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महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

गृहस्थ-धर्मके सम्बन्धमें श्रीकृष्णका पृथ्वीके साथ संवाद

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गृहस्थ-धर्मके सम्बन्धमें श्रीकृष्णका पृथ्वीके साथ संवाद

अनित्यं हि स्थितो यस्मात् तस्मादतिथिरुच्यते ।
आचार्यस्थ पितुश्चैव सख्युपराप्तस्य चातिथेः ॥ १९ ॥
इदमस्ति गृहे मह्यमिति नित्यं निवेदयेत् ।
ते यद् वदेयुस्तत् कुर्यादिति धर्मो विधीयते ॥ २० ॥
जो नित्य अपने घरमें स्थित नहीं रहता, वह अतिथि कहलाता है। आचार्य, पिता, विश्वासपात्र मित्र और अतिथिसे सदा यह निवेदन करे कि ‘अमुक वस्तु मेरे घरमें मौजूद है, उसे आप स्वीकार करें।’ फिर वे जैसी आज्ञा दें वैसा ही करे। ऐसा करनेसे धर्मका पालन होता है ॥ १९-२० ॥
गृहस्थः पुरुषः कृष्ण शिष्टाशी च सदा भवेत् ।
राजर्त्विजं स्नातकं च गुरुं श्वशुरमेव च ॥ २१ ॥
अर्चयेन्मधुपर्केण परिसंवत्सरोषितान् ।

श्रीकृष्ण! गृहस्थ पुरुषको सदा यज्ञशिष्ट अन्नका ही भोजन करना चाहिये। राजा, ऋत्विज्, स्नातक, गुरु और श्वशुर—ये यदि एक वर्षके बाद घर आवें तो मधुपर्कसे इनकी पूजा करनी चाहिये ॥ २११/२ ॥
श्वभ्यश्च श्वपचेभ्यश्च वयोभ्यश्चावपेद् भुवि ।
वैश्वदेवं हि नामैतत् सायंप्रातर्विधीयते ॥ २२ ॥
कुत्तों, चाण्डालों और पक्षियोंके लिये भूमिपर अन्न रख देना चाहिये। यह वैश्वदेव नामक कर्म है। इसका सायंकाल और प्रातःकाल अनुष्ठान किया जाता है ॥
एतांस्तु धर्मान् गार्हस्थ्यान् यः कुर्यादनसूयकः ।
स इहर्षिवरान् प्राप्य प्रेत्य लोके महीयते ॥ २३ ॥
जो मनुष्य दोषदृष्टिका परित्याग करके इन गृहस्थोचित धर्मोंका पालन करता है, उसे इस लोकमें ऋषि-महर्षियोंका वरदान प्राप्त होता है और मृत्युके पश्चात् वह पुण्यलोकोंमें सम्मानित होता है ॥ २३ ॥

भीष्म उवाच

इति भूमेर्वचः श्रुत्वा वासुदेवः प्रतापवान् ।
तथा चकार सततं त्वमप्येवं सदाचर ॥ २४ ॥
**भीष्मजी कहते हैं—**युधिष्ठिर! पृथ्वी देवीके ये वचन सुनकर प्रतापी भगवान् श्रीकृष्णने उन्हींके अनुसार गृहस्थधर्मोंका विधिवत् पालन किया। तुम भी सदा इन धर्मोंका अनुष्ठान करते रहो ॥ २४ ॥
एतद् गृहस्थधर्मं त्वं चेष्टमानो जनाधिप ।
इहलोके यशः प्राप्य प्रेत्य स्वर्गमवाप्स्यसि ॥ २५ ॥
जनेश्वर! इस गृहस्थ-धर्मका पालन करते रहनेपर तुम इहलोकमें सुयश और परलोकमें स्वर्ग प्राप्त कर लोगे ॥

इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि बलिदानविधिर्नाम सप्तनवतितमोऽध्यायः ॥ ९७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें बलिदानविधि नामक सत्तानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ९७ ॥