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महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

[जल-दान, अन्न-दान और अतिथि-सत्कारका माहात्म्य]

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[जल-दान, अन्न-दान और अतिथि-सत्कारका माहात्म्य]

वैशम्पायन उवाच

श्रुत्वा यमपुराध्वानं जीवानां गमनं तथा ।
धर्मपुत्रः प्रहृष्टात्मा केशवं पुनरब्रवीत् ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! यमपुरके मार्गका वर्णन तथा वहाँ जीवोंके (सुखपूर्वक) जानेका उपाय सुनकर राजा युधिष्ठिर मन-ही-मन बहुत प्रसन्न हुए और भगवान् श्रीकृष्णसे फिर बोले— ॥
देवदेवेश दैत्यघ्न ऋषिसंघैरभिष्टुत ।
भगवन् भवहन् श्रीमन् सहस्रादित्यसंनिभ ॥
‘देवदेवेश्वर! आप सम्पूर्ण दैत्योंका वध करनेवाले हैं, ऋषियोंके समुदाय सदा आपकी ही स्तुति करते हैं, आप षडैश्वर्यसे युक्त, भवबन्धनसे मुक्ति देनेवाले, श्रीसम्पन्न और हजारों सूर्योंके समान तेजस्वी हैं ॥
सर्वसम्भव धर्मज्ञ सर्वधर्मप्रवर्तक ।
सर्वदानफलं सौम्य कथयस्व ममाच्युत ॥
‘धर्मज्ञ! आपहीसे सबकी उत्पत्ति हुई है और आप ही सम्पूर्ण धर्मोंके प्रवर्तक हैं। शान्तस्वरूप अच्युत! मुझे सब प्रकारके दानोंका फल बतलाइये ॥
एवमुक्तो हृषीकेशो धर्मपुत्रेण धीमता ।
उवाच धर्मपुत्राय पुण्यान् धर्मान् महोदयान् ॥
बुद्धिमान् धर्मपुत्र युधिष्ठिरके द्वारा इस प्रकार पूछे जानेपर हृषीकेश भगवान् श्रीकृष्ण धर्मपुत्रके प्रति महान् उन्नति करनेवाले पुण्यमय धर्मोंका वर्णन करने लगे— ॥
पानीयं परमं लोके जीवानां जीवनं स्मृतम् ।
पानीयस्य प्रदानेन तृप्तिर्भवति पाण्डव ।
पानीयस्य गुणा दिव्याः परलोके गुणावहाः ॥
‘पाण्डुनन्दन! संसारमें जलको प्राणियोंका परम जीवन माना गया है, उसके दानसे जीवोंकी तृप्ति होती है। जलके गुण दिव्य हैं और वे परलोकमें भी लाभ पहुँचानेवाले हैं ॥
तत्र पुष्पोदकी नाम नदी परमपावनी ।
कामान् ददाति राजेन्द्र तोयदानां यमालये ॥
‘राजेन्द्र! यमलोकमें पुष्पोदकी नामवाली परम पवित्र नदी है। वह जल-दान करनेवाले पुरुषोंकी सम्पूर्ण कामनाएँ पूर्ण करती है ॥
शीतलं सलिलं ह्यत्र ह्यक्षय्यममृतोपमम् ।
शीत्तोयप्रदातॄणां भवेन्नित्यं सुखावहम् ॥

