ करने के लिए
व्याकुल रहने लगी। उन्हीं दिनों राम प्रसाद फरारी से लौटकर आये थे
और अशफाक उल्ला ने किसी न किसी तरह उनसे परिचय प्राप्त किया
था।¹ चाहे जो हो अशफाक पूर्ण रूप से समर्पित क्रांतिकारी सदस्य बन
गये थे। अशफाक का क्रांतिकारी दल में सम्मिलित होना एक मुस्लिम
परिवार का होने के कारण एक नया अध्याय जोड़ता है।
अशफाक उल्ला खाँ ने निश्चित ही यह बता दिया कि वे एक ऐसा
समाज चाहते हैं जहाँ धनी-गरीब एक साथ रह सकें। शोषण रहित समाज
की उन्होंने कल्पना की थी। समाजवादी विचारधारा से पोषित अशफाक के
चिन्तन में स्वतंत्र भारत की एक तस्वीर थी। अवश्य ही अशफाक को
समझना भारत की संस्कृति और इतिहास की झलक पाना है। यही नहीं
हिन्दू-मुस्लिम या इसी प्रकार की अन्य प्रदूषित भावनाओं से दूर मानवी
हित की बात अशफाक ने की है। वे एकता के समर्थक थे। अपने विचारों
में उन्होंने एक स्थान पर लिखा भी है - ‘‘मैं हिन्दुस्तान की ऐसी
आजादी का ख्वाहिशमन्द हूँ, जिसमें गरीब खुश और आराम से रहते और
सब बराबर के होते।

  1. अशफाक उल्ला खाँ, भवान सिंह राणा, पृष्ठ -44
    87

क्रांतिधर्मी अशफाक ने शहीद भगत सिंह से पहले कहा था कि अगर
हिन्दुस्तान आजाद हुआ और बजाए हमारे गोरे आकाओं के हमारे वतनी
भाई सल्तनत व हुकूमत की बागडोर अपने हाथ में लेते और तफरी को
तमीज, अमीर व गरीब, जमींदार व काश्तकार में रहें तो ऐ खुदा, मुझे
ऐसी आजादी उस वक्त तक न देना जब तक मेरी मखलूक में मसावात
(बराबरी) कायम न हो जाय।’’$^1$
अशफाक क्रांतिकारी जीवन में अपने मित्रों को भी आत्म बलिदान
की प्रेरणा देते थे। समर्पित जीवन के धनी अशफाक के लिए एक मात्र
लक्ष्य था मातृभूमि की स्वतंत्रता, और इसी लक्ष्य की प्राप्ति हेतु एक
महत्वपूर्ण घटना 'काकोरी काण्ड' नाम से घटी जो क्रांतिकारी इतिहास में
महत्वपूर्ण षड्यंत्रों में गिनी जाती है।

