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महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

अध्याय (पृष्ठ 693)

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एकोनाशीतितमोऽध्यायः

गौओंको तपस्याद्वारा अभीष्ट वरकी प्राप्ति तथा उनके दानकी महिमा, विभिन्न प्रकारके गौओंके दानसे विभिन्न उत्तम लोकोंमें गमनका कथन

वसिष्ठ उवाच

शतं वर्षसहस्राणां तपस्तप्तं सुदुष्करम् ।
गोभिः पूर्वं विसृष्टाभिर्गच्छेम श्रेष्ठतामिति ॥ १ ॥
लोकेऽस्मिन् दक्षिणानां च सर्वासां वयमुत्तमाः ।
भवेम न च लिप्यैम दोषेणेति परंतप ॥ २ ॥
अस्मत्पुरीषस्नानेन जनः पूयेत सर्वदा ।
शकृता च पवित्रार्थं कुर्वीरन् देवमानुषाः ॥ ३ ॥
तथा सर्वाणि भूतानि स्थावराणि चराणि च ।
प्रदातारश्च लोकान् नो गच्छेयुरिति मानद ॥ ४ ॥
वसिष्ठजी कहते हैं— मानद परंतप! प्राचीन कालमें जब गौओंकी सृष्टि हुई थी, तब उन गौओंने एक लाख वर्षोंतक बड़ी कठोर तपस्या की थी। उनकी तपस्याका उद्देश्य यह था कि हम श्रेष्ठता प्राप्त करें। इस जगत्‌में जितनी दक्षिणा देने योग्य वस्तुएँ हैं, उन सबमें हम उत्तम समझी जायँ। किसी दोषसे लिप्त न हों। हमारे गोबरसे स्नान करनेपर सदा सब लोग पवित्र हों। देवता और मनुष्य पवित्रताके लिये हमेशा हमारे गोबरका उपयोग करें। समस्त चराचर प्राणी भी हमारे गोबरसे पवित्र हो जायँ और हमारा दान करनेवाले मनुष्य हमारे ही लोक (गोलोकधाम) में जायँ ॥

ताभ्यो वरं ददौ ब्रह्मा तपसोऽन्ते स्वयं प्रभुः ।
एवं भवत्विति प्रभुर्लोकांस्तारयतेति च ॥ ५ ॥
जब उनकी तपस्या समाप्त हुई, तब साक्षात् भगवान् ब्रह्माने उन्हें वर दिया—'गौओ! ऐसा ही हो—तुम्हारे मनमें जो संकल्प है, वह परिपूर्ण हो। तुम सम्पूर्ण जगत्‌के जीवोंका उद्धार करती रहो' ॥ ५ ॥

उत्तस्थुः सिद्धकामास्ता भूतभव्यस्य मातरः ।
प्रातर्नमस्यास्ता गावस्ततः पुष्टिमवाप्नुयात् ॥ ६ ॥
इस प्रकार अपनी समस्त कामनाएँ सिद्ध हो जानेपर गौएँ तपस्यासे उठीं। वे भूत, भविष्य और वर्तमान—तीनों कालोंकी जननी हैं; अतः प्रतिदिन प्रातःकाल उठकर गौओंको प्रणाम करना चाहिये। इससे मनुष्योंको पुष्टि प्राप्त होती है ॥ ६ ॥

