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श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished276 पृष्ठ

[अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६१

[अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६१


मानत्वादस्वातन्त्र्यात्सृष्टिस्थिति- | होनेके कारण वह सृष्टि, स्थिति,
प्रलयनियमलक्षणकार्यकरणत्वा- | प्रलय और प्रेरणारूप कार्य करनेमें
योगात् । | समर्थ नहीं है ।
आत्मा तर्हि कारणं स्यादे- | तब तो आत्मा कारण हो ही
[आत्मनः सृष्टिकारणत्व-निरासः] वात आह—आत्मा- | सकता है, इसपर कहते हैं—
प्यनीशः सुखदुःख- | 'आत्माप्यनीशः सुखदुःखहेतोः ।'
हेतोरिति । आत्मा | अर्थात् आत्मा यानी जीव भी अनीश—
जीवोऽप्यनीशोऽस्वतन्त्रो न कार- | अस्वतन्त्र है—वह भी सृष्टि आदिका
णम्, अस्वातन्त्र्यादेव चात्मनो- | कारण नहीं है । तात्पर्य यह है
ऽपि सृष्ट्यादिहेतुत्वं न संभव- | कि अस्वतन्त्रताके ही कारण आत्माका
तीत्यर्थः । कथमनीशत्वम् ? सुख- | भी सृष्टि आदिमें हेतु होना सम्भव
दुःखहेतोः सुखदुःखहेतुभूतस्य | नहीं है । इसकी अस्वतन्त्रता कैसे है !
पुण्यापुण्यलक्षणस्य कर्मणो विद्य- | [ सो बताते हैं-] सुखदुःखहेतोः-
मानत्वात्कर्मपरवशतवेनास्वात- | सुख-दुःखके हेतुभूत पुण्यापुण्यरूप
न्त्र्याच्च । त्रैलोक्यसृष्टिस्थितिनियमे | कर्म विद्यमान हैं, अतः उन कर्मोंके
सामर्थ्यं न विद्यत एवेत्यर्थः । | अधीन होनेसे इसकी अस्वतन्त्रता है ।
अथवा सुखदुःखादिहेतुभूतस्या- | इसीसे त्रिलोकीकी सृष्टि, स्थिति और
ध्यात्मिकादिभेदभिन्नस्य जगतो- | नियमनमें इसका सामर्थ्य नहीं ही
ऽनीशो न कारणम् ॥ २ ॥ | है—यही इसका अभिप्राय है। अथवा
| [ यों समझना चाहिये कि ] आत्मा
| सुख-दुःखादिके हेतुभूत आध्यात्मि-
| कादि भेदोंवाले जगत्का ईश—
| कारण नहीं है* ॥ २ ॥


* क्योंकि जो आध्यात्मिकादि भेदोंवाला जगत् आत्माके बन्धन और दुःखका
कारण है उसकी वह स्वतन्त्रतासे स्वयं ही क्यों रचना करेगा ?