  1. जांबाज पत्रिका (लेख), राजेश कुमार मित्तल, पृष्ठ -59
    88

अध्याय-छः

अध्याय-छ:
काकोरी काण्ड
शचीन्द्रनाथ सन्याल का यह कथन सत्य है कि क्रांतिकारियों ने
राष्ट्रीय मुक्ति संघर्ष को आगे बढ़ाने के लिए उत्प्रेरक तथा पूरक भूमिका
निभायी।¹ वे कांग्रेस द्वारा चलाये गये आन्दोलनों में बाधक भी नहीं
बने। विचारधारा भिन्न जरूर थी। क्रान्तिकारियों ने अपने शौर्यपूर्ण कार्यों
व बलिदानों से जनता में राष्ट्रीय चेतना और जुझारू संघर्ष की भावना
जागृत की।
अशफाक क्रांतिकारियों के गुप्त संगठन 'हिन्दुस्तान गणतांत्रिक संघ'
के सक्रिय सदस्य थे। यही एक ऐसा काण्ड था, जिससे अशफाक को दल
की पूर्ण समस्याओं और कार्यप्रणाली से परिचित होने का अवसर मिला।
स्पष्ट था कि क्रांतिकारी संगठनों के पास धन की समस्या थी। कमजोर
अर्थ पक्ष गतिविधियों को प्रभावित कर रहा था। हिन्दुस्तान गणतांत्रिक
संगठन को भी धनाभाव की विषम परिस्थितियों से गुजरना होता था।
आय का कोई अन्य रास्ता न था। यह भी कहा जा सकता है कि आय
के ठोस स्रोत न होने के कारण आर्थिक समस्याएं क्रांतिकारी संगठन की
असफलता का कारण थीं। राम प्रसाद बिस्मिल ने लिखा है कि - “.......
.........जब कार्य प्रारम्भ हो गया और असहयोग को टटोला गया तो वे
आन्दोलन से कहीं अधिक शिथिल हो चुके थे। उनकी आशाओं पर पूरी
तरह पानी फिर चुका था। अपने पास की पूंजी समाप्त हो चुकी थी। घर
में फाकें हो रहे थे। आगे की भी कोई विशेष आशा नहीं थी। कांग्रेस में
भी स्वराज्य दल पर जोर हो गया था। जिनके पास कुछ धन तथा इष्ट
मित्रों का संगठन था, वे कौंसिल तथा असेम्बली के सदस्य बन गये थे।

  1. स्वतंत्रता आन्दोलन में शाहजहाँपुर का योगदान, पृष्ठ-106 - डॉ०एन०सी०
    मेहोत्रा
    89

ऐसी अवस्थाओं में यदि क्रांतिकारी संगठन-कर्ताओं के पास पर्याप्त
धन होता तो वे असहयोगियों को अपने हाथ में लेकर उनसे काम ले
सकते थे। कितना भी सच्चा काम करने वाला हो, किन्तु पेट तो सबका
है।'' स्पष्ट है कि संगठन को धन की आवश्यकता थी और कोई सार्थक
जरिया दिखाई भी नहीं दे रहा था। प्रसिद्ध क्रांतिकारी और संगठन के
प्रमुख राम प्रसाद इस हेतु मुख्य प्रबन्धक शाहजहांपुर हुए। वे संगठन के
महत्वपूर्ण व्यक्ति थे। धन के अभाव में क्रांतिकारी किसी कार्य को
परिणाम तक पहुंचाने में असफल हो रहे थे। हथियार बढ़ाने, सदस्यों की
संख्या अधिक करने, पर्चे आदि हेतु धन की आवश्यकता थी। सदस्यों
द्वारा अर्जित किये गये चंदे का धन पर्याप्त न था।
संगठन के कुछ सदस्यों ने अपने घरों से पैसा लगाया तो किसी ने
चोरी की। बावजूद इसके धन की कमी रहती ही थी। देश को स्वतंत्र
कराने हेतु पर्याप्त धन आये कहां से यह चिन्ता की बात थी।
क्रांतिकारियों से सहानुभूति रखने वालों से सहायता तो मिलती ही थी,
जिसमें प्रमुख थे - पं० मोती लाल नेहरू, उपन्यासकार शरत् चन्द, राजर्षि
पुरूषोत्तम दास टण्डन, अटार्नी जनरल सर एस०एन० सरकार।¹
राम प्रसाद बिस्मिल के नेतृत्व में क्रांतिकारियों ने गांव भी लूटे,
अशफाक भी पूर्णतः सम्मिलित हुए थे। अशफाक ने अपने भाई की
राइफल का उपयोग भी किया। लेकिन जो धन प्राप्त हुआ था, वह मात्र
सौ से दो सौ रूपये तक ही सीमित रहा। राम प्रसाद इन (डकैती) कार्यों
से प्रसन्न नहीं थे। वैसे भी यह धन राष्ट्र की आजादी के लिए ही खर्च
होता था। लेकिन राम प्रसाद बिस्मिल का मत था कि भारतवासी ग्रामीण
जनता को नुकसान पहुंचाने का कोई अधिकार किसी के पास नहीं है
और यह अनुचित है।

