न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)
Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya
महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा
स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)
१९ सू० ] शब्दानित्यत्वपरीक्षाप्रकरणम् १४९
१९ सू० ] शब्दानित्यत्वपरीक्षाप्रकरणम् १४९
सोऽयमुच्चार्यमाणः श्रूयते, श्रूयमाणश्चाभूत्वा भवतीति अनुमीयते । ऊर्ध्वं
चोच्चारणान्न श्रूयते-स भूत्वा न भवति, अभावान्न श्रूयत इति । कथम् ? आवर-
णाद्यनुपलब्धेरित्युक्तम् । तस्मादुत्पत्तितिरोभावधर्मकः शब्द इति ॥ १८ ॥
एवं च सति तत्त्वं पांशुभिरिवावाकिरन्निदमाह—
तदनुपलब्धेरनुपलम्भादावरणोपपत्तिः ? ॥ १९ ॥
यद्यनुपलम्भादावरणं नास्ति, आवरणानुपलब्धिरपि तर्ह्यनुपलम्भान्नास्तीति
तस्या अभावादप्रतिषिद्धमावरणमिति ? कथं पुनर्जानीते भवान्-नावरणानुप-
लब्धिरुपलभ्यत इति ? किमत्र ज्ञेयं प्रत्यात्मवेदनीयत्वात् समानम् ! अयं खल्वा-
वरणमनुपलभमानः प्रत्यात्ममेव संवेदयते—'नावरणमुपलभे' इति, यथा कुड्ये-
नावृतस्यावरणमुपलभमानः प्रत्यात्ममेव संवेदयते, सेयमावरणोपलब्धिवदावरणा-
नुपलब्धिरपि संवेद्यैवेति । एवं च सत्यपह्नुतविषयमुत्तरवाक्यमस्तीति ॥ १९ ॥
अभ्यनुज्ञावादेन तूच्यते जातिवादिना—
'यह शब्द उच्चरित होता हुआ सुनायी देता है, सुनायी देता हुआ पहले न होकर
होता है'—ऐसा उसके विषय में अनुमान होता है । इसी प्रकार उच्चारण के बाद वह
सुनायी नहीं देता, अतः 'वह हो कर नहीं होता है—यों, अभाव होने से नहीं सुनायी
देता'—ऐसा अनुमान होता है । वह कैसे ? आवरणादि की वहाँ (अनुच्चारणकाल में)
उपलब्धि न होने से, यह बात अभी हम पीछे कह चुके हैं । अतः शब्द उत्पत्ति-विनाश-
धर्मा है—यह सिद्धान्त स्थिर हुआ ॥ १८ ॥
सच्चाई पर धूल डाल कर बात कुछ उलझाता हुआ-सा पूर्वपक्षी फिर शंका
करता है—
उसकी अनुपलब्धि का ग्रहण न होने से आवरण की उपपत्ति हो
सकती है ? ॥ १९ ॥
यदि आवरणकारणों के अनुपलब्भ से आवरण न होना मानते हो, तो अनुपलब्भ से
आवरणानुपलब्धि भी नहीं माननी पड़ेगी, उसके अभाव में आवरण का प्रतिषेध कैसे
होगा ?
भाष्यकार पूछते हैं—आप कैसे जानते हैं कि आवरणानुपलब्धि उपलब्ध नहीं
होती ? इसमें जानना क्या है, दोनों के ही प्रत्यात्मवेदनीय होने से बात बराबर है !
