न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)
Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya
महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा
स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)
३८. सू० ] इन्द्रियपरीक्षाप्रकरणम् १९९
३८. सू० ] इन्द्रियपरीक्षाप्रकरणम् १९९
लब्धिर्नासावभावं प्रतिपादयति, यथा—चन्द्रमसः परभागस्य, पृथिव्याश्चाधो-
भागस्य ॥ ३६ ॥
द्रव्यगुणधर्मभेदाच्चोपलब्धिनियमः ॥ ३७ ॥
भिन्नः खल्वयं द्रव्यधर्मो गुणधर्मश्च, महदनेकद्रव्यञ्च १विषक्तावयवमाप्यं
द्रव्यं प्रत्यक्षतो नोपलभ्यते, स्पर्शस्तु शीतो गृह्यते, तस्य द्रव्यस्यानुबन्धात् हेमन्त-
शिशिरौ कल्पेते, तथाविधमेव च तैजसं द्रव्यमनुद्भूतरूपं सह रूपेण नोपलभ्यते,
स्पर्शस्त्वस्योष्ण उपलभ्यते; तस्य द्रव्यस्यानुबन्धाद् ग्रीष्मवसन्तौ कल्पेते ॥ ३७ ॥
यत्र त्वेषा भवति—
अनेकद्रव्यसमवायात् २ रूपविशेषाच्च रूपोपलब्धिः ३ ॥ ३८ ॥
यत्र रूपं च द्रव्यं च तदाश्रयः प्रत्यक्षत उपलभ्यते, रूपविशेषस्तु यद्भावात्
क्वचिद्रूपोपलब्धिः, यदभावाच्च द्रव्यस्य क्वचिदनुपलब्धिः—स रूपधर्मोऽयमुद्भव-
समाख्यात इति । अनुद्भूतरूपश्चायं नायनो रश्मिः, तस्मात् प्रत्यक्षतो नोपलभ्यत
प्रत्यक्ष से उपलब्ध नहीं होता तो उनके विषय में क्या हम यह मान बैठते हैं कि उनका
अभाव है ! ॥ ३६ ॥
तथा द्रव्यगुणभेद से उपलब्धि में नियम होता है ॥ ३७ ॥
ये द्रव्य तथा गुण के धर्म भिन्न-भिन्न हैं। कोई प्रत्यक्षतः उपलब्ध हो जाता है, कोई
नहीं होता। जैसे जलीय द्रव्य ( वायुनीत जलीय त्र्यणुकादि ) महान्, अनेकद्रव्यवान् तथा
विभक्तावयव होते हुए भी प्रत्यक्ष से उपलब्ध नहीं होता, परन्तु उसका शीतस्पर्श प्रत्य-
क्षतः गृहीत है; उसी से द्रव्य अनुमेय है। अतः उस द्रव्य के अनुबन्ध से हेमन्त-शिशिर
ऋतु की कल्पना की जाती है। इसी प्रकार, तैजस द्रव्य, जिसका रूप अनुद्भूत है, रूप
से युक्त होने पर भी प्रत्यक्ष नहीं होता; परन्तु उसका उष्ण स्पर्श प्रत्यक्षतः अनुभूत होता
है; उसीसे द्रव्य अनुमेय होता है। उस द्रव्य के अनुबन्ध से ग्रीष्म-वसन्त ऋतु की कल्पना
की जाती है ॥ ३७ ॥
जहाँ यह रूपोपलब्धि होती है, वहाँ—
अनेक द्रव्यों के समवाय सम्बन्ध होने से तथा ('उद्भूत' नामक) रूपविशेष से रूप-
सहित द्रव्यों की उपलब्धि होती है ॥ ३८ ॥
जहाँ रूप, द्रव्य तथा तदाश्रय प्रत्यक्षतः उपलब्ध होते हैं; वहाँ रूपविशेष प्रयोजक
है, जिसकी सत्ता से रूपोपलब्धि होती है, तथा अभाव से कहीं रूपोपलब्धि नहीं हो पाती—
यह रूपधर्म 'उद्भव' कहलाता है। यह चाक्षुष रश्मि अनुद्भूत होने के कारण प्रत्यक्षतः
उपलब्ध नहीं हो पाती। लोक में तेज का भी धर्मभेद देखा जाता है, यथा—तेज
१. विभक्तावयवम्—इति पाठः । २. अनेकद्रव्येण समवायादिति वार्त्तिकसम्मतः