  1. अशफाक उल्ला खाँ, भवान सिंह राणा, पृष्ठ -47
    90

राम प्रसाद बिस्मिल पर क्रांतिकारी गतिविधियों का उत्तरदायित्व अधिक
था, लेकिन वे कर भी क्या सकते थे। संगठन को नियमित रूप से
सहायता देने वालों ने भी हाथ खींच लिया था। कई कार्यकर्ताओं के ऊपर
ऋण का बोझ हो चुका था, अनेकों ने खराब आर्थिक स्थिति के कारण
दल से सम्बन्ध विच्छेद कर लिया था।¹ राम प्रसाद बिस्मिल ने अपनी
जिम्मेदारी पर ऋण लेकर जिला कार्यकर्ताओं को मासिक व्यय हेतु धन
दिया किन्तु ऐसा करना हमेशा सम्भव नहीं था। उसी समय बंगाल में
आर्डीनेंस लागू हो गया, जिसके तहत कई कार्यकर्ता तुरन्त बन्दी बना
लिये गये। कार्यकर्ताओं में उदासीनता व्याप्त होने लगी। संगठन पर
भीषण आर्थिक संकट आ गया, जिसका वर्णन बिस्मिल ने इन शब्दों में
किया है- "इस समय समिति के सदस्यों को बड़ी ही दुर्दशा का सामना
करना पड़ रहा था। चने मिलना भी कठिन था। सब पर कुछ-न-कुछ
कर्ज हो गया था। किसी के पास साबुत कपड़े तक न थे। कुछ विद्यार्थी
बनकर धर्म क्षेत्रों तक में भोजन करते थे। चार-पांच सदस्यों ने
अपने-अपने केन्द्र त्याग दिये थे। पांच सौ से अधिक रूपये मैं कर्ज लेकर
व्यय कर चुका था। यह दुर्दशा देखकर मुझे बड़ा कष्ट होने लगा। मुझसे
भरपेट भोजन नहीं किया जाता था। सहायता के लिए सहानुभूति रखने
वालों का द्वार खटखटाया, किन्तु कोरा उत्तर मिला। किंकर्तव्यविमूढ़ था।
कुछ समझ में नहीं आता था। कोमल “दय नवयुवक मेरे चारों ओर
बैठकर कहा करते थे - 'पंडित जी अब क्या करें।' मैं उनके सूखे मुख
को देखकर बहुधा रो पड़ता था कि स्वदेश सेवा का वत लेने के कारण
उनकी फकीरों से भी बुरी दशा हो रही है। एक-एक कुर्ता तथा धोती भी
ऐसी नहीं थी, जो साबुत होती।

  1. अशफाक उल्ला खां, भवान सिंह राणा, पृष्ठ - 47
    91

सारा-सारा दिन लंगोट बांधकर गुजारते थे। अंगोछे पहनकर नहाते थे,
एक समय भोजन करते थे, एक समय दो-दो पैसे का सत्तू खा लेते थे।
मैं पन्द्रह वर्ष से एक समय दूध पीता था। इन लोगों की दशा देखकर
मुझे दूध पीने का जरा भी साहस नहीं होता था। मैं सबके साथ बैठकर
सत्तू खा लेता था। मैंने विचार किया कि इतने नवयुवकों का जीवन नष्ट
करके उन्हें कहां भेजा जाए? जब समिति का सदस्य बनाया था, तो लोगों
ने बड़ी-बड़ी आशा बंधाई थी। कइयों का पढ़ना लिखना छुड़ाकर काम में
लगा दिया था।'"¹
अर्थ का प्रबन्ध करना आवश्यक था। किन्तु कैसे हो प्रबन्ध? प्रश्न
यह था। कोई उपाय न देख डाका डालना ही तय हुआ। किन्तु किसी
व्यक्ति विशेष के यहां डाका डालना उचित नहीं समझा गया। यह भी
सोचना हुआ कि क्यों न सरकारी खजाना ही लूटा जाय। भीषण अभावों
में जीवन यापन करने वाले मातृभूमि के उपासक अपने उद्देश्यों की पूर्ति
में कोई भी अवसर हाथ से जाने देना नहीं चाहते थे। यह क्रांतिकारियों
का ही साहस था कि संगठन के प्रत्येक केन्द्र पर हथियारों का अच्छा
संग्रह तैयार हो गया और सदा अवसर की ताक में रहते कि कुछ कर
दिखायें। अंग्रेजी सत्ता यह सोचने के लिए बाध्य हो जाये कि कोई
चुनौती देने वाला है। योजना के अनुसार एक ही दिन क्रांति के पर्चे
वितरित करने की बात हुई। पर्चों में अंग्रेजी सरकार के विरुद्ध विद्रोह
करने का जिक्र था। यह भी कहा गया कि क्रांतिकारियों के सामने
सोवियत संघ का आदर्श है।² पर्चों के वितरण का कार्य गोपनीयता से
हुआ। किसी को भनक तक न लगी। सरकार हैरान थी और संगठन की
व्यापकता पर आश्चर्य व्यक्त कर रही थी।

