महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
युधिष्ठिरने कहा—पितामह! जो सर्वोत्तम कर्तव्य-रूपसे जानने योग्य है, महात्मा पुरुष जिसका अनुष्ठान करना अपना धर्म समझते हैं तथा जो सम्पूर्ण शास्त्रोंका स
चतुर्विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः
नारदका पुण्डरीकको भगवान् नारायणकी आराधनाका उपदेश तथा उन्हें भगवद्धामकी प्राप्ति, सामगुणकी प्रशंसा, ब्राह्मणका राक्षसके सफेद और दुर्बल होनेका कारण बताना
(युधिष्ठिर उवाच
यज्ज्ञेयं परमं कृत्यमनुष्ठेयं महात्मभिः ।
सारं मे सर्वशास्त्राणां वक्तुमर्हस्यनुग्रहात् ॥
**युधिष्ठिरने कहा—**पितामह! जो सर्वोत्तम कर्तव्य-रूपसे जानने योग्य है, महात्मा पुरुष जिसका अनुष्ठान करना अपना धर्म समझते हैं तथा जो सम्पूर्ण शास्त्रोंका सार है, उस श्रेयका कृपापूर्वक वर्णन कीजिये ।।
भीष्म उवाच
श्रूयतामिदमत्यन्तं गूढं संसारमोचनम् ।
श्रोतव्यं च त्वया सम्यग् ज्ञातव्यं च विशाम्पते ॥
**भीष्मजीने कहा—**प्रजानाथ! जो अत्यन्त गूढ़, संसारबन्धनसे मुक्त करनेवाला और तुम्हारे द्वारा श्रवण करने एवं भलीभाँति जाननेके योग्य है, उस परम श्रेयका वर्णन सुनो ।।
पुण्डरीकः पुरा विप्रः पुण्यतीर्थे जपान्वितः ।
नारदं परिपप्रच्छ श्रेयो योगपरं मुनिम् ॥
नारदश्चाब्रवीदेनं ब्रह्मणोक्तं महात्मना ॥
प्राचीन कालकी बात है, पुण्डरीक नामसे प्रसिद्ध एक ब्राह्मण किसी पुण्यतीर्थमें सदा जप किया करते थे। उन्होंने योगपरायण मुनिवर नारदजीसे श्रेय (कल्याणकारी साधन) के विषयमें पूछा। तब नारदजीने महात्मा ब्रह्माजीके द्वारा बताये हुए श्रेयका उन्हें इस प्रकार उपदेश दिया ।।
नारद उवाच
शृणुष्वावहितस्तात ज्ञानयोगमनुत्तमम् ।
अप्रभूतं प्रभूतार्थं वेदशास्त्रार्थसारकम् ॥
**नारदजीने कहा—**तात! तुम सावधान होकर परम उत्तम ज्ञानयोगका वर्णन सुनो। यह किसी व्यक्ति-विशेषसे नहीं प्रकट हुआ है—अनादि है, प्रचुर अर्थका साधक है तथा वेदों और शास्त्रोंके अर्थका सारभूत है ।।
यः परः प्रकृतेः प्रोक्तः पुरुषः पञ्चविंशकः ।
स एव सर्वभूतात्मा नर इत्यभिधीयते ॥
जो चौबीस तत्त्वमयी प्रकृतिसे उसका साक्षिभूत पचीसवाँ तत्त्व पुरुष कहा गया है तथा जो सम्पूर्ण भूतोंका आत्मा है, उसीको नर कहते हैं ।।
नराज्जातानि तत्त्वानि नाराणीति ततो विदुः ।
तान्येव चायनं तस्य तेन नारायणः स्मृतः ॥
नरसे सम्पूर्ण तत्त्व प्रकट हुए हैं, इसलिये उन्हें नार कहते हैं। नार ही भगवान्का अयन—निवासस्थान है, इसलिये वे नारायण कहलाते हैं ।।
नारायणाज्जगत् सर्वं सर्गकाले प्रजायते ।
