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महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

कार्तवीर्य अर्जुनको दत्तात्रेयजीसे चार वरदान प्राप्त होनेका एवं उनमें अभिमानकी उत्पत्तिका वर्णन तथा ब्राह्मणोंकी महिमाके विषयमें कार्तवीर्य अर्जुन और

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द्विपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः

कार्तवीर्य अर्जुनको दत्तात्रेयजीसे चार वरदान प्राप्त होनेका एवं उनमें अभिमानकी उत्पत्तिका वर्णन तथा ब्राह्मणोंकी महिमाके विषयमें कार्तवीर्य अर्जुन और वायुदेवताके संवादका उल्लेख

युधिष्ठिर उवाच

कां तु ब्राह्मणपूजायां व्युष्टिं दृष्ट्वा जनाधिप ।
कं वा कर्मोदयं मत्वा तानर्चसि महामते ॥ १ ॥

**युधिष्ठिरने कहा—**जनेश्वर! आप कौन-सा फल देखकर ब्राह्मणपूजामें लगे रहते हैं? महामते! अथवा किस कर्मका उदय सोचकर आप उन ब्राह्मणोंकी पूजा-अर्चा करते हैं? ॥ १ ॥

भीष्म उवाच

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
पवनस्य च संवादमर्जुनस्य च भारत ॥ २ ॥

**भीष्मजीने कहा—**भरतनन्दन! इस विषयमें विज्ञपुरुष कार्तवीर्य अर्जुन और वायुदेवताके संवादरूप इस प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं ॥ २ ॥

सहस्रभुजभृच्छ्रीमान् कार्तवीर्योऽभवत् प्रभुः ।
अस्य लोकस्य सर्वस्य माहिष्मत्यां महाबलः ॥ ३ ॥
स तु रत्नाकरवतीं सद्वीपां सागराम्बराम् ।
शशास पृथिवीं सर्वां हैहयः सत्यविक्रमः ॥ ४ ॥

**पूर्वकालकी बात है—**माहिष्मती नगरीमें सहस्र-भुजधारी परम कान्तिमान् कार्तवीर्य अर्जुन नामवाला एक हैहयवंशी राजा समस्त भूमण्डलका शासन करता था। वह महान् बलवान् और सत्यपराक्रमी था। इस लोकमें सर्वत्र उसीका आधिपत्य था ॥ ३-४ ॥

स्ववित्तं तेन दत्तं तु दत्तात्रेयाय कारणे ।
क्षत्रधर्मं पुरस्कृत्य विनयं श्रुतमेव च ॥ ५ ॥
आराधयामास च तं कृतवीर्यात्मजो मुनिम् ।

एक समय कृतवीर्यकुमार अर्जुनने क्षत्रिय-धर्मको सामने रखते हुए विनय और शास्त्रज्ञानके अनुसार बहुत दिनोंतक मुनिवर दत्तात्रेयकी आराधना की तथा किसी कारणवश अपना सारा धन उनकी सेवामें समर्पित कर दिया ॥ ५ ½ ॥

न्यमन्त्रयत संतुष्टो द्विजश्चैनं वरैस्त्रिभिः ।। ६ ।।
स वरैश्छन्दितस्तेन नृपो वचनमब्रवीत् ।
सहस्रबाहुर्भूयां वै चमूमध्ये गृहेऽन्यथा ।। ७ ।।
मम बाहुसहस्रं तु पश्यतां सैनिका रणे ।
विक्रमेण महीं कृत्स्नां जयेयं संशितव्रत ।। ८ ।।
तां च धर्मेण सम्प्राप्य पालयेयमतन्द्रितः ।
चतुर्थं तु वरं याचे त्वामहं द्विजसत्तम ।। ९ ।।
तं ममानुग्रहकृते दातुमर्हस्यनिन्दित ।
अनुशासन्तु मां सन्तो मिथ्योद्वृत्तं त्वदाश्रयम् ।। १० ।।

विप्रवर दत्तात्रेय उसके ऊपर बहुत संतुष्ट हुए और उन्होंने उसे तीन वर माँगनेकी आज्ञा दी। उनके द्वारा वर माँगनेकी आज्ञा मिलनेपर राजाने कहा—'भगवन्! मैं युद्धमें तो हजार भुजाओंसे युक्त रहूँ; किन्तु घरपर मेरी दो ही बाँहें रहें। रणभूमिमें सभी सैनिक मेरी एक हजार भुजाएँ देखें। कठोर व्रतका पालन करनेवाले गुरुदेव! मैं अपने पराक्रमसे सम्पूर्ण पृथ्वीको जीत लूँ। इस प्रकार पृथ्वीको धर्मके अनुसार प्राप्तकर मैं आलस्यरहित हो उसका पालन करूँ। द्विजश्रेष्ठ! इन तीन वरोंके सिवा एक चौथा वर भी मैं आपसे माँगता हूँ। अनिन्द्य महर्षे! मुझपर कृपा करनेके लिये आप वह वर भी अवश्य प्रदान करें। मैं आपका आश्रित भक्त हूँ। यदि कभी मैं सन्मार्गका परित्याग करके असत्य मार्गका आश्रय लूँ तो श्रेष्ठ पुरुष मुझे राहपर लानेके लिये शिक्षा दें' ।। ६—१० ।।