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महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

DevanagariSanskritpublished2,566 pages

॥ महाप्रस्थानिकपर्व सम्पूर्ण ॥

Page 2506Permalink

कुरुनन्दन! तुम्हें वह उत्तम सिद्धि प्राप्त हुई है जिसे दूसरा मनुष्य कभी और कहीं नहीं पा सका। तुम्हारे भाई ऐसा स्थान नहीं पा सके हैं॥ ३४॥
अद्यापि मानुषो भावः स्पृशते त्वां नराधिप।
स्वर्गोऽयं पश्य देवर्षीन् सिद्धांश्च त्रिदिवालयान्॥ ३५॥
‘नरेश्वर! क्या अब भी मानवभाव तुम्हारा स्पर्श कर रहा है? राजन्! यह स्वर्गलोक है। इन स्वर्गवासी देवर्षियों तथा सिद्धोंका दर्शन करो’॥ ३५॥
युधिष्ठिरस्तु देवेन्द्रमेवंवादिनमीश्वरम्।
पुनरेवाब्रवीद् धीमानिदं वचनमर्थवत्॥ ३६॥
ऐसी बात कहते हुए ऐश्वर्यशाली देवराजसे बुद्धिमान् युधिष्ठिरने पुनः यह अर्थयुक्त वचन कहा—॥ ३६॥
तैर्विना नोत्सहे वस्तुमिह दैत्यनिबर्हण।
गन्तुमिच्छामि तत्राहं यत्र ते भ्रातरो गताः॥ ३७॥
यत्र सा बृहती श्यामा बुद्धिसत्त्वगुणान्विता।
द्रौपदी योषितां श्रेष्ठा यत्र चैव गता मम॥ ३८॥
‘दैत्यसूदन! अपने भाइयोंके बिना मुझे यहाँ रहनेका उत्साह नहीं होता; अतः मैं वहीं जाना चाहता हूँ, जहाँ मेरे भाई गये हैं तथा जहाँ ऊँचे कदवाली, श्यामवर्णा, बुद्धिमती सत्त्वगुणसम्पन्ना एवं युवतियोंमें श्रेष्ठ मेरी द्रौपदी गयी है॥ ३७-३८॥

इति श्रीमहाभारते महाप्रस्थानिके पर्वणि युधिष्ठिरस्वर्गारोहे तृतीयोऽध्यायः॥ ३॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत महाप्रस्थानिकपर्वमें युधिष्ठिरका स्वर्गारोहणविषयक तीसरा अध्याय पूरा हुआ॥ ३॥


॥ महाप्रस्थानिकपर्व सम्पूर्ण ॥


अनुष्टुप्(अन्य बड़े छन्द)बड़े छन्दोंको ३२ अक्षरोंके अनुष्टुप् मानकर गिननेपरकुल योग
उत्तर भारतीय पाठसे लिये गये१०१(१०)१३ ॥११४ ॥
दक्षिण भारतीय पाठसे लिये गये×××

महाप्रस्थानिकपर्वकी कुल श्लोकसंख्या— ११४ ॥