महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
अध्याय (पृष्ठ 537)
चतुःपञ्चाशत्तमोऽध्यायः
महर्षि च्यवनके प्रभावसे राजा कुशिक और उनकी रानीको अनेक आश्चर्यमय दृश्योंका दर्शन एवं च्यवन मुनिका प्रसन्न होकर राजाको वर माँगनेके लिये कहना
भीष्म उवाच
ततः स राजा रात्र्यन्ते प्रतिबुद्धो महामनाः ।
कृतपूर्वाह्निकः प्रायात् सभार्यस्तद् वनं प्रति ॥ १ ॥
**भीष्मजी कहते हैं—**राजन्! तत्पश्चात् रात्रि व्यतीत होनेपर महामना राजा कुशिक जागे और पूर्वाह्नकालके नैत्यिक नियमोंसे निवृत्त होकर अपनी रानीके साथ उस तपोवनकी ओर चल दिये ॥ १ ॥
ततो ददर्श नृपतिः प्रासादं सर्वकाञ्चनम् ।
मणिस्तम्भसहस्राढ्यं गन्धर्वनगरोपमम् ॥ २ ॥
वहाँ पहुँचकर नरेशने एक सुन्दर महल देखा, जो सारा-का-सारा सोनेका बना हुआ था। उसमें मणियोंके हजारों खम्भे लगे हुए थे और वह अपनी शोभासे गन्धर्वनगरके समान जान पड़ता था ॥ २ ॥
तत्र दिव्यानभिप्रायान् ददर्श कुशिकस्तदा ।
पर्वतान् रूप्यसानूंश्च नलिनीश्च सपङ्कजाः ॥ ३ ॥
चित्रशालाश्च विविधास्तोरणानि च भारत ।
शाद्वलोपचितां भूमिं तथा काञ्चनकुट्टिमाम् ॥ ४ ॥
भारत! उस समय राजा कुशिकने वहाँ शिल्पियोंके अभिप्रायके अनुसार निर्मित और भी बहुत-से दिव्य पदार्थ देखे। कहीं चाँदीके शिखरोंसे सुशोभित पर्वत, कहीं कमलोंसे भरे सरोवर, कहीं भाँति-भाँतिकी चित्रशालाएँ तथा तोरण शोभा पा रहे थे। भूमिपर कहीं सोनेसे मढ़ा हुआ पक्का फर्श और कहीं हरी-हरी घासकी बहार थी ॥
सहकारान् प्रफुल्लांश्च केतकोद्दालकान् वरान् ।
अशोकान् सहकुन्दांश्च फुल्लांश्चैवातिमुक्तकान् ॥ ५ ॥
चम्पकांस्तिलकान् भव्यान् पनसान् वञ्जुलानपि ।
पुष्पितान् कर्णिकारांश्च तत्र तत्र ददर्श ह ॥ ६ ॥
अमराइयोंमें बौर लगे थे। जहाँ-तहाँ केतक, उद्दालक, अशोक, कुन्द, अतिमुक्तक, चम्पा, तिलक, कटहल, बेंत और कनेर आदिके सुन्दर वृक्ष खिले हुए थे। राजा और रानीने उन सबको देखा ॥ ५-६ ॥
श्यामान् वारणपुष्पांश्च तथाष्टपदिका लताः ।
तत्र तत्र परिक्लृप्ता ददर्श स महीपतिः ॥ ७ ॥
राजाने विभिन्न स्थानोंमें निर्मित श्याम तमाल, वारणपुष्प तथा अष्टपदिका लताओंका दर्शन किया ॥ ७ ॥
रम्यान् पङ्कजोत्पलधरान् सर्वर्तुकुसुमांस्तथा ।
विमानप्रतिमांश्चापि प्रासादान् शैलसंनिभान् ॥ ८ ॥