पाठः । ३. इदं सूत्रं वैशेषिकसूत्रेष्वपि ( ४. अ० १. आ० ६ सू० ) दृश्यते ।
२०० वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ३. अ० १. आ०
इति । दृष्टश्च तेजसो धर्मभेदः—उद्भूतरूपस्पर्शं प्रत्यक्षं तेजः, यथा-आदित्य-
रश्मयः; उद्भूतरूपमनुद्भूतस्पर्शं च प्रत्यक्षं तेजः, यथा-प्रदीपरश्मयः; उद्भूत-
स्पर्शमनुद्भूतरूपमप्रत्यक्षम्, यथा-अवादिसंयुक्तं तेजः। अनुद्भूतरूपस्पर्शोऽ-
प्रत्यक्षश्चाक्षुषो रश्मिरिति ॥ ३८ ॥
कर्मकारितश्चेन्द्रियाणां व्यूहः पुरुषार्थतन्त्रः ॥ ३९ ॥
यथा चेतनस्यार्थो विषयोपलब्धिभूतः सुखदुःखोपलब्धिभूतश्च कल्प्यते,
तथेन्द्रियाणि व्यूढानि, विषयप्राप्त्यर्थश्च रश्मेश्चाक्षुषस्य व्यूहः । रूपस्पर्शानिभि-
व्यक्तिश्च व्यवहारप्रवृत्त्यर्था१ द्रव्यविशेषे च प्रतिघातादावरणोपपत्तिर्व्यवहा-
रार्था। सर्वद्रव्याणां विश्वरूपो व्यूह इन्द्रियवत् कर्मकारितः पुरुषार्थतन्त्रः ।
कर्म तु धर्माधर्मभूतं चेतनस्योपभोगार्थमिति ।
अव्यभिचाराच्च प्रतिघातो भौतिकधर्मः२ ।
यश्चावरणोपलम्भादिन्द्रियस्य द्रव्यविशेषे प्रतिघातः स भौतिकधर्मो न भूतानि
अद्भूतरूपस्पर्श वाला प्रत्यक्ष उपलब्ध होता है, जैसे—सूर्य की किरणें । उद्भूतरूप तथा
अनुद्भूतस्पर्श वाला तेज प्रत्यक्षतः उपलब्ध होता है, जैसे—दीपक की लो । परन्तु वही
उद्भूतस्पर्श तथा अनुद्भूतरूप वाला होता हुआ प्रत्यक्षतः उपलब्ध नहीं होता, जैसे
जलादिसंयुक्त तेज । इस नय से चाक्षुष रश्मि ( कनीनिका ) अनुद्भूतरूपस्पर्श वाली
होती हुई प्रत्यक्षतः उपलब्ध नहीं होती ॥ ३८ ॥
कर्म से प्रेरित यह इन्द्रियों की रचना उपभोग की साधिका है ॥ ३९ ॥
जिस प्रकार चेतन के अभीप्सित या जिहासित अर्थ सुख दुःख उसके हेतु हैं, उसी
प्रकार चेतन के लिये सुखदुःखोपलब्धिरूप विषयोपलब्धि की कल्पना की जाती है, उसी
चेतन के लिये ये इन्द्रियाँ भी रची गयी हैं। विषयसंयोग के लिये चाक्षुषरश्मि की रचना
की गयी है । रूप या स्पर्श का अनुभूतत्व व्यवहारप्रवृत्ति के लिये है । द्रव्य-विशेष में
गतिनिरोधक संयोग से चक्षु की आवरणोपपत्ति भी व्यवहार के लिये है । सभी द्रव्यों की
विश्व के रूप में विचित्र रूपरचना इन्द्रियों की तरह ही कर्मप्रेरित है, यह रचना पुरुषार्थ-
साधिका है । तथा कर्म धर्माधर्म रूप से चेतन के उपभोग के लिये है ।
व्यभिचार न होने से यह गतिनिरोधक संयोग होना भौतिक धर्म माना गया है ।
जो यह आवरण की उपलब्धि से इन्द्रिय का द्रव्यविशेष में गतिनिरोधक संयोग है, वह
१. ०प्रक्लृप्त्यर्था—इति पाठ० । २. केविट्टीकाकाराः सूत्रकारीयं सूत्रमिदं मन्यन्ते ।
वस्तुतस्तु भाष्यकारीयमेवेदं सूत्रम्; न्यायसूचीनिबन्धेऽदृष्टत्वात् ।
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