तपसोऽन्ते महाराज गावो लोकपरायणाः ।
तस्माद् गावो महाभागाः पवित्रं परमुच्यते ॥ ७ ॥
महाराज! तपस्या समाप्त होनेपर गौएँ सम्पूर्ण जगत्का आश्रय बन गयीं; इसलिये वे महान् सौभाग्यशालिनी गौएँ परम पवित्र बतायी जाती हैं ॥ ७ ॥
तथैव सर्वभूतानां समतिष्ठन्त मूर्धनि ।
समानवत्सां कपिलां धेनुं दत्त्वा पयस्विनीम् ।
सुव्रतां वस्त्रसंवीतां ब्रह्मलोके महीयते ॥ ८ ॥
ये समस्त प्राणियोंके मस्तकपर स्थित हैं (अर्थात् सबसे श्रेष्ठ एवं वन्दनीय हैं)। जो मनुष्य दूध देनेवाली सुलक्षणा कपिला गौको वस्त्र ओढ़ाकर कपिल रंगके बछड़ेसहित दान करता है, वह ब्रह्मलोकमें सम्मानित होता है ॥ ८ ॥
लोहितां तुल्यवत्सां तु धेनुं दत्त्वा पयस्विनीम् ।
सुव्रतां वस्त्रसंवीतां सूर्यलोके महीयते ॥ ९ ॥
जो मनुष्य दूध देनेवाली सुलक्षणा लाल रंगकी गौको वस्त्र ओढ़ाकर लाल रंगके बछड़ेसहित दान करता है, वह सूर्यलोकमें सम्मानित होता है ॥ ९ ॥
समानवत्सां शबलां धेनुं दत्त्वा पयस्विनीम् ।
सुव्रतां वस्त्रसंवीतां सोमलोके महीयते ॥ १० ॥
जो पुरुष दूध देनेवाली सुलक्षणा चितकबरी गौको वस्त्र ओढ़ाकर चितकबरे बछड़ेसहित दान करता है, वह चन्द्रलोकमें पूजित होता है ॥ १० ॥
समानवत्सां श्वेतां तु धेनुं दत्त्वा पयस्विनीम् ।
सुव्रतां वस्त्रसंवीतामिन्द्रलोके महीयते ॥ ११ ॥
जो मानव दूध देनेवाली सुलक्षणा श्वेत वर्णकी गौको वस्त्र ओढ़ाकर श्वेत वर्णके बछड़ेसहित दान करता है, उसे इन्द्रलोकमें सम्मान प्राप्त होता है ॥ ११ ॥
समानवत्सां कृष्णां तु धेनुं दत्त्वा पयस्विनीम् ।
सुव्रतां वस्त्रसंवीतामग्निलोके महीयते ॥ १२ ॥
जो मनुष्य दूध देनेवाली सुलक्षणा कृष्ण वर्णकी गौको वस्त्र ओढ़ाकर कृष्ण वर्णके बछड़ेसहित दान करता है, वह अग्निलोकमें प्रतिष्ठित होता है ॥ १२ ॥
समानवत्सां धूम्रां तु धेनुं दत्त्वा पयस्विनीम् ।
सुव्रतां वस्त्रसंवीतां याम्यलोके महीयते ॥ १३ ॥
जो पुरुष दूध देनेवाली सुलक्षणा धूएँ-जैसे रंगकी गौको वस्त्र ओढ़ाकर धूएँके समान रंगके बछड़ेसहित दान करता है, वह यमलोकमें सम्मानित होता है ॥ १३ ॥
अपां फेनसवर्णां तु सवत्सां कांस्यदोहनाम् ।
प्रदाय वस्त्रसंवीतां वारुणं लोकमाप्नुते ॥ १४ ॥

जो जलके फेनके समान रंगवाली गौको वस्त्र ओढ़ाकर बछड़े और कांस्यके दुग्धपात्रसहित दान करता है, वह वरुणलोकको प्राप्त होता है ॥ १४ ॥
वातरेणुसवर्णां तु सवत्सां कांस्यदोहनाम् ।
प्रदाय वस्त्रसंवीतां वायुलोके महीयते ॥ १५ ॥
जो हवासे उड़ी हुई धूलके समान रंगवाली गौको वस्त्र ओढ़ाकर बछड़े और कांस्यके दुग्धपात्रसहित दान करता है, उसकी वायुलोकमें पूजा होती है ॥ १५ ॥
हिरण्यवर्णां पिंगाक्षीं सवत्सां कांस्यदोहनाम् ।
प्रदाय वस्त्रसंवीतां कौबेरं लोकमश्नुते ॥ १६ ॥
जो सुवर्णके समान रंग तथा पिंगल वर्णके नेत्रवाली गौको वस्त्र ओढ़ाकर बछड़े और कांस्यके दुग्धपात्रसहित दान करता है, वह कुबेर-लोकको प्राप्त होता है ॥ १६ ॥
पलालधूम्रवर्णां तु सवत्सां कांस्यदोहनाम् ।
प्रदाय वस्त्रसंवीतां पितृलोके महीयते ॥ १७ ॥
जो पुआलके धूएँके समान रंगवाली बछड़ेसहित गौको वस्त्रसे आच्छादित करके कांस्यके दुग्धपात्रसहित दान करता है, वह पितृलोकमें प्रतिष्ठित होता है ॥ १७ ॥
सवत्सां पीवरीं दत्त्वा दृतिकण्ठामलंकृताम् ।
वैश्वदेवमसम्बाधं स्थानं श्रेष्ठं प्रपद्यते ॥ १८ ॥
जो लटकते हुए गलकम्बलसे युक्त मोटी-ताजी सवत्सा गौको अलंकृत करके ब्राह्मणको दान देता है, वह बिना किसी बाधाके विश्वेदेवोंके श्रेष्ठ लोकमें पहुँच जाता है ॥ १८ ॥
समानवत्सां गौरीं तु धेनुं दत्त्वा पयस्विनीम् ।
सुव्रतां वस्त्रसंवीतां वसूनां लोकमाप्नुयात् ॥ १९ ॥
जो गौर वर्णवाली और दूध देनेवाली शुभलक्षणा गौको वस्त्र ओढ़ाकर समान रंगवाले बछड़ेसहित दान करता है, वह वसुओंके लोकमें जाता है ॥ १९ ॥
पाण्डुकम्बलवर्णाभां सवत्सां कांस्यदोहनाम् ।
प्रदाय वस्त्रसंवीतां साध्यानां लोकमाप्नुते ॥ २० ॥
जो श्वेत कम्बलके समान रंगवाली सवत्सा गौको वस्त्रसे आच्छादित करके कांस्यके दुग्धपात्रसहित दान करता है, वह साध्योंके लोकमें जाता है ॥ २० ॥
वैराटपृष्ठमुक्षाणं सर्वरत्नैरलंकृतम् ।
प्रदन्मरुतां लोकान् स राजन् प्रतिपद्यते ॥ २१ ॥
राजन्! जो विशालपृष्ठभागवाले बैलको सब प्रकारके रत्नोंसे अलंकृत करके उसका दान करता है, वह मरुद्गणोंके लोकोंमें जाता है ॥ २१ ॥
वयोपपन्नं लीलांगं सर्वरत्नसमन्वितम् ।
गन्धर्वाप्सरसां लोकान् दत्त्वा प्राप्नोति मानवः ॥ २२ ॥

