श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९९
अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९९
इत्याशङ्क्य दृष्टान्तपूर्वकं व्यवस्थां | दृष्टान्तपूर्वक व्यवस्था दिखलाते हैं—
दर्शयति— | “जिस प्रकार एक ही सूर्य विभिन्न
“एकस्तु सूर्यो बहुधा | जलाधारोंमें अनेकरूप दिखायी देता
जलाधारेषु दृश्यते । | है उसी प्रकार समस्त उपाधियोंमें
आभाति परमात्मा च | स्थित परमात्मा भी अनेकवत् भासता
सर्वोपाधिषु संस्थितः ॥ | है । वह परब्रह्म समस्त शरीरोंके
ब्रह्म सर्वशरीरेषु | बाहर और भीतर भी स्थित है ।
बाह्ये चाभ्यन्तरे स्थितम् । | जिस प्रकार आकाश पञ्चभूतोंमें
आकाशमिव भूतेषु | ओतप्रोत है उसी प्रकार समस्त
बुद्धावात्मान चान्यथा॥ | बुद्धियोंमें एक ही आत्मा अनुस्यूत
एवं सति यथा बुद्ध्या | है, और किसी प्रकार नहीं । ऐसी
देहोऽहमिति मन्यते । | स्थितिमें अनात्मामें आत्मत्वकी भ्रान्ति
अनात्मन्यात्मताभ्रान्त्या | हो जानेसे वैसी बुद्धिके द्वारा वह जीव
सा स्यात्संसारबन्धिनी ॥ | जो ऐसा मानने लगता है कि 'मैं देह
सर्वैर्विकल्पैर्हीनस्तु | हूँ' यह मति ही उसे संसारमें बाँधने-
शुद्धो बुद्धोऽजरोऽमरः । | वाली है । किन्तु इन समस्त
प्रशान्तो व्योमवद्व्यापी | विकल्पोंसे रहित वह शुद्ध, बुद्ध,
चैतन्यात्मासकृत्प्रभः ॥ | अजर, अमर, अत्यन्त शान्त,
धूमाभ्रधूलिभिर्व्योम | आकाशके समान व्यापक, चैतन्य-
यथा न मलिनायते । | स्वरूप और नित्यज्योतिःस्वरूप है ।
प्राकृतैरपरामृष्टो | जिस प्रकार धूम, मेघ और धूलि
विकारैः पुरुषस्तथा ॥ | आदिसे आकाश मलिन नहीं होता
यथैकस्मिन्घटाकाशे | उसी प्रकार पुरुष प्रकृतिके विकारोंसे
जलैर्धूमादिभिर्युते । | असंग है । जिस प्रकार एक घटा-
नान्ये मलिनतां यान्ति | काशके जल या धूमादिसे युक्त
दूरस्थाः कुत्रचित्क्वचित् ॥ | होनेपर उससे दूर रहनेवाले अन्य
| सब घटाकाश कभी किसी भी
१०० श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १
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तथा द्वन्द्वैरनेकैस्तु | स्थानमें मलिन नहीं होते उसी प्रकार
जीवे च मलिनीकृते । | एक जीवके अनेकों द्वन्द्वोंसे अभिभूत
एकस्मिन्नापरे जीवा | होनेपर भी अन्य जीव कहीं भी
मलिनाः सन्ति कुत्रचित् ॥” | मलिन नहीं हो सकते।”
तथा च शुकशिष्यो गौड- | इसी तरह शुकदेवजीके शिष्य
पादाचार्यः— | श्रीगौडपादाचार्य कहते हैं—“जिस
“यथैकस्मिन्घटाकाशे | प्रकार एक घटाकाशके धूलि और
रजोधूमादिभिर्युते । | धूमादिसे युक्त होनेपर अन्य सब
न सर्वे संप्रयुज्यन्ते | घटाकाश उनसे युक्त नहीं होते, उसी
तद्वज्जीवाः सुखादिभिः॥” | तरह [ एक जीवके ] सुखादिसे सब
(माण्डू० का० ३। ५) इति। | जीव भी युक्त नहीं होते।”
तस्मादद्वितीये परमात्मन्यु- | अतः अद्वितीय परमात्मामें उपाधि-
[जीवगतदुःख-] पाधितो जीवेश्वर- | से ही जीव, ईश्वर और जीवोंके
[सुखादेरीश्वरे-] योर्जीवानां च भेद- | पारस्परिक भेदकी व्यवस्था सिद्ध
[ऽप्राप्तिः] व्यवस्थायाः सिद्ध- | होनेसे विशुद्ध सत्त्वमयी उपाधिवाले
त्वान्न विशुद्धसत्त्वोपाधेरीश्वरस्या- | ईश्वरको अशुद्ध उपाधिवाले जीवके
विशुद्धोपाधिजीवगताः सुख- | सुख, दुःख, मोह एवं ज्ञानादि प्राप्त
दुःखमोहाज्ञानादयः । तथा च | नहीं हो सकते । ऐसा ही भगवान्
भगवान्पराशरः— | पराशरजी कहते हैं—“समस्त
“ज्ञानात्मकस्यामलसत्त्वराशे- | जीवोंके अन्तःकरणोंमें स्थित ज्ञान-
रपेतदोषस्य सदा स्फुटस्य । | स्वरूप, विशुद्ध सत्त्वराशि, सर्वदोष-
किं वा जगत्यस्ति समस्तपुंसा- | निर्मुक्त और नित्य प्रकाशस्वरूप
मज्ञातमस्यास्ति हृदि स्थितस्य ॥” | परमात्माको संसारमें कौन वस्तु
(विष्णुपु० ५। १७।३२) इति। | अज्ञात है ?”
नापि जीवान्तरगतसुखदुःख- | इसके सिवा किसी बद्ध या मुक्त
| जीवान्तरका किसी अन्य जीवके