श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
२०६ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ५
२०६ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ५
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सांख्यानां कपिलो देवो ज्ञानयोगियोंमें कपिलदेव हो और रुद्रोंमें
रुद्राणामसि शङ्करः॥” महादेव हो” इत्यादि पुराणवचनोंमें
इति परमर्षिः प्रसिद्धः । कपिल नामसे महर्षि कपिल ही
“ततस्तदानीं तु भुवनमस्मि- प्रसिद्ध हैं।
न्प्रवर्तते कपिलं कवीनाम् । स अथवा “ततस्तदानीं तु भुवनम-
षोडशास्रो पुरुषश्च विष्णोर्विराज- स्मिन् प्रवर्तते कपिलं कवीनाम् । स
मानं तमसः परस्तात्” इति श्रूयते षोडशास्रः पुरुषश्च विष्णोर्विराजमानं
मुण्डकोपनिषदि । स एव वा तमसः परस्तात् ।” इस मुण्डको-
कपिलः प्रसिद्धोऽग्रे सृष्टिकाले । पनिषद्की श्रुतिके अनुसार वह
यो ज्ञानैर्धर्मज्ञानवैराग्यैश्वर्यैर्बिभर्ति हिरण्यगर्भ ही पूर्वकालमें सृष्टिके
बभार जायमानं च पश्येदपश्य- समय ‘कपिल’ नामसे प्रसिद्ध हुआ
दित्यर्थः ॥ २ ॥ जिसे परमात्माने अपने ज्ञानोंसे--
धर्म, ज्ञान, वैराग्य और ऐश्वर्योंसे
युक्त किया और उत्पन्न होते
देखा ॥२॥
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किञ्च— तथा—
एकैकं जालं बहुधा विकुर्व-
न्नस्मिन्क्षेत्रे संहरत्येष देवः ।
भूयः सृष्ट्वा पतयस्तथेशः
सर्वाधिपत्यं कुरुते महात्मा ॥ ३ ॥
इस संसारक्षेत्रमें यह देव [ सृष्टिके समय ] एक-एक जालको*
अनेक प्रकारसे विकृत कर [ अन्तमें ] संहार करता है; तथा यह महात्मा
१. यह श्रुति मुण्डकोपनिषद्में नहीं मिलती, अन्यत्र भी उसका पता
नहीं चलता । श्रुतिका पाठ भी शुद्ध नहीं जान पड़ता । परम्परासे जैसा पाठ मिला
वैसा ही रहने दिया है और अर्थसंगति न लगनेके कारण उसका अनुवाद नहीं
किया गया है ।
- 'जाल' शब्दके अर्थ टीकाकारोंने भिन्न-भिन्न प्रकारसे किये हैं । भगवान्
अध्याय ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ २०७
ईश्वर ही [ कल्पान्तरके आरम्भमें ] प्रजापतियोंको पुनः उत्पन्न कर सबका
आधिपत्य करता है ॥३॥
एकैकमिति । सुरनरतिर्यगा- | 'एकैकम्' इत्यादि । यह देव
दीनां सृजति जालमेकैकं प्रत्येकं | इस मायामय क्षेत्रमें सृष्टिके समय
बहुधा नानाप्रकारं विकुर्वन्सृष्टि- | देवता, मनुष्य एवं तिर्यगादिके एक-
कालेऽस्मिन्मायात्मके क्षेत्रे संहर- | एक जालको नाना प्रकारसे विकृत
त्येष देवः । भूयः पुनर्य लोकानां | करके रचता है और फिर संहार
| कर देता है। फिर यह ईश्वर महात्मा,
पतयो मरीच्यादयस्तान्सृष्ट्वा तथा | जिस प्रकार इसने पूर्वकल्पमें मरीचि
यथा पूर्वस्मिन्कल्पे सृष्टवानीशः | आदि जो लोकाध्यक्ष हैं उन्हें रचा
सर्वाधिपत्यं कुरुते महात्मा ॥३॥ | था उसी प्रकार पुनः रचकर उन
| सबका आधिपत्य करता है ॥३॥
किञ्च— | तथा—
सर्वा दिश ऊर्ध्वमधश्च तिर्य-
क्प्रकाशयन्भ्राजते यद्दनड्वान् ।
एवं स देवो भगवान्वरेण्यो
योनिस्वभावानधितिष्ठत्येकः ॥ ४॥
भाष्यकारने इसका कोई अर्थ नहीं किया । श्रीशङ्करानन्दजी लिखते हैं—'जालं
महेन्द्रजालं संसाररूपं प्रतिप्राणिव्यवस्थितमित्यर्थः' अर्थात् 'जाल शब्दका तात्पर्य है
प्रत्येक प्राणीसे सम्बन्ध रखनेवाला संसाररूप महान् इन्द्रजाल ।' श्रीनारायणतीर्थ कहते
हैं—'जालं कर्मफललक्षणं बन्धम्' अर्थात् 'कर्मफलरूप बन्धन ही जाल है ।' तथा
विज्ञानभगवान्का कथन है—'जालं समष्टिरूप कार्यकारणलक्षणानि जालानि पुरुष-
मत्स्यानां बन्धनत्वाज्जालवज्जालम्' अर्थात् 'समष्टिरूप भूत और इन्द्रियवर्गरूप जाल
ही पुरुषरूप मत्स्योंको बाँधनेवाले होनेसे जालके समान जाल हैं ।'