श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
१८२ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ४
१८२ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ४
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मस्यैव महिमा परमेश्वरस्येति | इस परमात्माकी ही है—ऐसा जिस
| समय देखता है उस समय यह
यदैवं पश्यति तदा वीतशोको | शोकरहित हो जाता है । अर्थात्
| सम्पूर्ण शोकसागरसे मुक्त यानी
भवति । सर्वस्माच्छोकसागराद्वि- | कृतकृत्य हो जाता है । अथवा
| [ ऐसा अर्थ करना चाहिये कि ]
मुच्यते कृतकृत्यो भवतीत्यर्थः । | जिस समय इस भोक्ता जीवको यह
अथवा जुष्टं यदा पश्यत्यन्यमीश- | योगिसेवित अन्य-ईश्वररूप अर्थात्
| इस प्रत्यगात्माकी ही महिमारूप
मस्यैव प्रत्यगात्मनो महिमानम् | देखता है उस समय शोकरहित हो
इति तदा वीतशोको भवति ॥७॥ | जाता है ॥७॥
ब्रह्मकी अधिष्ठानरूपता और उसके ज्ञानसे कृतार्थता
इदानीं तद्विदां कृतार्थतां | अब श्रुति ब्रह्मवेत्ताओंकी कृतार्थता
दर्शयति— | प्रदर्शित करती है—
ऋचो अक्षरे परमे व्योमन्
यस्मिन्देवा अधि विश्वे निषेदुः ।
यस्तं न वेद किमृचा करिष्यति
य इत्तद्विदुस्त इमे समासते ॥ ८ ॥
जिसमें समस्त देवगण अधिष्ठित हैं उस अक्षर परव्योममें ही वेदत्रय
स्थित हैं [ अर्थात् वे भी उसीका प्रतिपादन करते हैं ] । जो उसको नहीं
जानता वह वेदोंसे ही क्या कर लेगा ? जो उसे जानते हैं वे तो ये कृतार्थ
हुए स्थित हैं ॥ ८ ॥
ऋच इति । वेदत्रयवेद्येऽक्षरे | 'ऋचः' इत्यादि । वेदत्रयवेद्य
परमे व्योमन्व्योम्याकाशकल्पे | अक्षर परमाकाशमें—आकाशसदृश