जो मनुष्य यौवनसे सम्पन्न और सुन्दर अंगवाले बैलको सम्पूर्ण रत्नोंसे विभूषित करके उसका दान करता है, वह गन्धर्वों और अप्सराओंके लोकोंको प्राप्त करता है ॥ २२ ॥

दृतिकण्ठमनड्वाहं सर्वरत्नैरलंकृतम् ।
दत्त्वा प्रजापतेर्लोकान् विशोकः प्रतिपद्यते ॥ २३ ॥
जो लटकते हुए गलकम्बलवाले तथा गाड़ीका बोझ ढोनेमें समर्थ बैलको सम्पूर्ण रत्नोंसे अलंकृत करके ब्राह्मणको देता है, वह शोकरहित हो प्रजापतिके लोकोंमें जाता है ॥ २३ ॥

गोप्रदानरतो याति भित्त्वा जलदसंचयान् ।
विमानेनार्कवर्णेन दिवि राजन् विराजते ॥ २४ ॥
राजन्! गोदानमें अनुरागपूर्वक तत्पर रहनेवाला पुरुष सूर्यके समान देदीप्यमान विमानमें बैठकर मेघमण्डलको भेदता हुआ स्वर्गमें जाकर सुशोभित होता है ॥ २४ ॥

तं चारुवेषाः सुश्रोण्यः सहस्रं सुरयोषितः ।
रमयन्ति नरश्रेष्ठं गोप्रदानरतं नरम् ॥ २५ ॥
उस गोदानपरायण श्रेष्ठ मनुष्यको मनोहर वेष और सुन्दर नितम्बवाली सहस्रों देवांगनाएँ (अपनी सेवासे) रमण कराती हैं ॥ २५ ॥

वीणानां वल्लकीनां च नूपुराणां च सिञ्जितैः ।
हासैश्च हरिणाक्षीणां सुप्तः स प्रतिबोध्यते ॥ २६ ॥
वह वीणा और वल्लकीके मधुर गुंजन, मृगनयनी युवतियोंके नूपुरोंकी मनोहर झनकारों तथा हास-परिहासके शब्दोंको श्रवण करके नींदसे जागता है ॥ २६ ॥

यावन्ति रोमाणि भवन्ति धेन्वा-
स्तावन्ति वर्षाणि महीयते सः ।
स्वर्गच्युतश्चापि ततो नृलोके
प्रसूयते वै विपुले गृहे सः ॥ २७ ॥
गौके शरीरमें जितने रोएँ होते हैं, उतने वर्षोंतक वह स्वर्गलोकमें सम्मानपूर्वक रहता है। फिर पुण्यक्षीण होनेपर जब स्वर्गसे नीचे उतरता है, तब इस मनुष्यलोकमें आकर सम्पन्न घरमें जन्म लेता है ॥ २७ ॥

इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि गोप्रदानिके
एकोनाशीतितमोऽध्यायः ॥ ७९ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें गोदानविषयक उन्यासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७९ ॥