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महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

१६८-

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अष्टषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः

भीष्मजीका प्राणत्याग, धृतराष्ट्र आदिके द्वारा उनका दाह-संस्कार, कौरवोंका गंगाके जलसे भीष्मको जलांजलि देना, गंगाजीका प्रकट होकर पुत्रके लिये शोक करना और श्रीकृष्णका उन्हें समझाना

वैशम्पायन उवाच

एवमुक्त्वा कुरून् सर्वान् भीष्मः शान्तनवस्तदा ।
तूष्णीं बभूव कौरव्यः स मुहूर्तमरिंदम ॥ १ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**शत्रुदमन जनमेजय! समस्त कौरवोंसे ऐसा कहकर कुरुश्रेष्ठ शान्तनुनन्दन भीष्मजी दो घड़ीतक चुपचाप पड़े रहे ॥ १ ॥

धारयामास चात्मानं धारणासु यथाक्रमम् ।
तस्योर्ध्वमगमन् प्राणाः संनिरुद्धा महात्मनः ॥ २ ॥
तदनन्तर वे मनसहित प्राणवायुको क्रमशः भिन्न-भिन्न धारणाओंमें स्थापित करने लगे। इस तरह यौगिक क्रियाद्वारा रोके हुए महात्मा भीष्मजीके प्राण क्रमशः ऊपर चढ़ने लगे ॥ २ ॥

इदमाश्चर्यमासीच्च मध्ये तेषां महात्मनाम् ।
सहितैर्ऋषिभिः सर्वैस्तदा व्यासादिभिः प्रभो ॥ ३ ॥
यद्यन्मुञ्चति गात्रं हि स शान्तनुसुतस्तदा ।
तत् तद् विशल्यं भवति योगयुक्तस्य तस्य वै ॥ ४ ॥
प्रभो! उस समय वहाँ एकत्र हुए सभी संत-महात्माओंके बीच एक बड़े आश्चर्यकी घटना घटी। व्यास आदि सब महर्षियोंने देखा कि योगयुक्त हुए शान्तनुनन्दन भीष्मके प्राण उनके जिस-जिस अंगको त्यागकर ऊपर उठते थे, उस-उस अंगके बाण अपने-आप निकल जाते और उनका घाव भर जाता था ॥ ३-४ ॥

क्षणेन प्रेक्षतां तेषां विशल्यः सोऽभवत् तदा ।
तद् दृष्ट्वा विस्मिताः सर्वे वासुदेवपुरोगमाः ॥ ५ ॥
सह तैर्मुनिभिः सर्वैस्तदा व्यासादिभिर्नृप ।
नरेश्वर! इस प्रकार सबके देखते-देखते भीष्मजीका शरीर क्षणभरमें बाणोंसे रहित हो गया। यह देखकर व्यास आदि समस्त मुनियोंसहित भगवान् श्रीकृष्ण आदिको बड़ा विस्मय हुआ ॥ ५ ½ ॥