यह आवरण को उपलब्ध न करता हुआ मन से यह समझ लेता है कि 'आवरण को नहीं
प्राप्त कर पा रहा हूँ', जैसे दीवाल से व्यवहित आवरण के उपलब्ध होते हुए के बारे
में मन से जान लेता है । उसी तरह आवरणानुपलब्धि का भी संवेदन स्वीकार करते
ही हो, ऐसी स्थिति में आपका (जातिवादी का) उत्तर निःसार हो गया ? ॥ १९ ॥
जातिवादी अभ्यनुज्ञावाद (हठात् स्वीकृत पक्ष) से फिर कहता है—
१५० वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ २. अ० २. आ०
अनुपलब्भादप्यनुपलब्धिसद्भावान्नावरणानुपपत्तिरनुपलम्भात् ? ॥ २० ॥
यथाऽनुपलभ्यमानाप्यावरणानुपलब्धिरस्ति, एवमनुपलभ्यमानमप्यावरण-
मस्तीति । यद्यभ्यनुजानाति भवान्—अनुपलभ्यमानावराणानुपलब्धिरस्तीति,
अभ्यनुज्ञाय च वदति—नास्त्यावरणमनुपलम्भादित्येतद् । एतस्मिन्नप्यभ्यनुज्ञावादे
प्रतिपत्तिनियमो नोपपद्यत इति ? ॥ २० ॥
अनुपलब्भात्मकत्वादनुपलब्धेरहेतुः ॥ २१ ॥
यदुपलभ्यते तदस्ति, यन्नोपलभ्यते तन्नास्ति, इति अनुपलब्भात्मकमस-
दिति व्यवस्थितम् । उपलब्ध्याभावश्च—अनुपलब्धिरिति । सेयमभावत्वान्नोप-
लभ्यते । सच्च खल्वावरणम् तस्योपलब्ध्या भवितव्यम्, न चोपलभ्यते, तस्मान्ना-
स्तीति । तत्र यदुक्तम्—‘नावरणानुपपत्तिरनुपलम्भात्’ इति अयुक्तमिति ॥ २१ ॥
अथ शब्दस्य नित्यत्वं प्रतिजानानः कस्माद्धेतोः प्रतिजानीते ?
अस्पर्शत्वात् ? ॥ २२ ॥
अस्पर्शमाकाशं नित्यं दृष्टमिति, तथा च शब्द इति ? ॥ २२ ॥
सोऽयमुभयतः सव्यभिचारः—स्पर्शवांश्चाणुर्नित्यः, अस्पर्शं च कर्मानित्यं
अनुपलब्भ से अनुपलब्धि होने के कारण आवरणानुपलब्धि अनुपलब्भ से नहीं मान
सकते ? ॥ २० ॥
जैसे आवरणानुपलब्धि अनुपलभ्यमान होते हुए भी है, वैसे ही आवरण होते हुए भी
वह अनुपलभ्यमान भी है ? हमारा मतलब है कि यदि आप यह स्वीकार करते हैं कि
अनुपलम्यमान भी आवरणत्वानुपलब्धि हैं, तो यह स्वीकार करके ही आप यह भी
कहते हैं कि—अनुपलम्भ से आवरण नहीं है, तो इस अभ्यनुज्ञावाद का प्रतिपादन ठीक
नहीं हुआ ? ॥ २० ॥
अनुपलब्भात्मक होने से अनुपलब्धि का वह अहेतु है ॥ २१ ॥
जो उपलब्ध है वह है, जो उपलब्ध नहीं है वह नहीं है, तो अनुपलब्भात्मक द्रव्य
असत् है—यह निश्चित हो गया । उपलब्ध्याभाव को अनुपलब्धि कहते हैं । यह अभाव
के कारण उपलब्ध नहीं होता । सत् आवरण है । वह होता तो उसकी उपलब्धि होती;
वह उपलब्ध नहीं हैं, अतः वह नहीं है । ऐसी स्थिति में, तुम्हारा ‘अनुपलम्भ से आवरण
की अनुपपत्ति नहीं होती’—यह कथन ही अयुक्त है, हमारा पक्ष नहीं ॥ २१ ॥
शब्द की नित्यता किस हेतु से प्रतिज्ञात करते हो ? क्या
अस्पर्शवत्त्व होने से ? ॥ २२ ॥
अस्पर्शवान् आकाश नित्य देखा गया है, उसी तरह का यह शब्द है ? ॥ २२ ॥
अन्वय-व्यतिरेक से शब्द के नित्यत्व में अस्पर्शवत्त्व हेतु व्यभिचारी है; क्योंकि