कहीं कमल और उत्पलसे भरे हुए रमणीय सरोवर शोभा पाते थे। कहीं पर्वत-सदृश ऊँचे-ऊँचे महल दिखायी देते थे जो विमानके आकारमें बने हुए थे। वहाँ सभी ऋतुओंके फूल खिले हुए थे ॥ ८ ॥
शीतलानि च तोयानि क्वचिदुष्णानि भारत ।
आसनानि विचित्राणि शयनप्रवराणि च ॥ ९ ॥
भरतनन्दन! कहीं शीतल जल थे तो कहीं उष्ण, उन महलोंमें विचित्र आसन और उत्तमोत्तम शय्याएँ बिछी हुई थीं ॥ ९ ॥
पर्यङ्कान् रत्नसौवर्णान् परार्घ्यास्तरणावृतान् ।
भक्ष्यं भोज्यमनन्तं च तत्र तत्रोपकल्पितम् ॥ १० ॥
सोनेके बने हुए रत्नजटित पलंगोंपर बहुमूल्य बिछौने बिछे हुए थे। विभिन्न स्थानोंमें अनन्त भक्ष्य, भोज्य पदार्थ रखे गये थे ॥ १० ॥
वाणीवादान् शुकांश्चैव सारिकान् भृङ्गराजकान् ।
कोकिलान् शतपत्रांश्च सकोयष्टिककुक्कुभान् ॥ ११ ॥
मयूरान् कुक्कुटांश्चापि दात्यूहान् जीवजीवकान् ।
चकोरान् वानरान् हंसान् सारसांश्चक्रसाह्वयान् ॥ १२ ॥
समन्ततः प्रमुदितान् ददर्श सुमनोहरान् ।
राजाने देखा, मनुष्योंकी-सी वाणी बोलनेवाले तोते और सारिकाएँ चहक रही हैं। भृंगराज, कोयल, शतपत्र, कोयष्टि, कुक्कुभ, मोर, मुर्गे, दात्यूह, जीवजीवक, चकोर, वानर, हंस, सारस और चक्रवाक आदि मनोहर पशु-पक्षी चारों ओर सानन्द विचर रहे हैं ॥ ११-१२½ ॥
क्वचिदप्सरसां संघान् गन्धर्वाणां च पार्थिव ॥ १३ ॥
कान्ताभिरपरांस्तत्र परिष्वक्तान् ददर्श ह ।
न ददर्श च तान् भूयो ददर्श च पुनर्नृपः ॥ १४ ॥
पृथ्वीनाथ! कहीं झुंड-की-झुंड अप्सराएँ विहार कर रही थीं। कहीं गन्धर्वोंके समुदाय अपनी प्रियतमाओंके आलिंगन-पाशमें बँधे हुए थे। उन सबको राजाने देखा। वे कभी उन्हें देख पाते थे और कभी नहीं देख पाते थे ॥ १३-१४ ॥
गीतध्वनिं सुमधुरं तथैवाध्यापनध्वनिम् ।
हंसान् सुमधुरांश्चापि तत्र शुश्राव पार्थिवः ।। १५ ।।
राजा कभी संगीतकी मधुर ध्वनि सुनते, कभी वेदोंके स्वाध्यायका गम्भीर घोष उनके कानोंमें पड़ता और कभी हंसोंकी मीठी वाणी उन्हें सुनायी देती थी ।। १५ ।।
तं दृष्ट्वात्यद्भुतं राजा मनसाचिन्तयत् तदा ।
स्वप्नोऽयं चित्तविभ्रंश उताहो सत्यमेव तु ।। १६ ।।
उस अति अद्भुत दृश्यको देखकर राजा मन-ही-मन सोचने लगे—'अहो! यह स्वप्न है या मेरे चित्तमें भ्रम हो गया है अथवा यह सब कुछ सत्य ही है ।। १६ ।।
अहो सह शरीरेण प्राप्तोऽस्मि परमां गतिम् ।
उत्तरान् वा कुरून् पुण्यानथवाप्यमरावतीम् ।। १७ ।।
