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श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished276 पृष्ठ

पुष्टिके लिये वे इसके कई मन्त्र उद्धृत करते हैं; परन्तु उनमें प्रधान

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इसी प्रकार द्वैतवादियोंने भी इस ग्रन्थके वाक्योंसे अपने
सिद्धान्तको पुष्ट करनेका प्रयत्न किया है। यों तो अपने सिद्धान्तकी
पुष्टिके लिये वे इसके कई मन्त्र उद्धृत करते हैं; परन्तु उनमें प्रधान
चतुर्थ अध्यायके छठे और सातवें मन्त्र ही हैं। वे इस प्रकार हैं—
द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्षं परिषस्वजाते।
तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्त्यनश्नन्नन्योऽभिचाकशीति ॥
समाने वृक्षे पुरुषो निमग्नोऽनीशया शोचति मुह्यमानः।
जुष्टं यदा पश्यत्यन्यमीशमस्य महिमानमिति वीतशोकः ॥
इन मन्त्रोंके द्वारा द्वैतवादी आचार्योंने जीव और ईश्वरका
भेद सिद्ध करनेकी चेष्टा की है; परन्तु आचार्यने पूर्वमन्त्रके दो सखा
सुवर्ण विज्ञानात्मा और परमात्मा तथा द्वितीय मन्त्रके पुरुष और
ईश अविद्याग्रस्त जीव और प्रत्यगात्मा बतलाकर उनका केवल औपा-
धिक भेद प्रदर्शित करते हुए परमार्थतः एकत्व ही सिद्ध किया है।
इस विषयमें शारीरकभाष्यमें भी बड़ा युक्तियुक्त विचार किया
गया है।
यह सब होते हुए भी यह नहीं कहा जा सकता कि अन्य मताव-
लम्बियोंके सिद्धान्त सर्वथा अलीक ही हैं। वस्तुतः परमप्रमाणभूता
श्रुति और उसके प्रमेय श्रीभगवान् दोनों ही वाञ्छाकल्पतरु हैं।
उन्हें जो जिस भावसे भजता है उसे उनकी उसी रूपमें अनुभूति होती
है। उनका परमार्थस्वरूप सर्वथा अनिर्वचनीय और मन-बुद्धि आदिका
अविषय है; किन्तु जिस रूपमें उनकी अनुभूति होती है उससे भी
उनका किसी प्रकारका भेद नहीं है। इसलिये उसके द्वारा भी उन्हीं-
की झाँकी होती है। वे सर्वरूप हैं, सर्वातीत हैं और सबके साक्षी हैं। बस,
एकमात्र वे ही वे हैं। जिसे हम उनसे भिन्न समझते हैं वह भी उन्हींकी
प्रतिकृति है। वस्तुतः ऐसा कोई देश, काल या पदार्थ नहीं है जो उनसे
भिन्न हो और यों किसी भी देश, काल या पदार्थके द्वारा उनका
ग्रहण भी नहीं किया जा सकता; सारे मत उन्हींका प्रतिपादन करते
हैं और वस्तुतः वे किसी भी मतके विषय भी नहीं हो सकते। यह

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एक विचित्र पहेली है। व्यवहारमें किन्हीं भी दो विरुद्ध धर्मोंका
सामानाधिकरण्य नहीं हो सकता; परन्तु यहाँ सारे विरोधोंका समन्वय
हो जाता है, क्योंकि वे सर्वाधिष्ठान हैं। यदि यहाँ भी सबका सामञ्जस्य
न हुआ तो और हो ही कहाँ सकता है ? अस्तु ।
इस प्रकार यह उपनिषद् परमार्थतत्त्वके जिज्ञासुओंके लिये बहुत
ही उपयोगी है। इसपर शाङ्करभाष्यके अतिरिक्त श्रीशङ्करानन्दकृत
दीपिका, श्रीनारायणविरचित दीपिका और श्रीविज्ञानभगवान्कृत
विवरणनामक तीन टीकाएँ और हैं। भगवान् शङ्करकी विवेचनशैली
बड़ी ही गम्भीर, प्रसादपूर्ण और युक्तियुक्त होती है। उनके पाण्डित्य
और युक्तिकौशलको विपक्षी विद्वान् भी मुक्तकण्ठसे स्वीकार करते
हैं। परन्तु प्रस्तुत भाष्यमें वह प्रतिभा नहीं देखी जाती। इसमें न
वह गाम्भीर्य है, न प्रसाद है और न युक्तिकौशल ही है। इसीसे अधि-
कांश विद्वानोंका ऐसा मत है कि यह आचार्यकी रचना नहीं है।
किन्हीं अन्य मठस्थ शङ्कराचार्यने इसे लिखकर अपने भाष्यकी प्रतिष्ठा-
के लिये भगवान् भाष्यकारके नामसे प्रसिद्ध कर दिया है। इसके
आचार्यकृत न होनेमें और भी कई कारण बताये जाते हैं। परन्तु यहाँ
उन्हें उद्धृत करनेका कोई विशेष प्रयोजन नहीं है। इस प्रकारकी
खोज ऐतिहासिक और साहित्यिक दृष्टिसे तो अवश्य बहुत आवश्यक
है; परन्तु जिज्ञासुओंका तो मुख्य लक्ष्य अपनी ज्ञानपिपासाकी शान्ति-
पर ही होना चाहिये। इसकी रचना कैसी ही शिथिल और प्रसाद-
शून्य हो, इसमें कल्याणकामियोंकी शान्तिके लिये पुष्कल सामग्री है।
इसलिये इसका अनुशीलन उनके लिये किसी प्रकार अनुपयोगी नहीं
हो सकता।
इस उपनिषद्के प्रकाशनसे एक चिरकालिक अभिलाषाकी पूर्तिके
कारण मुझे बड़ी प्रसन्नता हो रही है। आजसे प्रायः सात वर्ष पूर्व
इन एकादश उपनिषदोंके भाष्यका हिन्दी-अनुवाद करनेका संकल्प
हुआ था। भगवत्कृपासे वह संकल्प पूरा हो गया। छान्दोग्यतक
नौ उपनिषदोंको प्रकाशित हुए प्रायः दो वर्ष हो गये हैं। बृहदारण्यक

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और श्वेताश्वतर शेष थे। इनका अनुवाद भी समाप्त हो गया।
प्रचलित क्रमके अनुसार पहले बृहदारण्यक प्रकाशित होना चाहिये
था, परन्तु छोटा होनेके कारण पहले श्वेताश्वतरका अनुवाद किया
गया और वही पहले प्रकाशित भी हो रहा है। बृहदारण्यककी छपाई
भी आरम्भ हो गयी है, आशा है वह भी शीघ्र ही प्रकाशित हो जायगा।
इस प्रकार अनुवादके ही बहाने जो यत्किञ्चित् सत्पुरुषोंकी सेवा
और सद्ग्रन्थोंका मनन होता है, उससे किसी प्रकार भगवत्कृपाका
पात्र बन सकूँ-ऐसा प्रेमी पाठक आशीर्वाद देनेकी कृपा करें।
विनीत
अनुवादक