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महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

मन-बुद्धि और इन्द्रियरूप सप्त होताओंका, यज्ञ तथा मन-इन्द्रिय-संवादका वर्णन

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द्वाविंशोऽध्यायः

मन-बुद्धि और इन्द्रियरूप सप्त होताओंका, यज्ञ तथा मन-इन्द्रिय-संवादका वर्णन

ब्राह्मण उवाच

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
सुभगे सप्तहोतॄणां विधानमिह यादृशम् ॥ १ ॥
ब्राह्मणने कहा— सुभगे! इसी विषयमें इस पुरातन इतिहासका भी उदाहरण दिया जाता है। सात होताओंके यज्ञका जैसा विधान है, उसे सुनो ॥ १ ॥

घ्राणश्चक्षुश्च जिह्वा च त्वक् श्रोत्रं चैव पञ्चमम् ।
मनो बुद्धिश्च सप्तैते होतारः पृथगाश्रिताः ॥ २ ॥
सूक्ष्मेऽवकाशे तिष्ठन्तो न पश्यन्तीतरेतरम् ।
एतान् वै सप्तहोतॄंस्त्वं स्वभावाद् विद्धि शोभने ॥ ३ ॥
नासिका, नेत्र, जिह्वा, त्वचा और पाँचवाँ कान, मन और बुद्धि—ये सात होता अलग-अलग रहते हैं। यद्यपि ये सभी सूक्ष्म शरीरमें ही निवास करते हैं तो भी एक-दूसरेको नहीं देखते हैं। शोभने! इन सात होताओंको तुम स्वभावसे ही पहचानो ॥ २-३ ॥

ब्राह्मण्युवाच

सूक्ष्मेऽवकाशे सन्तस्ते कथं नान्योन्यदर्शिनः ।
कथंस्वभावा भगवंन्नेतदाचक्ष्व मे प्रभो ॥ ४ ॥
ब्राह्मणीने पूछा— भगवन्! जब सभी सूक्ष्म शरीरमें ही रहते हैं, तब एक-दूसरेको देख क्यों नहीं पाते? प्रभो! उनके स्वभाव कैसे हैं? यह बतानेकी कृपा करें ॥ ४ ॥

ब्राह्मण उवाच

गुणाज्ञानमविज्ञानं गुणज्ञानमभिज्ञता ।
परस्परं गुणानेते नाभिजानन्ति कर्हिचित् ॥ ५ ॥
ब्राह्मणने कहा— प्रिये! (यहाँ देखनेका अर्थ है, जानना) गुणोंको न जानना ही गुणवान्‌को न जानना कहलाता है और गुणोंको जानना ही गुणवान्‌को जानना है। ये नासिका आदि सात होता एक-दूसरेके गुणोंको कभी नहीं जान पाते हैं (इसीलिये कहा गया है कि ये एक-दूसरेको नहीं देखते हैं) ॥ ५ ॥

जिह्वा चक्षुस्तथा श्रोत्रं वाङ्मनो बुद्धिरेव च ।
न गन्धानधिगच्छन्ति घ्राणस्तानधिगच्छति ॥ ६ ॥

जीभ, आँख, कान, त्वचा, मन और बुद्धि—ये गन्धोंको नहीं समझ पाते, किंतु नासिका उसका अनुभव करती है ।। ६ ।।

घ्राणं चक्षुस्तथा श्रोत्रं वाङ्मनो बुद्धिरेव च ।
न रसानधिगच्छन्ति जिह्वा तानधिगच्छति ।। ७ ।।

नासिका, कान, नेत्र, त्वचा, मन और बुद्धि—ये रसोंका आस्वादन नहीं कर सकते। केवल जिह्वा उसका स्वाद ले सकती है ।। ७ ।।

घ्राणं जिह्वा तथा श्रोत्रं वाङ्मनो बुद्धिरेव च ।
न रूपाण्यधिगच्छन्ति चक्षुस्तान्यधिगच्छति ।। ८ ।।

नासिका, जीभ, कान, त्वचा, मन और बुद्धि—ये रूपका ज्ञान नहीं प्राप्त कर सकते; किंतु नेत्र इनका अनुभव करते हैं ।। ८ ।।

घ्राणं जिह्वा ततश्चक्षुः श्रोत्रं बुद्धिर्मनस्तथा ।
न स्पर्शानधिगच्छन्ति त्वक् च तानधिगच्छति ।। ९ ।।

नासिका, जीभ, आँख, कान, बुद्धि और मन—ये स्पर्शका अनुभव नहीं कर सकते; किंतु त्वचाको उसका ज्ञान होता है ।। ९ ।।

घ्राणं जिह्वा च चक्षुश्च वाङ्मनो बुद्धिरेव च ।
न शब्दानधिगच्छन्ति श्रोत्रं तानधिगच्छति ।। १० ।।

नासिका, जीभ, आँख, त्वचा, मन और बुद्धि—इन्हें शब्दका ज्ञान नहीं होता; किंतु कानको होता है ।। १० ।।