'अहो! क्या मैं इसी शरीरसे परम गतिको प्राप्त हो गया हूँ अथवा पुण्यमय उत्तरकुरु या अमरावतीपुरीमें-आ पहुँचा हूँ ।। १७ ।।
किंचेदं महदाश्चर्यं सम्पश्यामीत्यचिन्तयत् ।
एवं संचिन्तयन्नेव ददर्श मुनिपुंगवम् ।। १८ ।।
'यह महान् आश्चर्यकी बात जो मुझे दिखायी दे रही है, क्या है?' इस तरह वे बारंबार विचार करने लगे। राजा इस प्रकार सोच ही रहे थे कि उनकी दृष्टि मुनिप्रवर च्यवनपर पड़ी ।। १८ ।।
तस्मिन् विमाने सौवर्णे मणिस्तम्भसमाकुले ।
महार्हे शयने दिव्ये शयानं भृगुनन्दनम् ।। १९ ।।
मणिमय खम्भोंसे युक्त सुवर्णमय विमानके भीतर बहुमूल्य दिव्य पर्यंकपर वे भृगुनन्दन च्यवन लेटे हुए थे ।।
तमभ्ययात् प्रहर्षेण नरेन्द्रः सह भार्यया ।
अन्तर्हितस्ततो भूयश्च्यवनः शयनं च तत् ।। २० ।।
उन्हें देखते ही पत्नीसहित महाराज कुशिक बड़े हर्षके साथ आगे बढ़े। इतनेहीमें फिर महर्षि च्यवन अन्तर्धान हो गये। साथ ही उनका वह पलंग भी अदृश्य हो गया ।। २० ।।
ततोऽन्यस्मिन् वनोद्देशे पुनरेव ददर्श तम् ।
कौश्यां बृस्यां समासीनं जपमानं महाव्रतम् ।। २१ ।।
तदनन्तर वनके दूसरे प्रदेशमें राजाने फिर उन्हें देखा, उस समय वे महान् व्रतधारी महर्षि कुशकी चटाईपर बैठकर जप कर रहे थे ।। २१ ।।
एवं योगबलाद् विप्रो मोहयामास पार्थिवम् ।
क्षणेन तद् वनं चैव ते चैवाप्सरसां गणाः ।। २२ ।।
गन्धर्वाः पादपाश्चैव सर्वमन्तरधीयत ।
निःशब्दमभवच्चापि गंगाकूलं पुनर्नृप ।। २३ ।।
इस प्रकार ब्रह्मर्षि च्यवनने अपनी योगशक्तिसे राजा कुशिकको मोहमें डाल दिया। एक ही क्षणमें वह वन, वे अप्सराओंके समुदाय, गन्धर्व और वृक्ष सब-के-सब अदृश्य हो गये। नरेश्वर! गंगाका वह तट पुनः शब्द-रहित हो गया ॥ २२-२३ ॥
कुशवल्मीकभूयिष्ठं बभूव च यथा पुरा ।
ततः स राजा कुशिकः सभार्यस्तेन कर्मणा ॥ २४ ॥
विस्मयं परमं प्राप्तस्तद् दृष्ट्वा महदद्भुतम् ।
ततः प्रोवाच कुशिको भार्यां हर्षसमन्वितः ॥ २५ ॥
वहाँ पहलेके ही समान कुश और बाँबीकी अधिकता हो गयी। तत्पश्चात् पत्नीसहित राजा कुशिक ऋषिका वह महान् अद्भुत प्रभाव देखकर उनके उस कार्यसे बड़े विस्मयको प्राप्त हुए। इसके बाद हर्षमग्न हुए कुशिकने अपनी पत्नीसे कहा— ॥ २४-२५ ॥
पश्य भद्रे यथा भावाश्चित्रा दृष्टाः सुदुर्लभाः ।
प्रसादाद् भृगुमुख्यस्य किमन्यत्र तपोबलात् ॥ २६ ॥
‘कल्याणी! देखो, हमने भृगुकुलतिलक च्यवन मुनिकी कृपासे कैसे-कैसे अद्भुत और परम दुर्लभ पदार्थ देखे हैं। भला, तपोबलसे बढ़कर और कौन-सा बल है? ॥
