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न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा

स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished410 पृष्ठ

१६. सू० ] प्रमाणसामान्यपरीक्षाप्रकरणम् ८९

१६. सू० ] प्रमाणसामान्यपरीक्षाप्रकरणम् ८९
यदा च उपलब्धिविषयः क्वचिदुपलब्धिसाधनं भवति, तदा प्रमाणं प्रमेयमिति
चैकोऽर्थोऽभिधीयते ।
अस्यार्थस्यावद्योतनार्थमिदमुच्यते—
प्रमेया¹ च तुला प्रामाण्यवत् ॥ १६ ॥
गुरुत्वपरिमाणज्ञानसाधनं तुला प्रमाणम्, ज्ञानविषयो गुरुद्रव्यं सुवर्णादि
प्रमेयम् । यदा सुवर्णादिना तुल्यान्तरं व्यवस्थाप्यते तदा तुलान्तरप्रतिपत्तौ
सुवर्णादि प्रमाणम्, तुल्यान्तरं प्रमेयमिति । एवमनवयवेन तन्त्रार्थ उद्दिष्टो
वेदितव्यः ।
आत्मा तावदुपलब्धिविषयत्वात् प्रमेये परिपठितः उपलब्धौ स्वातन्त्र्यात्
प्रमाता । बुद्धिरुपलब्धिसाधनत्वात्² प्रमाणम् । उपलब्धिविषयत्वात् प्रमेयम् ।
उभयाभावात् तु प्रमितिः । एवमर्थविशेषे समाख्यासमावेशो योज्यः ।
तथा च कारक शब्दा निमित्तवशात् समावेशेन वर्तन्त इति । वृक्षस्तिष्ठतीति
स्वस्थितौ स्वातन्त्र्यात् कर्ता । वृक्षं पश्यतीति दर्शनेनाप्तुमिष्यमाणतमत्वात्
उपलब्धि-साधन ही कहीं उपलब्धि-विषय बन जाता है तो उस समय वह प्रमाण 'प्रमेय'
भी बन जाता है और दोनों संज्ञाओं में से एक ही अर्थ लिया जाता है।
इसी अर्थ को सूत्रकार स्पष्ट करते हैं—
प्रमाणता के समान तुला प्रमेय भी है ॥ १६ ॥
गुरुत्व ( वजन ) तथा परिमाण के ज्ञान का साधन तुला 'प्रमाण' है, ज्ञान के विषय
वजनी द्रव्य सुवर्णादि 'प्रमेय' है। जब उस तुले हुये सुवर्ण आदि से दूसरी चीज का तोल
किया जाता है तब वही सुवर्णादि प्रमाण बन जाता है। इस प्रकार यहाँ शास्त्र ( सूत्र )
का अर्थ संघात ( व्यापक ) रूप से उपदिष्ट है—ऐसा समझना चाहिये ।
उपलब्धि विषय होने से प्रमेय में पढा गया 'आत्मा' उपलब्धि ( ज्ञान ) में स्वातन्त्र्य
होने के कारण 'प्रमाता' भी कहलाता है, इसी तरह प्रमेयपरिपठित होते हुये भी ज्ञान-
साधन होने से 'प्रमाण' है, उपलब्धिविषय होने से 'प्रमेय' है, दोनों ही विषय या साधन
जब न हों तब वह 'प्रमिति' है। इस प्रकार अर्थविशेष में संज्ञा का समावेश लगा लेना
चाहिए ।
इसी तरह कारक शब्द भी व्यवहृत होते हैं। जैसे—'वृक्ष खड़ा है' यहाँ वृक्ष अपनी
स्थिति में स्वतन्त्र होने से 'कर्ता' है; परन्तु 'वृक्ष को देखता है'—इस वाक्य में दर्शन-
१. 'प्रमेयता च'इति पाठ० । शब्दोऽयं तात्पर्यटीकानुसारमत्र स्थापितः ।
२. 'बुद्धिरूपोपलब्धिसाधनत्वात्' इति पाठ० ।
CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri

९० वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ २. अ० १ आ०
कर्म । वृक्षेण चन्द्रमसं ज्ञापयतीति ज्ञापकस्य साधकतमत्वात् करणम् । 'वृक्षा-
योदकमासिञ्चति' इति आसिच्यमानेनोदकेन वृक्षमभिप्रेतीति सम्प्रदानम् ।
वृक्षात्पर्णं पततीति 'ध्रुवमपायेऽपादानम्' इत्यपादानम् । वृक्षे वयांसि सन्तीति
'आधारोऽधिकरणम्' इत्यधिकरणम् । एवं च सति न द्रव्यमात्रं कारकम्, न
क्रियामात्रम्, किं तर्हि ? क्रियासाधनं क्रियाविशेषयुक्तं कारकम् । यत्क्रिया-
साधनं स्वतन्त्रः स कर्ता, न द्रव्यमात्रं न क्रियामात्रम् । क्रियया व्याप्तुमिष्य-
माणतमं कर्म, न द्रव्यमात्रं न क्रियामात्रम् । एवं साधकतमादिष्वपि । एवं च
कारकार्थान्वाख्यानं यथैव उपपत्तितः, एवं लक्षणतः कारकान्वाख्यानमपि न
द्रव्यमात्रेण न क्रियया वा; किं तर्हि ? क्रियासाधने क्रियाविशेषयुक्त इति ।
कारकशब्दश्चायं प्रमाणं प्रमेयमिति, स च कारकधर्मं न हातुमर्हति ॥ १६ ॥
अस्ति भोः ! कारक शब्दानां निमित्तवशात् समावेशः । प्रत्यक्षादीनि च
प्रमाणानि, उपलब्धिहेतुत्वात्; प्रमेयं चोपलब्धिविषयत्वात् । संवेद्यानि च
क्रिया से ईप्सा का विषय होने के कारण वही 'कर्म' हो गया है। इसी प्रकार 'वृक्ष से
चन्द्रमा को दिखाता है' यहाँ ज्ञप्ति का साधन होने से वही वृक्ष 'करण' है । 'वृक्ष को
जल सींचता है' इस वाक्य में सींचे जाने वाले जल का वृक्ष अभिप्रेत है अतः वह 'सम्प्र-
दान' है । 'वृक्ष से पत्ते गिरते हैं' इसमें 'ध्रुवमपायेऽपादानम्' ( पा० सू० १.४.२४ ) इस
पाणिनि के नियम से वही वृक्ष 'अपादान' है ।'वृक्ष पर पक्षी बैठे हैं' इस वाक्य में 'आधारो-
ऽधिकरणम्' ( पा० सू० ४. १. २५ ) इस नियम से पक्षियों का आधार बन जाने
से वह 'अधिकरण' है। इन उदाहरणों से स्पष्ट है कि द्रव्य या क्रिया ही कारक नहीं
होते;' अपितु क्रिया ( व्यापार ) का साधन तथा क्रिया ( व्यापार ) विशेष से युक्त
कारक होता है। जो स्वतन्त्र रहता हुआ क्रिया का साधन है वह 'कर्ता' कहलाता
है न कि केवल द्रव्य या केवल क्रिया । इसी तरह क्रिया से ईप्सिततम कारक 'कर्म' कह-
लाता है, न कि केवल द्रव्य या केवल क्रिया । इसी प्रकार साधकतम ( क्रिया का अत्यन्त
साधक ) 'करण' आदि कारकों के विषय में भी समझ लेना चाहिये। इस प्रकार जैसे
कारक के अर्थ का अन्वाख्यान युक्ति से किया गया है उसी तरह कारकों का स्वरूपकथन
भी केवल द्रव्य या क्रिया से नहीं; अपितु 'क्रिया (व्यापार) विशेष से युक्त क्रियासाधन'-
ऐसा कर लेना चाहिए। यह 'कारक' शब्द प्रमाण भी है, प्रमेय भी है, यह दोनों
अवस्थाओं में अपने 'कारकत्व' को नहीं छोड़ता ॥ १६ ॥
शङ्का—हम उक्त रीति से कारकों का निमित्तों के सम्बन्धों से समावेश होना मान
लेते हैं । प्रकृत में - प्रत्यक्षादि उपलब्धिहेतु होने से प्रमाण हैं, उपलब्धिविषय होने से प्रमेय
हैं। ये प्रत्यक्षादि संवेद्य (विभाग से जानने योग्य) भी हैं, क्योंकि 'प्रत्यक्ष से जानता हूँ',
'अनुमान से जानता हूँ', 'उपमान से जानता हूँ' 'शब्द प्रमाण से जानता हूँ' —ऐसा
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