तस्मिन्नेव पुनस्तच्च प्रलये सम्प्रलीयते ॥
सृष्टिकालमें यह सारा जगत् नारायणसे ही प्रकट होता है और प्रलयकालमें फिर उन्हींमें इसका लय होता है ।।
नारायणः परं ब्रह्म तत्त्वं नारायणः परः ।
परादपि परश्चासौ तस्मान्नास्ति परात् परम् ॥
नारायण ही परब्रह्म हैं, परमपुरुष नारायण ही सम्पूर्ण तत्त्व हैं, वे ही परसे भी परे हैं। उनके सिवा दूसरा कोई परात्पर तत्त्व नहीं है ।।
वासुदेवं तथा विष्णुमात्मानं च तथा विदुः ।
संज्ञाभेदैः स एवैकः सर्वशास्त्राभिसंस्कृतः ॥
उन्हींको वासुदेव, विष्णु तथा आत्मा कहते हैं। संज्ञाभेदसे एकमात्र नारायण ही सम्पूर्ण शास्त्रोंद्वारा वर्णित होते हैं ।।
आलोड्य सर्वशास्त्राणि विचार्य च पुनः पुनः ।
इदमेकं सुनिष्पन्नं ध्येयो नारायणः सदा ॥
समस्त शास्त्रोंका आलोडन करके बारंबार विचार करनेपर एकमात्र यही सिद्धान्त स्थिर हुआ है कि सदा भगवान् नारायणका ध्यान करना चाहिये ।।
तस्मात्त्वं गहनान् सर्वांस्त्यक्त्वा शास्त्रार्थविस्तरान् ।
अनन्यचेता ध्यायस्व नारायणमजं विभुम् ॥
अतः तुम शास्त्रार्थके सम्पूर्ण गहन विस्तारका त्याग करके अनन्यचित्त होकर सर्वव्यापी अजन्मा भगवान् नारायणका ध्यान करो ।।
मुहूर्तमपि यो ध्यायेन्नारायणमतन्द्रितः ।
सोऽपि सद्गतिमाप्नोति किं पुनस्तत्परायणः ॥
जो आलस्य छोड़कर दो घड़ी भी नारायणका ध्यान करता है, वह भी उत्तम गतिको प्राप्त होता है। फिर जो निरन्तर उन्हींके भजन-ध्यानमें तत्पर रहता है, उसकी तो बात ही क्या है ।।
नमो नारायणायेति यो वेद ब्रह्म शाश्वतम् ।
अन्तकाले जपन्नेति तद्विष्णोः परमं पदम् ॥
जो 'ॐ नमो नारायणाय' इस अष्टाक्षर मन्त्रको सनातन ब्रह्मरूप जानता है और अन्तकालमें इसका जप करता है, वह भगवान् विष्णुके परम पदको प्राप्त कर लेता है ॥
श्रवणान्मननाच्चैव गीतिस्तुत्यर्चनादिभिः ।
आराध्यं सर्वदा ब्रह्म पुरुषेण हितैषिणा ॥
जो मनुष्य अपना हित चाहता हो, वह सदा श्रवण, मनन, गीत, स्तुति और पूजन आदिके द्वारा सर्वदा ब्रह्मस्वरूप नारायणकी आराधना करे ॥
लिप्यते न स पापेन नारायणपरायणः ।
पुनाति सकलं लोकं सहस्रांशुरिवोदितः ॥
नारायणके भजनमें तत्पर रहनेवाला पुरुष पापसे लिप्त नहीं होता। वह उदित हुए सहस्र किरणोंवाले सूर्यकी भाँति समस्त लोकको पवित्र कर देता है ॥
ब्रह्मचारी गृहस्थो वा वानप्रस्थोऽथ भिक्षुकः ।
केशवाराधनं हित्वा नैव यान्ति परां गतिम् ॥
ब्रह्मचारी हो या गृहस्थ, वानप्रस्थ हो या संन्यासी, भगवान् विष्णुकी आराधना छोड़ देनेपर ये कोई भी परम गतिको नहीं प्राप्त होते हैं ॥