घ्राणं जिह्वा च चक्षुश्च त्वक् श्रोत्रं बुद्धिरेव च ।
संशयं नाधिगच्छन्ति मनस्तमधिगच्छति ।। ११ ।।

नासिका, जीभ, आँख, त्वचा, कान और बुद्धि—ये संशय (संकल्प-विकल्प) नहीं कर सकते। यह काम मनका है ।। ११ ।।

घ्राणं जिह्वा च चक्षुश्च त्वक् श्रोत्रं मन एव च ।
न निष्ठामधिगच्छन्ति बुद्धिस्तामधिगच्छति ।। १२ ।।

इसी प्रकार नासिका, जीभ, आँख, त्वचा, कान, और मन—वे किसी बातका निश्चय नहीं कर सकते। निश्चयात्मक ज्ञान तो केवल बुद्धिको होता है ।। १२ ।।

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
इन्द्रियाणां च संवादं मनसश्चैव भामिनि ।। १३ ।।

भामिनि! इस विषयमें इन्द्रियों और मनके संवादरूप एक प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया जाता है ।। १३ ।।

मन उवाच

नाघ्राति मामृते घ्राणं रसं जिह्वा न वेत्ति च ।

रूपं चक्षुर्न गृह्णाति त्वक् स्पर्शं नावबुध्यते ॥ १४ ॥
न श्रोत्रं बुध्यते शब्दं मया हीनं कथंचन ।
प्रवरं सर्वभूतानामहमस्मि सनातनम् ॥ १५ ॥
एक बार मनने इन्द्रियोंसे कहा—मेरी सहायताके बिना नासिका सूँघ नहीं सकती, जीभ रसका स्वाद नहीं ले सकती, आँख रूप नहीं देख सकती, त्वचा स्पर्शका अनुभव नहीं कर सकती और कानोंको शब्द नहीं सुनायी दे सकता। इसलिये मैं सब भूतोंमें श्रेष्ठ और सनातन हूँ ॥ १४-१५ ॥
अगारणीव शून्यानि शान्तार्चिष इवाग्नयः ।
इन्द्रियाणि न भासन्ते मया हीनानि नित्यशः ॥ १६ ॥
‘मेरे बिना समस्त इन्द्रियाँ बुझी लपटोंवाली आग और सूने घरकी भाँति सदा श्रीहीन जान पड़ती हैं ॥ १६ ॥
काष्ठानीवार्द्रशुष्काणि यतमानैरपीन्द्रियैः ।
गुणार्थान् नाधिगच्छन्ति मामृते सर्वजन्तवः ॥ १७ ॥
संसारके सभी जीव इन्द्रियोंके यत्न करते रहनेपर भी मेरे बिना उसी प्रकार विषयोंका अनुभव नहीं कर सकते, जिस प्रकार कि सूखे-गीले काष्ठ कोई अनुभव नहीं कर सकते ॥ १७ ॥

इन्द्रियाण्यूचुः
एवमेतद् भवेत् सत्यं यथैतन्मन्यते भवान् ।
ऋतेऽस्मानस्मदर्थांस्त्वं भोगान् भुङ्क्ते भवान् यदि ॥ १८ ॥
यह सुनकर इन्द्रियोंने कहा—महोदय! यदि आप भी हमारी सहायता लिये बिना ही विषयोंका अनुभव कर सकते तो हम आपकी इस बातको सच मान लेतीं ॥ १८ ॥
यद्यस्मासु प्रलीनेषु तर्पणं प्राणधारणम् ।
भोगान् भुङ्क्ते भवान् सत्यं यथैतन्मन्यते तथा ॥ १९ ॥
हमारा लय हो जानेपर भी आप तृप्त रह सकें, जीवन धारण कर सकें और सब प्रकारके भोग भोग सकें तो आप जैसा कहते और मानते हैं, वह सब सत्य हो सकता है ॥ १९ ॥
अथवास्मासु लीनेषु तिष्ठत्सु विषयेषु च ।
यदि संकल्पमात्रेण भुङ्क्ते भोगान् यथार्थवत् ॥ २० ॥
अथ चेन्मन्यसे सिद्धिमस्मदर्थेषु नित्यदा ।
घ्राणेन रूपमादत्स्व रसमादत्स्व चक्षुषा ॥ २१ ॥
श्रोत्रेण गन्धानादत्स्व स्पर्शनादत्स्व जिह्वया ।
त्वचा च शब्दमादत्स्व बुद्ध्या स्पर्शमथापि च ॥ २२ ॥

