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श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished276 पृष्ठ

अध्याय ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ २३७

अध्याय ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ २३७
तावापः पुरुषवचसो भवन्ति" (जल) पुरुष नामवाला हो जाता है।"
(छा० उ० ५।९।१) इति। सन्निविष्ट—आत्मभावसे सम्यग्रूपसे
संनिविष्टः सम्यगात्मत्वेन नि- स्थित है। अथवा 'सलिले'—यज्ञ-
विष्टः। अथवा सलिले सलिल दानादिद्वारा सलिल (जल) के
इव स्वच्छे यज्ञदानादिना समान स्वच्छ किये अन्तःकरणमें
विमलीकृतेऽन्तःकरणे संनिविष्टो स्थित वेदान्तवाक्यार्थके सम्यग्ज्ञानके
वेदान्तवाक्यार्थसम्यग्ज्ञानफलका- फलरूपसे अविद्या और उसके कार्य-
रूढोऽविद्यातत्कार्यस्य दाहक का दाह करनेवाला [ अग्नि ]—ऐसा
इत्यर्थः। तस्मात्तमेव विदित्वाति भी अर्थ हो सकता है। अतः उसी-
मृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यते- को जानकर पुरुष मृत्युके पार हो
ऽयनाय ॥१५॥ जाता है, मोक्षके लिये कोई और मार्ग
नहीं है ॥१५॥
परमेश्वरके स्वरूपका विशेषरूपसे वर्णन
परमपदप्राप्तये पुनरपि तमेव परमपदकी प्राप्तिके लिये श्रुति
विशेषतो दर्शयति— फिर भी उसीको विशेषरूपसे प्रदर्शित
करती है—
स विश्वकृद्विश्वविदात्मयोनि-
र्ज्ञः कालकारो गुणी सर्वविद्यः ।
प्रधानक्षेत्रज्ञपतिर्गुणेशः
संसारमोक्षस्थितिबन्धहेतुः ॥१६॥
वह विश्वका कर्ता, विश्ववेत्ता, आत्मयोनि (स्वयम्भू), ज्ञाता, कालका
प्रेरक, अपहतपाप्मत्वादि गुणवान् और सम्पूर्ण विद्याओंका आश्रय है। तथा
वही प्रधान और पुरुषका अध्यक्ष, गुणोंका नियामक एवं संसारके मोक्ष,
स्थिति और बन्धनका हेतु है ॥१६॥