'उसका जल ठण्डा, अक्षय और अमृतके समान मधुर है तथा वह ठंडे जलका दान करनेवाले लोगोंको सदा सुख पहुँचाता है ।।
प्रणश्यत्यम्बुपानेन बुभुक्षा च युधिष्ठिर ।
तृषितस्य न चान्नेन पिपासाभिप्रणश्यति ।
तस्मात् तोयं सदा देयं तृषितेभ्यो विजानता ।।
'युधिष्ठिर! जल पीनेसे भूख भी शान्त हो जाती है; किंतु प्यासे मनुष्यकी प्यास अन्नसे नहीं बुझती, इसलिये समझदार मनुष्यको चाहिये कि वह प्यासेको सदा पानी पिलाया करे ।।
अग्नेर्मूर्तिः क्षितेर्योनिरमृतस्य च सम्भवः ।
अतोऽम्भः सर्वभूतानां मूलमित्युच्यते बुधैः ।।
'जल अग्निकी मूर्ति है, पृथ्वीकी योनि (कारण) है और अमृतका उत्पत्ति स्थान है। इसलिये समस्त प्राणियोंका मूल जल है—ऐसा बुद्धिमान् पुरुषोंने कहा है ।।
अद्भिः सर्वाणि भूतानि जीवन्ति प्रभवन्ति च ।
तस्मात् सर्वेषु दानेषु तोयदानं विशिष्यते ।।
'सब प्राणी जलसे पैदा होते हैं और जलसे ही जीवन धारण करते हैं। इसलिये जलदान सब दानोंसे बढ़कर माना गया है ।।
ये प्रयच्छन्ति विप्रेभ्यस्त्वन्नदानं सुसंस्कृतम् ।
तैस्तु दत्ताः स्वयं प्राणा भवन्ति भरतर्षभ ।।
'भरतश्रेष्ठ! जो लोग ब्राह्मणोंको सुपक्व अन्नदान करते हैं, वे मानो साक्षात् प्राण-दान करते हैं ।।
अन्नाद् रक्तं च शुक्रं च अन्ने जीवः प्रतिष्ठितः ।
इन्द्रियाणि च बुद्धिश्च पुष्णन्त्यन्नेन नित्यशः ।
अन्नहीनानि सीदन्ति सर्वभूतानि पाण्डव ।।
'पाण्डुनन्दन! अन्नसे रक्त और वीर्य उत्पन्न होता है। अन्नमें ही जीव प्रतिष्ठित है। अन्नसे ही इन्द्रियोंका और बुद्धिका सदा पोषण होता है। बिना अन्नके समस्त प्राणी दुःखित हो जाते हैं ।।
तेजो बलं च रूपं च सत्त्वं वीर्यं धृतिर्द्युतिः ।
ज्ञानं मेधा तथाऽऽयुश्च सर्वमन्ने प्रतिष्ठितम् ।।
'तेज, बल, रूप, सत्त्व, वीर्य, धृति, द्युति, ज्ञान, मेधा और आयु—इन सबका आधार अन्न ही है ।।
देवमानवतिर्यक्षु सर्वलोकेषु सर्वदा ।
सर्वकालं हि सर्वेषां अन्ने प्राणाः प्रतिष्ठिताः ।।