  1. अशफाक उल्ला खाँ, भवान सिंह राणा, पृष्ठ-48
  2. अशफाक उल्ला खाँ, भवान सिंह राणा, पृष्ठ-50
    92

जनता को क्रांतिकारियों के इस संगठन से परिचित होने का अवसर
मिला। इन सब गतिविधियों और आर्थिक संकटों से जूझते आगे बढ़ते हुए
प्रमुख क्रांतिकारी राम प्रसाद बिस्मिल एक दिन शाहजहांपुर से लखनऊ
यात्रा कर रहे थे। वे डिब्बे के बाहर आये। वे गार्ड के पास वाले डिब्बे में
ही बैठे थे। जब स्टेशन पर गाड़ी रुकी तो स्टेशन मास्टर एक थैली लाया
और गार्ड के डिब्बे में डाल दिया। कुछ खटपट की आवाज हुई। राम
प्रसाद ने देखा कि एक लोहे का संदूक रखा है। उन्होंने अनुमान लगा
लिया कि इसी में थैली डाली होगी। अगले स्टेशन पर भी थैली डाली
गयी। लोहे का संदूक गार्ड के डिब्बे में जंजीर से बंधा था और ताला भी
पड़ा था। यह सब राम प्रसाद ने अनुमान ही लगाया। कुछ दिनों के बाद
राम प्रसाद को लखनऊ स्टेशन पर जाने का अवसर प्राप्त हुआ। राम
प्रसाद ने देखा कि गाड़ी में से कुली लोहे का संदूक (आमदनी वाले
सन्दूक) उतार रहे हैं। पता करने पर राम प्रसाद बिस्मिल को ज्ञात हुआ
कि इस सन्दूक में जंजीर ताला कुछ नहीं पड़ता, यूं ही रखा जाता है।
राम प्रसाद ने उसी समय निश्चय किया कि इसी पर हाथ मारूँगा।¹ धुन
सवार हो गयी। राम प्रसाद ने तुरन्त जाकर टाइम-टेबुल देखा और
अनुमान लगाया कि सहारनपुर से गाड़ी चलती है, लखनऊ तक निश्चित
ही दस हजार रू० की आमदनी होती है। बिस्मिल ने अब दृढ़ निश्चय कर
लिया कि अब वे इस खजाने को लूटकर रहेंगे। उन्होंने अपना विचार दल
के अन्य सदस्यों को बता दिया। काफी बहस-विमर्श के बाद तय हुआ था
कि रेल खजाना ही लूटा जाय।

