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न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा

स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished410 पृष्ठ

३०. सू० ] प्रत्यक्षपरीक्षाप्रकरणम् १०१

३०. सू० ] प्रत्यक्षपरीक्षाप्रकरणम् १०१
नार्थविशेषप्राबल्यात् ॥ ३० ॥
नास्ति व्याघातः, न ह्यात्ममनःसन्निकर्षस्य ज्ञानकारणत्वं व्यभिचरति ।
इन्द्रियार्थसन्निकर्षस्य प्राधान्यमुपादीयते ; अर्थविशेषप्राबल्याद्धि सुप्तव्यासक्त-
मनसां ज्ञानोत्पत्तिरेकदा भवति । अर्थविशेषः = कश्चिदेवेन्द्रियार्थः, तस्य
प्राबल्यम् = तीव्रता-पटुते । तच्चार्थविशेषप्राबल्यमिन्द्रियार्थसन्निकर्षविषयम्,
नात्ममनसोः सन्निकर्षविषयम् । तस्मादिन्द्रियार्थसन्निकर्षः प्रधानमिति ।
असति प्रणिधाने, सङ्कल्पे चासति, सुप्तव्यासक्तमनसां यदिन्द्रियार्थसन्न्रि-
कर्षादुत्पद्यते ज्ञानं तत्र मनःसंयोगोऽपि कारणमिति मनसि क्रियाकारणं
वाच्यमिति ?
यथैव ज्ञातुः खल्वयमिच्छाजनितः प्रग्रहो१ मनसः प्रेरक आत्मगुणः, एव-
मात्मनि गुणान्तरं सर्वस्य साधकं प्रवृत्तिदोषजनितमस्ति, येन प्रेरितं मन
इन्द्रियेण सम्बध्यते । तेन ह्यप्रेर्यमाणे मनसि संयोगाभावाद् ज्ञानानुत्पत्तौ
सर्वार्थताऽस्य निवर्त्तते । एषितव्यं चास्य गुणान्तरस्य द्रव्यगुणकर्मकारणत्वम्;
उत्तरपक्ष-
किसो इन्द्रियविशेष के प्रवल होने से (वचनव्याघात नहीं है) ॥ ३० ॥
वचनव्याघात नहीं है, अर्थात् आत्ममनःसनिकर्ष का ज्ञानकारणत्व व्यभिचरित नहीं
होता । हम तो इन्द्रियार्थसन्निकर्ष कारण को प्रत्यक्षज्ञान में प्रधानतामात्र दे रहे हैं; क्यों-
कि सुप्त या व्यासक्तमना पुरुषों को अर्थविशेष के प्राधान्य से उस-उस समय में वैसा-वैसा
ज्ञानोत्पाद हो जाता है । अर्थविशेष से तात्पर्य है कोई खास इन्द्रियार्थ, उसका प्राबल्य
अर्थात् तीव्रता या पटुता । यह अर्थविशेष की प्रबलता इन्द्रियार्थसन्निकर्षविषयक ही है,
न कि आत्ममनःसन्निकर्षविषयक । अतः इन्द्रियार्थसन्निकर्ष ही प्रत्यक्षज्ञान में प्रधान है । .
शङ्का-इच्छा तथा सङ्कल्प के न रहने पर सुप्त तथा व्यासक्तमना पुरुषों का जो
इन्द्रियार्थसन्निकर्ष से ज्ञान उत्पन्न होता है, वहाँ मनःसंयोग भी कारण है तो उस संयोग
को उत्पन्न करनेवाली मनःक्रिया किस कारण से होती है-यह बताना चाहिये ?
उत्तर-जैसे आत्मा ( ज्ञाता ) का इच्छाजनित प्रयत्न मन का प्रेरक है, उसी प्रकार
आत्मा में एक और ( अदृष्ट ) गुण है जो कि समग्र भोग तथा उनके साधनों का जनक
है, तथा पूर्वोक्त ( १.१.१७-१८ ) प्रवृत्ति तथा दोष से जनित है, इसकी प्रेरणा से मन
इन्द्रिय के साथ सम्बद्ध होता है । वह अदृष्ट आत्मगुण यदि मन को प्रेरणा न करे तो
संयोग न होने से ज्ञानोत्पत्ति न हो सकने से इसकी सर्वार्थता (.सब कार्यों का कारण
होना ) निवृत्त हो जाती है; अदृष्ट गुण को द्रव्य, गुण तथा कर्मों का कारण
मानना भी आवश्यक है; अन्यथा पृथ्वी-आदि चार भूतों के मूल कारण अणु सूक्ष्म
१. 'प्रयत्नः' इति पाठ० ।