'समस्त लोकोंमें सदा रहनेवाले देवता, मनुष्य और तिर्यक् योनिके प्राणियोंमें सब समय सबके प्राण अन्नमें ही प्रतिष्ठित हैं।।
अन्नं प्रजापते रूपमन्नं प्रजननं स्मृतम् ।
सर्वभूतमयं चान्नं जीवश्चान्नमयः स्मृतः ॥
'अन्न प्रजापतिकारूप है। अन्न ही उत्पत्तिका कारण है। इसलिये अन्न सर्वभूतमय है और समस्त जीव अन्नमय माने गये हैं।।
अन्नेनाधिष्ठितः प्राण अपानो व्यान एव च ।
उदानश्च समानश्च धारयन्ति शरीरिणम् ॥
'प्राण, अपान, व्यान, उदान और समान—ये पाँचों प्राण अन्नके ही आधारपर रहकर देहधारियोंको धारण करते हैं।।
शयनोत्थानगमनग्रहणाकर्षणानि च ।
सर्वसत्त्वकृतं कर्म चान्नादेव प्रवर्तते ॥
'सम्पूर्ण प्राणियोंद्वारा किये जानेवाले सोना, उठना, चलना, ग्रहण करना, खींचना आदि कर्म अन्नसे ही चलते हैं।।
चतुर्विधानि भूतानि जंगमानि स्थिराणि च ।
अन्नाद भवन्ति राजेन्द्र सृष्टिरेशा प्रजापतेः ॥
'राजेन्द्र! चारों प्रकारके चराचर प्राणी, जो यह प्रजापतिकी सृष्टि है, अन्नसे ही उत्पन्न होते हैं।।
विद्यास्थानानि सर्वाणि सर्वयज्ञाश्च पावनाः ।
अन्नाद यस्मात् प्रवर्तन्ते तस्मादन्नं परं स्मृतम् ॥
'समस्त विद्यालय और पवित्र बनानेवाले सम्पूर्ण यज्ञ अन्नसे ही चलते हैं। इसलिये अन्न सबसे श्रेष्ठ माना गया है।।
देवा रुद्रादयः सर्वे पितरोऽप्यग्नयस्तथा ।
यस्मादन्नेन तुष्यन्ति तस्मादन्नं विशिष्यते ॥
'रुद्र आदि सभी देवता, पितर और अग्नि अन्नसे ही संतुष्ट होते हैं; इसलिये अन्न सबसे बढ़कर है।।
यस्मादन्नात् प्रजाः सर्वाः कल्पे कल्पेऽसृजत् प्रभुः ।
तस्मादन्नात् परं दानं न भूतं न भविष्यति ॥
'शक्तिशाली प्रजापतिने प्रत्येक कल्पमें अन्नसे ही सारी प्रजाकी सृष्टि की है; इसलिये अन्नसे बढ़कर न कोई दान हुआ है और न होगा।।
यस्मादन्नात् प्रवर्तन्ते धर्मार्थौ काम एव च ।
तस्मादन्नात् परं दानं नामुत्रेह च पाण्डव ॥

'पाण्डुनन्दन! धर्म, अर्थ और कामका निर्वाह अन्नसे ही होता है। अतः इस लोक या परलोकमें अन्नसे बढ़कर कोई दान नहीं है।।
यक्षरक्षोग्रहा नागा भूतान्यन्ये च दानवाः।
तुष्यन्त्यन्नेन यस्मात् तु तस्मादन्नं परं भवेत्।।
'यक्ष, राक्षस, ग्रह, नाग, भूत और दानव भी अन्नसे ही संतुष्ट होते हैं; इसलिये अन्नका महत्त्व सबसे बढ़कर है।।
ब्राह्मणाय दरिद्राय योऽन्नं संवत्सरं नृप।
श्रोत्रियाय प्रयच्छेद् वै पाकभेदविवर्जितः।।
दम्भानृतविमुक्तस्तु परां भक्तिमुपागतः।
स्वधर्मेणार्जितफलं तस्य पुण्यफलं शृणु।।
'राजन्! जो मनुष्य दम्भ और असत्यका परित्याग करके मुझमें परम भक्ति रखकर रसोईमें भेद न करते हुए दरिद्र एवं श्रोत्रिय ब्राह्मणको एक वर्षतक अपने द्वारा धर्मपूर्वक उपार्जित अन्नका दान करता है, उसके पुण्यके फलको सुनो।।
शतवर्षसहस्राणि कामगः कामरूपधृक्।
मोदतेऽमरलोकस्थः पूज्यमानोऽप्सरोगणैः।।
ततश्चापि च्युतः कालान्न्रलोके द्विजो भवेत्।।
'वह एक लाख वर्षतक बड़े सम्मानके साथ देवलोकमें निवास करता है तथा वहाँ इच्छानुसार रूप धारण करके यथेष्ट विचरता रहता है एवं अप्सराओंका समुदाय उसका सत्कार करता है। फिर समयानुसार पुण्य क्षीण हो जानेपर वह जब स्वर्गसे नीचे उतरता है, तब मनुष्यलोकमें ब्राह्मण होता है।।
अग्रभिक्षां च यो दद्याद् दरिद्राय द्विजातये।
षण्मासान् वार्षिकं श्राद्धं तस्य पुण्यफलं शृणु।।
'जो छः महीने या वार्षिक श्राद्धपर्यन्त प्रतिदिनकी पहली भिक्षा दरिद्र ब्राह्मणको देता है, उसका पुण्यफल सुनो।।
गोसहस्रप्रदानेन यत् पुण्यं समुदाहृतम्।
तत् पुण्यफलमाप्नोति नरो वै नात्र संशयः।।
'एक हजार गोदानका जो पुण्यफल बताया गया है, वह उसी पुण्यके समान फल पाता है, इसमें संशय नहीं है।।
अध्वश्रान्ताय विप्राय क्षुधितायान्नकाङ्क्षिणे।
देशकालाभियाताय दीयते पाण्डुनन्दन।।
'पाण्डुनन्दन! देश-कालके अनुसार प्राप्त एवं रास्ता चलकर थके-माँदे आये हुए भूखे और अन्न चाहनेवाले ब्राह्मणको अन्न-दान करना चाहिये।।
यस्तु पांसुलपादश्च दूराध्वश्रमकर्शितः।