तपसा तदवाप्यं हि यत् तु शक्यं मनोरथैः ।
त्रैलोक्यराज्यादपि हि तप एव विशिष्यते ॥ २७ ॥
‘जिसकी मनके द्वारा कल्पना मात्र की जा सकती है, वह वस्तु तपस्यासे साक्षात् सुलभ हो जाती है। त्रिलोकीके राज्यसे भी तप ही श्रेष्ठ है ॥ २७ ॥
तपसा हि सुतप्तेन शक्यो मोक्षस्तपोबलात् ।
अहो प्रभावो ब्रह्मर्षेश्च्यवनस्य महात्मनः ॥ २८ ॥
‘अच्छी तरह तपस्या करनेपर उसकी शक्तिसे मोक्षतक मिल सकता है। इन ब्रह्मर्षि महात्मा च्यवनका प्रभाव अद्भुत है ॥ २८ ॥
इच्छयैष तपोवीर्यादन्याँल्लोकान् सृजेदपि ।
ब्राह्मणा एव जायेरन् पुण्यवाग्बुद्धिकर्मणः ॥ २९ ॥
‘ये इच्छा करते ही अपनी तपस्याकी शक्तिसे दूसरे लोकोंकी सृष्टि कर सकते हैं। इस पृथ्वीपर ब्राह्मण ही पवित्रवाक्, पवित्रबुद्धि और पवित्र कर्मवाले होते हैं ॥
उत्सहेदिह कृत्वैव कोऽन्यो वै च्यवनादृते ।
ब्राह्मण्यं दुर्लभं लोके राज्यं हि सुलभं नरैः ॥ ३० ॥
‘महर्षि च्यवनके सिवा दूसरा कौन है, जो ऐसा महान् कार्य कर सके? संसारमें मनुष्योंको राज्य तो सुलभ हो सकता है, परंतु वास्तविक ब्राह्मणत्व परम दुर्लभ है ॥ ३० ॥
ब्राह्मण्यस्य प्रभावाद्धि रथे युक्तौ स्वधुर्यवत् ।
इत्येवं चिन्तयानः स विदितश्च्यवनस्य वै ॥ ३१ ॥
‘ब्राह्मणत्वके प्रभावसे ही महर्षिने हम दोनोंको अपने वाहनोंकी भाँति रथमें जोत दिया था।’ इस तरह राजा सोच-विचार कर ही रहे थे कि महर्षि च्यवनको उनका आना ज्ञात हो गया ॥ ३१ ॥
सम्प्रेक्ष्योवाच नृपतिं क्षिप्रमागम्यतामिति ।
इत्युक्तः सहभार्यस्तु सोऽभ्यगच्छन्महामुनिम् ॥ ३२ ॥
शिरसा वन्दनीयं तमवन्दत च पार्थिवः ।
उन्होंने राजाकी ओर देखकर कहा—‘भूपाल! शीघ्र यहाँ आओ।’ उनके इस प्रकार आदेश देनेपर पत्नीसहित राजा उनके पास गये तथा उन वन्दनीय महामुनिको उन्होंने मस्तक झुकाकर प्रणाम किया ॥
तस्याशिषः प्रयुज्याथ स मुनिस्तं नराधिपम् ॥ ३३ ॥
निषीदेत्यब्रवीद् धीमान् सान्त्वयन् पुरुषर्षभः ।
तब उन पुरुषप्रवर बुद्धिमान् मुनिने राजाको आशीर्वाद देकर सान्त्वना प्रदान करते हुए कहा—‘आओ बैठो’ ॥ ३३ १/२ ॥
ततः प्रकृतिमापन्नो भार्गवो नृपते नृपम् ॥ ३४ ॥
उवाच श्लक्ष्णया वाचा तर्पयन्निव भारत ।
भरतवंशी नरेश! तदनन्तर स्वस्थ होकर भृगुपुत्र च्यवन मुनि अपनी स्निग्ध मधुर वाणीद्वारा राजाको तृप्त करते हुए-से बोले— ॥ ३४ १/२ ॥