जन्मान्तरसहस्रेषु दुर्लभा तद्गता मतिः ।
तद्भक्तवत्सलं देवं समाराधय सुव्रत ॥
उत्तम व्रतका पालन करनेवाले पुण्डरीक! सहस्रों जन्म धारण करनेपर भी भगवान् विष्णुमें मन और बुद्धिका लगना अत्यन्त दुर्लभ है। अतः तुम उन भक्तवत्सल नारायणदेवकी भलीभाँति आराधना करो ॥
भीष्म उवाच
नारदेनैवमुक्तस्तु स विप्रोऽभ्यर्चयद्धरिम् ।
स्वप्नेऽपि पुण्डरीकाक्षं शङ्खचक्रगदाधरम् ॥
किरीटकुण्डलधरं लसच्छ्रीवत्सकौस्तुभम् ।
तं दृष्ट्वा देवदेवेशं प्राणमत् सम्भ्रमान्वितः ॥
**भीष्मजी कहते हैं—**राजन्! नारदजीके इस प्रकार उपदेश देनेपर विप्रवर पुण्डरीक भगवान् श्रीहरिकी आराधना करने लगे। वे स्वप्नमें भी शंख-चक्र गदाधारी, किरीट और कुण्डलसे सुशोभित, सुन्दर श्रीवत्स-चिह्न एवं कौस्तुभमणि धारण करनेवाले कमलनयन नारायण देवका दर्शन करते थे और उन देवदेवेश्वरको देखते ही बड़े वेगसे उठकर उनके चरणोंमें साष्टांग प्रणाम करते थे ॥
अथ कालेन महता तथा प्रत्यक्षतां गतः ।
संस्तुतः स्तुतिभिर्वेदैर्देवगन्धर्वकिन्नरैः ॥
तदनन्तर दीर्घकालके बाद भगवान्ने उसी रूपमें पुण्डरीकको प्रत्यक्ष दर्शन दिया। उस समय सम्पूर्ण वेद तथा देवता, गन्धर्व और किन्नर नाना प्रकारके स्तोत्रोंद्वारा उनकी स्तुति करते थे ।।
अथ तेनैव भगवानात्मलोकमधोक्षजः ।
गतः सम्पूजितः सर्वैः स योगनिलयो हरिः ॥
योग ही जिनका निवासस्थान है, वे भगवान् अधोक्षज श्रीहरि सबके द्वारा पूजित हो उस भक्त पुण्डरीकको साथ लेकर ही पुनः अपने धामको चले गये ।।
तस्मात् त्वमपि राजेन्द्र तद्भक्तस्तत्परायणः ।
अर्चयित्वा यथायोगं भजस्व पुरुषोत्तमम् ॥
राजेन्द्र! इसलिये तुम भी भगवान्के भक्त एवं शरणागत होकर उनकी यथायोग्य पूजा करके उन्हीं पुरुषोत्तमके भजनमें लगे रहो ।।
अजरममरमेकं ध्येयमाद्यन्तशून्यं
सगुणमगुणमाद्यं स्थूलमत्यन्तसूक्ष्मम् ।
निरुपममुपमेयं योगिविज्ञानगम्यं
त्रिभुवनगुरुमीशं सम्प्रपद्यस्व विष्णुम् ॥)
जो अजर, अमर, एक (अद्वितीय), ध्येय, अनादि, अनन्त, सगुण, निर्गुण, सबके आदि कारण, स्थूल, अत्यन्त सूक्ष्म, उपमारहित, उपमाके योग्य तथा योगियोंके लिये ज्ञान-गम्य हैं, उन त्रिभुवनगुरु भगवान् विष्णुकी शरण लो ।।
युधिष्ठिर उवाच
साम्नि चापि प्रदाने च ज्यायः किं भवतो मतम् ।
प्रब्रूहि भरतश्रेष्ठ यदत्र व्यतिरिच्यते ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा— भरतश्रेष्ठ! आपके मतमें साम और दानमें कौन-सा श्रेष्ठ है? इनमें जो उत्कृष्ट हो, उसे बताइये ।। १ ।।
भीष्म उवाच
साम्ना प्रसाद्यते कश्चिद् दानेन च तथा परः ।
पुरुषप्रकृतिं ज्ञात्वा तयोरेकतरं भजेत् ॥ २ ॥