  1. राम प्रसाद बिस्मिल, पूर्वो, पृष्ठ-88

93

अशफाक का विरोध : -
रेल का खजाना लूटने की योजना राम प्रसाद बिस्मिल के दिमाग
की उपज थी। यह योजना जब दल के अन्य सदस्यों के सामने रखी
गयी, तो सबने इसे स्वीकार कर लिया और अब पूर्णरूप से रेल खजाना
लूटने की योजना बन गयी। किन्तु अशफाक इस योजना से सहमत नहीं
थे। अशफाक का स्पष्ट रूप से कहना था कि सरकारी खजाने पर धावा
बोलना उचित नहीं है, इसका अर्थ सरकार से सीधी टक्कर लेना है।¹
अशफाक ने नये कदम का डटकर मुकाबला किया। उन्होंने कहा कि जहाँ
तक चुनौती का सम्बन्ध है, इस काम से हम सरकार को चुनौती तो
अवश्य दे देंगे लेकिन पार्टी के अन्त का प्रारम्भ हो जायेगा। उन्होंने
साफ-साफ कह दिया कि अभी पार्टी बहुत कमजोर है और इस काबिल
नहीं है कि सरकार के साथ युद्ध कर सके। अशफाक ने यह भी कहा कि
जिस प्रकार यह प्रस्तावित काम करने का इरादा किया जा रहा है, इससे
फौरन सरकार को संदेह हो जायेगा और जल्द ही सरकार हमारे ऊपर टूट
पड़ेगी।² अशफाक कारण जानते थे कि दल के पास धन भी नहीं हैं और
न अन्य साधन। ऐसी स्थिति में सरकार से टक्कर लेना अपना ही सिर
फोड़ना है। अशफाक ने बहुत प्रयास किया कि उनकी बात मान ली
जाय। अशफाक जानते थे कि यह कार्य अपने पैर में कुल्हाड़ी मारने जैसा
है। लेकिन अशफाक को सफलता न मिली। विरोध सार्थक था और इससे
अशफाक की दूरदर्शिता का पता भी चलता है। वे स्थायित्व में विश्वास
करते थे। वे कोई ऐसा कार्य नहीं चाहते थे, जिससे दल को भारी
नुकसान हो। यह विरोधात्मक स्वर भी अशफाक के व्यक्तित्व ही नहीं
कृतित्व को भी दर्शाता है।


  1. अशफाक उल्ला खाँ, भवान सिंह राणा, पृष्ठ -59
  2. जांबाज (पत्रिका), मन्मथनाथ गुप्त, पृष्ठ-3
    94

क्रांतिकारी दल की मुख्य समिति ने बिस्मिल की योजना को
स्वीकृति दे दी। इसके बाद भी अशफाक बार-बार बिस्मिल को इस कार्य
के सम्भावित घातक परिणामों से सचेत करते रहे। लेकिन अब तो जो हो
गया सो हो गया। अब निर्णय को बदलना बिस्मिल के लिए भी असम्भव
था। अन्त में अशफाक को बिस्मिल ने सहमत कर लिया। अन्ततः
रेलगाड़ी लूटने की योजना बनाई गयी। योजना के प्रत्येक पहलू पर खूब
विचार किया गया। प्रथम चरण में यह निश्चित हुआ कि रेलगाड़ी जब
किसी छोटे स्टेशन पर खड़ी हो तो स्टेशन के तारघर पर अधिकार कर
लिया जाये।¹
अशफाक ने भले ही स्वीकार कर लिया लेकिन उनका भीतरी
व्यक्तित्व इस कार्य हेतु स्वीकृति नहीं देता था। वहीं चन्द्रशेखर आजाद
सबसे अधिक प्रसन्न थे। वे सरकार को खुली चुनौती देते हुए सीधी
टक्कर लेने में विश्वास रखते थे। यही कारण था कि योजना के सबसे
अधिक प्रबल समर्थक चन्द्रशेखर आजाद ही थे। चन्द्रशेखर आजाद जैसी
विचारधारा वाले संगठन के सदस्यों का मत था कि यदि गाड़ी का गार्ड,
ड्राइवर आदि अंग्रेज हुए तो उन्हें भी गोली मार दी जाये। बिस्मिल ऐसे
विचार से कतई सहमत नहीं थे। वे व्यर्थ की हत्या या रक्तपात के विरोधी
थे। अशफाक उल्ला खां तो प्रारम्भ से ही इस प्रकार की डकैती के विरुद्ध
थे।² वे चाहते थे कि क्रांतिकारी जो भी कार्य करें छिपकर करें।
क्रांतिकारी मन्मथ नाथ गुप्त जो स्वयं काकोरी काण्ड में सम्मिलित
हुए थे, वे अशफाक की असहमति पर लिखते हैं कि - 'इस बार एक बड़ी
योजना बनाई गई थी। यह तय किया गया कि लखनऊ के पास काकोरी
नामक स्थान पर 8 डाउन रेल को