राजन् सम्यग् जितानीह पञ्च पञ्च स्वयं त्वया ॥ ३५ ॥
मनःषष्ठानीन्द्रियाणि कृच्छ्रान्मुक्तोऽसि तेन वै ।
‘राजन्! तुमने पाँच ज्ञानेन्द्रियों, पाँच कर्मेन्द्रियों और छठे मनको अच्छी तरह जीत लिया है। इसीलिये तुम महान् संकटसे मुक्त हुए हो ॥ ३५ १/२ ॥
सम्यगाराधितः पुत्र त्वया प्रवदतां वर ॥ ३६ ॥
न हि ते वृजिनं किंचित् सुसूक्ष्ममपि विद्यते ।
‘वक्ताओंमें श्रेष्ठ पुत्र! तुमने भलीभाँति मेरी आराधना की है। तुम्हारे द्वारा कोई छोटे-से-छोटा या सूक्ष्म-से-सूक्ष्म अपराध भी नहीं हुआ है ॥ ३६ १/२ ॥
अनुजानीहि मां राजन् गमिष्यामि यथागतम् ॥ ३७ ॥
प्रीतोऽस्मि तव राजेन्द्र वरश्च प्रतिगृह्यताम् ।
‘राजन्! अब मुझे विदा दो। मैं जैसे आया था, वैसे ही लौट जाऊँगा। राजेन्द्र! मैं तुमपर बहुत प्रसन्न हूँ; अतः तुम कोई वर माँगो’ ॥ ३७ १/२ ॥
कुशिक उवाच
अग्निमध्ये गतेनेव भगवन् संनिधौ मया ॥ ३८ ॥
वर्तितं भृगुशार्दूल यन्न दग्धोऽस्मि तद् बहु ।
एष एव वरो मुख्यः प्राप्तो मे भृगुनन्दन ॥ ३९ ॥
कुशिक बोले— भगवन्! भृगुश्रेष्ठ! मैं आपके निकट उसी प्रकार रहा हूँ, जैसे कोई प्रज्वलित अग्निके बीचमें खड़ा हो। उस अवस्थामें रहकर भी मैं जलकर भस्म नहीं हुआ, यही मेरे लिये बहुत बड़ी बात है। भृगुनन्दन! यही मैंने महान् वर प्राप्त कर लिया ।।
यत् प्रीतोऽसि मया ब्रह्मन् कुलं त्रातं च मेऽनघ ।
एष मेऽनुग्रहो विप्र जीविते च प्रयोजनम् ॥ ४० ॥
निष्पाप ब्रह्मर्षे! आप जो प्रसन्न हुए हैं तथा आपने जो मेरे कुलको नष्ट होनेसे बचा दिया, यही मुझपर आपका भारी अनुग्रह है। और इतनेसे ही मेरे जीवनका सारा प्रयोजन सफल हो गया ।। ४० ।।
एतद् राज्यफलं चैव तपसश्च फलं मम ।
यदि त्वं प्रीतिमान् विप्र मयि वै भृगुनन्दन ॥ ४१ ॥
अस्ति मे संशयः कश्चित् तन्मे व्याख्यातुमर्हसि ॥ ४२ ॥
भृगुनन्दन! यही मेरे राज्यका और यही मेरी तपस्याका भी फल है। विप्रवर! यदि आपका मुझपर प्रेम हो तो मेरे मनमें एक संदेह है, उसका समाधान करनेकी कृपा करें ।।
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि च्यवनकुशिकसंवादे चतुःपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ।। ५४ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें च्यवन और कुशिकका संवादविषयक चौवनवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ५४ ।।