१०२ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ २. अ० १. आ०
अन्यथा हि चतुर्विधानामणूनां भूतसूक्ष्माणां मनसां च ततोऽन्यस्य क्रियाहेतो-
रसम्भवात् शरीरेन्द्रियविषयाणामनुत्पत्तिप्रसङ्गः ॥ ३० ॥
विषयपरीक्षा
प्रत्यक्षमनुमानमेकदेशग्रहणादुपलब्धेः ? ॥ ३१ ॥
यदिदमिन्द्रियार्थसन्निकर्षादुत्पद्यते ज्ञानम् 'वृक्ष' इति एतत् किल प्रत्यक्षम्,
तत् खल्वनुमानमेव । कस्मात् ? एकदेशग्रहणात् वृक्षस्योपलब्धेः । अर्वाग्भागमयं
गृहीत्वा वृक्षमुपलभते; न चैकदेशो वृक्षः । तत्र यथा धूमं गृहीत्वा वह्निमनु-
मिनोति तादृगेव तद् भवति ? ॥ ३१ ॥
किं पुनर्गुह्यमाणादेकदेशाद् अर्थान्तरमनुमेयं मन्यसे ! अवयवसमूहपक्षे
अवयवान्तराणि, द्रव्यान्तरोत्पत्तिपक्षे तानि चावयवी चेति ? अवयवसमूह-
पक्षे तावदेकदेशग्रहणाद् वृक्षबुद्धेरभावः, नागृह्यमाणमेकदेशान्तरं वृक्षो गृह्य-
भूत तथा इस मन में अदृष्ट गुण को छोड़कर अन्य कोई क्रियोत्पादक कारण न होने से
शरीर, इन्द्रिय तथा विषयों की उत्पत्ति ही नहीं बनेगी—यह एक नयी बाधा आ खड़ी
होगी ! ॥ ३० ॥
[ इस प्रकार प्रत्यक्षलक्षण के स्वरूप की परीक्षा करने के बाद उसके विषय की
परीक्षा प्रारम्भ की जा रही है—]
प्रत्यक्ष अनुमान ही है, क्योंकि अवयवी का एकदेश के ग्रहण से ज्ञान होता है ? ॥३१॥
इन्द्रियार्थसन्निकर्ष से उत्पन्न 'वृक्ष' यह प्रत्यक्ष ज्ञान एक तरह से अनुमान ही है;
क्योंकि यह वृक्ष के एक भाग ( कुछ अवयवों ) का ग्रहण करके ही हो जाता है । वृक्ष
के अगले हिस्से को देखकर यह वृक्ष का ज्ञान कर लेता है, परन्तु अगला हिस्सा ही तो
वृक्ष नहीं है ! वहाँ ( अनुमान में ) जैसे धूम को देखकर वह्नि का अनुमान होता है, वही
स्थिति यहाँ ( वृक्ष के प्रत्यक्ष में ) भी है। इस प्रकार 'प्रत्यक्षादि चार प्रमाण हैं'
सिद्धान्ती की यह प्रतिज्ञा नष्ट हो गयी ? ॥ ३१ ॥
सिद्धान्ती पूछता है कि आप चक्षुःसन्निकर्ष से ज्ञायमान वृक्ष के अग्रभाग से अनुमान .
करने योग्य दूसरा क्या पदार्थ मानते हैं ?
इसके उत्तर में पूर्वपक्षी कहता है कि यहाँ हमें दो विप्रतिपत्तियां हैं—१. 'अवयवी
अवयवों से पृथक् नहीं हैं' इस अवयवसमूहपक्ष में अन्य अवयवों ( जो दिखायी नहीं दिये
थे ) का अनुमान करते हैं, तथा २. 'अवयवों से कोई अवयवी नामक अर्थान्तर ही उत्पन्न
होता हैं'—इस द्रव्यान्तरोत्पत्तिपक्ष में अवशिष्ट अवयवों तथा अवयवी का अनुमान करते हैं?
इस पर सिद्धान्ती का उत्तर है—अवयवसमूहपक्ष में, एकदेश ( अग्रभाग ) के ग्रहण
से 'यह वृक्ष है' ऐसी बुद्धि नहीं हो सकती; इसी प्रकार, गृह्यमाण एकदेश की तरह