अथवा हम सब इन्द्रियाँ लीन हो जायँ या विषयोंमें स्थित रहें, यदि आप अपने संकल्पमात्रसे विषयोंका यथार्थ अनुभव करनेकी शक्ति रखते हैं और आपको ऐसा करनेमें सदा ही सफलता प्राप्त होती है तो जरा नाकके द्वारा रूपका तो अनुभव कीजिये, आँखसे रसका तो स्वाद लीजिये और कानके द्वारा गन्धोंको तो ग्रहण कीजिये। इसी प्रकार अपनी शक्तिसे जिह्वाके द्वारा स्पर्शका, त्वचाके द्वारा शब्दका और बुद्धिके द्वारा स्पर्शका तो अनुभव कीजिये ॥ २०—२२ ॥
बलवन्तो ह्यनियमा नियमा दुर्बलीयसाम् ।
भोगानपूर्वानादत्स्व नोच्छिष्टं भोक्तुमर्हसि ॥ २३ ॥
आप-जैसे बलवान् लोग नियमोंके बन्धनमें नहीं रहते, नियम तो दुर्बलोंके लिये होते हैं। आप नये ढंगसे नवीन भोगोंका अनुभव कीजिये। हमलोगोंकी जूठन खाना आपको शोभा नहीं देता ॥ २३ ॥
यथा हि शिष्यः शास्तारं श्रुत्यर्थमभिधावति ।
ततः श्रुतमुपादाय श्रुत्यर्थमुपतिष्ठति ॥ २४ ॥
विषयानेवमस्माभिर्दर्शितानभिमन्यसे ।
अनागतानतीतांश्च स्वप्ने जागरणे तथा ॥ २५ ॥
जैसे शिष्य श्रुतिके अर्थको जाननेके लिये उपदेश करनेवाले गुरुके पास जाता है और उनसे श्रुतिके अर्थका ज्ञान प्राप्त करके फिर स्वयं उसका विचार और अनुसरण करता है, वैसे ही आप सोते और जागते समय हमारे ही दिखाये हुए भूत और भविष्य-विषयोंका उपभोग करते हैं ॥ २४-२५ ॥
वैमनस्यं गतानां च जन्तूनामल्पचेतसाम् ।
अस्मदर्थे कृते कार्ये दृश्यते प्राणधारणम् ॥ २६ ॥
जो मनरहित हुए मन्दबुद्धि प्राणी हैं, उनमें भी हमारे लिये ही कार्य किये जानेपर प्राण-धारण देखा जाता है ॥ २६ ॥
बहूनपि हि संकल्पान् मत्वा स्वप्नानुपास्य च ।
बुभुक्षया पीड्यमानो विषयानेव धावति ॥ २७ ॥
बहुत-से संकल्पोंका मनन और स्वप्नोंका आश्रय लेकर भोग भोगनेकी इच्छासे पीड़ित हुआ प्राणी विषयोंकी ओर ही दौड़ता है ॥ २७ ॥
अगारमद्वारमिव प्रविश्य
संकल्पभोगान् विषये निबद्धान् ।
प्राणक्षये शान्तिमुपैति नित्यं
दारुक्षयेऽग्निर्ज्वलितो यथैव ॥ २८ ॥
विषय-वासनासे अनुविद्ध संकल्पजनित भोगोंका उपभोग करके प्राणशक्तिके क्षीण होनेपर मनुष्य बिना दरवाजेके घरमें घुसे हुए मनुष्यकी भाँति उसी तरह शान्त हो जाता है,

जैसे समिधाओंके जल जानेपर प्रज्वलित अग्नि स्वयं ही बुझ जाती है ॥ २८ ॥

कामं तु नः स्वेषु गुणेषु सङ्गः
कामं च नान्योन्यगुणोपलब्धिः ।
अस्मान् विना नास्ति तवोपलब्धि-
स्तावदृते त्वां न भजेत् प्रहर्षः ॥ २९ ॥

भले ही हमलोगोंकी अपने-अपने गुणोंके प्रति आसक्ति हो और भले ही हम परस्पर एक-दूसरेके गुणोंको न जान सकें; किंतु यह बात सत्य है कि आप हमारी सहायताके बिना किसी भी विषयका अनुभव नहीं कर सकते। आपके बिना तो हमें केवल हर्षसे ही वंचित होना पड़ता है ॥ २९ ॥

इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि ब्राह्मणगीतासु
द्वाविंशोऽध्यायः ॥ २२ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें ब्राह्मणगीताविषयक बाईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २२ ॥


* इस श्लोकका सारांश इस प्रकार समझना चाहिये—पहले आत्मा मनको उच्चारण करनेके लिये प्रेरित करता है, तब मन जठराग्निको प्रज्वलित करता है। जठराग्निके प्रज्वलित होनेपर उसके प्रभावसे प्राणवायु अपानवायुसे जा मिलता है। उसके बाद वह वायु उदानवायुके प्रभावसे ऊपर चढ़कर मस्तकमें टकराता है और फिर व्यानवायुके प्रभावसे कण्ठ-तालु आदि स्थानोंमें होकर वेगसे वर्ण उत्पन्न कराता हुआ वैखरीरूपसे मनुष्योंके कानमें प्रविष्ट होता है। जब प्राणवायुका वेग निवृत्त हो जाता है, तब वह फिर समानभावसे चलने लगता है।