महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
सत्त्व और पुरुषकी भिन्नता, बुद्धिमान्की प्रशंसा, पञ्चभूतोंके गुणोंका विस्तार और परमात्माकी श्रेष्ठताका वर्णन
पञ्चाशत्तमोऽध्यायः
सत्त्व और पुरुषकी भिन्नता, बुद्धिमान्की प्रशंसा, पञ्चभूतोंके गुणोंका विस्तार और परमात्माकी श्रेष्ठताका वर्णन
ब्रह्मोवाच
हन्त वः संप्रवक्ष्यामि यन्मां पृच्छथ सत्तमाः ।
गुरुणा शिष्यमासाद्य यदुक्तं तन्निबोधत ॥ १ ॥
ब्रह्माजी बोले—श्रेष्ठ महर्षियो! तुमलोगोंने जो विषय पूछा है, उसे अब मैं कहूँगा। गुरुने सुयोग्य शिष्यको पाकर जो उपदेश दिया है, उसे तुमलोग सुनो ॥ १ ॥
समस्तमिह तच्छ्रुत्वा सम्यगेवावधार्यताम् ।
अहिंसा सर्वभूतानामेतत् कृत्यतमं मतम् ॥ २ ॥
एतत् पदमनुद्विग्नं वरिष्ठं धर्मलक्षणम् ।
उस विषयको यहाँ पूर्णतया सुनकर अच्छी प्रकार धारण करो। सब प्राणियोंकी अहिंसा ही सर्वोत्तम कर्तव्य है—ऐसा माना गया है। यह साधन उद्वेगरहित, सर्वश्रेष्ठ और धर्मको लक्षित करानेवाला है ॥ २ १/२ ॥
ज्ञानं निःश्रेय इत्याहुर्वृद्धा निश्चितदर्शिनः ॥ ३ ॥
तस्माज्ज्ञानेन शुद्धेन मुच्यते सर्वकिल्बिषैः ।
निश्चयको साक्षात् करनेवाले वृद्ध लोग कहते हैं कि ‘ज्ञान ही परम कल्याणका साधन है।' इसलिये परम शुद्ध ज्ञानके द्वारा ही मनुष्य सब पापोंसे छूट जाता है ॥ ३ १/२ ॥
हिंसापराश्च ये केचिद् ये च नास्तिकवृत्तयः ।
लोभमोहसमायुक्तास्ते वै निरयगामिनः ॥ ४ ॥
जो लोग प्राणियोंकी हिंसा करते हैं, नास्तिक-वृत्तिका आश्रय लेते हैं और लोभ तथा मोहमें फँसे हुए हैं, उन्हें नरकमें गिरना पड़ता है ॥ ४ ॥
आशीर्युक्तानि कर्माणि कुर्वते ये त्वतन्द्रिताः ।
तेऽस्मिँल्लोके प्रमोदन्ते जायमानाः पुनः पुनः ॥ ५ ॥
जो लोग सावधान होकर सकाम कर्मोंका अनुष्ठान करते हैं, वे बार-बार इस लोकमें जन्म ग्रहण करके सुखी होते हैं ॥ ५ ॥
कुर्वते ये तु कर्माणि श्रद्दधाना विपश्चितः ।
अनाशीर्योगसंयुक्तास्ते धीराः साधुदर्शिनः ॥ ६ ॥
जो विद्वान् समत्वयोगमें स्थित हो श्रद्धाके साथ कर्तव्य-कर्मोंका अनुष्ठान करते हैं और उनके फलमें आसक्त नहीं होते, वे धीर और उत्तम दृष्टिवाले माने गये हैं ॥ ६ ॥
अतः परं प्रवक्ष्यामि सत्त्वक्षेत्रज्ञयोर्यथा ।
संयोगो विप्रयोगश्च तन्निबोधत सत्तमाः ॥ ७ ॥
श्रेष्ठ महर्षियो! अब मैं यह बता रहा हूँ कि सत्त्व और क्षेत्रज्ञका परस्पर संयोग और वियोग कैसे होता है? इस विषयको ध्यान देकर सुनो ॥ ७ ॥
विषयो विषयित्वं च सम्बन्धोऽयमिहोच्यते ।
विषयी पुरुषो नित्यं सत्त्वं च विषयः स्मृतः ॥ ८ ॥
इन दोनोंमें यहाँ यह विषय-विषयिभाव सम्बन्ध माना गया है। इनमें पुरुष तो सदा विषयी और सत्त्व विषय माना जाता है ॥ ८ ॥
व्याख्यातं पूर्वकल्पेन मशकोदुम्बरं यथा ।
भुज्यमानं न जानीते नित्यं सत्त्वमचेतनम् ।
यस्त्वेवं तं विजानीते यो भुङ्क्ते यश्च भुज्यते ॥ ९ ॥
पूर्व अध्यायमें मच्छर और गूलरके उदाहरणसे यह बात बतायी जा चुकी है कि भोगा जानेवाला अचेतन सत्त्व नित्य-स्वरूप क्षेत्रज्ञको नहीं जानता, किंतु जो क्षेत्रज्ञ है वह इस प्रकार जानता है कि जो भोगता है वह आत्मा है और जो भोगा जाता है, वह सत्त्व है ॥ ९ ॥
नित्यं द्वन्द्वसमायुक्तं सत्त्वमाहुर्मनीषिणः ।
निर्द्वन्द्वो निष्कलो नित्यः क्षेत्रज्ञो निर्गुणात्मकः ॥ १० ॥
मनीषी पुरुष सत्त्वको द्वन्द्वयुक्त कहते हैं और क्षेत्रज्ञ निर्द्वन्द्व, निष्कल, नित्य और निर्गुणस्वरूप है ॥ १० ॥
समं संज्ञानुगश्चैव स सर्वत्र व्यवस्थितः ।
उपभुङ्क्ते सदा सत्त्वमपः पुष्करपर्णवत् ॥ ११ ॥
वह क्षेत्रज्ञ समभावसे सर्वत्र भलीभाँति स्थित हुआ ज्ञानका अनुसरण करता है। जैसे कमलका पत्ता निर्लिप्त रहकर जलको धारण करता है, वैसे ही क्षेत्रज्ञ सदा सत्त्वका उपभोग करता है ॥ ११ ॥
सर्वैरपि गुणैर्विद्वान् व्यतिषक्तो न लिप्यते ।
जलबिन्दुर्यथा लोलः पद्मिनीपत्रसंस्थितः ॥ १२ ॥
एवमेवाप्यसंयुक्तः पुरुषः स्यान्न संशयः ।
जैसे कमलके पत्तेपर पड़ी हुई जलकी चंचल बूँद उसे भिगो नहीं पाती, उसी प्रकार विद्वान् पुरुष समस्त गुणोंसे सम्बन्ध रखते हुए भी किसीसे लिप्त नहीं होता। अतः क्षेत्रज्ञ पुरुष वास्तवमें असंग है, इसमें संदेह नहीं है ॥ १२ १/२ ॥
द्रव्यमात्रभूत् सत्त्वं पुरुषस्येति निश्चयः ॥ १३ ॥