संनिरुद्धस्तु तेनात्मा सर्वेष्वायतनेषु च ॥ ६ ॥

जगाम भित्त्वा मूर्धानं दिवमभ्युत्पपात ह ।
भीष्मजीने अपने देहके सभी द्वारोंको बंद करके प्राणोंको सब ओरसे रोक लिया था; इसलिये वह उनका मस्तक (ब्रह्मरन्ध्र) फोड़कर आकाशमें चला गया ॥ ६ १/२ ॥
देवदुन्दुभिनादश्च पुष्पवर्षैः सहाभवत् ॥ ७ ॥
सिद्धा ब्रह्मर्षयश्चैव साधु साध्विति हर्षिताः ।
उस समय देवताओंकी दुन्दुभियाँ बज उठीं और साथ ही दिव्य पुष्पोंकी वर्षा होने लगी। सिद्धों तथा ब्रह्मर्षियोंको बड़ा हर्ष हुआ। वे भीष्मजीको साधुवाद देने लगे ॥ ७ १/२ ॥
महोल्केव च भीष्मस्य मूर्धदेशाज्जनाधिप ॥ ८ ॥
निःसृत्याकाशमाविश्य क्षणेनान्तरधीयत ।
जनेश्वर! भीष्मजीका प्राण उनके ब्रह्मरन्ध्रसे निकलकर बड़ी भारी उल्काकी भाँति आकाशमें उड़ा और क्षणभरमें अन्तर्धान हो गया ॥ ८ १/२ ॥
एवं स राजशार्दूल नृपः शान्तनवस्तदा ॥ ९ ॥
समयुज्यत कालेन भरतानां कुलोद्वहः ।
नृपश्रेष्ठ! इस प्रकार भरतवंशका भार वहन करनेवाले शान्तनुनन्दन राजा भीष्म कालके अधीन हुए ॥ ९ १/२ ॥
ततस्त्वादाय दारूणि गन्धांश्च विविधान् बहून् ॥ १० ॥
चितां चक्रमहात्मानः पाण्डवा विदुरस्तथा ।
युयुत्सुश्चापि कौरव्य प्रेक्षकास्त्वितरेऽभवन् ॥ ११ ॥
कुरुनन्दन! तदनन्तर बहुत-से काष्ठ और नाना प्रकारके सुगन्धित द्रव्य लेकर महात्मा पाण्डव, विदुर और युयुत्सुने चिता तैयार की और शेष सब लोग अलग खड़े होकर देखते रहे ॥ १०-११ ॥
युधिष्ठिरश्च गाङ्गेयं विदुरश्च महामतिः ।
छादयामासतुरुभौ क्षौमैर्माल्यैश्च कौरवम् ॥ १२ ॥
राजा युधिष्ठिर और परम बुद्धिमान् विदुर इन दोनोंने रेशमी वस्त्रों और मालाओंसे कुरुनन्दन गंगापुत्र भीष्मको आच्छादित किया और चितापर सुलाया ॥ १२ ॥
धारयामास तस्याथ युयुत्सुश्छत्रमुत्तमम् ।
चामरव्यजने शुभ्रे भीमसेनार्जुनावुभौ ॥ १३ ॥
उस समय युयुत्सुने उनके ऊपर उत्तम छत्र लगाया और भीमसेन तथा अर्जुन श्वेत चँवर एवं व्यजन डुलाने लगे ॥ १३ ॥
उष्णीषे परिगृह्णीतां माद्रीपुत्रावुभौ तथा ।
स्त्रियः कौरवनाथस्य भीष्मं कुरुकुलोद्वहम् ॥ १४ ॥
तालवृन्तान्युपादाय पर्यवीजन्त सर्वशः ।

माद्रीकुमार नकुल और सहदेवने पगड़ी हाथमें लेकर भीष्मजीके मस्तकपर रखी। कौरवराजके रनिवासकी स्त्रियाँ ताड़के पंखे हाथमें लेकर कुरुकुलधुरन्धर भीष्मजीके शवको सब ओरसे हवा करने लगीं ॥ १४ १/२ ॥

ततोऽस्य विधिवच्चक्रुः पितृमेधं महात्मनः ॥ १५ ॥
यजनं बहुशश्चाग्नौ जगुः सामानि सामगाः ।
ततश्चन्दनकाष्ठैश्च तथा कालीयकैरपि ॥ १६ ॥
कालागुरुप्रभृतिभिर्गन्धैश्चोच्चावचैस्तथा ।
समवच्छाद्य गाङ्गेयं सम्प्रज्वाल्य हुताशनम् ॥ १७ ॥
अपसव्यमकुर्वन्त धृतराष्ट्रमुखाश्चिताम् ।

तदनन्तर पाण्डवोंने विधिपूर्वक महात्मा भीष्मका पितृमेध कर्म सम्पन्न किया। अग्निमें बहुत-सी आहुतियाँ दी गयीं। साम-गान करनेवाले ब्राह्मण साममन्त्रोंका गान करने लगे तथा धृतराष्ट्र आदिने चन्दनकी लकड़ी, कालीचन्दन और सुगन्धित वस्तुओंसे भीष्मके शरीरको आच्छादित करके उनकी चितामें आग लगा दी। फिर धृतराष्ट्र आदि सब कौरवोंने इस जलती हुई चिताकी प्रदक्षिणा की ॥ १५—१७ १/२ ॥

संस्कृत्य च कुरुश्रेष्ठं गाङ्गेयं कुरुसत्तमाः ॥ १८ ॥
जग्मुर्भागीरथीं पुण्यामृषिजुष्टां कुरूद्वहाः ।
अनुगम्यमाना व्यासेन नारदेनासितेन च ॥ १९ ॥
कृष्णेन भरतस्त्रीभिर्ये च पौराः समागताः ।
उदकं चक्रिरे चैव गाङ्गेयस्य महात्मनः ॥ २० ॥
विधिवत् क्षत्रियश्रेष्ठाः स च सर्वो जनस्तदा ।