  1. स्वतंत्रता आन्दोलन में शाहजहांपुर का योगदान, डॉ० एन०सी० मेहरोत्रा,
    पृष्ठ-118
  2. स्वतंत्रता आन्दोलन में शाहजहांपुर का योगदान, डॉ० एन०सी० मेहरोत्रा,
    पृष्ठ-118
    95

रोककर उसमें आने वाला रेल खजाना लूट लिया जाए। काकोरी स्टेशन
के पास एक वीरान जगह चुन ली गई थी। सारी तैयारियां गुपचुप,
लेकिन बड़ी सरगर्मी के साथ होती रहीं। पर अशफाक अब भी इस डाके
का विरोध करते रहे। यह मानना पड़ेगा कि वह बहुत दूर की चीज सोच
रहे थे। उनका कहना था कि हमारा दल अभी इतना मजबूत नहीं है कि
हम ब्रिटिश सरकार को खुली चुनौती दे सकें। अभी हम इस हालत में
नहीं हैं कि हम सरकार से सीधी लड़ाई छेड़कर दल को कायम रख सकें।
लेकिन सब जोश के मारे फड़क रहे थे, और अशफाक उल्ला की बात
नक्कार खाने में तूती की आवाज बनकर रह गयी।''¹
मन्मथ नाथ गुप्त ने आगे लिखा कि - '.......एक महत्वपूर्ण बात
यह थी कि यों तो अशफाक उल्ला सरकारी खजाने की डकैती के विरोधी
थे, पर जब उन्होंने देखा कि उनकी एक न चली और क्रांतिकारी इस
काम को करने पर ही तुले हैं, तब उन्होंने भी कमर कस ली। उनकी
सुन्दर बड़ी-बड़ी आँखे तेज से दीप्त हो उठीं ओर वह अपना पार्ट अदा
करने के लिए अत्यन्त साहस तथा प्रसन्नता से प्रस्तुत हो गये। उनका
विरोध किसी डर या भय से प्रेरित न था, बल्कि वह बुद्धिमत्ता की
आवाज थी। बाद के इतिहास ने सिद्ध कर दिया कि अशफाक सही थे
और बाकी सभी क्रांतिकारी गलती पर थे। यह बात तो निश्चित है कि
यदि हम इस कार्य को न करते तो इतनी जल्दी हमारे पांव न उखड़ते।''²

  1. अशफाक उल्ला खाँ, भवान सिंह राणा, पृष्ठ -61
  2. भारतीय क्रांतिकारी आन्दोलन का इतिहास, मन्मथनाथ गुप्त, पृष्ठ-
    209-210
    96

उपरोक्त कथनों से स्पष्ट हो जाता है कि अशफाक उल्ला खां
दूरदर्शी मस्तिष्क के धनी थे और उस समय के क्रांतिकारियों में मानसिक
रूप से उनका स्थान ऊंचा था। अशफाक का विरोधात्मक स्वर व्यर्थ गया
और इस कार्य हेतु दस क्रांतिकारी युवकों का चयन कर लिया गया, जो
इस प्रकार है - पंडित राम प्रसाद बिस्मिल, चन्द्रशेखर आजाद, अशफाक
उल्ला खां, राजेन्द्र नाथ लाहिड़ी, मुकुन्दी लाल, मन्मथनाथ गुप्त, बनवारी
लाल, शचीन्द्र नाथ बख्शी, मुरारी लाल, कुन्दन लाल। राम प्रसाद
बिस्मिल इस योजना को क्रियान्वित करने वाले दल के नेता बने। अत्यन्त
गुप्त रूप से, पूरी सावधानी रखते हुए तेजी से तैयारियों होने लगीं। इसके
लिए लखनऊ से कुछ दूर काकोरी नामक स्थान का चयन भी कर लिया
गया।¹

  1. अशफाक उल्ला खाँ, भवान सिंह राणा, पृष्ठ -60
    97