क्षुत्पिपासाश्रमश्रान्त आर्तः खिन्नगतिर्द्विजः ।
पृच्छन् वै ह्यन्नदातारं गृहमभ्येत्य याचयेत् ।
तं पूजयेत् तु यत्नेन सोऽतिथिः स्वर्गसंक्रमः ॥
तस्मिंस्तुष्टे नरश्रेष्ठ तुष्टाः स्युः सर्वदेवताः ॥
‘जो दूरका रास्ता तय करनेके कारण दुर्बल तथा भूख-प्यास और परिश्रमसे थका-माँदा हो, जिसके पैर बड़ी कठिनतासे आगे बढ़ते हों तथा जो बहुत पीड़ित हो रहा हो, ऐसा ब्राह्मण अन्नदाताका पता पूछता हुआ धूलभरे पैरोंसे यदि घरपर आकर अन्नकी याचना करे तो यत्नपूर्वक उसकी पूजा करनी चाहिये; क्योंकि वह अतिथि स्वर्गका सोपान होता है। नरश्रेष्ठ! उसके संतुष्ट होनेपर सम्पूर्ण देवता संतुष्ट हो जाते हैं॥

न तथा हविषा होमैर्न पुष्पैर्नानुलेपनैः ।
अग्नयः पार्थ तुष्यन्ति यथा ह्यतिथिपूजनात् ॥
‘पार्थ! अतिथिकी पूजा करनेसे अग्निदेवको जितनी प्रसन्नता होती है, उतनी हविष्यसे होम करने और फूल तथा चन्दन चढ़ानेसे भी नहीं होती॥

देवमाल्यापनयनं द्विजोच्छिष्टापमार्जनम् ।
श्रान्तसंवाहनं चैव तथा पादावसेचनम् ॥
प्रतिश्रयप्रदानं च तथा शय्यासनस्य च ।
एकैकं पाण्डवश्रेष्ठ गोप्रदानाद् विशिष्यते ॥
‘पाण्डवश्रेष्ठ! देवताके ऊपर चढ़ी हुई पत्र-पुष्प आदि पूजन-सामग्रीको हटाकर उस स्थानको साफ करना, ब्राह्मणके जूठे किये हुए बर्तन और स्थानको माँज-धो देना, थके हुए ब्राह्मणका पैर दबाना, उसके चरण धोना, उसे रहनेके लिये घर, सोनेके लिये शय्या और बैठनेके लिये आसन देना—इनमेंसे एक-एक कार्यका महत्त्व गोदानसे बढ़कर है॥

पादोदकं पादघृतं दीपमन्नं प्रतिश्रयम् ।
ये प्रयच्छन्ति विप्रेभ्यो नोपसर्पन्ति ते यमम् ॥
‘जो मनुष्य ब्राह्मणोंको पैर धोनेके लिये जल, पैरमें लगानेके लिये घी, दीपक, अन्न और रहनेके लिये घर देते हैं, वे कभी यमलोकमें नहीं जाते॥