इस प्रकार कुरुश्रेष्ठ भीष्मजीका दाह-संस्कार करके समस्त कौरव अपनी स्त्रियोंको साथ लेकर ऋषि-मुनियोंसे सेवित परम पवित्र भागीरथीके तटपर गये। उनके साथ महर्षि व्यास, देवर्षि नारद, असित, भगवान् श्रीकृष्ण तथा नगरनिवासी मनुष्य भी पधारे थे। वहाँ पहुँचकर उन क्षत्रियशिरोमणियों और अन्य सब लोगोंने विधिपूर्वक महात्मा भीष्मको जलांजलि दी ॥ १८—२० १/२ ॥

ततो भागीरथी देवी तनयस्योदके कृते ॥ २१ ॥
उत्थाय सलिलात् तस्माद् रुदती शोकविह्वला ।
परिदेवयती तत्र कौरवानभ्यभाषत ॥ २२ ॥
निबोधत यथावृत्तमुच्यमानं मयानघाः ।
राजवृत्तेन सम्पन्नः प्रज्ञयाभिजनेन च ॥ २३ ॥

उस समय कौरवोंद्वारा अपने पुत्र भीष्मको जलांजलि देनेका कार्य पूरा हो जानेपर भगवती भागीरथी जलके ऊपर प्रकट हुई और शोकसे विह्वल हो रोदन एवं विलाप करती हुई कौरवोंसे कहने लगी—'निष्पाप पुत्रगण! मैं जो कहती हूँ, उस बातको यथार्थरूपसे

सुनो। भीष्म राजोचित सदाचारसे सम्पन्न थे। वे उत्तम बुद्धि और श्रेष्ठ कुलसे सम्पन्न थे॥ २१—२३॥
सत्कर्ता कुरुवृद्धानां पितृभक्तो महाव्रतः।
जामदग्न्येन रामेण यः पुरा न पराजितः॥ २४॥
दिव्यैरस्त्रैर्महावीर्यः स हतोऽद्य शिखण्डिना।
‘महान् व्रतधारी भीष्म कुरुकुलवृद्ध पुरुषोंके सत्कार करनेवाले और अपने पिताके बड़े भक्त थे। हाय! पूर्वकालमें जमदग्निनन्दन परशुराम भी अपने दिव्य अस्त्रोंद्वारा जिस मेरे महापराक्रमी पुत्रको पराजित न कर सके, वह इस समय शिखण्डीके हाथसे मारा गया। यह कितने कष्टकी बात है॥ २४ १/२॥
अश्मसारमयं नूनं हृदयं मम पार्थिवाः॥ २५॥
अपश्यन्त्याः प्रियं पुत्रं यन्न दीर्यति मेऽद्य वै।
‘राजाओ! अवश्य ही मेरा हृदय पत्थर और लोहेका बना हुआ है, तभी तो अपने प्रिय पुत्रको जीवित न देखकर भी आज यह फट नहीं जाता है॥ २५ १/२॥
समेतं पार्थिवं क्षत्रं काशिपुर्यां स्वयंवरे॥ २६॥
विजित्यैकरथेनैव कन्याश्चायं जहार ह।
‘काशीपुरीके स्वयंवरमें समस्त भूमण्डलके क्षत्रिय एकत्र हुए थे, किंतु भीष्मने एकमात्र रथकी ही सहायतासे उन सबको जीतकर काशिराजकी तीनों कन्याओंका अपहरण किया था॥ २६ १/२॥
यस्य नास्ति बले तुल्यः पृथिव्यामपि कश्चन॥ २७॥
हतं शिखण्डिना श्रुत्वा न विदीर्येत यन्मनः।
‘हाय! इस पृथ्वीपर बलमें जिसकी समानता करनेवाला दूसरा कोई नहीं है, उसीको शिखण्डीके हाथसे मारा गया सुनकर आज मेरी छाती क्यों नहीं फट जाती॥ २७ १/२॥
जामदग्न्यः कुरुक्षेत्रे युधि येन महात्मना॥ २८॥
पीडितो नातियत्नेन स हतोऽद्य शिखण्डिना।
‘जिस महामना वीरने जमदग्निनन्दन परशुरामको कुरुक्षेत्रके युद्धमें अनायास ही पीड़ित कर दिया था, वही शिखण्डीके हाथसे मारा गया, यह कितने दुःखकी बात है’॥ २८ १/२॥
एवंविधं बहु तदा विलपन्तीं महानदीम्॥ २९॥
आश्वासयामास तदा गङ्गां दामोदरो विभुः।