भीष्मजीने कहा— बेटा! कोई मनुष्य सामसे प्रसन्न होता है और कोई दानसे। अतः पुरुषके स्वभावको समझकर दोनोंमेंसे एकको अपनाना चाहिये ।। २ ।।
गुणांस्तु शृणु मे राजन् सान्त्वस्य भरतर्षभ ।
दारुणान्यपि भूतानि सान्त्वेनाराधयेद् यथा ॥ ३ ॥
राजन्! भरतश्रेष्ठ! अब तुम सामके गुणोंको सुनो। सामके द्वारा मनुष्य भयानक-से-भयानक प्राणीको वशमें कर सकता है ॥ ३ ॥
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
गृहीत्वा रक्षसा मुक्तो द्विजातिः कानने यथा ॥ ४ ॥
इस विषयमें एक प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया जाता है, जिसके अनुसार कोई ब्राह्मण किसी जंगलमें किसी राक्षसके चंगुलमें फँसकर भी सामनीतिके द्वारा उससे मुक्त हो गया था ॥ ४ ॥
कश्चिद् वाग्बुद्धिसम्पन्नो ब्राह्मणो विजने वने ।
गृहीतः कृच्छ्रमापन्नो रक्षसा भक्षयिष्यता ॥ ५ ॥
एक बुद्धिमान् एवं वाचाल ब्राह्मण किसी निर्जन वनमें घूम रहा था। उसी समय किसी राक्षसने आकर उसे खानेकी इच्छासे पकड़ लिया। बेचारा ब्राह्मण बड़े कष्टमें पड़ गया ॥ ५ ॥
स बुद्धिश्रुतिसम्पन्नस्तं दृष्ट्वातीव भीषणम् ।
सामैवास्मिन् प्रयुयुजे न मुमोह न विव्यथे ॥ ६ ॥
ब्राह्मणकी बुद्धि तो अच्छी थी ही, वह शास्त्रोंका विद्वान् भी था। इसलिये उस अत्यन्त भयानक राक्षसको देखकर भी वह न तो घबराया और न व्यथित ही हुआ। बल्कि उसके प्रति उसने साम नीतिका ही प्रयोग किया ॥ ६ ॥
रक्षस्तु वाचं सम्पूज्य प्रश्नं पप्रच्छ तं द्विजम् ।
मोक्ष्यसे ब्रूहि मे प्रश्नं केनास्मि हरिणः कृशः ॥ ७ ॥
राक्षसने ब्राह्मणके शान्तिमय वचनोंकी प्रशंसा करके उनके सामने अपना प्रश्न उपस्थित किया और कहा—‘यदि मेरे प्रश्नका उत्तर दे दोगे तो तुम्हें छोड़ दूँगा! बताओ, मैं किस कारणसे अत्यन्त दुर्बल और सफेद (पाण्डु) हो गया हूँ’ ॥ ७ ॥
मुहूर्तमथ संचिन्त्य ब्राह्मणस्तस्य रक्षसः ।
आभिर्गाथाभिरव्यग्रः प्रश्नं प्रतिजगाद ह ॥ ८ ॥
यह सुनकर ब्राह्मणने दो घड़ीतक विचार करके शान्तभावसे निम्नांकित गाथाओं (वचनोंद्वारा) उस राक्षसके प्रश्नका उत्तर देना आरम्भ किया ॥ ८ ॥
ब्राह्मण उवाच
विदेशस्थो विलोकस्थो विना नूनं सुहृज्जनैः ।
विषयानतुलान् भुङ्क्षे तेनासि हरिणः कृशः ॥ ९ ॥
**ब्राह्मण बोला—**राक्षस! निश्चय ही तुम सुहृद्जनोंसे अलग होकर परदेशमें दूसरे लोगोंके साथ रहते और अनुपम विषयोंका उपभोग करते हो; इसीलिये चिन्ताके कारण तुम दुबले एवं सफेद होते जा रहे हो ॥ ९ ॥
नूनं मित्राणि ते रक्षः साधूपचरितान्यपि ।
स्वदोषादपरज्यन्ते तेनासि हरिणः कृशः ॥ १० ॥