विप्रातिथ्ये कृते राजन् भक्त्या शुश्रूषितेऽपि च ।
देवाः शुश्रूषिताः सर्वे त्रयस्त्रिंशदरिंदम ॥
‘शत्रुदमन! राजन्! ब्राह्मणका आतिथ्य सत्कार तथा भक्तिपूर्वक उसकी सेवा करनेसे समस्त तैंतीसों देवताओंकी सेवा हो जाती है॥

अभ्यागतो ज्ञातपूर्वो ह्यज्ञातोऽतिथिरुच्यते ।
तयोः पूजां द्विजः कुर्यादिति पौराणिकी श्रुतिः ॥
‘पहलेका परिचित मनुष्य यदि घरपर आवे तो उसे अभ्यागत कहते हैं और अपरिचित पुरुष अतिथि कहलाता है। द्विजोंको इन दोनोंकी ही पूजा करनी चाहिये। यह पञ्चम वेद

—पुराणकी श्रुति है ।।
पादाभ्यङ्गान्नपानैस्तु योऽतिथिं पूजयेन्नरः ।
पूजितस्तेन राजेन्द्र भवामीह न संशयः ।।
'राजेन्द्र! जो मनुष्य अतिथिके चरणोंमें तेल मलकर, उसे भोजन कराकर और पानी पिलाकर उसकी पूजा करता है, उसके द्वारा मेरी भी पूजा हो जाती है—इसमें संशय नहीं है ।।
शीघ्रं पापाद् विनिर्मुक्तो मया चानुगृहीकृतः ।
विमानेनेन्दुकल्पेन मम लोकं स गच्छति ।।
'वह मनुष्य तुरंत सब पापोंसे छुटकारा पा जाता है और मेरी कृपासे चन्द्रमाके समान उज्ज्वल विमानपर आरूढ़ होकर मेरे परमधामको पधारता है ।।
अभ्यागतं श्रान्तमनुव्रजन्ति
देवाश्च सर्वे पितरोऽग्नयश्च ।
तस्मिन् द्विजे पूजिते पूजिताः स्यु-
र्गते निराशाः पितरो व्रजन्ति ।।
'थका हुआ अभ्यागत जब घरपर आता है, तब उसके पीछे-पीछे समस्त देवता, पितर और अग्नि भी पदार्पण करते हैं। यदि उस अभ्यागत द्विजकी पूजा हुई तो उसके साथ उन देवता आदिकी भी पूजा हो जाती है और उसके निराश लौटनेपर वे देवता, पितर आदि भी हताश होकर लौट जाते हैं ।।
अतिथिर्यस्य भग्नाशो गृहात् प्रतिनिवर्तते ।
पितरस्तस्य नाश्नन्ति दशवर्षाणि पञ्च च ।।
'जिसके घरसे अतिथिको निराश होकर लौटना पड़ता है, उसके पितर पंद्रह वर्षोंतक भोजन नहीं करते ।।
निर्वासयति यो विप्रं देशकालागतं गृहात् ।
पतितस्तत्क्षणादेव जायते नात्र संशयः ।।

'जो देश-कालके अनुसार घरपर आये हुए ब्राह्मणको वहाँसे बाहर कर देता है, वह तत्काल पतित हो जाता है—इसमें संदेह नहीं है ।।

चाण्डालोऽप्यतिथिः प्राप्तो देशकालेऽन्नकाङ्क्षया ।
अभ्युद्गभ्यो गृहस्थेन पूजनीयश्च सर्वदा ।।
'यदि देश-कालके अनुसार अन्नकी इच्छासे चाण्डाल भी अतिथिके रूपमें आ जाय तो गृहस्थ पुरुषको सदा उसका सत्कार करना चाहिये ।।

मोघं ध्रुवं प्रोर्णयति मोघमस्य तु पच्यते ।
मोघमन्नं सदाश्नाति योऽतिथिं न च पूजयेत् ।।
'जो अतिथिका सत्कार नहीं करता, उसका ऊनी वस्त्र ओढ़ना, अपने लिये रसोई बनवाना और भोजन करना—सब कुछ निश्चय ही व्यर्थ है ।।

साङ्गोपाङ्गांस्तु यो वेदान् पठतीह दिने दिने ।

न चातिथिं पूजयति वृथा भवति स द्विजः ॥
‘जो प्रतिदिन सांगोपांग वेदोंका स्वाध्याय करता है, किंतु अतिथिकी पूजा नहीं करता, उस द्विजका जीवन व्यर्थ है ॥

पाकयज्ञमहायज्ञैः सोमसंस्थाभिरेव च।
ये यजन्ति न चार्चन्ति गृहेष्वतिथिमागतम् ॥
तेषां यशोऽभिकामानां दत्तमिष्टं च यद् भवेत्।
वृथा भवति तत् सर्वमाशया हि तया हतम् ॥
‘जो लोग पाक-यज्ञ, पञ्चमहायज्ञ तथा सोमयाग आदिके द्वारा यजन करते हैं, परंतु घरपर आये हुए अतिथिका सत्कार नहीं करते, वे यशकी इच्छासे जो कुछ दान या यज्ञ करते हैं, वह सब व्यर्थ हो जाता है। अतिथिकी मारी गयी आशा मनुष्यके समस्त शुभ-कर्मोंका नाश कर देती है ॥

देशं कालं च पात्रं च स्वशक्तिं च निरीक्ष्य च।
अल्पं समं महद् वापि कुर्यादातिथ्यमाप्तवान् ॥
‘इसलिये श्रद्धालु होकर देश, काल, पात्र और अपनी शक्तिका विचार करके अल्प, मध्यम अथवा महान् रूपमें अतिथि-सत्कार अवश्य करना चाहिये ॥’

सुमुखः सुप्रसन्नात्मा धीमानतिथिमागतम्।
स्वागतेनासनेनाद्भिर्न्नाद्येन च पूजयेत् ॥
‘जब अतिथि अपने द्वारपर आवे, तब बुद्धिमान् पुरुषको चाहिये कि वह प्रसन्नचित्त होकर हँसते हुए मुखसे अतिथिका स्वागत करे तथा बैठनेको आसन और चरण धोनेके लिये जल देकर अन्न-पान आदिके द्वारा उसकी पूजा करे ॥

हितः प्रियो वा द्वेष्यो वा मूर्खः पण्डित एव वा।
प्राप्तो यो वैश्वदेवान्ते सोऽतिथिः स्वर्गसंक्रमः ॥
‘अपना हितैषी, प्रेमपात्र, द्वेषी, मूर्ख अथवा पण्डित—जो कोई भी बलिवैश्वदेवके बाद आ जाय, वह स्वर्गतक पहुँचानेवाला अतिथि है ॥

क्षुत्पिपासाश्रमार्ताय देशकालागताय च।
सत्कृत्यान्नं प्रदातव्यं यज्ञस्य फलमिच्छता ॥
‘जो यज्ञका फल पाना चाहता हो, वह भूख-प्यास और परिश्रमसे दुःखी तथा देश-कालके अनुसार प्राप्त हुए अतिथिको सत्कारपूर्वक अन्न प्रदान करे ॥

भोजयेदात्मनः श्रेष्ठान् विधिवद् हव्यकव्ययोः।
अन्नं प्राणो मनुष्याणामन्नदः प्राणदो भवेत् ॥
तस्मादन्नं विशेषेण दातव्यं भूतिमिच्छता ॥
‘यज्ञ और श्राद्धमें अपनेसे श्रेष्ठ पुरुषको विधिवत् भोजन कराना चाहिये। अन्न मनुष्योंका प्राण है, अन्न देनेवाला प्राणदाता होता है; इसलिये कल्याणकी इच्छा रखनेवाले

पुरुषको विशेषरूपसे अन्न-दान करना चाहिये ।।
अन्नदः सर्वकामैस्तु सुतृप्तः सुष्ठ्वलंकृतः ।
पूर्णचन्द्रप्रकाशेन विमानेन विराजता ।।
सेव्यमानो वरस्त्रीभिर्देवलोकं स गच्छति ।
'अन्न प्रदान करनेवाला मनुष्य सब भोगोंसे तृप्त होकर भलीभाँति आभूषणोंसे सम्पन्न हुआ पूर्ण चन्द्रमाके प्रकाशसे प्रकाशित विमानद्वारा देवलोकमें जाता है। वहाँ सुन्दर स्त्रियोंद्वारा उसकी सेवा की जाती है ।।
क्रीडित्वा तु ततस्तस्मिन् वर्षकोटिं यथामरः ।।
ततश्चापि च्युतः कालादिह लोके महायशाः ।
वेदशास्त्रार्थतत्त्वज्ञो भोगवान् ब्राह्मणो भवेत् ।।
'वहाँ करोड़ वर्षोंतक देवताओंके समान भोग भोगनेके बाद समयपर वहाँसे गिरकर यहाँ महायशस्वी और वेदशास्त्रोंके अर्थ और तत्त्वको जाननेवाला भोगसम्पन्न ब्राह्मण होता है ।।
यथाश्रद्धं तु यः कुर्यान्मनुष्येषु प्रजायते ।
महाधनपतिः श्रीमान् वेदवेदाङ्गपारगः ।
सर्वशास्त्रार्थतत्त्वज्ञो भोगवान् ब्राह्मणो भवेत् ।।
'जो मनुष्य श्रद्धापूर्वक अतिथि-सत्कार करता है, वह मनुष्योंमें महान् धनवान्, श्रीमान्, वेद-वेदांगका पारदर्शी, सम्पूर्ण शास्त्रोंके अर्थ और तत्त्वका ज्ञाता एवं भोगसम्पन्न ब्राह्मण होता है ।।
सर्वातिथ्यं तु यः कुर्याद् वर्षमेकमकल्मषः ।
धर्मार्जितधनो भूत्वा पाकभेदविवर्जितः ।।
'जो मनुष्य धर्मपूर्वक धनका उपार्जन करके भोजनमें भेद न रखते हुए एक वर्षतक सबका अतिथि-सत्कार करता है, उसके समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं ।।
सर्वातिथ्यं तु यः कुर्याद् यथाश्रद्धं नरेश्वर ।
अकालनियमेनापि सत्यवादी जितेन्द्रियः ।।
सत्यसंधो जितक्रोधः शाखाधर्मविवर्जितः ।
अधर्मभीरुर्धर्मिष्ठो मायामात्सर्यवर्जितः ।।
श्रद्दधानः शुचिर्नित्यं पाकभेदविवर्जितः ।
स विमानेन दिव्येन दिव्यरूपी महायशाः ।।
पुरंदरपुरं याति गीयमानोऽप्सरोगणैः ।
'नरेश्वर! जो सत्यवादी जितेन्द्रिय पुरुष समयका नियम न रखकर सभी अतिथियोंकी श्रद्धापूर्वक सेवा करता है, जो सत्यप्रतिज्ञ है, जिसने क्रोधको जीत लिया है, जो शाखाधर्मसे रहित, अधर्मसे डरनेवाला और धर्मात्मा है, जो माया और मत्सरतासे रहित है,

जो भोजनमें भेद-भाव नहीं करता तथा जो नित्य पवित्र और श्रद्धासम्पन्न रहता है, वह दिव्य विमानके द्वारा इन्द्रलोकमें जाता है। वहाँ वह दिव्यरूपधारी और महायशस्वी होता है। अप्सराएँ उसके यशका गान करती हैं ।।
मन्वन्तरं तु तत्रैव क्रीडित्वा देवपूजितः ।
मानुष्यलोकमागम्य भोगवान् ब्राह्मणो भवेत् ।।
‘वह एक मन्वन्तरतक वहीं देवताओंसे पूजित होता है और क्रीड़ा करता रहता है। उसके बाद मनुष्यलोकमें आकर भोगसम्पन्न ब्राह्मण होता है’ ।।
(दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त)